महात्मा गाँधी जी बचपन से ही सत्य और अहिंसा का पालन करते थे। कभी झूठ नहीं बोलते थे, कभी गलत काम नहीं करते थे। ये बातें उन्होंने अपनी माँ से सीखी थीं। जानते हो उन्होंने एक बार माँ को भी सच का पाठ पढ़ाया था।
2 अक्टूबर, 1869 को करमचंद गाँधी के घर पुत्र का जन्म हुआ। शिशु का नाम मोहनदास रखा गया। उसकी माँ पुतलीबाई प्यार से मोहन को मोनिया कहकर पुकारतीं। मोहन भी अपनी माँ को बहुत चाहता था। माँ की हर बात ध्यान से सुनता और उसे पूरा करने की कोशिश करता।
बचपन से मोहन की बुद्धि बहुत तेज थी। वह सवाल पूछ-पूछ कर माँ को परेशान कर डालता। मोहन के घर में एक कुआँ था। कुएँ के चारों ओर पेड़-पौधे लगे हुए थे। कुएँ के कारण बच्चों को पेड़ पर चढ़ना मना था। मोहन सबकी आँख बचा, जब-तब पेड़ पर चढ़ जाता। एक दिन उसके बड़े भाई ने मोहन को कुएँ के पास वाले पेड़ पर चढे़ देखा। उन्होंने मोहन से कहा-
”मोहन, तुझे पेड़ पर चढ़ने को मना किया था। पेड़ पर क्यों चढ़ा है, चल नीचे उतर।“
”नहीं, हम नहीं उतरेंगे। हमें पेड़ पर मजा आ रहा है।“
क्रोधित भाई ने मोहन को चाँटा मार दिया रोता हुआ मोहन माँ के पास पहुं.चा और बड़े भाई की शिकायत करने लगा।
”माँ, बड़े भइया ने हमें चाँटा मारा। तुम भइया को डाँटो।“
माँ काम में उलझी हुई थी। मोहन माँ से बार-बार भाई को डाँटने की बात कहता गया। तंग आकर माँ कह बैठी-
”उसने तुझे मारा है न? जा, तू भी उसे मार दे। मेरा पीछा छोड़, मोनिया। तंग मत कर।“
आँसू पोंछ मोहन ने कहा-
”यह तुम क्या कह रही हो, माँ? तुम तो कहती हो अपने से बड़ों का आदर करना चाहिए। भइया मुझसे बड़े हैं। मैं बड़े भइया पर हाथ कैसे उठा सकता हूँ? हाँ तुम भइया से बड़ी हो। तुम उन्हें समझा सकती हो कि वह मुझे न मारें।“
मोहन की बात सुन, माँ को अपनी भूल समझ में आ गई। हाथ का काम छोड़, माँ ने मोहन को सीने से चिपटा लिया। उनकी आँखों से खुशी के आँसू बह चले-
”तू मेरा राजा बेटा है, मोनिया। आज तूने अपनी माँ की भूल बता दी। हमेशा सच्चाई और ईमानदारी की राह पर चलना, मेरे लाल।“
मोहन ने अपने घर और आसपास एक और बात देखी। उसने देखा कि ऊंची जाति के लोग मेहतर आदि को नीची निगाह से देखते। अगर गलती से कोई ऊंची जाति वाला नीची जाति वाले से छू जाए तो उसे नहाना पड़ता। मोहन की समझ में यह बात नहीं आती कि इंसानों के बीच यह अंतर क्यों है? एक दिन मोहन का बदन, उनके घर में सफ़ाई का काम करने वाले से छू गया। उन्होंने माँ से कहा-
”माँ, गलती से मैंने मेहतर को छू लिया। मुझे नहला दो।“
माँ सोच में पड़ गई। उस दिन मौसम ठंडा था। शाम के समय नहलाना क्या ठीक होगा? कुछ सोचकर माँ ने कहा-
”यह नहाने का समय नहीं है। जा बाजार में किसी मुसलमान को छू आ। फिर तुझे नहाना नहीं पड़ेगा।“
मोहन सोच में पड़ गया। मनुष्य तो सब एक से हैं। एक को छूने पर नहाना पड़ता है, दूसरे को छू लेने से नहाना नहीं पड़ता, ऐसा क्यों है?
माँ से पूछने पर भी सही उत्तर नहीं मिल सका। यह सवाल मोहन के मन में हमेशा बना रहा। जब वे बड़े हुए तो उन्होंने लोगों को यही समझाया-
”सारे मनुष्य भगवान के बनाए हुए हैं। सब मनुष्य समान हैं। कोई जन्म से ऊंचा या नीचा, बड़ा या छोटा नहीं हो जाता। सबको प्यार करना ही ठीक बात है।“
बचपन में मोहन की माँ उसे राजा हरिश्चंद्र और श्रवण कुमार की कहानियाँ सुनाया करतीं। मोहन के मन पर इन कहानियों ने गहरा असर डाला। उन्होंने तय किया वे भी श्रवण कुमार की तरह अपने माता-पिता का कहना मानेंगे उनकी सेवा करेंगे। घर में सब उन्हें खूब प्यार करते।
हाई स्कूल की परीक्षा पास करने के बाद मोहनदास बैरिस्टरी की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड गए। उनकी माँ ने सुना था इंग्लैंड में लोग शराब पीते हैं। माँस खाते हैं। मोहनदास से उनकी माँ ने वचन लिया-
”बेटा, प्रतिज्ञा करो। तुम वहाँ शराब नहीं पियोगे, माँस नहीं खाओगे। मन लगाकर पढ़ाई करोगे।“
मोहन ने माँ के सामने शपथ ली- ”माँ मैं कभी शराब नहीं पीऊंगा, माँस नहीं खाऊंगा। बैरिस्टर बनकर घर लौटूँगा।“
इंग्लैंड में शराब और माँस के बिना रहना कठिन काम था, पर मोहनदास ने माँ को दिए वचन का पूरा पालन किया। उन्होंने कभी माँस नहीं खाया और कभी मदिरा नहीं चखी। पूरी मेहनत के साथ पढ़ाई पूरी करके बैरिस्टर बने। घर लौटने पर उन्हें अपनी माँ नहीं मिल सकीं। जब वह इंग्लैंड में थे, उनकी माँ की मृत्यु हो गई थी। मोहनदास को माँ से न मिल पाने का बहुत दुख रहा।
मोहनदास ने भारत की आज़ादी के लिए वकालत छोड़ दी। अंगे्रजी का शासन समाप्त करने के लिए उन्होंने बहुत त्याग किए। वे कई बार जेल गए। अंगे्रजों के अत्याचार सहे। अंत में भारत स्वाधीन हुआ।
सारा देश मोहनदास कमरचंद गाँधी को प्यार करता था। उन्होंने हमेशा सादा जीवन बिताया, इसीलिए वह महात्मा गाँधी कहलाए। भारतवासी उन्हें ‘बापू’ कहते हैं। महात्मा गाँधी ने सारे विश्व को शांति और अहिंसा का पाठ पढ़ाया। गाँधी जी का नाम भारत में ही नहीं, विदेशों में भी सम्मान के साथ लिया जाता है।
Showing posts with label प्रेरक बाल कहानियां. Show all posts
Showing posts with label प्रेरक बाल कहानियां. Show all posts
स्वामी विवेकानंद
स्वामी विवेकानंद का नाम तो तुमने सुना ही होगा। वे महान दार्शनिक और समाज सेवी थे।
बचपन में उनका नाम नरेंद्र था। नरेंद्र पशु-पक्षियों से प्यार करते थे। जरूरतमंद लोगों की मदद करते थे। हनुमान जी की कहानी सुनकर उन्होंने सोचा कि वे भी ताकतवर बनेंगे। वे जानते थे कि जब तक लोग ताकतवर नहीं होंगे तब तक दूसरों की सेवा नहीं कर सकेंगे। आओ पढ़ें कि वे जरूरतमंद लोगों की मदद कैसे करते थे।,
”ठहर तो, अभी तुझे मजा चखाता हूँ।“ बालक नरेंद्र अपने पालतू खरगोश के पीछे दौड़ रहा था। खरगोश भागकर नरेंद्र की माँ भुवनेश्वरी की गोद में छिप गया।
”अच्छा तो तू मेरी माँ की गोद में छिपा बैठा है। मेरे खरगोश को अपनी गोद से उतार दो माँ। मैं इसके साथ खेलूंगा।“
भुवनेश्वरी हॅंस पड़ीं। खरगोश को गोदी से उतार उन्होंने बेटे का माथा चूम लिया। नरेंद्र को पशु-पक्षियों से बहुत प्यार था। नरेंद्र के पिता विश्वनाथ दत्त कलकत्ता शहर के मशहूर वकील थे। नरेंद्र माता-पिता की आँखों का तारा था। बेटे की रूचि जानकर पिता ने नरेंद्र के लिए तरह-तरह के पशु-पक्षी मॅंगा रखे थे। नरेंद्र उन्हें दाना खिलाता, उनके साथ खेलता।
नरेंद्र की माँ रोज भगवान की पूजा करतीं। नरेंद्र भी माँ के साथ पूजा में बैठता। उसका गला बहुत मीठा था। माँ जब भजन गातीं तो नरेंद्र भी अपनी मीठी आवाज में माँ के साथ गाता। नरेंद्र की माँ उन्हें रामायण की कहानियाँ सुनातीं, दुर्गा माँ का पाठ करतीं। नरेंद्र को हनुमान जी का शक्तिशाली रूप बहुत अच्छा लगता। माँ ने उन्हें बताया था कि लंका युद्ध में जब लक्ष्मण जी के शक्ति. बाण लगा था तब वे मूर्छित हो गए। उन्हें बचाने के लिए संजीवनी बूटी चाहिए थी। संजीवनी बूटी एक पहाड़ पर उगती थी। हनुमान जी संजीवनी बूटी को नहीं पहचानते थे, इसलिए वह पूरे पर्वत को कंधे पर उठा लाए। नरेंद्र माँ से पूछा करते-
”माँ, क्या मैं भी हनुमान जी की तरह शक्तिशाली बन सकता हूँ?“
”क्यों नहीं, पर इसके लिए पौष्टिक भोजन और व्यायाम जरूरी है।“ माँ बालक को बहलातीं। वे कहते थे कि ताकतवर आदमी ही दूसरों की, देश की सेवा कर सकता है इसलिए ताकतवर बनने के लिए नरेंद्र रोज अखाड़े में जाकर व्यायाम करता, कुश्ती लड़ता। कुश्ती में नरेंद्र अपने साथियों को पछाड़ देता। शरीर से शक्तिशाली होने पर भी नरेंद्र का मन बहुत कोमल था। वह अपने मित्रों को सच्चे मन से प्यार करता। गरीबों पर दया करता। वह किसी को दुःखी नहीं देख सकता था। नरेंद्र की बुद्धि भी बहुत तीव्र थी। वह हमेशा प्रथम आता।
