कर्ज़


शीलो के उल्टे-सीधे सवालों पर मम्मी खीज उठतीं, पर सितारा को उन सवालों में शीलो की अद्भुत मेधा दिखाई पड़ती। वह माँ को समझाती।

'मम्मी, आप समझती क्यों नहीं, शीलो बड़ी ज़हीन लड़की है। इसकी जिज्ञासा शांत न की गई तो इसकी प्रतिभा बेकार हो जाएगी। कितनी चैलेंजिंग है शीलो।'

'हाँ-हाँ हत्यारिन माँ की बेटी चैलेंजिंग तो होगी ही। मैं कहती हूँ इस लड़की को घर लाकर तूने बड़ी ग़लती की है, सितारा।'

मम्मी को जब भी मौका मिलता शीलो की माँ पर व्यंग्य करना न भूलतीं। हत्यारिन माँ की बेटी शीलो को घर में बसाना कहाँ की बुद्धिमानी है? शीलो का जन्म जेल मे हुआ था। उसका बचपन जेल की चारदीवारी मे ही बीता था, पर उसका मन आकाश में उड़ती चिड़िया सा स्वतंत्र था।

काश वह भी चिड़िया होती तो फुर्र से जहाँ चाहती उड़ जाती। जेल की वार्डेन दीदी ने शीलो को अक्षर-ज्ञान कराया था। घर में सितारा का सोच, माँ से सर्वथा अलग था। स्कूल-काँलेज में उसने पढ़कर यही जाना-समझा कि परिस्थितियों पर विजय पाई जा सकती है। उसके लिए इंसान को अपने अधिकार और अपनी शक्ति की पहचान होनी चाहिए। शीलो में उसे अपने लिए चुनौती दिखी थी।

'क्या हुआ अगर उसकी माँ जेल में है, शीलो तो एक, अच्छी लड़की है सितारा उसे उसका प्राप्य दिलाएगी।'

शीलो का पिता मर चुका था और माँ पागल होकर जेल से अब पागलखाने जा चुकी थी। आश्चर्य इस बात का था शीलो जिस परिवेश से आई थी उसका अंश मात्र भी उसमें नहीं था। बुद्धि से जगमगाती बड़ी-बड़ी आँखें, जिनमें सब कुछ जान-समझ लेने की लौ जलती रहती।

सितारा के पापा तब झाँसी में जेलर थे। उसी जेल में शीलो की माँ शरबती ने अपनी दो बर्षीया बेटी शीलो को पागलखाने में जान से मार डालने का प्रयास किया था। जेल की जमादारिन सोमवरिया ने शीलो को सीने से लगा लिया था। तब से जेल की महिला कैदियों और कर्मचारियों के प्यार के बीच पलती शीलो दस वर्ष की हो चुकी थी। एक समारोह में शीलो ने जेलर साहब को माला पहनाकर, एक गीत प्रस्तुत किया था। उसके भोले, आत्मविश्वास से पूर्ण चेहरे ने सितारा का मन जीत लिया। क्या ग़लती थी उस बालिका की? उसे पाप और पुण्य कुछ नहीं पता। बस घर लौटकर सितारा मम्मी-पापा के पीछे पड़ गयी।

'पापा हम शीलो को अपने घर रख लें? उसे पढ़ाऊॅंगी, उसे आत्मनिर्भर बनाऊॅंगी।' सितारा के अन्दर की समाज-सेविका, शीलो को देख जाग गई थी।

मम्मी तुम जानती हो पति की हर क्रूरता शरबती ने सही थी। शीलो का पिता, पत्नी शरबती को किसी और के हाथ बेच रहा था। अपने को बचाने के लिए उसके पास दूसरा कौन सा उपाय था?'

'सितारा ठीक कह रही है, सच तो यह है हमें शरबती की इज्ज़त करनी चाहिए। ज़माने ने उसके साथ बहुत बुरा बर्ताव किया है। आज बेचारी को यह भी नहीं पता उसकी एक बेटी भी है।' सितारा के पापा की सहानुभूति शीलो के साथ थी।

अन्ततः जीत सितारा ही की हुई थी। शीलो उनके घर आ गई। सितारा का हाथ पकड़े शीलो, जब घर में आई तो घर की सजावट देख वह चकित रह गई।

'हम इस घर में रहेंगे, दीदी?' बड़ी-बड़ी आँखों में ढेर सारा विस्मय था।

'हाँ, शीलो अब यही तुम्हारा घर है।'

मम्मी ने छोटी बेटी को पहले ही समझा दिया-

'यह लड़की जेल से आई है, इस पर निगाह रखना इसके साथ तुम कोई रिश्ता मत रखना, नयना।'

नयना से उत्साह न पाकर भी शीलो उसके आगे-पीछे लगी रहती। नयना कभी अकारण भी उसे डांटती तो शीलो पर कोई असर न होता। शीलो तो तिरस्कार की घुट्टी पीकर ही बड़ी हुई थी।

