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मेरी बात

 
 

'माटी के तारे' उन बच्चों की कहानियाँ हैं जो अपनी निर्धनता के कारण उपेक्षित और अभिशप्त जीवन बिताने को विवश हैं। तिरस्कृत और उपेक्षित जीवन जी रहे इन बच्चों के मन में भी आकाशीय ऊॅंचाइयाँ छूने की आकांक्षा है। उनके समवयस्क बच्चे जब पीठ पर बैग लटकाए विद्यालय जाते हैं तब देश के ये लाल किसी चूड़ी, जूते, कालीन या पटाखे बनाने वाले कारखानों में हाड़-तोड़ मेहनत कर, कारखाने के धुँए को अपना बचपन अर्पित कर रहे होते हैं। यह धुँआ उनके नन्हें सीनों में धड़कता है। कुछ पा लेने, कर गुजरने की आग उनके अन्दर धधकती है। ज़रूरत है देश की इस भावी पीढ़ी के अन्दर छिपी चिंगारी को हवा देने की। यह पीढ़ी देश का भविष्य है।
संविधान द्वारा इन बच्चों को भी समान अधिकर दिये गये हैं, पर वे अपने अधिकारों से सर्वथा अनभिज्ञ हैं। बाल श्रमिक या बंधुआ मजदूर बने रहना ही क्या इनकी नियति है? उनकी इस नियति के लिये कौन उत्तरदायी है, यह एक बड़ा प्रश्नचिह्म है। कागजों पर अधिकार लिख देने से उनकी सार्थकता पूर्ण नहीं होती। ये अधिकार उन हाथों तक पहुँचाये जाने चाहिए जिन्होंने तिरस्कार को अपनी नियति मान रखा है। इस दिशा में सबसे पहले इन बच्चों को शिक्षा द्वारा जागरूक बनाया जाना चाहिए। इस पुनीत कार्य में देश के प्रत्येक नागरिक का योगदान आवश्यक है। देश की इस भावी पीढ़ी का विकास करने से ही राष्ट्र सशक्त बनेगा।
अगर मेरी कहानियाँ इन नन्हें-मुन्नों के अन्दर छिपी चिंगारी को प्रज्ज्वलित कर सकें तो मेरा लिखना सार्थक है।



---पुष्पा सक्सेना

खिलाड़ी


रोज की तरह उस दिन भी मुहल्ले के लड़के क्रिकेट खेलने के लिए जमा हुए थे। दीनू चैकीदार के ग्यारह वर्षीय पुत्र गोकुल के लिए यह समय सबसे अधिक प्रसन्नता का होता। घर के कामकाज जल्दी-जल्दी निबटा गोकुल, राजा भइया के साथ मैदान में पहॅुंच जाता। आठ वर्ष की आयु से गोकुल, राजा भइया के घर में माँ जी के कामों में हाथ बटाता आया है। इकलौता पुत्र होने के कारण घर में राजा का बहुत प्यार-दुलार होता। वह दुलार गोकुल के मन में कसक जगा जाता, काश उसकी भी माँ होती।
शराब पीकर दीनू, बिन माँ के बच्चे गोकुल को निर्दयता से पीटता। गोकुल के करूण विलाप से पसीजकर, राजा की माँ ने गोकुल को घर के कामकाज में मदद के लिए रख लिया था। सच तो यह है उस घर में आकर गोकुल ने सुख ही माना था। पेट भर रोटी, सोने के लिए स्थान मिल जाने में उसे अपना सौभाग्य दिखा था। दिन-रात खटने को उसने अपनी नियति स्वीकार किया था।
राजा की उम्र गोकुल से एकाध वर्ष अधिक रही होगी, पर अच्छे खानपान के कारण वह गोकुल से काफ़ी बड़ा लगता। राजा का हर आदेश पूरा करने में गोकुल को बहुत प्रसन्नता होती। राजा को बचपन से क्रिकेट खेलने का बहुत शौक था। तेरहवीं वर्षगांठ पर जब राजा को उसके पापा ने क्रिकेट-सेट का उपहार दिया तो राजा फूला न समाया।
बढ़िया क्रिकेट-सेट के कारण मुहल्ले के सभी लड़कों ने राजा को सहज ही टीम का कप्तान स्वीकार कर लिया। राजा की कृपा से दूर फेंकी गई बाँल उठाने के लिए गोकुल को भी टीम में रख लिया गया,पर बैटिंग का उसे कभी अवसर नहीं दिया जाता।
जब भी कोई खिलाड़ी चौआ या छक्का लगाता तो गोकुल की आँखें विस्मय से फैल जाती। लकड़ी के डंडे से वह रबर की गेंद को ज़ोर से मारता, पर बैट छू पाने का साहस कभी न कर सका। अक्सर छुट्टी के दिन राजा अकेले बैटिंग की प्रैक्टिस करता, उस समय गोकुल को बाँलिंग का चांस मिलता। चार वर्षो से बाँलिंग करते-करते गोकुल का हाथ काफी सध गया था। टीवी पर आने वाले क्रिकेट मैचों को वह पूरे ध्यान से देखता।
'राजा भइया स्पिनिंग क्या होती है?'
'अरे बुद्धू तू वो सब जानकर क्या करेगा? तू बाँल फेंक ले, उतना ही बहुत है।'
राजा से ठीक जवाब न मिलने पर गोकुल चुप रह जाता। कभी उसे लगता अगर वह भी पढ़ना-लिखना जानता तो राजा की तरह स्पिनिंग बाँलिंग का मतलब समझ पाता। कभी उसका जी चाहता राजा की तरह उसकी भी सुविधापूर्ण जिदगी होती, पर उन बातों के बारे में क्या सोचना, जो उसे मिल ही नहीं सकती।
एक दिन अपनी मम्मी-पापा के साथ राजा भी एक विवाह में शहर से बाहर गया था। राजा की अनुपस्थिति में उसके क्रिकेट बैट को गोकुल ललचाई निगाहों से देखता। बार-बार जी चाहता एक बार वह भी बैट उठाकर खेल पाता। गोकुल की तरह पास के दूसरे घरों में घर के काम करने वाले उस जैसे लड़कों में रामू, नरेन्दर, गनेशी भी थे। सबने मिलकर राजा के क्रिकेट-सेट को बड़े चाव से छू-छूकर देखा था। वैसे बैट और गेंद से खेलना, उनके भाग्य में कहाँ?
उस रोज जब मुहल्ले के लड़के क्रिकेट खेलने जमा हुए तो राजा के क्रिकेट-सेट के विकेट और बैट के बिना खेल जम नहीं पा रहा था। पिछले कई दिनों से राजा बाहर गया हुआ था। वाइस कैप्टन नवीन ने गोकुल को फुसलाया-
'ऐ गोकुल, राजा का बैट और गेंद क्या ताले में बंद है?'
'नहीं, भइया का कमरा खुला है। उनका सामान वहीं है।'
'तो एक काम कर, क्रिकेट का सामान उठा ला। तुझे टाँफी देंगे।'
'नहीं। भइया से बिना पूछे हम उनका सामान नहीं छू सकते।' दृढ़ स्वर में गोकुल ने 'न' कर दी।
'अगर तू सामान ले आया तो हम तुझे बैटिंग करने का चांस देंगे। नवीन ने गोकुल को लालच दिया था। वह गोकुल का बैटिंग के प्रति मोह जानता था।'
अगर राजा भइया को पता लग गया तो हमे मार पडे़गी। गोकुल शंकित था।
'अरे उसे कैसे पता चलेगा। हममे से कोई नहीं बताएगा। क्यों दोस्तो ठीक कह रहा हूँ न?'
'हाँ-हाँ, हम राजा को नहीं बताएंगे।' टीम के लड़कों ने वादा किया।
'अगर हम बैट और बाँल लाएंगे तो आप हमें बैटिंग करने देंगे न?' गोकुल विश्वास नहीं कर पा रहा था।
'ज़रूर, पर विकेट भी तो लाने होंगे।'
'जी, अभी लाया।' गोकुल तेजी से अन्दर दौड़ गया था। थोड़ी ही देर में हाथ में सामान लिये गोकुल मैदान में आ गया।
मैदान में हमेशा की तरह विकेट गाडे़ गए। आज का खेल, गोकुल के जीवन का एक नया अध्याय खोलने वाला था। आज उसकी जगह कोई और गेंद फेंकेगा और वह बल्ला घुमाएगा। उत्तेजना से गोकुल का चेहरा चमक रहा था।
'नवीन भइया, हम बैटिंग करें? उत्साहित गोकुल को समय काटना मुश्किल लग रहा था।'
'अरे थोड़ा रूक नहीं सकता? ऐसा लगता है जैसे तू ही सबसे बड़ा खिलाड़ी है। तुझे सबसे आखिर में चांस मिलेगा समझा।'
'अपनी किस्मत सराह, हमारे साथ खेलने का मौका मिल रहा है, वर्ना क्या हमारे साथ खेलने की तेरी औक़ात है?' चेहरे पर घृणा के भाव दर्शाता विनोद, काफ़ी सीमा तक क्रूर हो उठा।'
'जी भइया जी।' गोकुल का चेहरा उतर गया। इसका मतलब अगर कोई आउट नहीं तो उसे बैटिंग का चांस ही नहीं मिलेगा।
'गोकुल जब तक तेरी बैटिंग का चांस नहीं आता, तू गेंद दूर जाने पर पकडे़गा।' नवीन ने आदेश दे दिए।
दिन समाप्त होने वाला था और अभी तक पाँच खिलाड़ी ही आउट हो सके थे। दिन भर दौड़ते गोकुल का चेहरा लाल हो उठा था। बैटिंग वाली टीम के खिलाड़ी आराम से पेड़ के नीचे बैठे मैच का आनंद ले रहे थे, पर गोकुल तो उनकी दया का पात्र था, क्रिकेट का खिलाड़ी नहीं।
अचानक नवीन ने ज़ोर से छक्का मारा और न जाने कैसे बैट दो टुकड़ों में टूट गया। अपनी बहादुरी पर नवीन ठठाकर हॅंस पड़ा। लड़कों ने खुशी में तालियाँ बजाई, पर उस टूटे बैट ने गोकुल के सारे सपने तोड़ दिए। अब बैटिंग कर सकने का सपना बस सपना ही रह जाएगा।
कुछ ही पलों में कठोर वास्तविकता अपने सही रूप में स्पष्ट हो गयी। राजा भइया को सारी सच्चाई पता लग जाएगी। उनकी सख्त हिदायत है, बिना उनसे पूछे, उनकी किसी चीज़ को गोकुल हाथ न लगाए। एक बार बिना पूछे गोकुल ने उनकी गुलेल उठाकर निशाना लगा लिया था राजा ने गोकुल की जमकर पिटाई की थी। क्रिकेट का बैट तो उन्हें बहुत प्रिय है। अब गोकुल की ख़ैर नहीं।
गोकुल ने अपना डर नवीन पर प्रकट किया-
'नवीन भइया यह बैट आपने तोड़ दिया, राजा भइया हमें मारेंगे।'
'तो पिट लेना। हमने जानकर तो बैट नहीं तोड़ा। बड़ी आसानी से नवीन ने जवाब दे दिया।'
'ग़लती तेरी ही है, हमने ज़बरदस्ती तेरा हाथ थोड़ी पकड़ा था, तू क्यों लाया?' विनोद ने सीधे गोकुल पर वार कर डाला।
गोकुल की चिन्ता का अन्त न था। समस्या का समाधान किसी तरह नहीं मिल पा रहा था। अचानक गोकुल की दृष्टि गले में पड़े चांदी के तावीज पर गई। गोकुल के जन्म के समय उसकी दादी ने वह तावीज, गोकुल के गले में डाला था। पोते पर किसी की बुरी नजर न पडे़। माँ की मृत्यु के बाद गोकुल को दादी ने ही सम्हाला था। जब तक दादी जीवित रही, गोकुल उनकी प्यार की छाया में सुरक्षित था, पर भगवान ने दादी को भी अपने पास बुला लिया। दीनू ने दूसरी शादी कर ली और गोकुल बाप के रहते भी अनाथ बन गया। शराब के नशे में धुत्त दीनू, गोकुल पर ही सारा आक्रोश उतारता। गले में बंधा दादी का तावीज गोकुल को तसल्ली देता, पर आज निर्णय की घड़ी आ पहॅुंची। उसकी वजह से राजा भइया का बैट टूटा है, उसे ही भरपाई करनी होगी। अपनी गलती का प्रायश्चित उसे ही करना होगा।
पास के गिरधारी लाल सर्राफ ने तावीज के जितने पैसे दिए उनमें एक बैट आसानी से खरीदा जा सकता था। प्रसन्न मन गोकुल जब नया बैट लेकर घर वापस पहॅुंचा तो मनसूबे बांधता आया था, आज इस बैट से रामू और नरेन्दर के साथ थोड़ी देर के लिए क्रिकेट जरूर खेलेगा। तावीज बेचते गोकुल के सामने दादी का स्नेहिल चेहरा तैर गया था, पर हाथ में नया बैट पाकर, वह अपना दुख भूल गया।
घर के बाहर राजा को खड़ा देख गोकुल का दिल बैठ गया। राजा का परिवार तो कल आने वाला था-
'क्यों रे गोकुल, कहाँ गायब था? और यह तेरे हाथ में नया बैट कहाँ से आया?' राजा ने कड़कदार आवाज में पूछा।
'जी..........ई............। यह हमने खरीदा है।' गोकुल की जबान लड़खड़ा आई।
'तूने खरीदा है, तेरे पास पैसे कहाँ से आए?' राजा विस्मित था।
'पैसे कहाँ से लाया रे? बोल कहाँ चोरी करके आया है?' साहब का जोरदार थप्पड़ गोकुल को तिलमिला गया।
'हम सच कहते हैं, हमने चोरी नहीं की साहब।' गोकुल की आँखों में आँसू झिलमिला आए।
'चोरी नहीं की तो ये बैट कहाँ से आया? साहब फिर दहाडे़।'
'यह देखिए पापा इसने हमारा बैट तोड़ डाला। जरूर यह अपने दोस्तों के साथ हमारे बैट से क्रिकेट खेलता था। राजा ने भी गोकुल के दो-चार थप्पड़ जमा दिए।'
'आखिर जात का असर कहाँ जाएगा? इन लोगों को लाख प्यार-दुलार दो, पर खून तो नहीं बदल सकता। छोटे लोग छोटे ही रहेंगे। राजा की माँ ने भी अपना सुर मिलाया था।'
'हम यह बैट राजा भइया के लिए लाए है, माँ जी?'
'चोरी के पैसों से हमारा बेटा नहीं खेलेगा। ले जा अपना बैट और दफ़ा हो जा हमारी आँखों के सामने से। पापा ने गोकुल को धक्का देकर बाहर कर दिया। उसके हाथ का बैट उठाकर दूर फेंक दिया।'
घर में शोरगुल सुनकर पड़ोस के घर से विवेक आ पहॅुंचा। पड़ोसी लड़कों में विवेक का स्वभाव दूसरे लड़कों से अलग था, उसे गोकुल से भी सहानुभूति थी। कल की पूरी घटना का वह चश्मदीद गवाह था। उसने नवीन और विनोद से बात भी की थी कि उनके कारण बैट टूटा है अतः उन्हें मिलकर राजा को सच्चाई बतानी चाहिए वर्ना बेचारा गोकुल मारा जाएगा। विवेक ने चंदा करके नया बैट खरीदने की भी पेशकश की थी, पर उन लड़कों ने विवेक की बात हॅंसकर टाल दी। नवीन ने तो साफ़-साफ़ कह डाला-
'अरे इन लोगों को रोज मार-डांट खाने की आदत ही होती है एक दिन और सही।'
रोता हुआ गोकुल घर के बाहर ही मिल गया।
'यह बैट तू कहाँ से लाया,गोकुल?' प्यार से गोकुल के कंधे पर हाथ रख विवेक ने पूछा।
गोकुल ने सारी बात कह सुनाई। विवेक का मन भर आया। यह गरीब लड़का अपनी दादी की अंतिम निशानी बेच, एक पुराने लकड़ी से बने बैट का मूल्य चुका रहा है।
विवेक के मॅुंह से गोकुल की सच्चाई सुन, सारा परिवार स्तब्ध रह गया।
'तूने ऐसा क्यों किया, गोकुल? अपनी दादी का तावीज एक पुराने बैट के लिए क्यों बेचा?' राजा ने विस्मय से पूछा।
'हमने बिना पूछे आपका सामान दूसरों को दिया, यह हमारी ग़लती थी, राजा भइया। आपके बैट से खेलने का हमें लालच आ गया था....................'
'तूने उन्हें हमारा बैट-बाँल दी, फिर भी क्रिकेट तो खेल नहीं पाया।'
'यह हमारी किस्मत है। हम हैं ही अभागे, वर्ना अम्मा और दादी हमें क्यों अकेला छोड़ जातीं।' गोकुल की आँखें भर आई।
'नहीं राजा तू अभागा नहीं है, अभागे हम है जो तुझ जैसे हीरे को पहचान नहीं सके।' पापा का स्वर गदगद था।
'गोकुल आज से तू मेरा दोस्त है। तू सच्चा खिलाड़ी है, अब तू हमेशा मेरे साथ टीम मे खेला करेगा। जिंदगी के आनंद उठाने का तुझे भी उतना ही अधिकार है जितना हमें।' राजा का स्वर गम्भीर था।
'ठीक कहते हो राजा, हमने कभी नहीं सोचा गोकुल भी एक बच्चा है, इसके मन में भी वही सब कुछ करने की इच्छाएँ होंगी जो दूसरे बच्चे करते है।' राजा की माँ भी उदास हो आई थी।
'अभी कुछ नहीं बिगड़ा है, कल से गोकुल भी हमारी टीम मे शामिल होगा।ष्राजा ने प्यार से कहा।  
गोकुल की खुशी की सीमा न थी। उसे गेंद फेंकने में बहुत मज़ा आता। बैटिंग का चांस छोड़कर खिलाड़ी को आउट करना उसे अच्छा लगता। कुछ ही दिनों के अभ्यास से गोकुल टीम के अच्छे खिलाड़ियों को अपनी गेंद से आउट करने लगा। फिर भी उसे पक्का गेंदबाज नहीं समझा जा सकता था।'
दुर्गा-पूजा की छुट्टियों में दूसरे मुहल्ले के लड़कों ने क्रिकेट-मैच की चुनौती दे डाली। राजा की टीम तैयारी में जुट गई। गोकुल को बारहवें खिलाड़ी की तरह रखा गया था। उतने से ही वह बहुत उत्साहित था।
नियत दिन मैच शुरू होने वाला था, पर बाँलर सुमीत गायब था। तभी किसी ने बताया कल उसके पाँव में चोट आ गई है। आज वह क्रिकेट नहीं खेल सकेगा। राजा की टीम वालें के चेहरों पर हवाइयाँ उड़ने लगीं। तभी गोकुल ने कहा ................
'राजा भइया, आप घबराइए नहीं। बाँलिंग मैं करूँगा।' गोकुल के चेहरे पर आत्मविश्वास था।
कोई उपाय न देख, गोकुल को बाँलिंग का चांस देना ही पड़ा। दूसरी टीम ने टास जीत कर बैटिंग का निश्चय किया।
खेल शुरू होते ही दूसरी टीम के खिलाड़ी ने जोरदार खेल शुरू कर दिया। गोकुल की गेंद पर दो चौके मारते ही राजा को घबराहट शुरू हो गई। अगर ऐसा ही चलता रहा तब तो हार निश्चित थी। थोड़ी ही देर में दूसरी टीम ने सौ के ऊपर रन बना लिए। अचानक गोकुल की गेंद ने सीधे विकेट पर गेंद मार, एक खिलाड़ी को आउट कर दिया। राजा ने गोकुल की पीठ ठोंकी।
अब तो मानो चमत्कार ही हो गया। गोकुल ने एक-एक करके तीन खिलाड़ी आउट कर दिए। तालियों की गड़गड़ाहट से गोकुल का चेहरा चमक उठा। यह तो शुरूआत थी। गोकुल की गेंद ने धमाका ही कर दिया। छह खिलाड़ी अकेले गोकुल की गेंद से ही आउट हो गए। फिर तो खुद राजा और विवेक ने भी धुंआधार बाँलिंग कर, दूसरी टीम को मात्र एक सौ पचहत्तर रन पर आउट कर दिया।
राजा की टीम ने जोश से खेलना शुरू कर दिया। शुरू में दो खिलाड़ी जल्दी आउट हो गए। राजा बस दस रन बना सका, पर बाद के खिलाड़ी जम गए। गोकुल को अच्छा गेंदबाज जरूर माना जाता था, पर उस दिन दो छक्के मारकर टीम को जीत के नजदीक पहॅुंचा दिया। गोकुल ने आखिरी जीत का रन बनाकर, खुशी की लहर दौड़ा दी।
खेल ख़त्म होते ही सबने गोकुल को कंधों पर उठा लिया। निश्चय ही आपकी जीत गोकुल की वजह से संभव हो सकी थी। राजा ने जोर से घोषणा की-
"आज का मैन आफ़ दि मैच गोकुल है।" तालियों के बीच गोकुल का चेहरा खुशी से जगमगा उठा।

