पात्र

पिछले तीन महीनों से दोनों के बीच अनबोला  चल रहा था- ऐसा नहीं कि इसके पहले दोनों की बोलचाल बंद न हुई हो, पर इतने लंबे समय के लिए बातचीत कभी बंद नहीं हुई थी.एक और बात, पहले के झगड़ों के बाद पति कभी इतना अजनबी नहीं लगा था. इस बार तो जैसे वह उससे डरने लगी थी. हमेशा की तरह न वो चिल्लाया, न दहाड़ा, बस एकदम गुम हो गया. उसके मन में क्या चल रहा है, यह जानने के लिए जैसे कहीं कोई सूराख भी नहीं बच रहा था.
शादी के बाद जबसे उसे अपने दोनों के बीच किसी ‘तीसरी’ का पता लगा था, दोनों के बीच झगड़े शुरू हो गए थे. परिवार वाले इस सच्चाई से पहले से ही परिचित थे, शायद इसीलिए कुंतल को कभी वह जगह नहीं मिल सकी, जो घर की बहू की होती है. पति की उपेक्षिता को कौन सम्मान दे?अपने लिए की गई ज्यादती कुंतल सह भी जाती, पर बच्चों का तिरस्कार सह पाना कठिन हो जाता.पति ने उसे क्या दुत्कारा कि बच्चे भी पराए हो गए.दूसरी बहुओं के बच्चों का लाड-प्यार किया जाता और उसके बच्चे हर चीज़ को तरस कर रह जाते.
जब कभी भी उसने पति और ससुरालवालों के अन्याय के खिलाफ मुंह खोला, अंत हमेशा कलह-क्लेश के बाद अनबोले में हुआ.बार-बार की हार के बावजूद कुंतल को अक्ल नहीं आती. मौके-बेमौके वह वही बातें दोहरा जाती,जिन्हें सुनते ही पति का खून खौळ उठाता.उसकी तकलीफों को उसने शायद कभी महसूस ही नहीं किया, हमेशा लताड़ ही दिया-
“बढ़ा-चढ़ा के कहने की तुम्हारी पुरानी आदत है, इन बातों में ज़रा सी भी सच्चाई नहीं है.”
पति की वही बात उसे सिर से पैर तक तिलमिला जाती.क्या ये बात झूठी कि दूध पिलाने वाली कुतिया के आगे भी इंसान रोटी का टुकड़ा डाल देता है, पर उसे तो गिन-गिन कर रोटी दी जाती. भूख से कुलामुलाती आँतों के साथ बच्चे के लिए दूध क्या ख़ाक उतरता?बच्चे की दवा-दारू पर पैसे खर्च करना भी सास को अखरता.पति की उपेक्षिता उसकी स्थिति घर की नौकरानी से भी बदतर थी.
कभी जब पति खुश होता, उसका लाड-दुलार करता, उन क्षणों में वह चाहती, वो हमेशा ऐसा ही रहे.कभी तो प्यार से अपनी गलती मानकर, उसे दिलासा दे दे-
“इन बातों को भुला दे कुन्नी, तू तो मेरी रानी है.”
सच उसकी इतनी सी बात सुनने को उसके कान तरस गए, पर उसने कब अपनी गलती मानी?प्यार से कुन्नी पुकारी जाने वाली कुंतल अपने आप में सुलगती रही. वो दूसरी औरत ही पति के लिए सब कुछ थी. परिवार वाले भी उससे दबते और सच्चाई जान कर भी अनजान बने रहते. कुंतल ने सास से मदद मांगी तो उसकी शिकायत पति से कर दी गई. घर में पति की दहाड़ पर बच्चे डर कर कमरे में बंद हो जाते.उनको रोते देख कुंतल का दिल भर आता, क्या इसी दिन के लिए उसने बच्चे जाने थे?क्या-क्या सपने देखे थे उसने और उसे क्या मिला?
छोटी ही उम्र कहानियों के दुखद अंत उसे रुला देते. अम्मा उसके रोने से नाराज़ हो जातीं-
“देख, कुन्नी से कहानियां-उपन्यास पढने वाली कुंतल का भावुक मन और भी ज़्यादा संवेदनशील बन गया था. अम्मा उसके रोने से नाराज़ हो जातिन्न-
“देख कुन्नी, अगर सिर्फ रोने के लिए कहानियां पढती है तो आज से तेरा घर में किताबें लाना बंद. ज़िंदगी में इतना कुछ करने को है और एक तू है कि कहानियों में डूब अपने को भी भुला बैठती है.”