बंगाल में दुर्गापूजा का त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। पूजा पास आ रही थी। कलकत्ता में जगह-जगह पूजा-पंडाल सजाए जा रहे थे। माँ दुर्गा की प्रतिमा बनाई जा रही थीं। भजन-कीर्तन के कार्यक्रम चल रहे थे। एक दिन नरेंद्र अपने मित्र रवि के साथ मुहल्ले के पूजा के पंडाल में घूम रहा था। चारों ओर खुशी का वातावरण था। चनाजोर, मूंगफली, गुब्बारे बिक रहे थे। नरेंद्र ने रवि से कहा-
”सुना है कल बहुत अच्छी भजन. मंडली, आ रही है। हम दोनों भी रात भर भजन सुनेंगे।“
”नहीं नरेंद्र, कल मैं नहीं आ सकूंगा।“ रवि का चेहरा उदास था।
”क्या बात है रवि, तू क्यों नहीं आएगा? तेरा चेहरा इतना उदास क्यों है, दोस्त?“
”नरेंद्र, तू तो जानता है कि मेरे पिता जी नहीं हैं। कल मेरी गलती से माँ की आधी साड़ी जल गई। उसके पास दूसरी साड़ी नहीं है। जली हुई धोती पहनकर माँ पूजा में कैसे आएगी। इसीलिए कल मैं नहीं आऊंगा।“
”अरे बस इतनी-सी बात पर तू उदास हो गया। तू यहीं ठहर, मैं अभी आया।“
रवि को वहीं खड़ा छोड़कर नरेंद्र अपने घर चला गया। थोड़ी देर बाद जब वह वापस आया तो उसके हाथ में एक नई साड़ी का पैकेट था।
”अरे तू यह क्या लाया है?“ रवि आश्चर्य में था।
”चल तेरे घर चलते हैं। मौसी के लिए नई धोती लाया हूँ।“
”नहीं नरेंद्र, माँ नाराज होंगी।“
”क्यों, क्या तेरी माँ मेरी मौसी माँ नहीं हैं? क्या मुझे तू भाई की तरह प्यार नहीं करता? डर मत, चल। मौसी माँ को प्रणाम कर आऊं।“
रवि के घर पहुंच, नरेंद्र ने रवि की माँ के पाँव छूकर कहा-
मौसी, मेरी माँ ने यह साड़ी भेजी है। कहा है कि कल पूजा के लिए यही साड़ी पहनकर आना।
रवि की माँ की आँखों में आँसू आ गए। नरेंद्र को ढेर सारे आशीर्वाद दे डाले। नरेंद्र हॅंस पड़ा।
”वाह मौसी, एक साड़ी पहुंचाने भर के लिए इतने आशीर्वाद?“
”हाँ बेटा, भगवान तुझ-सा बेटा हर माँ को दे। देखना एक दिन तेरा नाम सारी दुनिया में फैलेगा।“
”नहीं मौसी, माँ से पूछना उसे कितना परेशान करता हूँ।“
”जिसके दिल में दुखियों के लिए इतनी दया हो, वह जरूर महान व्यक्ति बनेगा। मेरी बात याद रखना।“
शाम को पूजा का पंडाल रोशनी से जगमगा रहा था। लोगों की भीड़ देवी के दर्शन के लिए उमड़ी आ रही थी। भजन-कीर्तन करने वाले अपने साज तैयार कर रहे थे। रवि और नरेंद्र भी उनके पास जाकर बैठ गए। नरेंद्र की संगीत में बहुत रूचि थी। रवि ने नरेंद्र से कहा-
”नरेंद्र तेरी आवाज कितनी मीठी है। जब तू गाता है तो जी चाहता है, तेरा भजन कभी समाप्त न हो। आज तू भी अपना भजन गाना।“
”नहीं रवि, यहाँ बहुत प्रसिद्ध भजनीक आते हैं। मैं उनके सामने कैसे गा सकता हूँ?“
भजन का कार्यक्रम शुरू हो गया। भजनीक के साथ नरेंद्र भी अपनी मीठी आवाज में गीत गा रहा था। नरेंद्र के पिता ने कहा-
”बेटा, तेरा गला इतना सुरीला है। एक भजन तू अकेले गा। देवी माँ तूझे आशीर्वाद देंगी।“
नरेंद्र के गीत पर लोग झूम उठे। कीर्तन मंडली वालों ने भी नरेंद्र की पीठ ठोंकी। एक दिन नरेंद्र को स्वामी रामकृष्ण परमहंस के सामने भी गीत गाने का मौका मिला। स्वामी रामकृष्ण परमहंस एक महान संत थे। नरेंद्र का गीत सुनकर वह प्रसन्न हो उठे। उन्होंने नरेंद्र से कहा-
”तुम लोगों की भलाई करने के लिए इस संसार में आए हो। तुम साधारण मनुष्य नहीं हो।“
नरेंद्र ने स्वामी जी से पूछा-
”क्या आपने भगवान को देखा है, स्वामी जी?“
”हाँ, मैंने भगवान को वैसे ही देखा है, जैसे तुझे देख रहा हूँ।“ हॅंसकर परमहंस जी ने जवाब दिया।
स्वामी रामकृष्ण परमहंस का नरेंद्र पर बहुत प्रभाव पड़ा। वह उनका शिष्य बन गया। नरेंद्र का नाम विवेकानंद रखा गया। उन्होंने कई वर्षो तक उनसे ज्ञान प्राप्त किया। स्वामी विवेकानंद ने लोगों को हिंदू धर्म का सच्चा अर्थ समझाया। उन्हें बताया कि मानव सेवा ही ईश्वर की सच्ची भक्ति है। अमेरिका के शिकागो नगर में उन्होंने एक भाषण दिया। उनके भाषण से कई विदेशी भी उनके भक्त बन गए। उन्होंने अपने गुरू रामकृष्ण परमहंस के नाम पर रामकृष्ण मठ की स्थापना की। यह मठ गरीबों और जरूरतमंदों की सेवा करता है। स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि मानव की सेवा ही वास्तव में ईश्वर की सेवा है। स्वामी विवेकानंद ने लोगों की भलाई और सेवा में अपना पूरा जीवन बिताया।
बचपन में उनका नाम नरेंद्र था। नरेंद्र पशु-पक्षियों से प्यार करते थे। जरूरतमंद लोगों की मदद करते थे। हनुमान जी की कहानी सुनकर उन्होंने सोचा कि वे भी ताकतवर बनेंगे। वे जानते थे कि जब तक लोग ताकतवर नहीं होंगे तब तक दूसरों की सेवा नहीं कर सकेंगे। आओ पढ़ें कि वे जरूरतमंद लोगों की मदद कैसे करते थे।,
”ठहर तो, अभी तुझे मजा चखाता हूँ।“ बालक नरेंद्र अपने पालतू खरगोश के पीछे दौड़ रहा था। खरगोश भागकर नरेंद्र की माँ भुवनेश्वरी की गोद में छिप गया।
”अच्छा तो तू मेरी माँ की गोद में छिपा बैठा है। मेरे खरगोश को अपनी गोद से उतार दो माँ। मैं इसके साथ खेलूंगा।“
भुवनेश्वरी हॅंस पड़ीं। खरगोश को गोदी से उतार उन्होंने बेटे का माथा चूम लिया। नरेंद्र को पशु-पक्षियों से बहुत प्यार था। नरेंद्र के पिता विश्वनाथ दत्त कलकत्ता शहर के मशहूर वकील थे। नरेंद्र माता-पिता की आँखों का तारा था। बेटे की रूचि जानकर पिता ने नरेंद्र के लिए तरह-तरह के पशु-पक्षी मॅंगा रखे थे। नरेंद्र उन्हें दाना खिलाता, उनके साथ खेलता।
नरेंद्र की माँ रोज भगवान की पूजा करतीं। नरेंद्र भी माँ के साथ पूजा में बैठता। उसका गला बहुत मीठा था। माँ जब भजन गातीं तो नरेंद्र भी अपनी मीठी आवाज में माँ के साथ गाता। नरेंद्र की माँ उन्हें रामायण की कहानियाँ सुनातीं, दुर्गा माँ का पाठ करतीं। नरेंद्र को हनुमान जी का शक्तिशाली रूप बहुत अच्छा लगता। माँ ने उन्हें बताया था कि लंका युद्ध में जब लक्ष्मण जी के शक्ति. बाण लगा था तब वे मूर्छित हो गए। उन्हें बचाने के लिए संजीवनी बूटी चाहिए थी। संजीवनी बूटी एक पहाड़ पर उगती थी। हनुमान जी संजीवनी बूटी को नहीं पहचानते थे, इसलिए वह पूरे पर्वत को कंधे पर उठा लाए। नरेंद्र माँ से पूछा करते-
”माँ, क्या मैं भी हनुमान जी की तरह शक्तिशाली बन सकता हूँ?“
”क्यों नहीं, पर इसके लिए पौष्टिक भोजन और व्यायाम जरूरी है।“ माँ बालक को बहलातीं। वे कहते थे कि ताकतवर आदमी ही दूसरों की, देश की सेवा कर सकता है इसलिए ताकतवर बनने के लिए नरेंद्र रोज अखाड़े में जाकर व्यायाम करता, कुश्ती लड़ता। कुश्ती में नरेंद्र अपने साथियों को पछाड़ देता। शरीर से शक्तिशाली होने पर भी नरेंद्र का मन बहुत कोमल था। वह अपने मित्रों को सच्चे मन से प्यार करता। गरीबों पर दया करता। वह किसी को दुःखी नहीं देख सकता था। नरेंद्र की बुद्धि भी बहुत तीव्र थी। वह हमेशा प्रथम आता।
बंगाल में दुर्गापूजा का त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। पूजा पास आ रही थी। कलकत्ता में जगह-जगह पूजा-पंडाल सजाए जा रहे थे। माँ दुर्गा की प्रतिमा बनाई जा रही थीं। भजन-कीर्तन के कार्यक्रम चल रहे थे। एक दिन नरेंद्र अपने मित्र रवि के साथ मुहल्ले के पूजा के पंडाल में घूम रहा था। चारों ओर खुशी का वातावरण था। चनाजोर, मूंगफली, गुब्बारे बिक रहे थे। नरेंद्र ने रवि से कहा-
”सुना है कल बहुत अच्छी भजन. मंडली, आ रही है। हम दोनों भी रात भर भजन सुनेंगे।“
”नहीं नरेंद्र, कल मैं नहीं आ सकूंगा।“ रवि का चेहरा उदास था।
”क्या बात है रवि, तू क्यों नहीं आएगा? तेरा चेहरा इतना उदास क्यों है, दोस्त?“
”नरेंद्र, तू तो जानता है कि मेरे पिता जी नहीं हैं। कल मेरी गलती से माँ की आधी साड़ी जल गई। उसके पास दूसरी साड़ी नहीं है। जली हुई धोती पहनकर माँ पूजा में कैसे आएगी। इसीलिए कल मैं नहीं आऊंगा।“
”अरे बस इतनी-सी बात पर तू उदास हो गया। तू यहीं ठहर, मैं अभी आया।“