ईमानदारी


महानगर में झुग्गी-झोपड़ी में काकी के साथ मोहन, चंदर, बेला, शीलो, रमेश नाम के अनाथ बच्चे रहते थे। आँख खोलते ही उन्होंने अपने को काकी के साथ पाया। काकी उनकी माँ ही नहीं, उनकी सब कुछ थी। काकी फुटपाथ पर छोटी सी चाय की दुकान चलाती थी। बेला और शीलो काकी की मदद करती और पास की बगिया से फूल लाकर सुंदर गजरे भी बनातीं। गजरों को बेचकर जो पैसे मिलते काकी को दे देती। बेला का जन्म जेल में हुआ था। माँ पर हत्या का झूठा इलज़ाम था। अपना फ़ैसला सुनने के पहले ही वह परलोक सिधार गई। हत्यारिन माँ की बेटी को कोई रिश्तेदार रखने को तैयार नहीं हुआ, अन्ततः काकी ने ही उसे अपनाया था।

मोहन, चंदर और रमेश कचरा बीनते। कचरे में प्लास्टिक या काम लायक चीजें कबाड़ी के हाथ बेचकर पैसे काकी को लाकर देते। काकी भी बच्चों को माँ जैसा प्यार देती। रात में वह बच्चों को पढ़ाती और अच्छा इंसान बनने का पाठ पढ़ाती।

दुखों में भी बच्चे खुशी की वजह पा लेते। वे सब आपस में भाई-बहिन थे। मोहन बेला की चोटी पकड़कर खींचता-

"चल मेरी घोड़ी टिक-टिक-टिक"

बेला मोहन की शिकायत काकी से करती। कभी चंदर शीलो के गजरे छीन कर चिढ़ाता-

"ये मॅुंह और मसूर की दाल"

पहनने को अच्छे कपड़े, नहीं, ये गजरा सिर पर लगाएगी। शीलो नहले पर दहला थी पलटकर जवाब देती-

"कभी शीशे में मॅुंह देखा है, बंदर लगता है।"

इसी तरह हॅंसते-खेलते दिन बीत रहे थे। एक दिन कचरा बीनते मोहन को एक पर्स मिला। पर्स खोलने पर उसमें सौ-सौ के कई नोट थे। मोहन के हाथ में रूपये देखकर रमेश उछल पड़ा।

"वाह यार! आज तो अपनी किस्मत खुल गई। अब इन रूपयों से खूब मजे उड़ाएंगे।"

"हाँ, मोहन, संगम में बड़ी अच्छी पिक्चर लगी है। चल आज पहले पिक्चर देखें फिर जी भर के चाट-मिठाई खाएंगे।"

"नहीं, यह ग़लत बात है। इन पैसों पर हमारा हक नहीं है। ये पैसे हम काकी को देंगे, वह इन पैसों को उसके मालिक के पास पहॅुंचा देगी।"

"एक बार फिर सोच ले, मोहन। इन पैसों से हम नए कपड़े भी खरीद सकते हैं। रमेश ने फिर कहा।"

"याद नहीं, काकी कहती है, दूसरों की चीज लेना चोरी है। ये पैसे हमारे नहीं हैं। इन्हें रखना चोरी है।"

"हाँ, मोहन, तू ठीक कहता है। चल हम काकी के पास चलते है। काकी ही ठीक राह दिखाएंगी।"

पूरी बात सुन कर काकी की आँखों में आँसू आ गए। मोहन को सीने से चिपटा काकी ने कहा।

"आज तूने मेरा जीवन सार्थक कर दिया। ईमानदारी से बड़ी न्यामत नहीं।"

"सच कहूँ, काकी तो मेरा और रमेश का मन तो ललचा गया था, पर मोहन ने हमें ठीक बात समझाई।" चंदर ने अपनी गलती मान ली।

"तू तो हमेशा का लालची है।" शीलो ने चंदर को चिढ़ाया।

"चुप बंदरिया, बड़ी आई हमें लालची कहने वाली।"

"चलो बच्चों, हम थाने चलते हैं।"

"थाने क्यों, काकी?" बेला को पुलिस के नाम से अपनी माँ याद आ जाती थी।

"डर नहीं, बेला। हम थाने में यह पर्स लौटाने जा रहे हैं। अच्छे बच्चों को पुलिस से नहीं डरना चाहिए।"

बच्चों के साथ काकी थाने पहॅुंची। थानेदार और एस.पी. काकी की इज्ज़त करते थे। वे जानते थे काकी अनाथ बच्चों को पाल कर नेक काम कर रही है। वह खुद भूखी रही, पर बच्चों का पेट भरती रही।

थानेदार और एस.पी. को पर्स देकर काकी ने पूरी बात बताकर कहा-

"हम चाहते हैं, यह पर्स जिसका है, उसे लौटा दिया जाए।"

पर्स में शहर के नामी सेठ रामचंद्र का कार्ड था। एस.पी. साहब ने सेठ जी को फोन पर बताया कि उनका खोया हुआ पर्स एक बच्चे को मिला है। सेठ जी ने कहा वह मोहन जैसे ईमानदार लड़के से मिलना चाहते हैं।

थोड़ी ही देर में सेठ जी थाने आ पहॅुंचे। मोहन की पीठ थपथपा कर उन्होंने शाबाशी दी।

पर्स से सौ-सौ के कई नोट निकाल कर मोहन की ओर बढ़ाकर कहा-

'यह लो बेटे, यह तुम्हारा इनाम है।'

"नहीं, सेठ जी। यह तो हमारा फर्ज था। हम आपसे पैसे नहीं ले सकते।"

"वाह! तुम तो कमाल के बच्चे हो। अच्छा बताओ बेटा मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूँ?"