अम्मा की वो बातें कुन्नी को कितनी खराब लगती थीं. क्लास में उसका मन बढाने वाली उसकी सहेली गिरिजा ही थी. उसका लिखा पढ़ वह मुग्ध रह जाती.
“ई कुन्नी तू इतना अच्छा कैसे लिख पाती है? देख लेना ,एक दिन तू बड़ी नामी कहानीकार बनेगी.”
अम्मा के लाख मना करने के बावजूद कुंतल का पढ़ना बंद नहीं हुआ.कहानी के पात्रों के साथ जैसे उसका रिश्ता बन जाता.किशोरी कुन्नी के मन में अपने सपनों के राजकुमार की अस्पष्ट सी आकृति उभरने लगती. इंटर पास करते ही अम्मा को उसकी शादी की धुन सवार हो गई.जल्दी ही उसका रिश्ता ताऊ हो गया, आखिर कुन्नी में कमी ही क्या थी?
आंसू भारी आँखों के साथ अपना घर निहार, कुन्नी साजन के घर आ गई.पूरे रास्ते साथ बैठे व्यक्ति को कुंतल में कोई दिलचस्पी ही नहीं थी.कुंतल का शरीर रोने से काँप-काँप जाता, पर एक बार भी उसकी पीठ पर हाथ धर प्यार से उसने तसल्ली नहीं दी. कुंतल का मन जैसे कहीं आहात हो गया था.
पहली रात की उसने ना जानेकितनी कल्पनाएँ कर रखी थी, ढेरों सपने देखे थे , पर उसकी छोटी ननद ने जो कहा उसे दहशत में डाल गया.
“हमारे भैया खराब नहीं हैं, पर वो औरत उन्हें अपने इशारों पर नचाती है. आज भी वो उन्हें अपने साथ ले गई है.”
कुन्नी संज्ञाशून्य सी बैठी रह गई.कहानियों में पढ़े जैसे सारे दयनीय पात्र उसमे जी उठे. अपने दोनों के बीच किसी तीसरी को कुन्नी बर्दाश्त नहीं कर सकती.
बहुत रात गए पति जब आए तो वह पत्थर बनी बैठी थी. उसे किसी के प्यार की जूठन स्वीकार नहीं.
“सॉरी , देर हो गई, असल में यार दोस्त छोड़ ही नहीं रहे थे.”सहज ढंग से उसने सफाई दी.
कुंतल मौन रह गई. पति ने जब प्यार दिखा कर उसका हाथ अपने होंठों से लगाना चाहा तो बरबस उसके मुंह से निकल गया-
“”तुम्हारे हाथ जूठे हैं, धो लो पहले.”
“क्या?’पति पूरी तरह से चौंक गया.”
“कुछ नहीं” वह सोच में पड़ गई थी.
पहली रात उसके मुंह से ये क्या निकल गया. उसे धैर्य रखना होगा. कहानियों की दुखी नायिका की तरह अपने प्यार से पति का मन जीतना होगा.
“सच कहो, क्यों कहा था तुमने वैसा?’
“ऐसे ही कुछ सोच रही थी.”
पति ने उसे अपनी ओर खींच लिया,. पति को अपना प्राप्य भले ही मिल गया, पर वह तो रीती ही रह गई.
घर में उसकी पीठ पीछे जो बातें होती थीं, कुंतल उनका अर्थ ना समझ पाए ऎसी मूर्ख नहीं थी.सबकी उपेक्षा सह वह जी रही थी.मन में जिद आ गई थी,पीटीआई को जीतने की, उसे पूरे का पूरा पा लेने की.
ससुराल में कोई ऐसा नहीं था, जिसके साथ अपना दुःख बाँट वह हलकी हो जाती.चुपके-चुपके वह अपना दुःख कागज़ पर उतारने लगी.कोरे कागजों से उसका रिश्ता बंध गया. अपने मन की बात खाली कागजों पर उतार वह हलकी हो जाती.अपने लिखने की बात उसने गिरिजा को लिख भेजी.जवाब में खूब लंम्बी सी चिट्ठी लख गिरिजा ने उसका मन बढाया था.
“अपना लिखा कहीं छपने को क्यों नहीं भेजती, कुन्नी?”