मम्मी और नयना भले ही शीलो से उदासीन रहीं, पर सितारा के लिए शीलो एक चैलेंज थी। अपनी पाँकेट-मनी से शीलो के लिए तेल-साबुन लाकर उसे नहलाया था। नहाने से शीलो का गोरा रंग चमक उठा था। सितारा दीदी ने मनोयोग पूर्वक शीलो को पढ़ाना शुरू किया था। मम्मी नाराज हो उठी-

'अपना काम छोड़ तू जो इसके साथ माथा-पच्ची कर रही है, उसका कोई नतीजा नहीं निकलने वाला है। देख लेना जरा बड़ी होते ही सब सामान लेकर गायब हो जाएगी।'

सितारा और मम्मी ने एक-दूसरी को झूठा सिद्ध करने की जिद ठान ली। शीलो जैसे ही किताबें खोलकर बैठती, मम्मी काम के लिए आवाज़ लगातीं। मम्मी का हुक्म बजा लेने जब शीलो भागकर पहॅुंचती तो हाथ में पकड़ी पेंसिल देखते ही उनका पारा चढ़ जाता-

'हमारे यहाँ तो स्कूल खुल गया है, सब पढ़ाई में लगे हैं, सबकी रोटी बनाने को एक मैं ही रह गई हूँ। चल जल्दी मसाला पीस कर दे।' शीलो के हाथ की पेंसिल छीन, मम्मी उसे काम में लगा देतीं।

सितारा खुद शीलो का जीवट देख, ताज्जुब में पड़ जाती। उतनी छोटी लड़की कैसे इतने सारे काम हॅंसते-हॅंसते निबटा लेती है। मम्मी की डांट-फटकार का उस पर जैसे कोई असर ही नहीं होता। मम्मी का हर हुक्म वह पूरी निष्ठा से निभाती और सितारा का दिया होम-वर्क भी न जाने कब निबटा डालती। उसकी बुद्धि का लोहा, पापा तक को मानना पड़ा दो वर्षो में उसने नयना की किताबें पढ़कर सबको चमत्कृत कर दिया। नयना तो रोने-रोने को हो आई-

'मम्मी, शीलो चोरी-चोरी हमारी किताबें पढ़ती है।' नयना पढ़ाई में बेहद कमज़ोर थी। शीलो की तेजस्विता में उसे अपनी हार दिखती।

'नहीं दीदी, जब मास्टर जी आपको पढ़ाते हैं न तो हम भी सुनते रहते है। जेल में भी हम पढ़ा करते थे, नयना दीदी। हमें माफ़ कर दीजिए।'

'नहीं शीलो, तुमने कोई गलती नहीं की है। मैं बहुत खुश हूँ नयना के साथ तुम भी मास्टर जी से पढ़ा करो।' उधर पापा ने तो निर्णय ले लिया, पर शीलो जानती थी, नयना के साथ पढ़कर वह कितना गम्भीर अपराध करेगी। उसके लिए सितारा दीदी ही काफ़ी थीं।

कभी-कभी चिढ़कर नयना शीलो के साथ क्रूर मजाक करने में भी न चूकती।

'पढ़-लिखकर शीलो अपनी पगली माँ को चिट्ठी लिखेगी। तेरी माँ ने तेरे बाप को कैसे मारा था, शीलो?'

सच तो यह है कि अपनी माँ की कहानी शीलो को नयना और मम्मी से ही पता लगी थी वर्ना जेल में भी किसी ने शीलो का दिल ऐसे नहीं दुखाया था। नयना की बातों के उत्तर में शीलो ओंठ भींच, आँसू पी जाती। सितारा की डांट पर नयना मॅुंह बिचका देती। सितारा ने शीलो का दुख समझा, प्यार से शीलो की माँ की सच्ची कहानी सुनाई थी। उदास स्वर में शीलों ने कहा था-

'हम माँ से मिलना चाहते हैं, दीदी।'

'मम्मी इस फ़र्माइश पर चिढ़ गई थीं।'

'वाह यह अच्छी रही। खाएगी हमारा और गुण गाएगी हत्यारिन माँ के। मैं तो कहती हूँ इसे उस पगली के पास भेजकर छुट्टी करो।'

'सितारा दीदी, माँ का इलाज क्या नहीं हो सकता?' आँखें में आँसू भरे शीलो ने पूछा था।

'तेरी माँ का इलाज चल रहा है, वह ज़रूर ठीक हो जाएगी।' सितारा ने तसल्ली दी।

सितारा के उत्तर पर शीलो की आँखे खुशी से चमक उठीं।

'दीदी, हम माँ से मिल सकते है।?'

- हाँ शीलो, पर एक शर्त है, पहले तू मन लगाकर पढ़ाई करेगी। मेट्रिक की परीक्षा पास कर ले फिर माँ के पास चलेंगे।

'पर उसमें तो अभी बहुत देर है।'

- पाँच महीने ज्यादा नहीं होते। मैं चाहती हूँ तू पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ी हो जा। सोच, तुझे उस रूप मे देखकर तेरी माँ कितनी खुश होगी न?