"हम सब खूब पढ़ना चाहते हैं। क्या आप हमारी मदद कर सकते हैं?" मोहन ने पूछा।

"जरूर ! मेरा एक स्कूल है। मैं तुम जैसे ईमानदार बच्चों को अपने स्कूल में पढ़ाऊॅंगा। तुम्हें फ़ीस भी नहीं देनी होगी।"

"नहीं, सेठजी। हम स्कूल में कुछ काम करेंगे। हम मुफ्त में नहीं पढ़ना चाहते" दृढ़ स्वर में मोहन ने कहा।

"हम लड़कियों को गजरा बनाना सिखाएँगे।" उत्साह से बेला ने कहा।

"शाबाश बच्चों। तुम काकी का नाम ज़रूर रोशन करोगे।" सेठ ने काकी को भी बधाई दी।

"अच्छा मोहन, तुम क्या बनना चाहते हो?" थानेदार ने प्यार से मोहन से पूछा।

"हम आप जैसे पुलिस वाले बनना चाहते हैं।"

"तुम जरूर पुलिस-अफ़सर बनोगे। तुम्हारे जैसे ईमानदार पुलिस आफ़िसर की देश को ज़रूरत है।"

"अच्छा तो हम चलते हैं। प्रणाम" काकी ने लौटने की इजाजत माँगी।

"ऐसे कैसे जा सकती हो, काकी। कम से कम मिठाई तो खाती जाओ।" थानेदार ने प्यार से कहा।

"मैं काकी के लिए भी स्कूल में कोई अच्छा काम दिलाऊॅंगा। काकी तो सच्ची अध्यापिका है। ये बच्चे काकी की ईमानदारी और सच्चाई के सबूत हैं। सेठ जी ने काकी की प्रशंसा में कहा।"

सेठ जी ने ढे़र सारी मिठाई और टाफियाँ मॅंगाकर बच्चों को बाँटी साथ ही कहा-

"अब कल से तुम कचरा नहीं बीनोगे, कल से तुम सब स्कूल जाओगे। हाँ, जैसा तुमने कहा है, तुम्हें स्कूल में कुछ काम करने होंगे। बोलो तैयार हो?" मुस्करा कर सेठजी ने पूछा।

"हम तैयार हैं" बच्चों ने एक स्वर में कहा। मिठाई खाते बच्चों के चेहरे भविष्य की कल्पना से जगमगा रहे थे।

न्याय की राह

नेहरू पार्क में बाल-मेला आयोजित किया गया था। लोगों की बढ़ती भीड़ देख लग रहा था मानो पूरा शहर मेले मे उमड़ आया हो। रंग-बिरंगे परिधानों में सजे बच्चों और स्त्रियों के कारण मेला रंगीन हो उठा था। मेले के बाहर बच्चों का आकर्षण बढ़ाने के लिए गुब्बारे वाले, चना जोर गरम और मूँगफली मसाले वालों की भारी संख्या उपस्थित थी। खिलौनों की दुकानें बच्चों को बरबस अपनी ओर खींच रही थी। एक ओर बंदर वाला अपनी बंदरिया को मायके न जाने के लिए मना रहा था तो दूसरी ओर दो बांसो के बीच बंधी रस्सी पर नट अपनी साइकिल चला, सबकी वाहवाही लूट रहा था। जोकर तो सब बच्चों के पास जा, उन्हें खूब हंसा रहा था। तभी माइक पर मेले के उद्घाटन के लिए मुख्य अतिथि के आगमन की घोषणा की गई। मेले के गेट के पास फ़ीता काटने की रस्म अदा की जानी थी।

मर्सडीज़ कार से उतरे मुख्य अतिथि क्षेत्र के सांसद घनश्याम दास जी अपने पुत्र राहुल के साथ मेले का उदघाटन करने पधारे थे । अब तक बाहर सिमटी भीड़ ज्वार की तरह मेले के गेट से अन्दर की ओर उमड़ पड़ी।

तभी राहुल की दृष्टि अपने सहपाठी किशोर पर पड़ी। मेले के एक कोने में बैठा किशोर एक व्यक्ति के जूतों पर पालिश कर, उनके जूते चमका रहा था। राहुल के ओठों पर मुस्कान आ गई।

'वह देखिए डैड, मेरा फ्रेंड शायद फेंसी-ड्रेस के लिए बूट पालिश वाला मेकअप करके आया है। आइए न डैड आपको उससे मिला दूँ।'

पिता के लाड़ले राहुल ने अपने पापा को किशोर के सामने ले जा खड़ा कर दिया।

'हलो बूट पालिश मास्टर। मेरे डैड से मिलो। क्यों किशोर, हमारे डैड के शू-पालिश करेगा? राहुल की आवाज में परिहास की खनक थी।'

'नमस्ते। आप अपना पैर यहाँ रख लीजिए, हम पालिश करके खूब चमका देंगे। आपको जूते उतारने की जरूरत नहीं है, सर।'

'वाह मान गए। तुम तो सचमुच अच्छे अभिनेता हो। भई राहुल, तुम्हारा दोस्त हमें बहुत पसंद आया।'

'जी डैड। क्लास में बस यही हमें हरा देता है, वर्ना हमेशा हम ही फ़स्र्ट आते।'

इतने में पीछे से एक सिपाही किशोर पर आकर बरस पड़ा।

'ऐ छोकरे, तू इधर कैसे घुस आया? तुम जैसे छोकरों के लिए बाहर जगह बनी है। तुझे अन्दर आने की मनाही है। चल निकल यहाँ से।'

'माफ़ कीजिएगा सिपाही जी, हमें पता नहीं था हम बाहर जाते है।'

घनश्याम दास जी की ओर मुड़ सिपाही ने दोनों हाथ जोड़ क्षमा माँगी थी।

'ग़लती से छोकरा इधर आ गया। क्षमा करें सरकार। आपसे पैसे तो नहीं माँग रहा था?'

'तुम ग़लत समझ रहे हो, कांस्टेबल। वह लड़का शायद फेंसी डेªस में आया था। वह मेरे साथ स्कूल में पढ़ता है।'

'नहीं भइया जी, हम भी उसे जानते है। माँ-बाप के मर जाने के बाद, चर्च के फादर ने आश्रय दिया है। उसे एक मिशनरी स्कूल में पढ़ने भेजा है। उसकी पूरी फीस माफ़ है। चर्च में ही रहता है। अपना खर्चा निकालने के लिए पार्ट टाइम जूता. पालिश का काम करता है।'

'नहीं, यह सच नहीं हो सकता।' विस्मय से राहुल स्तब्ध था।

'ओ.के.। बहुत हो गया, नाउ स्टाँप दिस नाँनसेंस। घनश्याम दास जी की भृकुटि तन गई।'

उनकी उस मुखमुद्रा को पूरा परिवार पहचानता था। भय से राहुल मौन साध गया। वह जान गया घर जाकर पिता का क्रोध उस पर जरूर उतरेगा। सच तो यह था कांस्टेबल के मॅुंह से किशोर की कहानी सुन, राहुल का मेले का आनंद ही ख़त्म हो गया। किशोर क्लास के दूसरे लड़कों से बिल्कुल अलग था। जिन बातों पर साथी खिलखिला कर हॅंसते , किशोर के ओठों पर मुस्कराहट की रेखा भी नहीं झलक पाती। किशोर के उस गाम्भीर्य ने ही राहुल को उसके प्रति आकृष्ट किया था। कभी उसके गाम्भीर्य पर राहुल विस्मित रह जाता।

'यार, तू किस मिट्टी का बना है। दुनिया की कोई खुशी और ग़म तुझे छू नहीं पाता।'

'सबसे तिरस्कृत मिट्टी से ही मेरा निर्माण हुआ है, राहुल। मैं तेरी दोस्ती के लायक नहीं मित्र।'

'ठीक है, जा नही बोलता तुझसे।' पर राहुल का संकल्प कब टिक पाता? किशोर के बिना राहुल को सब कुछ अधूरा लगता। किशोर की तीक्ष्ण बुद्धि का लोहा तो उसके अध्यापक भी मानते थे। कठिन से कठिन समस्या का समाधान वह मिनटों में कर देता। किशोर सबका प्रिय था, पर उसके जीवन का सत्य कोई नहीं जान पाया। इतने कष्टों के बीच रहकर भी किशोर उतना सामान्य कैसे रह पाता है। राहुल अपने को किशोर के बहुत निकट पाता था, पर उसके जीवन के उस कड़वे सत्य को वह आज से पहले कब जान पाया? कई बार उसने किशोर को उसके कवच से बाहर निकालने का प्रयास किया, पर वह मौन ही रहा। किशोर के प्रति राहुल का मन सहानुभूति से भर उठा।

घर वापस पहॅुंचा राहुल, डैड की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा करता रहा। उन्हें जवाब देने के लिए उसने जवाब भी सोच लिए थे, पर घनश्याम दास न उस पर चीखे न चिल्लाए, बस कार से उतरकर सीधे अपने कमरे में चले गए। जाते-जाते उन्हें डिस्टर्ब न किया जाए की चेतावनी देते गए। राहुल के लिए उनका यह व्यवहार अप्रत्याशित था। सुबह मम्मी से पता चला डैड देर रात तक लोगों से फ़ोन पर न जाने क्या बातें करते रहे। उनका मूड ठीक नहीं लग रहा था।

स्कूल पहॅुंच राहुल ने किशोर की खोज की तो पता लगा उसे प्रिन्सिपल सर ने बुलाया है। राहुल का मन शंका से धड़क उठा, किशोर को प्रिन्सिपल सर ने क्यों बुलाया? अपना बैग डेस्क में रख राहुल प्रिन्सिपल के आँफिस की ओर दौड़ गया। बाहर खड़े किशोर को प्रिन्सिपल चार्ली की धीमी-मृदु आवाज सुनाई दी थी।

'मुझे तुमसे कुछ कहना है एमाई सन'।

'जी सर, मैं सुनने को तैयार हूँ।'

'तुम्हें इस स्कूल से दूसरे स्कूल भेजा जा रहा है।'

'पर क्यों, सर? क्या मैंने कोई ग़लती की है, सर? आप मुझे इस स्कूल से न हटाइए प्लीज।'

'देखो बेटे इस स्कूल की फ़ीस बहुत ज्यादा है इसलिए .....................।'

'सर मैं दिन-रात मेहनत करूँगा, आपकी फफ़स चुकाऊॅंगा, पर मुझे यहाँ पढ़ने दीजिए।'

'आई एम साँरी, माई चाइल्ड। यह मेरे वश की बात नहीं है। तुम ज़हीन लड़के हो जहाँ जाओगे, अच्छा रिज़ल्ट पाओगे। गाँड ब्लेस यू, माई सन।'

उतरे मुख के साथ किशोर बाहर आया था। राहुल की हिम्मत उससे नज़र मिलाने की नहीं हुई। वह पूरी तरह समझ गया किशोर को किस अपराध का दंड मिला था। कल शाम ही तो डैड ने किशोर को लोगों के बूट पालिश करते देखा था, पर क्यो? किशोर के व्यक्तिगत जीवन की कठिनाइयों का क्या उन्होंने समाधान किया है? क्या हक़ है उसके डैड को कि एक ब्रिलिएंट लड़के को स्कूल से सिर्फ़ इसलिए निकलवा दें क्योंकि वह किसी आभिजात्य वर्ग से नहीं बल्कि एक निर्धन निम्न वर्ग से आता है। नहीं राहुल यह अन्याय नहीं होने देगा।

अचानक कमरे में घुस आए राहुल को देख प्रिन्सिपल चैक गए। बिना आज्ञा उनके कमरे में घुस आने का दुस्साहस कोई नहीं करता। गम्भीर स्वर में उन्होंने पूछा था-'यस। कोई ख़ास बात?'

'सर, आप जिस स्कूल में किशोर को भेज रहे हैं, मैं भी उसी स्कूल में पढ़ना चाहता हूँ।'

'व्हाँट नाँन्सेंस। राहुल, तुम जानते हो तुम किसके बेटे हो?'

'जी हाँ, बहुत अच्छी तरह जान गया हूँ।'

'फिर भी तुम उस स्कूल में पढ़ने जाना चाहते हो, जहाँ लेबर-क्लास के बच्चे पढ़ते हैं।'

'यस सर, क्या लेबर-क्लास के बच्चे हमसे अलग होते हैं? नहीं सर, यह वर्ग-भेद मेरे डैड जैसे अमीरों की देन है।'

'कूल डाउन चाइल्ड। इस वक्त तुम गुस्से में हो, थोड़ी देर बाद मेरे पास आना।'

'नहीं सर, मैं ज़रा भी गुस्सा नहीं हूँ, हाँ मैं बहुत दुखी जरूर हूँ। मुझे अपने डैड पर शर्म आ रही है। अच्छे स्कूल में पढ़ना किशोर का अधिकार है। आप उसका यह अधिकार उससे नहीं छीन सकते।'

'मुझे बहुत खुशी है राहुल, तुम इस तरह से सोचते हो। भविष्य में तुम जरूर एक सत्यनिष्ठ न्यायी अधिकारी बनोगे।'

'अगर आपकों न्याय से प्यार है तो मेरे डैड के अन्याय में उनका साथ क्यों दे रहे हैं, सर?'