रवि को वहीं खड़ा छोड़कर नरेंद्र अपने घर चला गया। थोड़ी देर बाद जब वह वापस आया तो उसके हाथ में एक नई साड़ी का पैकेट था।
”अरे तू यह क्या लाया है?“ रवि आश्चर्य में था।
”चल तेरे घर चलते हैं। मौसी के लिए नई धोती लाया हूँ।“
”नहीं नरेंद्र, माँ नाराज होंगी।“
”क्यों, क्या तेरी माँ मेरी मौसी माँ नहीं हैं? क्या मुझे तू भाई की तरह प्यार नहीं करता? डर मत, चल। मौसी माँ को प्रणाम कर आऊं।“
रवि के घर पहुंच, नरेंद्र ने रवि की माँ के पाँव छूकर कहा-
मौसी, मेरी माँ ने यह साड़ी भेजी है। कहा है कि कल पूजा के लिए यही साड़ी पहनकर आना।
रवि की माँ की आँखों में आँसू आ गए। नरेंद्र को ढेर सारे आशीर्वाद दे डाले। नरेंद्र हॅंस पड़ा।
”वाह मौसी, एक साड़ी पहुंचाने भर के लिए इतने आशीर्वाद?“
”हाँ बेटा, भगवान तुझ-सा बेटा हर माँ को दे। देखना एक दिन तेरा नाम सारी दुनिया में फैलेगा।“
”नहीं मौसी, माँ से पूछना उसे कितना परेशान करता हूँ।“
”जिसके दिल में दुखियों के लिए इतनी दया हो, वह जरूर महान व्यक्ति बनेगा। मेरी बात याद रखना।“
शाम को पूजा का पंडाल रोशनी से जगमगा रहा था। लोगों की भीड़ देवी के दर्शन के लिए उमड़ी आ रही थी। भजन-कीर्तन करने वाले अपने साज तैयार कर रहे थे। रवि और नरेंद्र भी उनके पास जाकर बैठ गए। नरेंद्र की संगीत में बहुत रूचि थी। रवि ने नरेंद्र से कहा-
”नरेंद्र तेरी आवाज कितनी मीठी है। जब तू गाता है तो जी चाहता है, तेरा भजन कभी समाप्त न हो। आज तू भी अपना भजन गाना।“
”नहीं रवि, यहाँ बहुत प्रसिद्ध भजनीक आते हैं। मैं उनके सामने कैसे गा सकता हूँ?“
भजन का कार्यक्रम शुरू हो गया। भजनीक के साथ नरेंद्र भी अपनी मीठी आवाज में गीत गा रहा था। नरेंद्र के पिता ने कहा-
”बेटा, तेरा गला इतना सुरीला है। एक भजन तू अकेले गा। देवी माँ तूझे आशीर्वाद देंगी।“
नरेंद्र के गीत पर लोग झूम उठे। कीर्तन मंडली वालों ने भी नरेंद्र की पीठ ठोंकी। एक दिन नरेंद्र को स्वामी रामकृष्ण परमहंस के सामने भी गीत गाने का मौका मिला। स्वामी रामकृष्ण परमहंस एक महान संत थे। नरेंद्र का गीत सुनकर वह प्रसन्न हो उठे। उन्होंने नरेंद्र से कहा-
”तुम लोगों की भलाई करने के लिए इस संसार में आए हो। तुम साधारण मनुष्य नहीं हो।“
नरेंद्र ने स्वामी जी से पूछा-
”क्या आपने भगवान को देखा है, स्वामी जी?“
”हाँ, मैंने भगवान को वैसे ही देखा है, जैसे तुझे देख रहा हूँ।“ हॅंसकर परमहंस जी ने जवाब दिया।
स्वामी रामकृष्ण परमहंस का नरेंद्र पर बहुत प्रभाव पड़ा। वह उनका शिष्य बन गया। नरेंद्र का नाम विवेकानंद रखा गया। उन्होंने कई वर्षो तक उनसे ज्ञान प्राप्त किया। स्वामी विवेकानंद ने लोगों को हिंदू धर्म का सच्चा अर्थ समझाया। उन्हें बताया कि मानव सेवा ही ईश्वर की सच्ची भक्ति है। अमेरिका के शिकागो नगर में उन्होंने एक भाषण दिया। उनके भाषण से कई विदेशी भी उनके भक्त बन गए। उन्होंने अपने गुरू रामकृष्ण परमहंस के नाम पर रामकृष्ण मठ की स्थापना की। यह मठ गरीबों और जरूरतमंदों की सेवा करता है। स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि मानव की सेवा ही वास्तव में ईश्वर की सेवा है। स्वामी विवेकानंद ने लोगों की भलाई और सेवा में अपना पूरा जीवन बिताया।
श्रवण कुमार
श्रवण कुमार का नाम इतिहास में मातृभक्ति और पितृभक्ति के लिए अमर रहेगा। उसके माँ-बाप बूढ़े थे, अंधे थे। वह दिन भर उनकी सेवा करता। वह कभी काम के कारण शिकायत न करता।
उसने विवाह किया। उसकी पत्नी उसके बूढे माता.पिता का तिरस्कार करती थी। वह नाराज़ होकर घर छोड़कर चली जाती है। फिर भी श्रवण पत्नी के लिए माँ-बाप को नहीं छोड़ता।
एक दिन श्रवण के माँ-बाप तीर्थ यात्रा पर जाने की इच्छा प्रकट करते हैं। उन दिनों रेल या बस नहीं थी। देखो कैसे श्रवण उन्हें तीर्थ पर ले जाता है।,
बहुत समय पहले श्रवण कुमार नाम का एक बालक था। श्रवण के माता-पिता अंधे थे। श्रवण अपने माता-पिता को बहुत प्यार करता। उसकी माँ ने बहुत कष्ट उठाकर श्रवण को पाला था। जैसे-जैसे श्रवण बड़ा होता गया, अपने माता-पिता के कामों में अधिक से अधिक मदद करता।
सुबह उठकर श्रवण माता-पिता के लिए नदी से पानी भरकर लाता। जंगल से लकड़ियाँ लाता। चूल्हा जलाकर खाना बनाता। माँ उसे मना करतीं-
”बेटा श्रवण, तू हमारे लिए इतनी मेहनत क्यों करता है? भोजन तो मैं बना सकती हूँ। इतना काम करके तू थक जाएगा।“
”नहीं माँ, तुम्हारे और पिता जी का काम करने में मुझे जरा भी थकान नहीं होती। मुझे आनंद मिलता है। तुम देख नहीं सकतीं। रोटी बनाते हुए, तुम्हारे हाथ जल जाएँगे।“
”हे भगवान! हमारे श्रवण जैसा बेटा हर माँ-बाप को मिले। उसे हमारा कितना खयाल है।“ माता-पिता श्रवण को आशीर्वाद देते न थकते।
श्रवण के माता-पिता रोज भगवान की पूजा करते। श्रवण उनकी पूजा के लिए फूल लाता, बैठने के लिए आसन बिछाता। माता-पिता के साथ श्रवण भी पूजा करता।
मता-पिता की सेवा करता श्रवण बड़ा होता गया। घर के काम पूरे कर, श्रवण बाहर काम करने जाता। अब उसके माता-पिता को काम नहीं करना होता।
श्रवण के माता-पिता को बेटे के विवाह की चिंता हुई। अंत में एक लड़की के साथ श्रवण कुमार का विवाह हो गया। श्रवण की पत्नी का स्वभाव अच्छा नहीं था। वह आलसी और स्वार्थी स्त्री थी। उसे श्रवण के अंधे माता-पिता की सेवा करना अच्छा नहीं लगता। अक्सर माता-पिता को लेकर वह श्रवण से झगड़ा करती। वह अपने लिए अच्छा भोजन बनाती, पर श्रवण के माता-पिता को रूखा-सूखा खाना देती। एक दिन श्रवण ने देखा उसके माता-पिता नमक से रोटी खा रहे हैं और उसकी पत्नी पूरी और मालपुए का भोजन कर रही है। श्रवण को क्रोध आ गया।
”यह क्या माँ-पिता जी को रूखी रोटी और खुद पकवान खाती हो। तुम्हें शर्म नहीं आती?“
”उन्हें खाना देती हूँ, यही क्या कम है। मैं किसी की दासी नहीं हूँ।“ श्रवण की पत्नी ने तमक कर जवाब दिया।
”क्या वे तुम्हारे माता-पिता नहीं हैं? बड़ों के साथ ऐसा बरताव क्या ठीक बात है?“
”नहीं, वे मेरे कोई नहीं लगते। मैं उनकी सेवा करने नहीं आई हूँ। मैं अभी यहाँ नहीं रह सकती। मैं जा रही हूँ। तुम चाहो तो मेरे साथ आ सकते हो। नहीं तो तुम इनके साथ बने रहो। मैं चली।“
ण की पत्नी घर छोड़कर जाने लगी। बहुत समझाने पर भी वह नहीं रूकी न श्रवण की बात मानी, न फिर कभी वापस आई। अपना दुख भुलाकर श्रवण फिर बूढे़ माता-पिता की सेवा में जुट गया। काम पर जाने के पहले वह उनके सारे काम पूरे करके जाता। घर लौटकर उनकी सेवा करता। रात में उनके पैर दबाता। माता-पिता के सोने के बाद खुद सोता।
एक दिन श्रवण के माता-पिता ने कहा-
”बेटा, तुमने हमारी सारी इच्छाएँ पूरी की हैं। अब एक इच्छा बाकी रह गई है।“
”कौन-सी इच्छा माँ? क्या चाहते हैं पिता जी? आप आज्ञा दीजिए। प्राण रहते आपकी इच्छा पूरी करूँगा।“
”हमारी उमर हो गई अब हम भगवान के भजन के लिए तीर्थ. यात्रा पर जाना चाहते हैं बेटा। शायद भगवान के चरणों में हमें शांति मिले।“
श्रवण सोच में पड़ गया। उन दिनों आज की तरह बस या रेलगाड़ियाँ नहीं थी। वे लोग ज्यादा चल भी नहीं सकते थे। माता-पिता की इच्छा कैसे पूरी करूँ, यह बात सोचते-सोचते श्रवण को एक उपाय सूझ गया। श्रवण ने दो बड़ी-बड़ी टोकरियाँ लीं। उन्हें एक मजबूत लाठी के दोनों सिरों पर रस्सी से बाँधकर लटका दिया। इस तरह एक बड़ा काँवर बन गया। फिर उसने माता-पिता को गोद में उठाकर एक-एक टोकरी में बिठा दिया। लाठी कंधे पर टाँगकर श्रवण माता-पिता को तीर्थ यात्रा कराने चल पड़ा।
श्रवण एक-एक कर उन्हें कई तीर्थ स्थानों पर ले जाता है। वे लोग गया, काशी, प्रयाग सब जगह गए। माता-पिता देख नहीं सकते थे इसलिए श्रवण उन्हें तीर्थ के बारे में सारी बातें सुनाता। माता-पिता बहुत प्रसन्न थे। एक दिन माँ ने कहा-”बेटा श्रवण, हम अंधों के लिए तुम आँखें बन गए हो। तुम्हारे मुंह से तीर्थ के बारे में सुनकर हमें लगता है, हमने अपनी आँखों से भगवान को देख लिया है।“