जब कुन्नी की एक कहानी किसी पत्रिका में छपी तो कुन्नी उत्साहित हो उठी. उसका लिखा छ्प भी सकता है, ये तो वह सोच भी नहीं पाई थी. अब तो उसे जब भी ज़रा सा वक्त मिलता,वह कुछ ना कुछ लिख डालती. उसकी कहानियां छपने लगीं. ताज्जुब तब हुआ जब उसकी कहानियों के लिए पाठकों के पत्र आने लगे.
एक ख़ास बात ये थी कि उसकी कहानियों और उनके के पात्रों के साथ पाठकों का सहज आत्मसाती- करण हो जाता. उसकी कहानियों में पाठक अपने को पा लेते.एक बार एक पाठक ने लिखा-
“आपकी कहानियों में इतना गहरा दुःख क्यों रहता है, मन अन्दर तक भीग जाता है.क्या आप सुखान्त कहानियां नहीं लिख सकतीं?’
कुंतल ने कोशिश की, पर सुखान्त कहानियां उसे बचकानी या कुछ हद तक फिल्मी लगीं.सप्रयास कहानी लिखना तो कहानी को खत्म कर देना है, वह अपने मन का ही लिखती रही.
दिल्ली से उसके एक पाठक ने लिखा था-
“आप अपने पात्रों के साथ बेहद सहानुभूति रखती हैं,. ताज्जुब होता है , जब खलनायक को भी आप सहानुभूति दिला जाती है, उसे तो पाठकों की घृणा मिलनी चाहिए ना?”
ऐसे पत्रों के साथ उसने अपनी कहानियों को गौर से पढ़ना शुरू किया तो उसे लगा उससे ज़्यादा तो उसके उस्पाथक कहानियों के पात्रों को पहिचानते हैं.कभी उसकी अपनी ही कहानियों की ऎसी समीक्षाएं मिलतीं कि वह विस्मित रह जाती, ऐसा सोचकर तो उसने नहीं लिखा था, पर उन पात्रों के बारे में पाठकों ने जो सोचावो एकदम सही ठहरता था.
बड़े होतेबच्चे उसके लेखन पर गर्व का अनुभव करते. गिरिजा तो उसकी हर कहानी पर्ल्न्बा सा खत भेज, उसका उत्साह बढाती.एक दिन तो पति ने भी उसके लिखे को पढ़ , तारीफ़ कर दी थी. उस दिन वह कितनी उमग आई थी.एक बात सच थी, उसने ज़िंदगी जैसे भी जी, पर अपने मन पर कभी काबू न पासकी.बहुत कोशिशों के बाव्जूद्क्प धो-पोंछ अपने से अलग न कर सकी.हमेशा कचोट बनी रही, अपना सब कुछ दे कर भी, वह अपना प्राप्य ना पा सकी.
शादी के बाद की अपनी उपेक्षा वह कभी ना भुला सकी. गिरिजा समझा कर लिखती, औरत की ज़िंदगी मेंमें इस तरह की बातें आम बातें हैं. उस दूसरी औरत को भुला दे, पर कुन्नी को शिकायत थी, अगर पति के जीवन में कोई और न होती तो क्या पति और ससुराल वाले उसका यूं तिरस्कार करते? अपना अपमान,उपेक्षा हमेशा उसके दिल में ताज़े घाव सी टीसती रही. ऐसा भी नहीं कि उसके लेखन ने उसकी प्रतिष्ठा ससुरालवालों के समक्ष बढ़ा दी थी. उस घर में पत्र-पत्रिकाएँ पढने का न किसी के पास समय था ना चाव. इतना ज़रूर था अब वह पाठकों द्वारा पहिचानी जाने लगी थी. उसकी हर कहानी पर प्रतिक्रियाएं आना ज़रूरी होगया था. एक ख़ास बात ये थी कि जिस समय वह कहानी लिखती , अपने आप में नहीं रहती. कभी कुछ सोच कर लिखना शुरू करती और अंत तक पहुंचाते-पहुँचते कहानी का अंत कुछ और बन जाता. जिस पात्र को नायक के रूपम मेंशुरू करती, अंत में उसकी जगह कोई और नायक बन जाता.वह खुद विस्मित रह जाती. उस जगह उसे कहानी के सन्दर्भ में पढ़ा वह कथन सच लगता कि लेखक का कहानी के पात्रों पर कोई वश नहीं चलता, पर वह क्या वैसी लेखिका बन सकती थी?