'तुम्हारी बातें ठीक हैं राहुल, मैं कोशिश करूँगा किशोर को न्याय मिले। मैं उसका केस राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के पास भेज सकता हूँ, पर पहले तुम अपने डैड से बात करके देख लो।'

'जी, मैं कोशिश करूँगा सर।'

राहुल न ेशांतिपूर्ण ढंग से सत्याग्रह करने की ठान ली। मम्मी से साफ़ कह दिया जब तक डैड, किशोर को न्याय नहीं देंगे, वह रूखी रोटी खाएगा, ज़मीन पर सोएगा और अगर डैड नहीं मानते तो जिस स्कूल में किशोर पढ़ेगा, उसी में राहुल भी पढ़ेगा।

दो दिन बाद धनश्याम दास को हथियार डालने पड़ गए। स्कूल के प्रिन्सिपल ने बोर्ड आँफ डाइरेक्टर्स को समझाया किशोर जैसे प्रतिभाशाली लड़के से स्कूल का नाम ऊॅंचा होगा। मिस्टर चड्ढा किशोर की कहानी सुन द्रवित हो गए।

'यही तो हमारे देश का दुर्भाग्य है जहाँ बुद्धि और प्रतिभा को चांदी के चंद सिक्कों से तौला जाता है। हमें तो ऐसे लड़के पर गर्व करना चाहिए जो अपने हाथ की कमाई से अपना खर्च चलाता है, पर किसी के आगे हाथ नहीं फैलाता।'

डाक्टर सुनीता के मन, में किशोर के प्रति ममता जाग उठी।

आज से किशोर का पूरा दायित्व मैं लेती हूँ, उसे बूट पालिश करने की जरूरत नहीं है।

स्वाभिमानी किशोर को जब यह प्रस्ताव सुनाया गया तो उसने किसी की भी सहायता लेने से साफ इंकार कर दिया।

'मेरे पिताजी कहते थे बिना किसी का काम किए सहायता लेना, भीख लेने के बराबर है। अगर डाँक्टर सुनीता मेरे लायक कोई काम दें तो जरूर उनकी सहायता स्वीकार करूँगा।'

प्रिन्सिपल चार्ली का चेहरा खुशी से चमक उठा। किशोर तो सचमुच उनके स्कूल का हीरा था। अन्ततः स्कूल की लाइब्रेरी में दो घंटे सहायता करने का काम किशोर को सौंपा गया। किशोर उसी स्कूल में पढ़ेगा। राहुल की आँखें खुशी से जगमगा उठीं।

किशोर के ओठों पर पहली बार मुस्कान दिखी थी।

'मैं तुम्हारा बहुत आभारी हूँ, राहुल........................'

'नहीं दोस्त, यह कहकर मुझे शर्मिन्दा मत करो। मैं समझ नहीं पा रहा अपने डैड के दुष्कर्म का प्रायश्चित कैसे करूँ। उन्होंने तुम्हे कितना मानसिक कष्ट पहॅुंचाया है। उन्होंने तुझसे तेरा अधिकर छीना था, किशोर।'

'नहीं राहुल तुम्हारे डैड बहुत अच्छे इन्सान है। जानता है दो दिन पहले वह मुझसे माफ़ी मांगने, चर्च आए थे।'

'ओह किशोर, यह बताकर तूने मेरे सीने पर से कितना बड़ा बोझ हटा दिया, तू नहीं जानता।'

घनश्याम दास के कमरे में पहॅंुच राहुल ने डैड के पाँव छू, उन्हें चमत्कृत कर दिया।

'अरे................ यह क्या, राहुल?'

'आप बहुत अच्छे हैं, डैड। मेरी ग़लती माफ़ कर दीजिए।'

'नहीं अच्छा तो मेरा बेटा राहुल है जिसने अपने पिता को अन्याय की राह पर जाने से बचा लिया। मुझे तुम पर गर्व है, मेरे बच्चे।'

राहुल को सीने से लगाए घनश्यामदास का चेहरा पुत्र प्रेम के आलोक से जगमगा उठा।

एक तराशा हीरा

आगरा शहर से कुछ दूर बसे गाँव में रहने वाले ज्यादातर मजदूर चमड़े के कारखानों में काम करते थे। क़रीम के घर में बड़ा बेटा रहमान दो बेटियाँ अकीला और रेहाना के बाद सबसे छोटा बेटा कमाल था। क़रीम आगरा के जूता बनाने वाले कारखाने में काम करता है। बड़े बेटे रहमान से क़रीम को काफ़ी उम्मीदें थीं, पर फ़िल्मों के चक्कर में पड़कर रहमान कुछ दिन पहले माँ के संदूक से ज़ेवर चुराकर बम्बई भाग गया। क़रीम के लिए यह चोट सह पाना आसान न था। रहमान उसके साथ जूतो के तल्ले बनाया करता। दोनों की आय से घर का खर्च चल रहा था। बड़ी बेटी अकीला के ब्याह का कर्ज़ सिर पर था और अब दूसरी बेटी रेहाना भी शादी के लिए तैयार थी। छ्ठी कक्षा मे पढ रहे कमाल से अब्बा.अम्मी की परेशानियाँ छिपी नहीं थी। इसीलिए उसने अब्बा के साथ जूते के कारखाने में काम करने का निर्णय ले डाला। कमाल की बात सुनकर क़रीम चैंक उठा।

'यह क्या कह रहा है, बेटा? तेरी अभी उमर ही क्या है। इतनी मेहनत कैसे कर पाएगा? फिर तेरी पढ़ाई का क्या होगा?'

'वह सब मैंने सोच लिया है, अब्बू। मैं रात को मौलवी साहब से पाठ पढ़ लिया करूँगा। रही बात मेहनत की तो आपने भी तो मेरी ही उम्र से यह काम शुरू किया था न, अब्बू?'

बेटे की बात सुन, क़रीम की आँखों में आँसू छलछला आए। ज़मीला बेगम ने ऐसा बेटा पाने के लिए अल्लाह का शुक्रिया अदा किया। अकेले क़रीम की कमाई से घर का खर्च चलाना ही मुश्किल होता फिर कर्ज़ा उतारना तो नामुमकिन ही होता। कारखाने में काम के लिए कमाल को भेजती ज़मीला का जी भरा आ रहा था। खाने का डिब्बा थमाते अम्मी ने समझाया था-

'ठीक वक्त पर खाना खा लेना, कमाल बेटा।'

'जी अम्मी, आप बिल्कुल परेशान न हों, मैं अब्बा को भी खाने की याद दिला दूँगा।'

'परेशान कैसे न होऊॅं, ये दिन तो तेरे खाने-खेलने के थे, पर तू हम सबका पेट भरने के लिए मज़दूरी करने जा रहा है।' ज़मीला ने आंचल से आँसू पोंछ लिए।

'बच्चे को काम पर भेजते, मन खराब न करो बेगम, अल्लाह अच्छे दिन जरूर लाएगा।' क़रीम ने ज़मीला को तसल्ली दी।

'काश् हमारा रहमान भी कमाल जैसा होता।' जमीला ने बड़े बेटे की याद कर, गहरी सांस ली।

'उसका नाम भी न लो, बेगम। वह तो हमारी जमा-पॅंूजी भी ले गया। घर के चिराग़ ने ही घर में आग लगाई हैं। क़रीम, रहमान का नाम भी नहीं सुनना चाहता था।'

'ऐसा न कहें अब्बा, भाई जान जरूर वापस आएंगे। चलिए अब्बा देर हो रही है।'

कारखाने में क़रीम के साथ कमाल को आता देख, क़रीम के परिचित मजदूरों में से किसी ने तो हमदर्दी जताई, पर कुछ ने टोक दिया। अमज़द क़रीम का हमउम्र दोस्त था। कमाल उसे प्यारा लगता।

'यह क्या क़रीम, इतने ज़हीन बेटे की पढ़ाई छुड़ा, इसे इस काम में झोंकना क्या ठीक बात है? यह वक्त इसकी तालीम का है।'

'मैंने भी लाख मना किया, पर यह मानता ही नहीं, कहता है रात में पढ़ाई कर लेगा।'

'चाचा, आप मेरी फिक्र न करें। आपके साथ रहते जो हुनर सीख जाऊॅंगा, वह ज़िंदगी भर काम आएगा।' बड़ी शांति से जवाब दे, कमाल काम में लग गया।

'खुश रहो, बेटा। क़रीम तू सचमुच किस्मत वाला है जो कमाल जैसा बेटा मिला।'

कुछ ही दिनों में कमाल जूतों के तल्ले बनाना सीख गया उसके हाथ की सफ़ाई देखने वाली होती। खाली वक्त में जब उसके हम-उम्र लड़के खेलते, कलाम चमड़े की कतरनों को जोड़कर चप्पलों के नमूने तैयार करता। पिछले तीन दिनों से चमड़े की कतरनें जोड़कर वह अपनी मम्मी के लिए चप्पलों की एक जोड़ी तैयार करना चाह रहा था। चप्पल तैयार थी, पर तला बनाने के लिए चमड़ा नहीं था। अन्ततः कमाल ने तरीका निकाल लिया। चप्पल के नीचे पुराने टायर का तला बनाकर, उसके ऊपर चमड़े की कतरनें चिपकाकर, चप्पल को तैयार कर लिया। कमाल का नन्हा मन संतोष से भर उठा। चमड़े की चप्पलें देखकर अम्मी कितनी खुश होगी। चमड़े के जूते-चप्पलें बनाने वाले अब्बू, अम्मी के लिए चमड़े की चप्पलें कब खरीद सके? अम्मी ने हमेशा सस्ती प्लास्टिक की चप्पलें ही पहनी है। चप्पल की जोड़ी देख क़रीम चैंक गया, कौन कह सकता है कि ये चप्पलें फेंकी गई बेकार कतरनों से बनाई गई हैं।

'वाह बेटे, तूने तो कमाल कर दिया। एक दिन तू जरूर नामी कारीगर बनेगा।'

'शुक्रिया अब्बू, पर मेहरबानी करके आप अम्मी को इस बारे में अभी कुछ न बताइएगा।'

'वो क्यों बेटे?'

'मैं ये चप्पलें अम्मी को ईद पर देना चाहता हूँ।'

'खुदा तुझे लम्बी उमर दे, हमें तुझ पर नाज़ हैं।'

बाप-बेटे बातों में इतने मशगूल थे कि उन्हें पता ही नहीं लगा कारखाने के मालिक, मुहम्मद अन्सारी पीछे खड़े उनकी बातें सुन रहे हैं। अचानक सामने मालिक को खड़ा देख क़रीम अचकचा गया।

'सलाम मालिक, यह मेरा बेटा कमाल हैं। कमाल, मालिक को सलाम कर। यही हमारे माई-बाप हैं।'

'वाह! लगता है तुम्हारा बेटा कुछ पढ़ा-लिखा भी हैं।'

'जी हुजूर, पाँचवीं में पढ़ रहा है। दिन में मेरे साथ काम करता है, शाम को मौलवी साहब के पास पढ़ने जाता है।'

'पढ़ना.लिखना अच्छा लगता है, कमाल?'

'जी सर, मैं पूरा मन लगाकर पढ़ाई करता हूँ। अल्लाह मेहरबान रहे तो इस बार भी अव्वल रहूँगा'

'वाह तुम तो बड़े ज़हीन मालूम होते हो।'

क़रीम से मालिक को बात करते देख, आसपास के कुछ मजदूर इकट्ठे हो गए। अमज़द मालिक की बातें ध्यान से सुन रहा था। कमाल की तारीफ सुन, उससे नहीं रहा गया।

'मालिक इस लड़के का नाम ही कमाल नहीं है।, यह सचमुच कमाल का लड़का है। शुरू-शुरू में चमड़ा कूटते इसकी हथेलियों पर खून छलछला आता, पर इसने कभी उफ़ नहीं करी।'

'यही नहीं, जब इसके हमउम्र खेलते, उस वक्त भी यह काम करता ताकि इसके अब्बू को ज्यादा पैसे मिल सकें।' रहीम ने भी अपनी राय जाहिर की थी।

'क्या यह सच है, कमाल?'

'मैं यह नहीं जानता था रहीम चचा और अमजद चचा जान मुझे इतना प्यार करते हैं मैं आज जान सका, मैं कितना खुशकिस्मत हूँ।'

तुम्हारा बेटा सचमुुच धूल में पड़ा हीरा है,क़रीम। इसे तराशने की जरूरत है।

'यह आपकी मेहरबानी है हुजूर।'

'कमाल, जरा यह चप्पल तो दिखाना।'

'इसकी ग़लती माफ करें मालिक, नादान है। खाली वक्त में चमड़ें की बेकार कतरनें जोड़कर चप्पल की ये जोड़ी बनाई है। कारखाने के काम के वक्त यह अपना काम नहीं करता' क़रीम घबरा गया था।

'वाह, ये चप्पलें तो बहुत खूबसूरत हैं। चमड़े की बेकार कतरनों से भी इतनी अच्छी चीज बनाई जा सकती है। मैं सोच भी नहीं सकता।'

'शुक्रिया, सर। अगर आप इजाज़त दें तो मैं ये चप्पलें अपनी अम्मी को देना चाहता हूँ। अगर आप चाहें तो चमड़े की कतरनों की कीमत ले लीजिए।'

'नहीं बेटे। ये तोहफ़ा तुम्हारी अम्मी का है। इसे पैसों से नहीं तौला जा सकता। मैं जानता हूँ तुम्हारी अम्मी इसे पाकर कितनी खुश होंगी। एक बात और, मेरी ओर से नए चमड़े की एक और जोड़ी चप्पल बनाकर, अपनी अम्मी को जरूर देना।'

'शुक्रिया, सर। आप बहुत अच्छे हैं।'

खुशी से कमाल का चेहरा चमक उठा।

'अब्दुल क़रीम एक घंटे बाद कमाल के साथ तुम मेरे आँफिस में आना।'

'जी मालिक, अभी पहॅुंचता हूँ।'

करीम को अपने आँफिस में आने के निर्देश देकर अन्सारी साहब चले गए। जाते वक्त कमाल के सिर पर प्यार से हाथ फेर दुआ दी थी।

'चल बेटा खाना खा लें।'

सामने लगे नल से हाथ धो, एक पेड़ की छाया में बैठ करीम ने कपड़े में बंधा प्लास्टिक का डिब्बा खोला था। डिब्बे में रोटी, प्याज और पुदीने की चटनी थी।

'वाह, आज तो अम्मी ने बड़ी जोरदार चटनी बनाई है।' सूखी रोटी पर चटनी लगा कमाल ने टुकड़ा तोड़ मॅुंह में रखा था।'

'या अल्लाह, तू सचमुच कमाल का है। सूखी रोटी खाकर भी कोई शिक़ायत नहीं। खुदा तुझे सारे जहाँ की खुशियाँ दे।'

'आमीन।' पास बैठे रोटी खा रहे अमज़द ने भी कमाल को दुआ दी थी।

खाना खाकर दोनों अन्सारी साहब के आँफ़िस पहॅुंचे। दरवाजे के बाहर बैठा चपरासी क़रीम को देख ताज्जुब में पड़ गया।

'क्या हुआ, क़रीम भाई? कोई ख़ास मुश्किल आ गई है क्या?'