”हाँ बेटा, तुम्हारे जैसा बेटा पाकर, हमारा जीवन धन्य हुआ। हमारा बोझ उठाते तुम थक जाते हो, पर कभी उफ़ नहीं करते।“ पिता ने भी श्रवण को आशीर्वाद दिया।
”ऐसा न कहें पिता जी, माता-पिता बच्चों पर कभी बोझ नहीं होते। यह तो मेरा कर्तव्य है। आप मेरी चिंता न करें।“
एक दोपहर श्रवण और उसके माता-पिता अयोध्या के पास एक जंगल में विश्राम कर रहे थे। माँ को प्यास लगी। उन्होंने श्रवण से कहा-
बेटा, क्या यहाँ आसपास पानी मिलेगा? धूप के कारण प्यास लग रही है।
”हाँ, माँ। पास ही नदी बह रही है। मैं जल लेकर आता हूँ।“
श्रवण कमंडल लेकर पानी लाने चला गया।
अयोध्या के राजा दशरथ को शिकार खेलने का शौक था। वे भी जंगल में शिकार खेलने आए हुए थे। श्रवण ने जल भरने के लिए कमंडल को पानी में डुबोया। बर्तन मे पानी भरने की अवाज़ सुनकर राजा दशरथ को लगा कोई जानवर पानी पानी पीने आया है। राजा दशरथ आवाज सुनकर, अचूक निशाना लगा सकते थे। आवाज के आधार पर उन्होंने तीर मारा। तीर सीधा श्रवण के सीने में जा लगा। श्रवण के मुंह से ‘आह’ निकल गई।
राजा जब शिकार को लेने पहुंचे तो उन्हें अपनी भूल मालूम हुई। अनजाने में उनसे इतना बड़ा अपराध हो गया। उन्होंने श्रवण से क्षमा माँगी।
”मुझे क्षमा करना एभाई । अनजाने में अपराध कर बैठा। बताइए मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ?“
”राजन्, जंगल में मेरे माता-पिता प्यासे बैठे हैं। आप जल ले जाकर उनकी प्यास बुझा दीजिए। मेरे विषय में उन्हें कुछ न बताइएगा। यही मेरी विनती है।“ इतना कहते-कहते श्रवण ने प्राण त्याग दिए।
दुखी हृदय से राजा दशरथ, जल लेकर श्रवण के माता-पिता के पास पहुंचे। श्रवण के माता-पिता अपने पुत्र के पैरों की आहट अच्छी तरह पहचानते थे। राजा के पैरों की आहट सुन वे चैंक गए।
”कौन है? हमारा बेटा श्रवण कहाँ है?“
बिना उत्तर दिए राजा ने जल से भरा कमंडल आगे कर, उन्हें पानी पिलाना चाहा, पर श्रवण की माँ चीख पड़ी-
”तुम बोलते क्यों नहीं, बताओ हमारा बेटा कहाँ है?“
”माँ, अनजाने में मेरा चलाया बाण श्रवण के सीने में लग गया। उसने मुझे आपको पानी पिलाने भेजा है। मुझे क्षमा कर दीजिए।“ राजा का गला भर आया।
”हाँ श्रवण, हाय मेरा बेटा“ माँ चीत्कार कर उठी। बेटे का नाम रो-रोकर लेते हुए, दोनों ने प्राण त्याग दिए। पानी को उन्होंने हाथ भी नहीं लगाया। प्यासे ही उन्होंने इस संसार से विदा ले ली।
सचमुच श्रवण कुमार की माता-पिता के प्रति भक्ति अनुपम थी। जो पुत्र माता-पिता की सच्चे मन से सेवा करते हैं, उन्हें श्रवण कुमार कहकर पुकारा जाता है। सच है, माता-पिता की सेवा सबसे बड़ा धर्म है।
कहा जाता है कि राजा दशरथ ने बूढ़े माँ-बाप से उनके बेटे को छीना था। इसीलिए राजा दशरथ को भी पुत्र वियोग सहना पड़ा रामचंद्र जी चौदह साल के लिए वनवास को गए। राजा दशरथ यह वियोग नहीं सह पाए। इसीलिए उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए।
उसने विवाह किया। उसकी पत्नी उसके बूढे माता.पिता का तिरस्कार करती थी। वह नाराज़ होकर घर छोड़कर चली जाती है। फिर भी श्रवण पत्नी के लिए माँ-बाप को नहीं छोड़ता।
एक दिन श्रवण के माँ-बाप तीर्थ यात्रा पर जाने की इच्छा प्रकट करते हैं। उन दिनों रेल या बस नहीं थी। देखो कैसे श्रवण उन्हें तीर्थ पर ले जाता है।,
बहुत समय पहले श्रवण कुमार नाम का एक बालक था। श्रवण के माता-पिता अंधे थे। श्रवण अपने माता-पिता को बहुत प्यार करता। उसकी माँ ने बहुत कष्ट उठाकर श्रवण को पाला था। जैसे-जैसे श्रवण बड़ा होता गया, अपने माता-पिता के कामों में अधिक से अधिक मदद करता।
सुबह उठकर श्रवण माता-पिता के लिए नदी से पानी भरकर लाता। जंगल से लकड़ियाँ लाता। चूल्हा जलाकर खाना बनाता। माँ उसे मना करतीं-
”बेटा श्रवण, तू हमारे लिए इतनी मेहनत क्यों करता है? भोजन तो मैं बना सकती हूँ। इतना काम करके तू थक जाएगा।“
”नहीं माँ, तुम्हारे और पिता जी का काम करने में मुझे जरा भी थकान नहीं होती। मुझे आनंद मिलता है। तुम देख नहीं सकतीं। रोटी बनाते हुए, तुम्हारे हाथ जल जाएँगे।“
”हे भगवान! हमारे श्रवण जैसा बेटा हर माँ-बाप को मिले। उसे हमारा कितना खयाल है।“ माता-पिता श्रवण को आशीर्वाद देते न थकते।
श्रवण के माता-पिता रोज भगवान की पूजा करते। श्रवण उनकी पूजा के लिए फूल लाता, बैठने के लिए आसन बिछाता। माता-पिता के साथ श्रवण भी पूजा करता।
मता-पिता की सेवा करता श्रवण बड़ा होता गया। घर के काम पूरे कर, श्रवण बाहर काम करने जाता। अब उसके माता-पिता को काम नहीं करना होता।
श्रवण के माता-पिता को बेटे के विवाह की चिंता हुई। अंत में एक लड़की के साथ श्रवण कुमार का विवाह हो गया। श्रवण की पत्नी का स्वभाव अच्छा नहीं था। वह आलसी और स्वार्थी स्त्री थी। उसे श्रवण के अंधे माता-पिता की सेवा करना अच्छा नहीं लगता। अक्सर माता-पिता को लेकर वह श्रवण से झगड़ा करती। वह अपने लिए अच्छा भोजन बनाती, पर श्रवण के माता-पिता को रूखा-सूखा खाना देती। एक दिन श्रवण ने देखा उसके माता-पिता नमक से रोटी खा रहे हैं और उसकी पत्नी पूरी और मालपुए का भोजन कर रही है। श्रवण को क्रोध आ गया।
”यह क्या माँ-पिता जी को रूखी रोटी और खुद पकवान खाती हो। तुम्हें शर्म नहीं आती?“
”उन्हें खाना देती हूँ, यही क्या कम है। मैं किसी की दासी नहीं हूँ।“ श्रवण की पत्नी ने तमक कर जवाब दिया।
”क्या वे तुम्हारे माता-पिता नहीं हैं? बड़ों के साथ ऐसा बरताव क्या ठीक बात है?“
”नहीं, वे मेरे कोई नहीं लगते। मैं उनकी सेवा करने नहीं आई हूँ। मैं अभी यहाँ नहीं रह सकती। मैं जा रही हूँ। तुम चाहो तो मेरे साथ आ सकते हो। नहीं तो तुम इनके साथ बने रहो। मैं चली।“
ण की पत्नी घर छोड़कर जाने लगी। बहुत समझाने पर भी वह नहीं रूकी न श्रवण की बात मानी, न फिर कभी वापस आई। अपना दुख भुलाकर श्रवण फिर बूढे़ माता-पिता की सेवा में जुट गया। काम पर जाने के पहले वह उनके सारे काम पूरे करके जाता। घर लौटकर उनकी सेवा करता। रात में उनके पैर दबाता। माता-पिता के सोने के बाद खुद सोता।
एक दिन श्रवण के माता-पिता ने कहा-
”बेटा, तुमने हमारी सारी इच्छाएँ पूरी की हैं। अब एक इच्छा बाकी रह गई है।“
”कौन-सी इच्छा माँ? क्या चाहते हैं पिता जी? आप आज्ञा दीजिए। प्राण रहते आपकी इच्छा पूरी करूँगा।“
”हमारी उमर हो गई अब हम भगवान के भजन के लिए तीर्थ. यात्रा पर जाना चाहते हैं बेटा। शायद भगवान के चरणों में हमें शांति मिले।“
श्रवण सोच में पड़ गया। उन दिनों आज की तरह बस या रेलगाड़ियाँ नहीं थी। वे लोग ज्यादा चल भी नहीं सकते थे। माता-पिता की इच्छा कैसे पूरी करूँ, यह बात सोचते-सोचते श्रवण को एक उपाय सूझ गया। श्रवण ने दो बड़ी-बड़ी टोकरियाँ लीं। उन्हें एक मजबूत लाठी के दोनों सिरों पर रस्सी से बाँधकर लटका दिया। इस तरह एक बड़ा काँवर बन गया। फिर उसने माता-पिता को गोद में उठाकर एक-एक टोकरी में बिठा दिया। लाठी कंधे पर टाँगकर श्रवण माता-पिता को तीर्थ यात्रा कराने चल पड़ा।
श्रवण एक-एक कर उन्हें कई तीर्थ स्थानों पर ले जाता है। वे लोग गया, काशी, प्रयाग सब जगह गए। माता-पिता देख नहीं सकते थे इसलिए श्रवण उन्हें तीर्थ के बारे में सारी बातें सुनाता। माता-पिता बहुत प्रसन्न थे। एक दिन माँ ने कहा-”बेटा श्रवण, हम अंधों के लिए तुम आँखें बन गए हो। तुम्हारे मुंह से तीर्थ के बारे में सुनकर हमें लगता है, हमने अपनी आँखों से भगवान को देख लिया है।“
”हाँ बेटा, तुम्हारे जैसा बेटा पाकर, हमारा जीवन धन्य हुआ। हमारा बोझ उठाते तुम थक जाते हो, पर कभी उफ़ नहीं करते।“ पिता ने भी श्रवण को आशीर्वाद दिया।
”ऐसा न कहें पिता जी, माता-पिता बच्चों पर कभी बोझ नहीं होते। यह तो मेरा कर्तव्य है। आप मेरी चिंता न करें।“