'हाँ दीदी, आप ठीक कहती हैं।'

उस दिन से शीलो पढ़ाई में जुट गई। सितारा को पापा से पता लगा था शीलो की माँ का पागलपन बहुत ज्यादा बढ़ गया था। सितारा को डर था माँ को उस हाल में देख शीलो पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे सकेगी। शीलो ने पढ़ाई को तपस्या मान लिया। मम्मी के जा-बेजा हुक्म बजाती शीलो के मुंह पर कभी शिकायत नहीं उभरी, पर सितारा का अक्सर माँ से झगड़ा हो जाता।

'मम्मी, शीलो को भी नयना की तरह पढ़ने-लिखने का अधिकार है। तुम नयना से तो कोई काम नहीं करवातीं, पर शीलो को थोड़ी देर पढ़ने का समय नहीं देना चाहती। यह अन्याय है, मम्मी।'

सितारा के उस तर्क से मम्मी कभी सहमत नहीं हो पाती, उन्हें लगता है हर इंसान की अपनी नियति होती है। अगर शीलो को पढ़ना-लिखना होता तो किसी अच्छे घर में जन्म लेती, हत्यारिन माँ की बेटी को तो कोई घर में भी नहीं घुसने देता। सितारा का सोच दूसरा था-

'किसका जन्म कहाँ होगा, यह तो अपने हाथ की बात नहीं है, मम्मी। अगर शीलो की माँ ने ग़लती की तो इसमें शीलो का क्या दोष है। मां.बेटी की तकरार पर शीलो डर जाती। सितारा को बड़ी बहिन की तरह समझाती-'

'आप हमारे लिए मांजी से झगड़ा न किया करें, दीदी। मांजी ठीक कहती हैं, हमारी किस्मत ही खराब है। मांजी ने अपने घर में जगह दी, यही क्या कम है?'

परिस्थितियों ने शीलो को उम्र से पहले ही समझदार बना दिया था।

मेट्रिक परीक्षा का परिणाम देख सितारा खुशी से उछल पड़ी। ष्शीलो को फ़र्स्ट डिवीजन मिली थी। नयना बस किसी तरह पास भर हो गई थी। सितारा भी एम0ए0 में प्रथम आई थी। अपने ही काँलेज में सितारा को लेक्चररशिप मिल गई। काँलेज की प्राचार्या को सितारा ने शीलो की कहानी सुना कर, मदद माँगी थी। प्राचार्या को दया आ गई। शीलो को न केवल निःशुल्क दाखिला मिला बल्कि होस्टेल में रहने की जगह भी मिल गई। शीलो के अन्य खर्चो का दायित्व सितारा ने ले लिया।

माँ को देखकर शीलो फूट-फूट कर रो पड़ी। शीलो को रोते देख उसकी माँ के चेहरे पर कई रंग आए। डाँक्टर ने कहा यह अच्छा संकेत है। सितारा ने शीलो के साथ प्रति सप्ताह उसकी माँ के पास जाने का निर्णय लिया था।

शीलो की गम्भीरता बढ़ती जा रही थी। क्लास में वह सर्वोच्च अंक पाती, पर लड़कियों में सिर्फ़ गीता ही उसकी सहेली थी। अपना अधिकांश समय वह पढ़ने में लगाती। माँ के पास नियमित रूप से जाती। शीलो को देख वह काफी सामान्य हो जाती। डाक्टर उसे शुभ संकेत मानते। उन्हें अब विश्वास होने लगा था कि शीलो की माँ सामान्य हो सकेगी।

बारहवीं की परीक्षा में भी शीलों को प्रथम श्रेणी के साथ तीन विषयों में डिस्टींक्शन मिला। काँलेज और जिले की ओर से उसे छात्रवृत्ति दी गई। सितारा ने शीलो के भविष्य के विषय में जानना चाहा था।

शीलो, अब तू क्या करना चाहती है?'

'हम वकील बनना चाहते हैं, दीदी।'

वकील क्यों, शीलो? तू डाक्टर बन सकती है, टीचर बन सकती है, वकील बनकर क्या करेगी? सितारा को उसके जवाब पर सचमुच ताज्जुब था।'

'वकील बनकर अपनी माँ की ओर से मुकदमा लडूँगी। उन्हें झूठे कलंक से बाहर निकालूँगी। हम जानते हैं अपनी इज्ज़त बचाने के लिए किसी को मारना अपराध नहीं। अपनी माँ के प्रति मेरा ऋण है, दीदी। उनका कर्ज़ हमें उतारना है।'

'शाबाश, शीलो। मुझे पूरा विश्वास है तू सिर्फ़ अपनी माँ की ही नहीं, उन जैसी दूसरी औरतों के न्याय के लिए भी मुकदमा लड़ेगी।'

'तो आशीर्वाद दीजिए दीदी, मेरा सपना पूरा हो। आपके बिना हम कुछ न कर पाते।'

शीलो अपने अधिकार जान चुकी थी, उसे उसका प्राप्य अवश्य मिलेगा। सितारा के चेहरे पर आश्वस्ति की मुस्कान बिखर आई।

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