'नहीं भइया, मालिक ने बुलाया है।'

'अच्छा, कोई ग़लती तो नहीं की?'

'अल्लाह जाने क्यों बुुलाया है। अपनी जान में तो हमने कोई ग़लत नहीं की। जरा साहब को ख़बर कर दो भइया।'

'देखता हूँ, साहब बहुत बिज़ी हैं।'

कमरे से बाहर वापस आए चपरासी का रूख ही बदला हुआ था।

'जाओ भाई, साहब तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं।'

परदा उठाकर क़रीम के साथ कमाल मालिक के कमरे में पहॅुंचा था। कमरे के वैभव ने कमाल की आँखें चैंधिया दीं। मिट्टी के बने घर में, टीन के टुकड़ों से छाई गई छत के नीचे रहने वाले कमाल के लिए वह कमरा एक अजूबा ही था। धूप में रहकर काम करने वाला क़रीम भी कमरे की ठंडक में सुकून का अनुभव कर रहा था।

अदब से साहब को आदाब कर, दोनों निर्देश की प्रतीक्षा में खड़े थे।

'बैठो अब्दुल क़रीम, कमाल तुम भी बैठो।'

'नहीं मालिक हम खड़े ही ठीक हैं, आपके सामने बैठने की जुर्रत कैसे कर सकते हैं।'

'नहीं क़रीम मियां, जब तक तुम दोनों नहीं बैठोगे मैं अपनी बात नहीं कह सकगा।'

मालिक के निर्देश को टालना संभव नहीं था।

'तुम्हारे बेटे में मैंने एक अच्छे इंसान और कुशल कामगार को देखा है, क़रीम मियां। जो लड़का फेंकी गई कतरनों से इतनी अच्छी चप्पलें बना सकता है, अगर उसे काम की ट्रेनिंग दी जाए तो वह हमारे कारखाने के लिए कितने काम का आदमी होगा, तुम समझ सकते हो?'

'आपके सामने मैं क्या कहूँ, सरकार?'

'मैं आपके कमाल को माँगना चाहता हूँ?'

'आपका हुक्म सर-आँखों सरकार, पर मैं आपकी बात ठीक समझ नहीं सका हुजूर।'

'मेरा मतलब है, कमाल की पढ़ाई उसकी ट्रेनिंग का पूरा खर्चा हमारी कम्पनी उठाएगी। जब तक कमाल की टेªनिंग पूरी नहीं होती, आपको कमाल की तनख्वाह बराबर मिलती रहेगी।'

'अल्लाह आपको दुनिया-जहान की खुशियाँ दे। इसकी अम्मी की भी यही ख्वाहिश थी, यह खूब पढ़े।' खुशी से क़रीम की आँखें छलछला आई

'कमाल बेटे, तुम क्या बनना चाहते हो।?' प्यार से अंसारी साहब ने पूछा था।

'मेरा सपना है, खूब पढ़-लिखकर एक जूते की फैक्ट्री खोलूँ, जिसमें नई-नई डिज़ाइन के जूते-चप्पलें तैयार कर सकूँ।'

'अल्लाह तुम्हारे सपने ज़रूर पूरे करेगा, बेटे। क़रीम मियां, मैंनेजर साहब कमाल की पढ़ाई और टेªनिंग का पूरा इंतजाम करा देंगे। अब आप जाकर यह खुशख़बरी अपनी बेग़म को दें।'

'सलाम मालिक।' खुशी से क़रीम के पाँवों को जैसे पंख मिल गए।

घर पहॅुंचे क़रीम का खिला चेहरा देख ज़मीला को लगा, रहमान की कोई खबर मिली है। क़रीम से पूरी बात सुन जमीला की आँखें भर आई अल्लाह क्या उन पर इतना मेहरबान हो सकता है? तभी कमाल ने अपने झोले से चप्पल निकाल अम्मी को दी थी।

'वाह। इतनी खूबसूरत चप्पलें, किसने बनाई हैं?'

'तुम्हें पसन्द आई, अम्मी?' कमाल जवाब पाने को उत्सुक था।

'पसन्द आने से क्या फ़ायदा? ये चप्पलें तो अमीरों के लिए हैं। किसके लिए बनाई हैं बेटे?'

'ये चप्पलें मैंने तुम्हारे लिए बनाई हैं, अम्मी।'

'पर तू तो कह रहा था, ये चप्पलें अम्मी को ईद पर देगा?' करीम ताज्जुब में था।

'तब तक दूसरी चप्पलें बन जाएंगी। अब्बू, याद नहीं सर ने क्या कहा था?' कमाल मुस्करा रहा था।

'सच तुझ पर कुर्बान जाऊॅं बेटे, खुदा तुझे हर कामयाबी दे।' ज़मीला ने चप्पलें सीने से लगा लीं।

'सच, आज तुम्हारी इन चप्पलों की वजह से करिश्मा ही हुआ। उस करिश्में की वजह से अल्लाह के रहमों-करम पर पूरा यकीन हो गया।'

'अल्लाह हमारे कमाल को बड़ा आदमी बनाए, हमारे दुख दूर हों।'

'नहीं अम्मी, हम बस अच्छे इंसान बनना चाहते है। आज हमें आगे बढ़ने का जो मौका मिला है, अल्लाह सबको दे।'

'अब मुझे यकीन है हमारा कमाल कारखाने का बड़ा अफसर बनेगा। मैं तो जिंदगी भर मजदूर ही रहा, पर मेरा बेटा कुछ बन सके इसी में हमारी खुशी है।'

'मजदूरी करना शर्म की बात नहीं है, अब्बू। ईमानदारी से किया गया हर काम, इज्ज़त का होता है। मुझे आप पर नाज़ है।'

'खुश रहो बेटे।' सच्चे दिल से क़रीम ने बेटे को दुआ दी थी।

अधिकार

नई अध्यापिका के कक्षा में पहॅुुचते ही शांति छा गई। सुस्मिता सेन ने उपस्थिति रजिस्टर खोल, बच्चों के नाम पुकारने शुरू किए। अपने-अपने नामों पर बच्चे 'उपस्थित मैडम' कहते जा रहे थे। राजा का नाम पुकारते ही कक्षा में खलबली सी मच गई। एक उदंड दबंग से लड़के ने आवाज कसी।

'उसका नाम राजा है, पर वह स्वीपर का बेटा है एमैडम। है न मजेदार बात।' उसकी बात पर कक्षा के लड़कों को जैसे जी खोल, हंसने का बहाना मिल गया।

रजिस्टर से दृष्टि उठा सुस्मिता ने जिधर से एक धीमी आवाज में 'उपस्थित' का शब्द आया था उधर निगाह डाली। मामूली कपड़ों में सिर मे तेल लगाकर संवारे गए बालों वाला लड़का, साथियों की खिलखिलाहट पर सहम सा गया था।

स्वीपर का लड़का क्या राजा नहीं हो सकता? ईमानदारी से किया जाने वाला हर काम इज्ज़त का होता है, सुधीर।'

'जी................जी............, पर स्वीपर को क्या कोई और नाम नहीं मिला?'

'एक बात जान लो बच्चों। तुम सब एक प्रजातंत्र देश में रहते हो। यहाँ हर इंसान को अपने तरीके से जीने का अधिकार है। मैं चाहती हूँ, तुम सब मिलकर रहो। इस तरह की बातें अच्छे बच्चे नहीं करते।'

सुस्मिता सेन को लगा उनकी बातें सुनकर राजा की आँखों में खुशी की चमक झलक आई।

बच्चों का परिचय ले, सुस्मिता सेन ने अपना परिचय दिया था।

'मैं तुम्हारी क्लास-टीचर हूँ और तुम्हें गणित और अंग्रेजी पढ़ाया करूँगी। तुममें से किस-किस को ये विषय अच्छे लगते हैं।'

आधे से कम बच्चों ने हाथ ऊपर किए थे। राजा ने भी जैसे डरते-डरते हाथ उठाया था।

'राजा, पिछली कक्षा में तुम्हें इन विषयों कितने अंक मिले थे?'

'जब टीचर ने कापी दिखाई तब तो सौ में से सौ अंक मिले थे, पर रिज़्ल्ट कार्ड में बस पचहत्तर ही अंक थे।'

'यह झूठ बोलता हैए मैडम। असल में टीचर के घर इसकी माँ खाना बनाने का काम करती है इसीलिए उन्होंने इसे पूरे-पूरे नम्बर दे दिए। मेरी रिपोर्ट पर प्रिन्सिपल ने कापी की जाँच की तो इसके नम्बर काट दिए गए। क्यों दोस्तों, यह सच है न?'

सगर्व सुधीर ने साथियों पर दृष्टि डाली थी।

'जी मैडम, सुधीर सच कहता है।' रोहित ने सुधीर की बात का समर्थन किया ।

'यह सच नहीं है, मैडम। हमने सारे सवाल सही किये थे............।' राजा का चेहरा उदास था।

'ठीक है अब मैं देखूँगी किसको कितने नम्बर मिलते हैं। तो आज मैं तुम्हें एक बहादुर लड़के नेल्सन की कहानी पढ़ाती हूँ।'

सुस्मिता ने नोटिस किया राजा पूरी तन्मयता और एकाग्रता के साथ पाठ पढ़ रहा था। नेल्सन की पितृ-भक्ति पर वह गर्वित था। सुधीर के मित्रों को जबरन पुस्तक पर ध्यान देना पड़ रहा था क्योंकि बार-बार उनकी दृष्टि अपनी कलाइयों पर बंधी घड़ियों पर जा रही थी, कभी बाहर उड़ती चिड़ियाँ उनका ध्यान खींच लेती।

खाने की छुट्टी की घंटा बजते ही बच्चे बाहर भाग गए। राजा को अपने स्थान पर बैठा देख, सुस्मिता उसके पास चली गई।

'तुम खाना नहीं खाओगे?'

'हम घर से खाकर आए है, टीचर जी।'

'घर से तो तुम बहुत सुबह आए थे।'

'हमें दो वक्त खाने की आदत है, टीचर जी।'

गम्भीरता से बात कह, राजा ने पढ़ने के लिए एक किताब निकाल ली।

दस-ग्यारह वर्ष के राजा की उस गम्भीरता ने सुस्मिता को द्रवित कर दिया। परिस्थितियों ने बच्चे को प्रौढ़ों वाली गम्भीरता दे दी थी।

कक्षा में पूछे जाने वाले हर प्रश्न के उत्तर में राजा का हाथ जरूर उठता। उसके उत्तर हमेशा ठीक होते, पर उत्तर देते वक्त वह जैसे डरा सा रहता। सुस्मिता उसके उत्तरों की जब प्रशंसा करती तो उसका चेहरा चमक उठता। सुस्मिता की प्रशंसा पर सुधीर का चेहरा उतर जाता। राजा के प्रति सुधीर की ईष्र्या का कारण सुस्मिता सेन को जल्दी ही ज्ञात हो गया। सुधीर के पिता शहर की नामी हस्तियों में होने के साथ ही स्कूल के चेयरमैन थे। स्कूल के सभी अध्यापक. अध्यापिकाएं सुधीर को प्रसन्न रखने की प्राणपण चेष्टा करते। बिना पढ़े प्रथम आना एसुधीर का अधिकार था। कुछ टीचर तो घर जाकर परीक्षा के प्रश्न-पत्र पहले ही सुधीर से हल करा लेते। दिव्या नारायण ने पिछली कक्षा में राजा को सर्वोच्च अंक देने का अपराध कर डाला, उसका दंड उसे भरना पड़ा था। चेयरमैन दहाड़ उठे थे।

'यह कैसी टीचर रख ली है आपने। हमारे टुकड़े तोड़ने वाला स्वीपर का बेटा प्रथम आएगा और हमारा बेटा गणित विषय में फ़ेल रहे? क्या इसीलिए हमने स्कूल चलाया हैं।'

दिव्या नारायण को लापरवाह करार दे, स्कूल की नौकरी से निकाल दिया गया। प्राइवेट स्कूलों की यही नियति सुस्मिता सेन को असह्य थी। उसके पिता ने हमेशा न्याय का साथ दिया, उनकी शिक्षा सुस्मिता के रक्त में बहती थी।

स्कूल की वार्षिक परीक्षाएं शुरू हो गई। प्रिन्सिपल ने सुस्मिता को अपने कक्षा में बुलाकर कहा था-

मिस सेन, आप स्कूल में नई आई हैं। सुधीर चंद्र चेयरमैन साहब का इकलौता बेटा है हमें उसका भविष्य संवारना है, उसका ख़ास ख्याल रखिएगा।

'जी सर, मैं अपना दायित्व अच्छी तरह समझती हूँ। बच्चा देश का भविष्य है।' दृढ़ता से अपनी बात कह सुस्मिता वापस लौट आई।

उसी शाम राजा का पिता रामलाल, सुस्मिता के घर आया। सुस्मिता विस्मित हो उठी, कहीं सुधीर ने जो कहा वही सच तो नहीं। रामलाल पुत्र को अधिक अंक देने की सिफ़ारिश तो नहीं लाया है, पर पिछले कुछ महीनों में वह इतना अवश्य जान गई थी राजा जैसे मेधावी लड़के के लिए किसी सिफ़ारिश की आवश्यकता नहीं थी। सुस्मिता के प्रोत्साहन और प्यार ने एक सहमे लड़के की जगह आत्मविश्वास से परिपूर्ण नए राजा को जन्म दिया था।

'कहो, रामलाल क्या बात है?' न चाहते हुए भी सुस्मिता सेन का स्वर रूखा हो उठा।

'राजा आपकी बहुत तारीफ करता है दीदी जी, इसीलिए एक विनती करने आया हूँ..........'