एक दोपहर श्रवण और उसके माता-पिता अयोध्या के पास एक जंगल में विश्राम कर रहे थे। माँ को प्यास लगी। उन्होंने श्रवण से कहा-
बेटा, क्या यहाँ आसपास पानी मिलेगा? धूप के कारण प्यास लग रही है।
”हाँ, माँ। पास ही नदी बह रही है। मैं जल लेकर आता हूँ।“
श्रवण कमंडल लेकर पानी लाने चला गया।
अयोध्या के राजा दशरथ को शिकार खेलने का शौक था। वे भी जंगल में शिकार खेलने आए हुए थे। श्रवण ने जल भरने के लिए कमंडल को पानी में डुबोया। बर्तन मे पानी भरने की अवाज़ सुनकर राजा दशरथ को लगा कोई जानवर पानी पानी पीने आया है। राजा दशरथ आवाज सुनकर, अचूक निशाना लगा सकते थे। आवाज के आधार पर उन्होंने तीर मारा। तीर सीधा श्रवण के सीने में जा लगा। श्रवण के मुंह से ‘आह’ निकल गई।
राजा जब शिकार को लेने पहुंचे तो उन्हें अपनी भूल मालूम हुई। अनजाने में उनसे इतना बड़ा अपराध हो गया। उन्होंने श्रवण से क्षमा माँगी।
”मुझे क्षमा करना एभाई । अनजाने में अपराध कर बैठा। बताइए मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ?“
”राजन्, जंगल में मेरे माता-पिता प्यासे बैठे हैं। आप जल ले जाकर उनकी प्यास बुझा दीजिए। मेरे विषय में उन्हें कुछ न बताइएगा। यही मेरी विनती है।“ इतना कहते-कहते श्रवण ने प्राण त्याग दिए।
दुखी हृदय से राजा दशरथ, जल लेकर श्रवण के माता-पिता के पास पहुंचे। श्रवण के माता-पिता अपने पुत्र के पैरों की आहट अच्छी तरह पहचानते थे। राजा के पैरों की आहट सुन वे चैंक गए।
”कौन है? हमारा बेटा श्रवण कहाँ है?“
बिना उत्तर दिए राजा ने जल से भरा कमंडल आगे कर, उन्हें पानी पिलाना चाहा, पर श्रवण की माँ चीख पड़ी-
”तुम बोलते क्यों नहीं, बताओ हमारा बेटा कहाँ है?“
”माँ, अनजाने में मेरा चलाया बाण श्रवण के सीने में लग गया। उसने मुझे आपको पानी पिलाने भेजा है। मुझे क्षमा कर दीजिए।“ राजा का गला भर आया।
”हाँ श्रवण, हाय मेरा बेटा“ माँ चीत्कार कर उठी। बेटे का नाम रो-रोकर लेते हुए, दोनों ने प्राण त्याग दिए। पानी को उन्होंने हाथ भी नहीं लगाया। प्यासे ही उन्होंने इस संसार से विदा ले ली।
सचमुच श्रवण कुमार की माता-पिता के प्रति भक्ति अनुपम थी। जो पुत्र माता-पिता की सच्चे मन से सेवा करते हैं, उन्हें श्रवण कुमार कहकर पुकारा जाता है। सच है, माता-पिता की सेवा सबसे बड़ा धर्म है।
कहा जाता है कि राजा दशरथ ने बूढ़े माँ-बाप से उनके बेटे को छीना था। इसीलिए राजा दशरथ को भी पुत्र वियोग सहना पड़ा रामचंद्र जी चौदह साल के लिए वनवास को गए। राजा दशरथ यह वियोग नहीं सह पाए। इसीलिए उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए।
शहीद भगत सिंह
शहीद का अर्थ है जो देश के लिए अपनी जान दे दे। भारत देश पर अंग्रेज हुकूमत कर रहे थे। भारत माता अंग्रेजों की गुलाम थीं। भारत माता को स्वतंत्र करने के लिए भगत सिंह लड़े और इस लड़ाई में अपनी जान दे दी। इसीलिए हम उन्हें शहीद भगत सिंह कहते हैं।
अब हम पढ़ेंगे कि बचपन से ही उनके मन में अंग्रेजों से लड़ने की बात कैसे घर कर गई।,
पंजाब के लायलपुर के एक गाँव बंगा में, एक शिशु का जन्म हुआ। दादी ने बड़े प्यार से उस बच्चे का नाम भगत सिंह रखा। सब भगत सिंह को खूब प्यार करते। घर में दादा-दादी, माता-पिता, बडे़ भाई-बहन और चाचा-चाची साथ रहते। सबके बीच खेलकर भगत सिंह बड़ा होने लगा।
भगत सिंह के जन्म के समय भारत में अंग्रेजों का शासन था। भगत सिंह के दादा, पिता और चाचा सब देश को आजाद कराने की कोशिश में जी-जान से जुटे हुए थे। घर के लोगों की बातचीत का भगत सिंह के मन पर गहरा असर पड़ा। वह बचपन से ही भारत की आजादी के सपने देखने लगा। सॅंझले चाचा की मृत्यु पर उसकी चाची रो रही थीं। चाची को तसल्ली देते हुए बालक भगत सिंह ने कहा-
”चाची जी, रोइए मत। जब मैं बड़ा हो जाऊंगा, अंग्रेजों को भारत से भगा ।दूंगा और चाचा जी को वापस लाऊंगा।“ चाची ने भगत को सीने से चिपका लिया।
पढ़ने लायक उम्र होने पर भगत सिंह को गाँव के प्राइमरी स्कूल में भर्ती करा दिया गया। वे पढ़ाई में बहुत तेज थे। भगत सिंह अपने गुरू का बहुत आदर करते थे। जब वे चौथी कक्षा में थे उनके मास्टर जी ने बच्चों से पूछा-
”बच्चों, तुम बड़े होकर क्या करना चाहोगे?“
एक बच्चे ने कहा-
”मैं बड़ा होकर खेती-बाड़ी करूँगा और फिर शादी करूँगा।“ सब हॅंस पड़े। भगत सिंह ने अकड़कर कहा-
”ये सब बड़े काम नहीं हैं। मैं हरगिज शादी नहीं करूँगा। मैं तो अंग्रेजों को देश से निकाल बाहर करूँगा।“ सब भगत सिंह की तेजी देखते रह गए। मास्टर जी ने उन्हें शाबाशी देकर कहा-
”भगत सिंह जरूर अपना वादा पूरा करेगा। पंजाब के जलियाँवाला बाग में एक सभा हो रही थी। अंग्रेजों ने बेकसूर हिंदुस्तानियों पर गोलियाँ बरसा दीं। सैकड़ों देशवासियों की जानें चली गई। उस वक्त भगत सिंह सिर्फ बारह बर्ष के थे। उनके मन में आग धधक उठी। निहत्थों पर गोलियाँ चलाना अन्याय है।“
भगत सिंह जलियाँवाला बाग में अकेले चले गए। चारों ओर सिपाही थे। वे जरा भी नहीं डरे। बाग की मिट्टी एक शीशी में भरकर ले आए। घर में आम आए हुए थे। भगत सिंह को आम बहुत पसंद थे। उनकी बहन ने उन्हें आम खाने को बुलाया। भगत सिंह ने आम खाने से इनकार कर दिया। बहन को अकेले में ले जाकर शीशी में बंद मिट्टी दिखाकर कहा-
”अंग्रेजों ने हमारे सैकड़ों लोग मार दिए। ये खून उन्हीं शहीदों का है। मुझे अंग्रेजों से इस खून का बदला लेना है।“
भगत सिंह कई वर्षो तक उस शीशी को अपने पास रखे रहे और उस पर फूल चढ़ाते रहे।
कॅलेज पहुंचने पर गाँधी जी की बातों का उन पर बहुत प्रभाव पड़ा। वे ।कॉलेज में भी मित्रों के साथ भारत की आजादी की बातें करते। नेशनल कॉलेज में उन्होंने महाराणा प्रताप, सम्राट चंद्रगुप्त, भारत दुर्दशा जैसे नाटकों में भाग लिया। इन सभी नाटकों में देश-भक्ति की भावना थी।
भगत सिंह की तरह उनके मित्र सुखदेव और राजगुरू भी आजादी के दीवाने थे। तीनों मिलकर गाते-
”मेरा रंग दे बसंती चोला,
माँ रंग दे बसंती चोला।“
भगत सिंह के माता-पिता उनका विवाह कर देना चाहते थे, पर भगत सिंह को तो देश को आज़ाद कराना था। उन्होंने माता-पिता से कह दिया-
”गुलाम देश में सिर्फ़ मौत ही मेरी पत्नी हो सकती है। मैं देश को आजादी दिलाए बिना शादी नहीं कर सकता।“
अपने देश को आजाद कराने के लिए भगत सिंह अपने मित्रों के साथ जी जान से जुट गए। उन्हें लगा बम के धमाकों से अंग्रेजों को डराया जा सकता है। अपने एक साथी के साथ उन्होंने असेंबली में बम फेंका और खुद गिरफ्तारी दी।
भगत सिंह और उनके मित्रों के खिलाफ़ मुकदमा चलाया गया। उन पर बम फेंककर अंग्रेजों को मारने का दोष लगाया गया। कोर्ट ने भगत सिंह और उनके मित्र सुखदेव और राजगुरू को फाँसी की सजा सुनाई। सजा सुनकर तीनों मित्र हॅंस पड़े और नारा लगाया, ”वंदे मातरम्! इंकलाब जिंदाबाद“।
भगत सिंह ने अपने माता-पिता को समझाया-
”आपका बेटा देश के लिए शहीद होगा। आप लोग दुख मत कीजिएगा।“
भगत सिंह से कहा गया कि अगर वे वायसरायय से माफी माँग लें तो उनकी फाँसी की सज़ा माफ़ की जा सकती है। भगत सिंह ने माफ़ी माँगना स्वीकार नहीं किया।
भगत सिंह से फाँसी के पहले उनकी अंतिम इच्छा पूछी गई। उन्होंने जोरदार शब्दों में कहा-
”मैं चाहता हूँ, मैं फिर भारत में जन्म लूं और अपने देश की सेवा करूँ।“
फाँसी लगने के पहले तीनों मित्र एक-दूसरे के गले मिले। मनपसंद रसगुल्ले खाए। मित्रों के साथ भगत सिंह फाँसी के फंदे के पास जा पहुंचे। अपने हाथ से गले में फाँसी का फंदा लगाया और हॅंसते-हॅंसते फाँसी चढ़ गए। अंत तक वे नारे लगाते रहे-
”इंकलाब जिंदाबाद।“
धन्य हैं वीर भगत सिंह। उन जैसे शहीदों के त्याग से ही भारत को आज़ादी मिल सकी। मरने के बाद भी वे अमर हैं। हम उन्हें सदैव याद करते रहेंगे।