उस दिन जब पता लगा ऑफिस के काम से दौरे पर पर जाने का बहाना कर, पति फिर उसके साथ उदयपुर गया थातो वह अपने पर वश न रख सकी, जो जी में आया कहती गई.
पति की सहानुभूति पाने की जगह, उसे उसकी ताड़ना मिली थी.साफ़ शब्दों में उसने लताड़ दिया था-
“मेरे पास तुम्हारी बेकार की बातों के लिए टाइम नहीं है. तुम्हें जो करना है कर लो. मै जैसे रहता हूँ वैसे ही रहूंगा, जो जी चाहे करूंगा. ये मेरा घर है तुम्हारे बाप का नहीं जो तुम हुक्म चलाओगी.
धार-धार रोटी कुन्नी निरीह हो उठी.अपने मन का दुःख वह किसे सुनाए, उसके सिवा कौन है उसका, और वो भी अपना नहीं.
ओंठ सिकोड़ पति ने ताना दिया था वह तो बड़ी भारी कहानीकार है, पूरी दुनिया को अपनी दुःख-गाथा सूना सकती है, बस उसकी जान बख्श दे. उसके पास उसका रोना सुनाने के लिए वक्त नहीं है.
पति के व्यंग्य सने वाक्य ने कुंतल को उत्तेजित कर दिया.उसी रात उसने एक लंबी कहानी लिख डाली.कहानी पूरी कर छपने भी भेज दी.उस समय उसने और कुछ नहीं सोचा.कहानी अक्षरश:सच ही तो नहीं होती, उसमें कल्पना और अतिशयोक्ति भी आ सकती है. कहानी छप भी गई, पर कहानी लिखने और छपने के बीच दो वर्षों का लंबा अंतराल था. तब तक उसे यह भी याद नहीं रहा , उसकी कहानी में ऐसे बहुत से सच्चे तथ्य और घटनाएं हैं, जिनसे उसे और उसके पति को आसानी से पहिचाना जा सकता है.
प्रकाशित कहानी की प्रति हमेशा की तरहुसके घर भेजी गई थी.दो सप्ताह बाहर छुट्टियां बिता कर लौटते ही पत्रिका मिली थी. पूरी कहानी पढ़, पति सामान्य नहीं रह सका.पूरी दुनिया के सामने उसने पति को जिस रूप में प्रस्तुत किया, वो अक्षम्य था. पति परमेश्वर होता है,पर उसकी कहानी ने तो भ्रम तोड़ डाला. उसका दंभ झूठा था, वह बेहद आहत था.
पति का कहना था, उसने जानते-बूझते सुनियोजित तरीके से पति के चरित्र की ह्त्या की है. अब वह कभी सामान्य जीवन नहीं जी सकता.रिश्तेदारों के सामने ही नहीं, मित्र-बांधवों के सामने भी वह सर ऊंचा करके नहीं चल सकता. अब उसे जैसे जीना है, जी ले, पति से उसका कोई वास्ता नहीं.
पति की बातों में सच्चाई थी, सब कुछ जानते हुए भी पिछले दस वर्षों से उसने पति का सम्मान अक्षुण्ण रक्खा था. आपस में लड़-झगड़ कर भी उसने किसी से पति की शिकायत नहीं की. सबके सामने उसने हमेशा उसे पति और बच्चों के पिता का पूरा सम्मान दिया.क उसकी कमजोरियों के बावजूद उसे सच्चे दिल से प्यार किया. शायद अन्दर-अन्दर वह उसकी इस बात के लिए उसका आभार भी मानता रहा हो, पर इस कहानी के माध्यम से अनजाने ही पट-रूप में उसने एक ऐसा पात्र गढ़ दिया था, जिससे किसी की भी सहानुभूति असंभव थी.

वह फटी-फटी आँखों से ताकती रह गई, अपने पात्रों के प्रति बेहद संवेदनशील कही जाने वाली कुंतल ने अपने सबसे प्रिय पात्र की इस निर्ममता से ह्त्या कैसे कर डाली? शायद सच यही था. कहानी लिखते समय वह उसका पति नहीं एक पात्र बस एक पात्र बन गया था. अपने उस पात्र को वह वश में नहीं रख सकी, पर उसका वो सच क्या पति स्वीकार कर सकेगा?

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