देखो रामलाल, मैं ईमानदारी में विश्वास रखती हूँ इसलिए कोई ग़लत काम नहीं कर सकती।

'पर हमारे लिए तो आपको ग़लत काम करना ही होगा, दीदी जी।'

'कभी नहीं। मैं ऐसा कोई काम नहीं करूँगी जिससे किसी का अहित हो।'

'दीदी जी, आपसे विनती है राजा को सब जवाब ठीक होने पर भी पूरे नम्बर मत दीजिएगा। हम जानते हैं अभागे को भगवान ने गरीब ज़रूर बनाया है, पर दिमाग देने में कोताही नहीं की है, उसकी तेज बुद्धि ही उसका दोष है, दीदी।'

'यह क्या कह रहे हो रामलाल।' अगर वह ठीक जवाब देता है तो पूरे नम्बर मिलना उसका अधिकार है। तुम्हारा बेटा सचमुच ज़हीन है।

'नहीं दीदी, यह गलती आप न करें, यही विनती लेकर आया था। पिछली परीक्षा में राजा को दिव्या दीदी ने पूरे नम्बर दिए तो वह खुशी से उछल पड़ा, पर उसके नम्बर काट दिए गए। दो दिन तक उसने खाना नहीं खाया। उसे समझा पाना कठिन हो गया था। हम नहीं चाहते राजा को फिर वही चोट सहनी पडे़।'

रामलाल की विनती पर सुस्मिता सेन स्तब्ध रह गई। अपने ही बेटे को कम अंक देने के पीछे रामलाल ने फिर अनुनय की थी-

'दीदी, आप नहीं जानतीं अगर राजा परीक्षा में अव्वल आता गया तो उसे स्कूल से निकाल दिया जाएगा। हमारी नौकरी चली जाएगी। हमारी मदद करें दीदी।'

'ठीक है रामलाल, मैं ऐसा काम नहीं करूँगी जिससे तुम्हारा या राजा का नुक्सान हो। अब तुम घर जाओ।'

'जी दीदी जी, प्रणाम।'

पूरी रात सुस्मिता सो नहीं सकी। आज़ादी के बासठ वर्षो के प्रजातंत्र का सच, उसे मॅंुह चिढ़ाता लग रहा था। रामलाल ने जो कहा उसकी सच्चाई वह समझ रही थी, पर एक अध्यापिका होते हुए भी वह अन्याय करें, क्या यह न्यायोचित हैं? नहीं, वह अन्याय नहीं होने देगी, अन्याय नहीं करेगी।

परीक्षा-परिणाम देख प्रिन्सिपल चैंक उठे। राजा का नाम प्रथम स्थान पर था। तुरन्त ही सुस्मिता सेन की बुलाहट हुई थी।

'यह क्या, इतना समझाने के बाद भी उस स्वीपर के बेटे को आपने प्रथम स्थान दिया है। इसका अंजाम जानती हैं?'

'एक अध्यापिका से ईमानदारी के अलावा आप और क्या अपेक्षा रखते हैं, महोदय?'

'इन बड़ी-बड़ी बातों को अपने पास रखिए। इनसे कुछ नहीं बनने वाला। चेयरमैन साहब, यह रिज़ल्ट नहीं सह सकते।'

'उन्हें यह सहना ही होगा, क्योंकि यह विद्यालय है, जहाँ हम बच्चों को सच्चाई और ईमानदारी की शिक्षा देते हैं। अन्याय के विरूद्ध आवाज उठाने की प्रेरणा देते हैं्। इस मंदिर में अन्याय नहीं किया जा सकता।'

'आप इस बात की गम्भीरता नहीं समझ रही है। आपकी नौकरी चली जाएगी।'

'किस अपराध के लिए मेरी नौकरी जाएगी?' क्षमा करें महोदय, विद्यालय के प्राचार्य रूप में आपका क्या यह कर्तव्य नहीं कि चेयरमैन साहब को समझाएं कि सुधीर को जबरदस्ती अधिक अंक दिलाकर वह उसका अहित कर रहे हैं। अपनी वैशाखी का सहारा दे, वह उसे अपंग बना रहे हैं।

उत्तेजना से सुस्मिता का चेहरा तमतमा आया।

'तो आप इस परिणाम में परिवर्तन नहीं करेंगी?'

'जी नहीं, मेरे परिणाम सौ प्रतिशत ठीक है।'

'बाद में मुझे दोष न दें।'

'अगर आपने न्याय का साथ नहीं दिया तब आपको अवश्य दोष दूँगी। नमस्ते।'

अपनी बात पूरी कर सुस्मिता सेन प्राचार्य के कक्ष से बाहर आ गई।

दूसरे दिन चेयरमैन ने उसे बुलवाया था। सुस्मिता से गम्भीर स्वर में कहा था-

'प्रिन्सिपल साहब ने बताया है आप रिज़ल्ट में परिवर्तन नहीं करेंगी।'

'जी हाँ, उन्होंने ठीक बताया है।'

'आप अपनी ज़िद के परिणाम जानती है?'

'सच की राह पर चलने वाले किसी भी परिणाम से नहीं डरते। मैं आपसे विनती करती हूँ, सुधीर को अपने पाँवों पर खड़ा होने दें। वह बुद्धिमान लड़का है, पर आपकी वैशाखी उसे लंगड़ा बना रही है?'

'यह क्या बकवास कर रही हो?' चेयरमैन क्रोधित हो उठे।

'मैं बिल्कुल ठीक कह रही हूँ। इस विद्यालय में सुधीर प्रथम आता रहेगा, पर इस विद्यालय के बाहर की दुनिया की प्रतिस्पद्र्धा का वह सामना कैसे कर पाएगा। अगर आप उसका हित चाहते हैं तो उसे सच्चाई का सामना करने दीजिए। एक बार चोट खाने से शायद वह स्वयं प्रथम आने का प्रयास करेगा। प्रतिस्पद्र्धा बच्चों को आगे बढ़ने को प्रेरित करती हैं उसे अपनी लड़ाई लड़ने दीजिए एचेयरमैन साहब।'

'अगर आपको नौकरी से निकाल दिया जाए, तब भी आप अपना निर्णय नहीं बदलेंगी?'

'मेरा निर्णय अटल है, क्योंकि यही न्यायेचित है। मैं राजा के साथ अन्याय नहीं होने दूँगी।'

'एक स्वीपर के बेटे के लिए इतनी हमदर्दी की क्या वजह है, मिस सेन?' चेयरमैन के प्रश्न में व्यंग्य था।

'मेरे लिए मेरी कक्षा के सारे बच्चे समान है। उन पर कोई लेबल नहीं लगा है। उनकी प्रतिभा, उनकी मेहनत का फल उन्हें मिलना ही चाहिए। मैं कहती हूँ आपके विद्यालय के लिए यह बहुत गौरव की बात होगी कि यहाँ काम करने वाले एक कर्मचारी का बच्चा अपनी मेहनत का फल प्राप्त कर सके।'

'धन्यवाद, मिस सेन। आपने मेरी आँखें खोल दीं। काश्, आपकी तरह किसी और ने मुझे समझाया होता। बताइए अपनी पिछली ग़लतियों का प्रायश्चित कैसे कर सकता हूँ?'

'मुझे शर्मिन्दा न करे, सर। अगर आप सचमुच प्रायश्चित करना चाहते हैं तो सुधीर को समझाइए वह राजा को स्वीपर का बेटा न कहकर, उसके साथ मित्रतापूर्ण व्यवहार करे। सुधीर के भविष्य के लिए यह छोटी-छोटी बातें महत्वपूर्ण सिद्ध होंगी।'

'आप ठीक कहती हैं, मिस सेन, वस्तुतः यह ग़लती मेरी थी। अपने अहं में मैं यह भूल ही गया हमारे संविधान ने सबको समान अधिकार दिए हैं स्वीपर भी स्वतंत्र भारत का सम्मानित नागरिक है।'

'मैं आपकी बहुत आभारी हूँ, सर।'

'नहीं मिस सेन, आभार मुझे मानना चाहिए। मेरी ओर से राजा को प्रथम आने के लिए छात्रवृत्ति की घोषणा की जाएगी। उसे हर सुविधा इस विद्यालय से दी जाएगी।'

'धन्यवाद, सर।'

कक्षा में रिज़ल्ट कार्ड बांटती सुस्मिता ने प्रथम स्थान पर राजा का नाम जब पुकारा तो वह अपनी जगह पर ही बैठा रहा।

'क्या बात है राजा, अपना प्रथम आना तुम्हें अच्छा नहीं लगा?'

'नहीं मैडम, क्योंकि मैं जानता हूँ, कल मेरे अंक काटकर मुझे नीचा स्थान दे दिया जाएगा।' उदास राजा ने मन का सच बता दिया।

'अब ऐसा नहीं होगा, मेरे दोस्त। मैं अपनी गलती समझ गया हूँ। पिछली परीक्षा में भी तुम्हीं पहले नम्बर पर थे। मेरी वजह से तुम्हें नीचा देखना पड़ा। मुझे माफ़ कर दो, राजा।'

सुधीर का गला भर आया।

'क्या..............सच हम प्रथम आए है।' प्रसन्नता के आवेग से राजा बोल नहीं सका।

'हाँ राजा, तुम प्रथम आए हो। आज तुम्हें अपना अधिकार मिल गया।' खुशी से सुस्मिता सेन का चेहरा जगमगा रहा था।

'पर मैडम, देख लीजिएगा अगली परीक्षा में मैं राजा को अपनी मेहनत से ज़रूर हरा दूँगा। क्यों राजा, लगाता है शर्त?'

सुधीर के आगे बढ़े हाथ में राजा ने अपना हाथ दे दिया। दोनों के चेहरों पर खुशी की जगमगाहट थी।

रोबोट


पति की आकस्मिक मृत्यु ने शकुन को स्तब्ध कर दिया। दस वर्षीय पुत्र सुखदेव के साथ भविष्य एक प्रश्नचिन्ह था। अशिक्षित शकुन के समक्ष दूसरों के घर की चाकरी के अतिरिक्त दूसरा कोई विकल्प शेष न था। सेठ श्यामलाल जी के मुनीम ने उसे सेठानी तक पहुंचा दिया था-
'आपकी सेवा के लिए शकुन को लाया हूँ। बहुत ईमानदार औरत है, मजबूरी में बाहर निकली है।'
'ठीक है, पर इसकी जिम्मेदारी आप पर होगी मुनीम जी, और यह लड़का कौन है?'
'हमारा बेटवा, मालकिनी।'
'इसे समझा देना, बच्चों के खिलौने और दूसरी कोई भी चीज छुए- छेड़े नहीं वर्ना तुम्हारा यहाँ टिकना मुश्किल होगा।'
'जी मालकिनी, सुखदेव यहाँ की कोई चीज नहीं छुएगा। समझ गया न रे?'
सुखदेव की दृष्टि घर के बच्चों पर थी। उनके खिलौने सुखदेव के लिए अजूबा थे। माँ की बात समझे बिना, उत्साहित सुखदेव ने सेठानी के बड़े बेटे के पास पड़ा खिलौना उठा लिया।
'देख तो माँ, कित्ता सुन्दर हाथी है और इस पर चढ़ा सवार तो राजा लगता है न?'
ऐ लड़के, खबरदार जो हमारे खिलौने छुए। तू नौकर है, इन खिलौनों को हाथ भी लगाया तो निकाल दिया जाएगा। समझ गया या समझाऊं। रोहन ने चेतावनी दी थी।
राजा भइया के उठे हाथ से अविचलित सुखदेव बोला था-
'क्या नौकर खिलौनों से नही खेल सकते, माँ?'
'हाँ बेटा, हम दूसरों की चाकरी के लिए बनें हैं, हमें मजे उड़ाने का हक नहीं। राजा भइया ठीक कहते हैं। इसे माफ़ कर दो, राजा भइया।'
'क्या नाम है तुम्हारा ..............हाँ शकुन। देखो पूरे घर की सफ़ाई, रसोई का काम सम्हाल लोगी?' सेठानी के मन में संशय था।
'जी मालकिनी। जो भी काम कहेंगी, करूँगी बस हमें आसरा दे दें।' हाथ जोड़, शकुन गिड़गिड़ाई थी।
'ठीक है, शांति इन्हें पीछे वाली कोठरी दिखा दे। दोनों वहीं रहेंगे।'
दूसरे दिन से शकुन जी-जान से काम में जुट गई थी। सुखदेव को सख्त हिदायत दी थी कि वह बच्चों की किसी भी चीज को हाथ न लगाए। शकुन जब काम में लगी रहती सुखदेव बच्चों के पास खड़ा, उन्हें खिलौने से खेलता देखता रहता। उसकी समझ में एक बात नहीं आती, मालिक के बच्चों के पास खेलने के लिए उतने ढे़र सारे खिलौने हैं, पर उसे खिलौनों से खेलने का अधिकार नहीं, ऐसा क्यों? सेठ का बड़ा लड़का रोहन सुखदेव का समवयस्क था। खिलौनों के प्रति सुखदेव का आकर्षण। स्पष्ट था। उसे चिढ़ाने की गरज से रोहन उसे छेड़ता-
'ऐ लड़के, तू इस रोबोट से खेलेगा?'
'आप हमें इसे खेलने को देंगे?'
अविश्वास के बावजूद सुखदेव की आँखें में आशा की चमक जाग उठती।
'हाँ, पर इससे खेलने के लिए तुझे हमारी एक शर्त पूरी करनी होगी?' रोहन उसका विश्वास बढ़ाता।
'कौन सी शर्त, भइया जी?'
'तुझे हमारा घोड़ा बनकर हमें पीठ पर घुमाना होगा।' रोहन की आवाज में चुनौती होती।'
'घोड़ा कैसे बनते हैं, रोहन भइया?'
'अरे बुद्धू, इतना भी नहीं जानता?' झुक जरा, हाँ ऐसे ही हाथ-पाँव के बल चलना होगा और हम तेरी पीठ पर बैठकर घुड़सवारी करेंगे। बोल है मंजूर।'