भगत सिंह ने देश के लिए अपनी जान दे दी। इसीलिए उन्हें शहीद भगत सिंह कहा जाता है।
अब हम पढ़ेंगे कि बचपन से ही उनके मन में अंग्रेजों से लड़ने की बात कैसे घर कर गई।,
पंजाब के लायलपुर के एक गाँव बंगा में, एक शिशु का जन्म हुआ। दादी ने बड़े प्यार से उस बच्चे का नाम भगत सिंह रखा। सब भगत सिंह को खूब प्यार करते। घर में दादा-दादी, माता-पिता, बडे़ भाई-बहन और चाचा-चाची साथ रहते। सबके बीच खेलकर भगत सिंह बड़ा होने लगा।
भगत सिंह के जन्म के समय भारत में अंग्रेजों का शासन था। भगत सिंह के दादा, पिता और चाचा सब देश को आजाद कराने की कोशिश में जी-जान से जुटे हुए थे। घर के लोगों की बातचीत का भगत सिंह के मन पर गहरा असर पड़ा। वह बचपन से ही भारत की आजादी के सपने देखने लगा। सॅंझले चाचा की मृत्यु पर उसकी चाची रो रही थीं। चाची को तसल्ली देते हुए बालक भगत सिंह ने कहा-
”चाची जी, रोइए मत। जब मैं बड़ा हो जाऊंगा, अंग्रेजों को भारत से भगा ।दूंगा और चाचा जी को वापस लाऊंगा।“ चाची ने भगत को सीने से चिपका लिया।
पढ़ने लायक उम्र होने पर भगत सिंह को गाँव के प्राइमरी स्कूल में भर्ती करा दिया गया। वे पढ़ाई में बहुत तेज थे। भगत सिंह अपने गुरू का बहुत आदर करते थे। जब वे चौथी कक्षा में थे उनके मास्टर जी ने बच्चों से पूछा-
”बच्चों, तुम बड़े होकर क्या करना चाहोगे?“
एक बच्चे ने कहा-
”मैं बड़ा होकर खेती-बाड़ी करूँगा और फिर शादी करूँगा।“ सब हॅंस पड़े। भगत सिंह ने अकड़कर कहा-
”ये सब बड़े काम नहीं हैं। मैं हरगिज शादी नहीं करूँगा। मैं तो अंग्रेजों को देश से निकाल बाहर करूँगा।“ सब भगत सिंह की तेजी देखते रह गए। मास्टर जी ने उन्हें शाबाशी देकर कहा-
”भगत सिंह जरूर अपना वादा पूरा करेगा। पंजाब के जलियाँवाला बाग में एक सभा हो रही थी। अंग्रेजों ने बेकसूर हिंदुस्तानियों पर गोलियाँ बरसा दीं। सैकड़ों देशवासियों की जानें चली गई। उस वक्त भगत सिंह सिर्फ बारह बर्ष के थे। उनके मन में आग धधक उठी। निहत्थों पर गोलियाँ चलाना अन्याय है।“
भगत सिंह जलियाँवाला बाग में अकेले चले गए। चारों ओर सिपाही थे। वे जरा भी नहीं डरे। बाग की मिट्टी एक शीशी में भरकर ले आए। घर में आम आए हुए थे। भगत सिंह को आम बहुत पसंद थे। उनकी बहन ने उन्हें आम खाने को बुलाया। भगत सिंह ने आम खाने से इनकार कर दिया। बहन को अकेले में ले जाकर शीशी में बंद मिट्टी दिखाकर कहा-
”अंग्रेजों ने हमारे सैकड़ों लोग मार दिए। ये खून उन्हीं शहीदों का है। मुझे अंग्रेजों से इस खून का बदला लेना है।“
भगत सिंह कई वर्षो तक उस शीशी को अपने पास रखे रहे और उस पर फूल चढ़ाते रहे।
कॅलेज पहुंचने पर गाँधी जी की बातों का उन पर बहुत प्रभाव पड़ा। वे ।कॉलेज में भी मित्रों के साथ भारत की आजादी की बातें करते। नेशनल कॉलेज में उन्होंने महाराणा प्रताप, सम्राट चंद्रगुप्त, भारत दुर्दशा जैसे नाटकों में भाग लिया। इन सभी नाटकों में देश-भक्ति की भावना थी।
भगत सिंह की तरह उनके मित्र सुखदेव और राजगुरू भी आजादी के दीवाने थे। तीनों मिलकर गाते-
”मेरा रंग दे बसंती चोला,
माँ रंग दे बसंती चोला।“
भगत सिंह के माता-पिता उनका विवाह कर देना चाहते थे, पर भगत सिंह को तो देश को आज़ाद कराना था। उन्होंने माता-पिता से कह दिया-
”गुलाम देश में सिर्फ़ मौत ही मेरी पत्नी हो सकती है। मैं देश को आजादी दिलाए बिना शादी नहीं कर सकता।“
अपने देश को आजाद कराने के लिए भगत सिंह अपने मित्रों के साथ जी जान से जुट गए। उन्हें लगा बम के धमाकों से अंग्रेजों को डराया जा सकता है। अपने एक साथी के साथ उन्होंने असेंबली में बम फेंका और खुद गिरफ्तारी दी।
भगत सिंह और उनके मित्रों के खिलाफ़ मुकदमा चलाया गया। उन पर बम फेंककर अंग्रेजों को मारने का दोष लगाया गया। कोर्ट ने भगत सिंह और उनके मित्र सुखदेव और राजगुरू को फाँसी की सजा सुनाई। सजा सुनकर तीनों मित्र हॅंस पड़े और नारा लगाया, ”वंदे मातरम्! इंकलाब जिंदाबाद“।
भगत सिंह ने अपने माता-पिता को समझाया-
”आपका बेटा देश के लिए शहीद होगा। आप लोग दुख मत कीजिएगा।“
भगत सिंह से कहा गया कि अगर वे वायसरायय से माफी माँग लें तो उनकी फाँसी की सज़ा माफ़ की जा सकती है। भगत सिंह ने माफ़ी माँगना स्वीकार नहीं किया।
भगत सिंह से फाँसी के पहले उनकी अंतिम इच्छा पूछी गई। उन्होंने जोरदार शब्दों में कहा-
”मैं चाहता हूँ, मैं फिर भारत में जन्म लूं और अपने देश की सेवा करूँ।“
फाँसी लगने के पहले तीनों मित्र एक-दूसरे के गले मिले। मनपसंद रसगुल्ले खाए। मित्रों के साथ भगत सिंह फाँसी के फंदे के पास जा पहुंचे। अपने हाथ से गले में फाँसी का फंदा लगाया और हॅंसते-हॅंसते फाँसी चढ़ गए। अंत तक वे नारे लगाते रहे-
”इंकलाब जिंदाबाद।“
धन्य हैं वीर भगत सिंह। उन जैसे शहीदों के त्याग से ही भारत को आज़ादी मिल सकी। मरने के बाद भी वे अमर हैं। हम उन्हें सदैव याद करते रहेंगे।
भगत सिंह ने देश के लिए अपनी जान दे दी। इसीलिए उन्हें शहीद भगत सिंह कहा जाता है।
सम्राट अशोक
सम्राट अशोक मगध के राजा थे। वे पास-पड़ोस के सभी राज्यों को जीतकर अपने अधीन कर लेना चाहते थे। इस कोशिश में उन्होंने कई राज्यों को जीतकर मगध के अधीन कर लिया था लेकिन कलिंग को जीतना आसान नहीं था। चार साल तक युद्ध हुआ, लेकिन कलिंग के राजा बहादुरी से लड़ रहे थे और सम्राट अशोक जीत नहीं पाए।
एक दिन खबर मिली कि कलिंग के राजा युद्ध में मारे गए। फिर भी अशोक की सेना कलिंग के दुर्ग के अंदर प्रवेश नहीं कर सकी।
अचानक दुर्ग का फाटक खुला और कलिंग की राजकुमारी पद्मा सैनिक की वेशभूषा में आकर अशोक से कहती हैं- हमसे लड़ो। हमें मारोगे तभी किले के अंदर जा सकते हो। सम्राट अशोक कहते हैं- यह कैसे हो सकता है? क्या मैं स्त्रियों पर हथियार चलाऊंगा?,
अशोक सम्राट बिंदुसार के पुत्र थे। पिता की मुत्यु के बाद अशोक मगध के सिंहासन पर बैठे। अशोक बहुत वीर राजा थे। वे अपने राज्य को दूर-दूर तक फैलाना चाहते थे। सम्राट अशोक ने कई राजाओं को हराकर, अपने राज्य का विस्तार किया। उन दिनों कलिंग का राज्य भी मगध राज्य के समान प्रसिद्ध था।
कलिंग वासी बहुत वीर थे। वे अपने राजा और अपनी जन्मभूमि से बहुत प्यार करते थे। अपना राज्य बढ़ाने के लिए सम्राट अशोक ने कलिंग राज्य पर आक्रमण कर दिया। दोनों ओर से घमासान युद्ध शुरू हो गया। चार वर्ष बीत जाने पर भी कलिंग को जीता न जा सका। कलिंग के लाखों सैनिक मारे गए, लाखों घायल हुए, पर कलिंग वालों ने हार नहीं मानी।
एक दिन सम्राट अशोक अपने शिविर में उदास बैठे थे। वे सोच रहे थे कि दोनों ओर के लाखों सैनिक मारे जा चुके हैं, पर आज तक युद्ध का कोई फैसला नहीं हो सका है। तभी एक सैनिक ने आकर सूचना दी-
”महाराज की जय हो। अभी-अभी खबर मिली है। कलिंग के महाराज युद्ध में मारे गए।“
”वाह ! यह तो बड़ी अच्छी खबर है। इसका मतलब हम युद्ध में जीत गए। मगध-राज्य अब हमारा है।“ अशोक प्रसन्न हो उठे।
”आपका सोचना ठीक है, महाराज परंतु कलिंग के किले का दरवाजा अभी भी बंद है।“ सिर झुकाकर सैनिक ने जवाब दिया।
”कोई बात नहीं, अब दरवाजा खुल जाएगा। कल मैं स्वयं कलिंग के दुर्ग का द्वार खुलवाऊंगा।“
”दूसरे दिन सम्राट अशोक ने स्वयं अपनी सेना का नेतृत्व किया। उनके पीछे मगध के हजारों सैनिक, सम्राट अशोक की जय-जयकार कर रहे थे। कलिंग दुर्ग के सामने पहुंचकर सम्राट अशोक ने अपनी सेना को ललकारा-
”मगध के वीर सैनिकों, पिछले चार वर्षो से युद्ध चल रहा है। कलिंग के महाराज मारे जा चुके हैं। आओ हम शपथ लें। आज कलिंग दुर्ग के फाटक, खुलवाकर, दुर्ग पर मगध का झंडा फहराएँगे।“
”सम्राट अशोक की जय, मगध राज्य की जय।“ चारों ओर जय-जयकार गूंज उठी।