'जी राजा भइया। हम घोड़ा बनेंगे।''ठीक है, अब हम घोड़े की पीठ पर बैठते हैं।'
सब बच्चों तालियाँ बजाओं। चल मेरे घोड़े टिक-टिक-टिक।'
रोहन की टिटकार पर सुखदेव, हाथ-पैरों के बल घोड़ा बन चलने लगा। परिवार के बच्चे तालियाँ बजाकर हॅंस पड़े।
'अरे ओ घोडे़, थोड़ा तेज दौड़ वर्ना चाबुक पड़ेगी.......................'
बच्चे ताली बजाकर हॅंस पड़े।
'अरे ओ घोड़े, थोड़ा और तेज दौड़ वर्ना चाबुक पड़ेगी........................'
सुखदेव ने तेजी से चलने की कोशिश की, पर सांस उखड़ गई और वह गिर गया। रोहन का वज़न कुछ कम नहीं था, सुखदेव के गिरते ही वह भी गिर पड़ा। खिसियाए रोहन ने सुखदेव की पिटाई शुरू कर दी, पर बड़ी बहिन शांति ने उसे रोका था।
'यह क्या रोहन, एक तो छोटे से बच्चे की पीठ पर सवार हुए, उस पर उसकी पिटाई कर रहे हो। हम बाबूजी से शिकायत करेंगे।'
'रोते सुखदेव की हिम्मत ही न हुई कि वह रोबोट हाथ में भी उठा ले। रोहन ने फिर हाँक लगाई थी।'
'ऐ मरियल घोड़े, जरा घास अच्छी तरह से खाया कर। अगली बार गिराया तो हंटर से मार पड़ेगी।' पास खड़े बच्चे रोहन के परिहास पर बच्चे ज़ोरों से हंस पड़े और रोता हुआ सुखदेव, माँ की खोज में चला गया।
'क्या हुआ सुक्खू, काहे रो रहा है, बेटा?' रोटी सेंकती शकुन का जी भर आया।
'अम्मा, रोहन भइया ने कहा था अगर हम उनके घोड़ा बनेंगे, वह हमें रोबोट से खेलने देंगे, हम घोड़ा भी बने, पर उन्होने हमें रोबोट नहीं दिया। हमको मारा।'
'जाने दे बेटा, वह बड़े लोग हैं। तू उनके खिलौने माँगता ही क्यों है अभागे। तुझे हमने गुड़िया बनाकर दी थी, उससे खेल राजा बेटा।'
'नहीं हम गुड़िया से नहीं खेलेंगे। हमें भी रोबोट चाहिए। हम बड़े आदमी क्यों नहीं हैं, अम्मा।'
'अपनी-अपनी किस्मत है, बेटा। हम गरीब हैं, वो अमीर हैं।'
'हम भी अमीर बनेंगे, अम्मा। हम भी रोबोट से खेलेंगे। अचानक सुखदेव की आवाज गम्भीर हो उठी।'
दूसरे दिन शकुन ने रोहन से अनुनय की थी-
'रोहन भइया, आप राजा बेटे हैं, कोई पुराना टूटा-फूटा खिलौना इस सुक्खू को दे दें। भगवान आपको बहुत खिलौनें देंगे।'
'ठीक है, ले ये मोटर गाड़ी हैं, पर अब यह चाभी से नहीं चलती। ऐसे ही दौड़ा ले।' बड़ी उदारता से टूटी मोटर कार और एक ढ़पली बजाने वाला बंदर रोहन ने सुखदेव को थमाया था।
टूटे खिलौने हाथ में पा, सुखदेव की आँखों में चमक आ गई। खिलौने को उलट-पुलट, सुखदेव ने कुछ स्क्रू कसे, चाभी लगाई और मोटर गाड़ी तेजी से दौड़ चली। थोड़ी देर बाद चाभी वाला बंदर भी चाभी से ढ़पली बजाने लगा। खुशी से सुखदेव नाच उठा।
'रोहन भइया, यह देखिए हमने खिलौने ठीक कर दिए।'
'रहने दे, यह खिलौने पहले ही ठीक थे, हमसे ग़लती हो गई। ला इधर, ये हमारे खिलौने हैं। इनसे हम खेलेंगे।'
'नहीं रोहन, यह बेईमानी है। तुमने तो ये खिलौने बेकार कह कर फेंक दिए थे। ये खिलौने सुखदेव ने ठीक किए हैं। यह खिलौने अब सुखदेव के हैं।'
'बड़ी आई इसकी तरफ़दारी करनेवाली। जा नहीं देता, तू क्या करेगी?'
'हम इसे अपना बात करने वाला गुड्डा दे देंगे जो तुम्हें भी बहुत अच्छा लगता है।'
'ठीक है ये खिलौने रख ले, पर इनके बदले में हमारे सारे टूटे खिलौने ठीक करने होंगे।'
'ज़रूर रोहन भइया। हम आपके सारे खिलौने ठीक कर देंगे, कृतज्ञता से सुखदेव का स्वर गदगद था।'
'एक बात बता सुखदेव, तूने टूटे खिलौने कैसे ठीक कर लिए?' शांति स्वयं विस्मित थी।
'हमारे बाबू ऐसी ही खिलौने बनाते थे, हम उनके साथ काम करते थे और रोहन भइया की तरह स्कूल भी जाते थे।' सुखदेव उदास हो आया।
'तब तो तेरे पास बहुत खिलौने होंगे, सुखदेव?'
'नहीं, शांति जीजी। खिलौने तो बाबू बेचने के लिए बनाते थे, हमें तो बस दो-तीन खिलौने ही मिले थे।'
'तेरी दूकान के खिलौने कहाँ गए, सुखदेव?' रोहन भी अब बातों में शामिल था।
'दीवाली पर बाबू ने खिलौनों के साथ पटाखे भी रक्खे थे, पता नहीं कैसे पटाखों में आग लग गई। पटाखों की आग में बाबू के साथ, सारे खिलौने भी खत्म हो गए।'
'ओह। कोई बात नहीं सुखदेव, तुम हमारे खिलौनों में से एक-दो खिलौने ले सकते हो।' शांति सदय हो आई।
'नहीं, तू टूटे खिलौने ठीक करके खेल सकता है। हाँ इस रोबोट को कभी मत छूना, यह बहुत महंगा है। ऐसे खिलौनों से नौकर नहीं खेलते समझा।'
सचमुच सुखदेव के लिए वह रोबोट एक अजूबा था। न जाने कैसे आदमी की तरह पाँव बढ़ाकर आगे चलता। आँखों में लाल-लाल बच्ची जलती। पहली बार तो उसे देखकर सुखदेव डर ही गया था। अक्सर रातों में भी उसे वही रोबोट चलता हुआ दिखाई देता। रोबोट के लिए सुखदेव के  मन में अद्भुत आकर्षण था, पर उसे छूने का उसने कभी साहस नहीं किया। अब बच्चों के पुराने टूटे खिलौने ठीक करने में सुखदेव का अधिकांश समय बीतने लगा।
अचानक एक दिन स्कूल से वापस आए रोहन की चिल्लाहट पर सारा घर इकट्ठा हो गया। सहमे खड़े सुखदेव की कमीज का कालर पकड़ रोहन चीखा था-
'ऐ चोट्टे, बता मेरा रोबोट कहाँ छिपाकर रखा है। कई दिनों से उस पर तेरी निगाह थी। सीधे-सीधे बता दे वर्ना पुलिस पकड़ कर ले जाएगी।'
'हम सच कहते हैं, रोहन भइया, हमने आपके रोबोट को हाथ भी नहीं लगाया।' सुखदेव रो पड़ा।
'सुखदेव की माँ, अपने बेटे से पता करके रोहन का रोबोट ला दे वर्ना पुलिस को खबर देनी होगी।' कड़ी आवाज में मालकिन ने भी रोहन की बात का समर्थन किया।
'ऐसा न करें। मालकिन, हमारा बेटा चोर नहीं है। हम इसकी खाल उधेड़ देंगे, पर पुलिस न बुलाएं। तू पैदा होते ही मर क्यों नहीं गया, अभागे।'
झर-झर झर रहे आँसुओं के साथ शकुन सुखदेव को थप्पड़ मारती गयी। सुखदेव की चीखों को जैसे शकुन सुन ही नहीं पा रही थी। अन्नतः शांति ने शकुन को रोका था..............
'बस करो, हम जानते हैं, सुखदेव चोर नहीं है। उसे मत मारो।'
'तू चुप रह शांति, हमेशा इस शैतान की हिमायत करती है। इतना बड़ा रोबोट क्या हवा में उड़ गया।' रोहन की आँखें आग बरसा रही थीं।
शकुन को बेटे के साथ तुरन्त घर छोड़कर जाने के आदेश दे दिए गए। कोठरी में पहुँच शकुन, सुखदेव को सीने से लिपटा बिलख पड़ी।
'हमें माफ कर दे, सुखदेव। हम जानते हैं तू कभी चोरी नहीं कर सकता।'
'अब हम कहाँ जाएंगे, माँ?'
'जहाँ भगवान ले जाए, बेटा। चल अब हम यहाँ नहीं रहेंगे।'
पुत्र का हाथ पकड़ शकुन अनजानी राह चल दी। बेध्यानी में चल रही शकुन के पीछे कार का ब्रेक लगने पर भी कार का हल्का सा धक्का शकुन को धरती पर गिरा देने को काफ़ी था। कार में सेठ राधाकमल थे। फौरन शकुन को अपने साथ कार में बिठा लिया। रोते सुखदेव से उसके दुर्भाग्य की कहानी सुन सेठ राधाकमल स्तब्ध रह गए।
'तुम्हें खिलौने बनाने सिखाए जाएँ तो सीखोगे, सुखदेव?'
'ज़रूर सेठ जी। हम रोहन भइया के टूटे खिलौने ठीक कर देते थे। हमारे बाबू की खिलौनों की दुकान थी। हम उनके साथ काम करते थे।' उत्साहित सुखदेव के आँसू सूख गए थे।
'सबसे पहले तुम कौन सा खिलौना बनान चाहोगे, सुखदेव बेटे?'
'हम सबसे पहले एक रोबोट बनाएंगे। उसे रोहन भइया को देंगे।'
'क्यों बेटे, तुम रोबोट अपने लिए क्यों नहीं रखोगे?'
'क्योंकि रोहन भइया ने हम पर रोबोट चोरी करने का जो इलजाम लगाया है, उससे माँ का अपमान हुआ है? माँ की बेइज्ज़ती हम कैसे सह सकते हैं।'
'शाबाश, सुखदेव। तुम बहुत अच्छे बच्चे हो। मेरी खिलौने बनाने की फ़ैक्ट्री है। मैं तुम्हें खिलौने बनाने की ट्रेनिंग दिलाऊँगा, साथ में तु्म्हें पढ़ाई भी करनी होगी। कर सकोगे दोनों काम?'
'ज़रूर कर सकूँगा। क्या आप माँ को भी काम देंगे? वह बहुत अच्छी गुड़िया बना सकती है।'
'ठीक है, तुम्हारी माँ को गुड़िया बनाने का काम दिया जाएगा। अब तो खुश हो न?'
'आप बहुत अच्छे है, सेठ जी। बाबू कहा करते थे दुनिया में अच्छे लोग भी रहते है। आप बहुत दयालु हैं।'
'नही बेटा, देश के हर बच्चे को पढ़ने-लिखने, खेलने-खाने का अधिकार है। मैं तो बस भगवान का एक सेवक हूँ।'
'माँ ठीक हो जाएगी न?' सुखदेव के चेहरे पर चिन्ता झलक आई।
'तुम्हारी माँ बिल्कुल ठीक हैं, उसे चोट नहीं आई है। थोड़ी देर में वह तुम्हारे पास होगी।'
'धन्यवाद सेठ जी।' सुखदेव की दृष्टि बाहर की चहल-पहल पर निबद्ध हो गई। सेठ राधाकमल का वात्सल्यपूर्ण हाथ उसकी पीठ पर था।

कर्ज़


शीलो के उल्टे-सीधे सवालों पर मम्मी खीज उठतीं, पर सितारा को उन सवालों में शीलो की अद्भुत मेधा दिखाई पड़ती। वह माँ को समझाती।

'मम्मी, आप समझती क्यों नहीं, शीलो बड़ी ज़हीन लड़की है। इसकी जिज्ञासा शांत न की गई तो इसकी प्रतिभा बेकार हो जाएगी। कितनी चैलेंजिंग है शीलो।'

'हाँ-हाँ हत्यारिन माँ की बेटी चैलेंजिंग तो होगी ही। मैं कहती हूँ इस लड़की को घर लाकर तूने बड़ी ग़लती की है, सितारा।'

मम्मी को जब भी मौका मिलता शीलो की माँ पर व्यंग्य करना न भूलतीं। हत्यारिन माँ की बेटी शीलो को घर में बसाना कहाँ की बुद्धिमानी है? शीलो का जन्म जेल मे हुआ था। उसका बचपन जेल की चारदीवारी मे ही बीता था, पर उसका मन आकाश में उड़ती चिड़िया सा स्वतंत्र था।