ष्शोर मचाती अशोक की सेना आगे बढ़ी। अचानक कलिंग दुर्ग का फाटक खुल गया। कलिंग देश की राजकुमारी पद्मा सैनिक वेष में घोड़े पर सवार खड़ी थीं। राजकुमारी पद्मा के पीछे स्त्रियों की सेना थी। राजकुमारी ने अपनी स्त्रियों की सेना से कहा-
”बहिनो, आज हमें अपने देश के सम्मान की रक्षा करनी है। जिन्होंने हमारे पिता, भाई, पति हमसे छीने हैं, वे हत्यारे आज हमारे सामने खड़े हैं। हमारे जीते जी, इस दुर्ग में ये प्रवेश नहीं कर सकते। जय भवानी ...............“ पद्मा के साथ स्त्री-सेना ने जय भवानी का हुंकार भरा।
सम्राट अशोक विस्मित थे। उन्होंने पूछा-
”तुम कौन हो देवी? सम्राट अशोक स्त्रियों से युद्ध नहीं करता।“
”तुम मेरे पिता के हत्यारे हो। तुम्हें मुझसे युद्ध करना होगा सम्राट।“ राजकुमारी ने गर्जना की।
”नहीं, स्त्रियों पर हथियार चलाना अधर्म है। यह अन्याय मैं नहीं कर सकता।“
”तुमने न्याय-अन्याय की चिंता कब की है, सम्राट? अपनी जीत के लिए तुमने लाखों मासूम लोगों की हत्या की है। अब तो केवल हम स्त्रियाँ बची हैं। दुर्ग पाने के लिए तुम्हें हमसे युद्ध करना पड़ेगा। ये सारी दुखी स्त्रियाँ तुमसे युद्ध करना चाहती हैं। तुमने इनके घर उजाडे़ हैं, सम्राट। क्या यह अन्याय नहीं है?“ पद्मा की आँखों से चिंगारियाँ-सी छिटक रही थीं।
”मैं अपनी गलती स्वीकार करता हूँ, राजकुमारी। मुझसे भूल हो गई। आप जो चाहें सजा दे दें।“ तलवार फेंककर अशोक ने सिर झुका लिया।
”नहीं तुम्हें हमसे युद्ध करना होगा। उठाओ तलवार सम्राट.........................“
”नहीं राजकुमारी, आज के बाद यह तलवार कभी नहीं उठेगी। मेरा सिर हाजिर है, आप इसे काटकर अपने पिता की मृत्यु का बदला ले लीजिए।“
”नहीं महाराज, हम भी निहत्थों पर वार नहीं करते। जाइए, हमने आपको क्षमा किया।“
”धन्यवाद, राजकुमारी। आज से आप कलिंग का राज्य संभालिए। मगध और कलिंग दोनों राज्य मित्र बनकर रहेंगे। आज के बाद मैं कोई युद्ध नहीं करूँगा। मैं अपने शस्त्र त्यागता हूँ।“
कभी युद्ध न करने का निर्णय लेने के बाद सम्राट अशोक, युद्ध-भूमि में गए। युद्ध-भूमि पर खून से लथपथ लाखों शव पड़े थे। हजारों घायल पानी-पानी कहकर तड़प रहे थे, कराह रहे थे, उनकी यह दशा देखकर अशोक का दिल भर आया राज्य पाने के लिए उसने कितने लोगों की हत्या कर दी। अशोक का हृदय बेचैन था। तभी उसने देखा कुछ बौद्ध भिक्षु घायलों को पानी पिला रहे थे। उनके घावों पर मरहम-पट्टी कर रहे थे। अशोक उनके सामने घुटने टेककर बैठ गए।
”मैं अपराधी हूँ, देव। मेरे हृदय को शांति दीजिए, भिक्षुवर।“
”धर्म ही तुम्हारे हृदय को शांति दे सकता है, अशोक। तुम बौद्ध धर्म की शरण में आ जाओ।“ भिक्षु ने शांति से उत्तर दिया।
”मुझे क्या करना होगा, भिक्षुवर?“
”प्रतिज्ञा करो, आज से तुम जीव-हत्या नहीं करोगे। जब तक शरीर में प्राण हैं, अहिंसा का पालन करोगे। सबसे प्रेम का व्यवहार करोगे।“
”मैं प्रतिज्ञा करता हूँ, देव। मुझे बौद्ध धर्म की शरण में ले लीजिए।“ हाथ जोड़कर सम्राट अशोक ने प्रार्थना की।
”जाओ अपनी प्रतिज्ञा का पालन करो। तुम्हारे मन को अवश्य शांति मिलेगी, सम्राट।“ हाथ उठाकर भिक्षु ने सम्राट को आशीर्वाद दिया।
कलिंग-युद्ध के बाद सम्राट अशोक ने कोई युद्ध नहीं किया। उसने अपनी प्रजा की भलाई और कल्याण में अपना जीवन बिताया। शांति और अहिंसा के धर्म को देश भर में फेलाया। इतना ही नहीं, उसे दूसरे देशों तक पहुंचाया। अशोक के राज्य में प्रजा बहुत सुखी थी। स्वयं सम्राट वेष बदलकर अपनी प्रजा का दुख-सुख जानने, घर-घर जाते थे। इतिहास में सम्राट अशोक का नाम अमर रहेगा।
एक दिन खबर मिली कि कलिंग के राजा युद्ध में मारे गए। फिर भी अशोक की सेना कलिंग के दुर्ग के अंदर प्रवेश नहीं कर सकी।
अचानक दुर्ग का फाटक खुला और कलिंग की राजकुमारी पद्मा सैनिक की वेशभूषा में आकर अशोक से कहती हैं- हमसे लड़ो। हमें मारोगे तभी किले के अंदर जा सकते हो। सम्राट अशोक कहते हैं- यह कैसे हो सकता है? क्या मैं स्त्रियों पर हथियार चलाऊंगा?,
अशोक सम्राट बिंदुसार के पुत्र थे। पिता की मुत्यु के बाद अशोक मगध के सिंहासन पर बैठे। अशोक बहुत वीर राजा थे। वे अपने राज्य को दूर-दूर तक फैलाना चाहते थे। सम्राट अशोक ने कई राजाओं को हराकर, अपने राज्य का विस्तार किया। उन दिनों कलिंग का राज्य भी मगध राज्य के समान प्रसिद्ध था।
कलिंग वासी बहुत वीर थे। वे अपने राजा और अपनी जन्मभूमि से बहुत प्यार करते थे। अपना राज्य बढ़ाने के लिए सम्राट अशोक ने कलिंग राज्य पर आक्रमण कर दिया। दोनों ओर से घमासान युद्ध शुरू हो गया। चार वर्ष बीत जाने पर भी कलिंग को जीता न जा सका। कलिंग के लाखों सैनिक मारे गए, लाखों घायल हुए, पर कलिंग वालों ने हार नहीं मानी।
एक दिन सम्राट अशोक अपने शिविर में उदास बैठे थे। वे सोच रहे थे कि दोनों ओर के लाखों सैनिक मारे जा चुके हैं, पर आज तक युद्ध का कोई फैसला नहीं हो सका है। तभी एक सैनिक ने आकर सूचना दी-
”महाराज की जय हो। अभी-अभी खबर मिली है। कलिंग के महाराज युद्ध में मारे गए।“
”वाह ! यह तो बड़ी अच्छी खबर है। इसका मतलब हम युद्ध में जीत गए। मगध-राज्य अब हमारा है।“ अशोक प्रसन्न हो उठे।
”आपका सोचना ठीक है, महाराज परंतु कलिंग के किले का दरवाजा अभी भी बंद है।“ सिर झुकाकर सैनिक ने जवाब दिया।
”कोई बात नहीं, अब दरवाजा खुल जाएगा। कल मैं स्वयं कलिंग के दुर्ग का द्वार खुलवाऊंगा।“
”दूसरे दिन सम्राट अशोक ने स्वयं अपनी सेना का नेतृत्व किया। उनके पीछे मगध के हजारों सैनिक, सम्राट अशोक की जय-जयकार कर रहे थे। कलिंग दुर्ग के सामने पहुंचकर सम्राट अशोक ने अपनी सेना को ललकारा-
”मगध के वीर सैनिकों, पिछले चार वर्षो से युद्ध चल रहा है। कलिंग के महाराज मारे जा चुके हैं। आओ हम शपथ लें। आज कलिंग दुर्ग के फाटक, खुलवाकर, दुर्ग पर मगध का झंडा फहराएँगे।“
”सम्राट अशोक की जय, मगध राज्य की जय।“ चारों ओर जय-जयकार गूंज उठी।
ष्शोर मचाती अशोक की सेना आगे बढ़ी। अचानक कलिंग दुर्ग का फाटक खुल गया। कलिंग देश की राजकुमारी पद्मा सैनिक वेष में घोड़े पर सवार खड़ी थीं। राजकुमारी पद्मा के पीछे स्त्रियों की सेना थी। राजकुमारी ने अपनी स्त्रियों की सेना से कहा-
”बहिनो, आज हमें अपने देश के सम्मान की रक्षा करनी है। जिन्होंने हमारे पिता, भाई, पति हमसे छीने हैं, वे हत्यारे आज हमारे सामने खड़े हैं। हमारे जीते जी, इस दुर्ग में ये प्रवेश नहीं कर सकते। जय भवानी ...............“ पद्मा के साथ स्त्री-सेना ने जय भवानी का हुंकार भरा।
सम्राट अशोक विस्मित थे। उन्होंने पूछा-
”तुम कौन हो देवी? सम्राट अशोक स्त्रियों से युद्ध नहीं करता।“
”तुम मेरे पिता के हत्यारे हो। तुम्हें मुझसे युद्ध करना होगा सम्राट।“ राजकुमारी ने गर्जना की।
”नहीं, स्त्रियों पर हथियार चलाना अधर्म है। यह अन्याय मैं नहीं कर सकता।“
”तुमने न्याय-अन्याय की चिंता कब की है, सम्राट? अपनी जीत के लिए तुमने लाखों मासूम लोगों की हत्या की है। अब तो केवल हम स्त्रियाँ बची हैं। दुर्ग पाने के लिए तुम्हें हमसे युद्ध करना पड़ेगा। ये सारी दुखी स्त्रियाँ तुमसे युद्ध करना चाहती हैं। तुमने इनके घर उजाडे़ हैं, सम्राट। क्या यह अन्याय नहीं है?“ पद्मा की आँखों से चिंगारियाँ-सी छिटक रही थीं।
”मैं अपनी गलती स्वीकार करता हूँ, राजकुमारी। मुझसे भूल हो गई। आप जो चाहें सजा दे दें।“ तलवार फेंककर अशोक ने सिर झुका लिया।
”नहीं तुम्हें हमसे युद्ध करना होगा। उठाओ तलवार सम्राट.........................“
”नहीं राजकुमारी, आज के बाद यह तलवार कभी नहीं उठेगी। मेरा सिर हाजिर है, आप इसे काटकर अपने पिता की मृत्यु का बदला ले लीजिए।“
”नहीं महाराज, हम भी निहत्थों पर वार नहीं करते। जाइए, हमने आपको क्षमा किया।“
”धन्यवाद, राजकुमारी। आज से आप कलिंग का राज्य संभालिए। मगध और कलिंग दोनों राज्य मित्र बनकर रहेंगे। आज के बाद मैं कोई युद्ध नहीं करूँगा। मैं अपने शस्त्र त्यागता हूँ।“