काश वह भी चिड़िया होती तो फुर्र से जहाँ चाहती उड़ जाती। जेल की वार्डेन दीदी ने शीलो को अक्षर-ज्ञान कराया था। घर में सितारा का सोच, माँ से सर्वथा अलग था। स्कूल-काँलेज में उसने पढ़कर यही जाना-समझा कि परिस्थितियों पर विजय पाई जा सकती है। उसके लिए इंसान को अपने अधिकार और अपनी शक्ति की पहचान होनी चाहिए। शीलो में उसे अपने लिए चुनौती दिखी थी।

'क्या हुआ अगर उसकी माँ जेल में है, शीलो तो एक, अच्छी लड़की है सितारा उसे उसका प्राप्य दिलाएगी।'

शीलो का पिता मर चुका था और माँ पागल होकर जेल से अब पागलखाने जा चुकी थी। आश्चर्य इस बात का था शीलो जिस परिवेश से आई थी उसका अंश मात्र भी उसमें नहीं था। बुद्धि से जगमगाती बड़ी-बड़ी आँखें, जिनमें सब कुछ जान-समझ लेने की लौ जलती रहती।

सितारा के पापा तब झाँसी में जेलर थे। उसी जेल में शीलो की माँ शरबती ने अपनी दो बर्षीया बेटी शीलो को पागलखाने में जान से मार डालने का प्रयास किया था। जेल की जमादारिन सोमवरिया ने शीलो को सीने से लगा लिया था। तब से जेल की महिला कैदियों और कर्मचारियों के प्यार के बीच पलती शीलो दस वर्ष की हो चुकी थी। एक समारोह में शीलो ने जेलर साहब को माला पहनाकर, एक गीत प्रस्तुत किया था। उसके भोले, आत्मविश्वास से पूर्ण चेहरे ने सितारा का मन जीत लिया। क्या ग़लती थी उस बालिका की? उसे पाप और पुण्य कुछ नहीं पता। बस घर लौटकर सितारा मम्मी-पापा के पीछे पड़ गयी।

'पापा हम शीलो को अपने घर रख लें? उसे पढ़ाऊॅंगी, उसे आत्मनिर्भर बनाऊॅंगी।' सितारा के अन्दर की समाज-सेविका, शीलो को देख जाग गई थी।

मम्मी तुम जानती हो पति की हर क्रूरता शरबती ने सही थी। शीलो का पिता, पत्नी शरबती को किसी और के हाथ बेच रहा था। अपने को बचाने के लिए उसके पास दूसरा कौन सा उपाय था?'

'सितारा ठीक कह रही है, सच तो यह है हमें शरबती की इज्ज़त करनी चाहिए। ज़माने ने उसके साथ बहुत बुरा बर्ताव किया है। आज बेचारी को यह भी नहीं पता उसकी एक बेटी भी है।' सितारा के पापा की सहानुभूति शीलो के साथ थी।

अन्ततः जीत सितारा ही की हुई थी। शीलो उनके घर आ गई। सितारा का हाथ पकड़े शीलो, जब घर में आई तो घर की सजावट देख वह चकित रह गई।

'हम इस घर में रहेंगे, दीदी?' बड़ी-बड़ी आँखों में ढेर सारा विस्मय था।

'हाँ, शीलो अब यही तुम्हारा घर है।'

मम्मी ने छोटी बेटी को पहले ही समझा दिया-

'यह लड़की जेल से आई है, इस पर निगाह रखना इसके साथ तुम कोई रिश्ता मत रखना, नयना।'

नयना से उत्साह न पाकर भी शीलो उसके आगे-पीछे लगी रहती। नयना कभी अकारण भी उसे डांटती तो शीलो पर कोई असर न होता। शीलो तो तिरस्कार की घुट्टी पीकर ही बड़ी हुई थी।

मम्मी और नयना भले ही शीलो से उदासीन रहीं, पर सितारा के लिए शीलो एक चैलेंज थी। अपनी पाँकेट-मनी से शीलो के लिए तेल-साबुन लाकर उसे नहलाया था। नहाने से शीलो का गोरा रंग चमक उठा था। सितारा दीदी ने मनोयोग पूर्वक शीलो को पढ़ाना शुरू किया था। मम्मी नाराज हो उठी-

'अपना काम छोड़ तू जो इसके साथ माथा-पच्ची कर रही है, उसका कोई नतीजा नहीं निकलने वाला है। देख लेना जरा बड़ी होते ही सब सामान लेकर गायब हो जाएगी।'

सितारा और मम्मी ने एक-दूसरी को झूठा सिद्ध करने की जिद ठान ली। शीलो जैसे ही किताबें खोलकर बैठती, मम्मी काम के लिए आवाज़ लगातीं। मम्मी का हुक्म बजा लेने जब शीलो भागकर पहॅुंचती तो हाथ में पकड़ी पेंसिल देखते ही उनका पारा चढ़ जाता-

'हमारे यहाँ तो स्कूल खुल गया है, सब पढ़ाई में लगे हैं, सबकी रोटी बनाने को एक मैं ही रह गई हूँ। चल जल्दी मसाला पीस कर दे।' शीलो के हाथ की पेंसिल छीन, मम्मी उसे काम में लगा देतीं।

सितारा खुद शीलो का जीवट देख, ताज्जुब में पड़ जाती। उतनी छोटी लड़की कैसे इतने सारे काम हॅंसते-हॅंसते निबटा लेती है। मम्मी की डांट-फटकार का उस पर जैसे कोई असर ही नहीं होता। मम्मी का हर हुक्म वह पूरी निष्ठा से निभाती और सितारा का दिया होम-वर्क भी न जाने कब निबटा डालती। उसकी बुद्धि का लोहा, पापा तक को मानना पड़ा दो वर्षो में उसने नयना की किताबें पढ़कर सबको चमत्कृत कर दिया। नयना तो रोने-रोने को हो आई-

'मम्मी, शीलो चोरी-चोरी हमारी किताबें पढ़ती है।' नयना पढ़ाई में बेहद कमज़ोर थी। शीलो की तेजस्विता में उसे अपनी हार दिखती।

'नहीं दीदी, जब मास्टर जी आपको पढ़ाते हैं न तो हम भी सुनते रहते है। जेल में भी हम पढ़ा करते थे, नयना दीदी। हमें माफ़ कर दीजिए।'

'नहीं शीलो, तुमने कोई गलती नहीं की है। मैं बहुत खुश हूँ नयना के साथ तुम भी मास्टर जी से पढ़ा करो।' उधर पापा ने तो निर्णय ले लिया, पर शीलो जानती थी, नयना के साथ पढ़कर वह कितना गम्भीर अपराध करेगी। उसके लिए सितारा दीदी ही काफ़ी थीं।

कभी-कभी चिढ़कर नयना शीलो के साथ क्रूर मजाक करने में भी न चूकती।

'पढ़-लिखकर शीलो अपनी पगली माँ को चिट्ठी लिखेगी। तेरी माँ ने तेरे बाप को कैसे मारा था, शीलो?'

सच तो यह है कि अपनी माँ की कहानी शीलो को नयना और मम्मी से ही पता लगी थी वर्ना जेल में भी किसी ने शीलो का दिल ऐसे नहीं दुखाया था। नयना की बातों के उत्तर में शीलो ओंठ भींच, आँसू पी जाती। सितारा की डांट पर नयना मॅुंह बिचका देती। सितारा ने शीलो का दुख समझा, प्यार से शीलो की माँ की सच्ची कहानी सुनाई थी। उदास स्वर में शीलों ने कहा था-

'हम माँ से मिलना चाहते हैं, दीदी।'

'मम्मी इस फ़र्माइश पर चिढ़ गई थीं।'

'वाह यह अच्छी रही। खाएगी हमारा और गुण गाएगी हत्यारिन माँ के। मैं तो कहती हूँ इसे उस पगली के पास भेजकर छुट्टी करो।'

'सितारा दीदी, माँ का इलाज क्या नहीं हो सकता?' आँखें में आँसू भरे शीलो ने पूछा था।

'तेरी माँ का इलाज चल रहा है, वह ज़रूर ठीक हो जाएगी।' सितारा ने तसल्ली दी।

सितारा के उत्तर पर शीलो की आँखे खुशी से चमक उठीं।

'दीदी, हम माँ से मिल सकते है।?'

- हाँ शीलो, पर एक शर्त है, पहले तू मन लगाकर पढ़ाई करेगी। मेट्रिक की परीक्षा पास कर ले फिर माँ के पास चलेंगे।

'पर उसमें तो अभी बहुत देर है।'

- पाँच महीने ज्यादा नहीं होते। मैं चाहती हूँ तू पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ी हो जा। सोच, तुझे उस रूप मे देखकर तेरी माँ कितनी खुश होगी न?

'हाँ दीदी, आप ठीक कहती हैं।'

उस दिन से शीलो पढ़ाई में जुट गई। सितारा को पापा से पता लगा था शीलो की माँ का पागलपन बहुत ज्यादा बढ़ गया था। सितारा को डर था माँ को उस हाल में देख शीलो पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे सकेगी। शीलो ने पढ़ाई को तपस्या मान लिया। मम्मी के जा-बेजा हुक्म बजाती शीलो के मुंह पर कभी शिकायत नहीं उभरी, पर सितारा का अक्सर माँ से झगड़ा हो जाता।

'मम्मी, शीलो को भी नयना की तरह पढ़ने-लिखने का अधिकार है। तुम नयना से तो कोई काम नहीं करवातीं, पर शीलो को थोड़ी देर पढ़ने का समय नहीं देना चाहती। यह अन्याय है, मम्मी।'

सितारा के उस तर्क से मम्मी कभी सहमत नहीं हो पाती, उन्हें लगता है हर इंसान की अपनी नियति होती है। अगर शीलो को पढ़ना-लिखना होता तो किसी अच्छे घर में जन्म लेती, हत्यारिन माँ की बेटी को तो कोई घर में भी नहीं घुसने देता। सितारा का सोच दूसरा था-

'किसका जन्म कहाँ होगा, यह तो अपने हाथ की बात नहीं है, मम्मी। अगर शीलो की माँ ने ग़लती की तो इसमें शीलो का क्या दोष है। मां.बेटी की तकरार पर शीलो डर जाती। सितारा को बड़ी बहिन की तरह समझाती-'

'आप हमारे लिए मांजी से झगड़ा न किया करें, दीदी। मांजी ठीक कहती हैं, हमारी किस्मत ही खराब है। मांजी ने अपने घर में जगह दी, यही क्या कम है?'

परिस्थितियों ने शीलो को उम्र से पहले ही समझदार बना दिया था।

मेट्रिक परीक्षा का परिणाम देख सितारा खुशी से उछल पड़ी। ष्शीलो को फ़र्स्ट डिवीजन मिली थी। नयना बस किसी तरह पास भर हो गई थी। सितारा भी एम0ए0 में प्रथम आई थी। अपने ही काँलेज में सितारा को लेक्चररशिप मिल गई। काँलेज की प्राचार्या को सितारा ने शीलो की कहानी सुना कर, मदद माँगी थी। प्राचार्या को दया आ गई। शीलो को न केवल निःशुल्क दाखिला मिला बल्कि होस्टेल में रहने की जगह भी मिल गई। शीलो के अन्य खर्चो का दायित्व सितारा ने ले लिया।

माँ को देखकर शीलो फूट-फूट कर रो पड़ी। शीलो को रोते देख उसकी माँ के चेहरे पर कई रंग आए। डाँक्टर ने कहा यह अच्छा संकेत है। सितारा ने शीलो के साथ प्रति सप्ताह उसकी माँ के पास जाने का निर्णय लिया था।

शीलो की गम्भीरता बढ़ती जा रही थी। क्लास में वह सर्वोच्च अंक पाती, पर लड़कियों में सिर्फ़ गीता ही उसकी सहेली थी। अपना अधिकांश समय वह पढ़ने में लगाती। माँ के पास नियमित रूप से जाती। शीलो को देख वह काफी सामान्य हो जाती। डाक्टर उसे शुभ संकेत मानते। उन्हें अब विश्वास होने लगा था कि शीलो की माँ सामान्य हो सकेगी।

बारहवीं की परीक्षा में भी शीलों को प्रथम श्रेणी के साथ तीन विषयों में डिस्टींक्शन मिला। काँलेज और जिले की ओर से उसे छात्रवृत्ति दी गई। सितारा ने शीलो के भविष्य के विषय में जानना चाहा था।

शीलो, अब तू क्या करना चाहती है?'

'हम वकील बनना चाहते हैं, दीदी।'

वकील क्यों, शीलो? तू डाक्टर बन सकती है, टीचर बन सकती है, वकील बनकर क्या करेगी? सितारा को उसके जवाब पर सचमुच ताज्जुब था।'

'वकील बनकर अपनी माँ की ओर से मुकदमा लडूँगी। उन्हें झूठे कलंक से बाहर निकालूँगी। हम जानते हैं अपनी इज्ज़त बचाने के लिए किसी को मारना अपराध नहीं। अपनी माँ के प्रति मेरा ऋण है, दीदी। उनका कर्ज़ हमें उतारना है।'

'शाबाश, शीलो। मुझे पूरा विश्वास है तू सिर्फ़ अपनी माँ की ही नहीं, उन जैसी दूसरी औरतों के न्याय के लिए भी मुकदमा लड़ेगी।'

'तो आशीर्वाद दीजिए दीदी, मेरा सपना पूरा हो। आपके बिना हम कुछ न कर पाते।'

शीलो अपने अधिकार जान चुकी थी, उसे उसका प्राप्य अवश्य मिलेगा। सितारा के चेहरे पर आश्वस्ति की मुस्कान बिखर आई।