कभी युद्ध न करने का निर्णय लेने के बाद सम्राट अशोक, युद्ध-भूमि में गए। युद्ध-भूमि पर खून से लथपथ लाखों शव पड़े थे। हजारों घायल पानी-पानी कहकर तड़प रहे थे, कराह रहे थे, उनकी यह दशा देखकर अशोक का दिल भर आया राज्य पाने के लिए उसने कितने लोगों की हत्या कर दी। अशोक का हृदय बेचैन था। तभी उसने देखा कुछ बौद्ध भिक्षु घायलों को पानी पिला रहे थे। उनके घावों पर मरहम-पट्टी कर रहे थे। अशोक उनके सामने घुटने टेककर बैठ गए।
”मैं अपराधी हूँ, देव। मेरे हृदय को शांति दीजिए, भिक्षुवर।“
”धर्म ही तुम्हारे हृदय को शांति दे सकता है, अशोक। तुम बौद्ध धर्म की शरण में आ जाओ।“ भिक्षु ने शांति से उत्तर दिया।
”मुझे क्या करना होगा, भिक्षुवर?“
”प्रतिज्ञा करो, आज से तुम जीव-हत्या नहीं करोगे। जब तक शरीर में प्राण हैं, अहिंसा का पालन करोगे। सबसे प्रेम का व्यवहार करोगे।“
”मैं प्रतिज्ञा करता हूँ, देव। मुझे बौद्ध धर्म की शरण में ले लीजिए।“ हाथ जोड़कर सम्राट अशोक ने प्रार्थना की।
”जाओ अपनी प्रतिज्ञा का पालन करो। तुम्हारे मन को अवश्य शांति मिलेगी, सम्राट।“ हाथ उठाकर भिक्षु ने सम्राट को आशीर्वाद दिया।
कलिंग-युद्ध के बाद सम्राट अशोक ने कोई युद्ध नहीं किया। उसने अपनी प्रजा की भलाई और कल्याण में अपना जीवन बिताया। शांति और अहिंसा के धर्म को देश भर में फेलाया। इतना ही नहीं, उसे दूसरे देशों तक पहुंचाया। अशोक के राज्य में प्रजा बहुत सुखी थी। स्वयं सम्राट वेष बदलकर अपनी प्रजा का दुख-सुख जानने, घर-घर जाते थे। इतिहास में सम्राट अशोक का नाम अमर रहेगा।
सत्यवादी हरिश्चंद्र
बहुत जमाने पहले की बात है। राजा हरिश्चंद्र सच बोलने और वचन. पालन के लिए मशहूर थे। उनकी प्रसिद्धि चारों तरफ फैली थी। ऋषि विश्वामित्र ने राजा हरिश्चंद्र की प्रसिद्धि सुनी। वे स्वयं इसकी परीक्षा करना चाहते थे। क्या हरिश्चंद्र हर कठिनाई झेलकर भी वचन का पालन करेंगे? आओ देखें कि विश्वामित्र ने कैसी परीक्षा ली?,
सतयुग में राजा हरिश्चंद्र नाम के एक राजा थे। राजा हरिश्चंद्र दानी थे और वचन के पक्के थे। वे जो वचन देते, उसे अवश्य पूरा करते। उनके बारे में कहा जाता, चाँद और सूरज भले ही अपनी जगह से हट जाएँ, पर राजा हरिश्चंद्र अपने वचन से कभी पीछे नहीं हट सकते। राजा हरिश्चंद्र की तरह ही उनकी रानी शैव्या और राजकुमार रोहिताश्व भी वचन का पालन करना अपना कर्तव्य मानते थे।
राजा की प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैल गई। ऋषि विश्वामित्र ने राजा हरिश्चंद्र की परीक्षा लेने का निश्चय किया। उसी रात राजा हरिश्चंद्र ने एक सपना देखा। सपने में उन्होंने देखा, ऋषि विश्वामित्र को राजा ने अपना पूरा राज-पाट दान में दे दिया है।
आँख खुलने पर राजा ने सोचा, अगर सपने में भी उन्होंने अपना साम्राज्य मुनि विश्वामित्र को दान में दे दिया, तब अपने साम्राज्य पर उनका कोई अधिकार नहीं रह गया है। प्रातःकाल विश्वामित्र साधु के वेष में राजा के महल में पहुंचे। राजा हरिश्चंद्र ने उन्हें प्रणाम कर पूछा-
”मेरे लिए क्या आज्ञा है, मुनिवर?“
”जो माँगूँगा दे सकोगे राजन्?“ मुस्कराकर ऋषि ने पूछा-
”मेरा सब कुछ आपका ही है, ऋषिवर। बताइए क्या सेवा करूँ? राजा हरिश्चंद्र ऋषि विश्वामित्र को पहचान गए थे।“
”मुझे तुम्हारा पूरा राज्य, धन-संपत्ति और खजाना चाहिए।“
”यह सब तो पहले ही आपको दे चुका हूँ, ऋषिवर।“ मुस्करा कर राजा ने कहा।
”वह कैसे राजन्?“ ऋषि विश्वामित्र आश्चर्य में पड़ गए।
”आज रात सपने में ही अपना पूरा राज-पाट, धन-संपत्ति आपको दे चुका हूँ, मुनिवर। अब मेरा सब कुछ आपका है।“
”मुझे खुशी है, तुम अपने वचन के पक्के हो, राजन्। चलो, तुम्हारा साम्राज्य अब मेरा हुआ। अब बताओ दक्षिणा में तुम क्या दोगे?“ ऋषि उनकी पूरी परीक्षा ले रहे थे।
राजा सोच में पड़ गए। वह जानते थे दक्षिणा के बिना दान पूरा नहीं होता। कुछ देर सोचने के बाद उन्होंने कहा-
”मुनिवर, अब तो हमारे पास केवल हमारे शरीर बचे हैं। काशी नगरी के बाजार में हम अपने को बेचेंगे। जो मूल्य मिलेगा, वही आपकी दक्षिणा होगी।“
राजा अपनी रानी और पुत्र के साथ काशी की मंडी मे गए। वहाँ उन्होंने कहा- ”हम तीनों अपने को बेचने आए हैं। जो हमें खरीदेगा, हम उसकी जीवन भर सेवा करते रहेंगे।“
बाजार में एक डोम आया था। उसके पास बहुत काम था और उसे एक नौकर की आवश्यकता थी। डोम ने राजा को खरीद लिया। एक ब्राह्ममण ने रानी शैव्या और राजकुमार रोहिताश्व को खरीदा। राजा होकर भी हरिश्चंद्र ने एक डोम के यहाँ काम करना स्वीकार किया। वह उसकी हर तरह से सेवा करते। छोटे-से-छोटे काम करने में भी न हिचकते।
रानी शैव्या और राजकुमार रोहिताश्व ब्राह्ममण परिवार की सेवा करते। एक दिन रोहिताश्व ने माँ से पूछा-
”माँ, हम राजमहल में रहते थे, हमारे यहाँ इतने दास-दासी थे। अब हम दूसरों के यहाँ काम करके रूखा-सूखा क्यों खाते हैं?“
”बेटा, वचन का पालन करने के लिए तुम्हारे पिता ने अपना सब कुछ दान में दे दिया। अब हमारे पास कुछ नहीं बचा है।“
”माँ, पिता जी ने अपना पूरा राज-पाट खजाना, सब कुछ दान में क्यों दे दिया?“
”बेटा, तुम्हारे पिता जी से अगर कोई कुछ माँगे तो वह देने में कभी नहीं चूकते। वे दानी हैं। ऋषि विश्वामित्र ने तुम्हारे पिता से उनका साम्राज्य माँगा। तुम्हारे पिता ने सहर्ष अपना साम्राज्य उन्हें दान में दे दिया। बताओ क्या उन्होंने गलती की?“
”नहीं माँ, पिता जी ने ठीक ही किया है। लेकिन वे हमारे साथ क्यों नहीं रहते?“
”वे एक दूसरी जगह रहकर अपने कर्तव्य का पालन कर रहे हैं, पुत्र। अब अपने शरीर पर भी हमारा अधिकार नहीं है।“
”वो क्यों माँ?“
”हमारे शरीर बेचकर जो मूल्य मिला, वो ऋषि विश्वामित्र को दक्षिणा में दे दिया गया। अब हमारे शरीरों पर हमारे स्वामी का अधिकार है। वह हमें जैसे रखेंगे, हम वैसे ही रहेंगे। उनकी सेवा करना हमारा धर्म है।“
”ओह माँ, पिता जी बहुत महान हैं। मैं जानता हूँ आने वाले समय में लोग पिता जी को बहुत आदर देंगे। उनका यश दूर-दूर तक फैलेगा।“
”तेरे पिता जी ने जो किया है, वह नाम या यश पाने के लिए नहीं किया पुत्र। उनका यही स्वभाव है।“ रानी ने बेटे को समझाया।
”तुम ठीक कहती हो, माँ।“
बहुत दिन बीत गए। राजा हरिश्चंद्र, रानी शैव्या और राजकुमार रोहिताश्व तन-मन से अपने-अपने मालिकों की सेवा करते रहे। उनके कष्ट देखकर भगवान का दिल भी पसीज गया। विश्वामित्र की परीक्षा पूरी हुई। विश्वामित्र ने राजा हरिश्चंद्र के पास जाकर कहा-
”तुम्हारी परीक्षा पूरी हुई, राजन्। तुम परीक्षा में खरे उतरे। वचन-पालन, दान और सच्चाई के लिए तुम्हारा नाम हमेशा आदर के साथ लिया जाता रहेगा। मैं तुम्हें तुम्हारा पूरा साम्राज्य वापस लौटाता हूँ।“
”नहीं मुनिवर, दिया हुआ दान वापस लेना अधर्म है। अब इस साम्राज्य पर मेरा कोई अधिकार नहीं है।“ हाथ जोड़कर राजा ने अपना राज्य वापस लेना अस्वीकार कर दिया।
”मैं ऋषि होकर इस साम्राज्य का क्या करूँगा, राजन्। तुम राजा की तरह शेष जीवन बिताओ।“
”यह असंभव है, ऋषिवर। अब मैं राज-पाट त्याग कर, भगवान की सेवा करूँगा।“
बहुत कहने पर भी राजा हरिश्चंद्र ने अपना साम्राज्य वापस नहीं लिया। अंत में राजकुमार रोहिताश्व को युवराज बनाया गया। राजा हरिश्चंद्र ने रानी शैव्या के साथ वानप्रस्थ ग्रहण कर लिया।
राजा हरिश्चंद्र का त्याग और वचन-पालन, आदर्श है। वचन-पालन और त्याग के लिए राजा हरिश्चंद्र को आज भी याद किया जाता है।
सतयुग में राजा हरिश्चंद्र नाम के एक राजा थे। राजा हरिश्चंद्र दानी थे और वचन के पक्के थे। वे जो वचन देते, उसे अवश्य पूरा करते। उनके बारे में कहा जाता, चाँद और सूरज भले ही अपनी जगह से हट जाएँ, पर राजा हरिश्चंद्र अपने वचन से कभी पीछे नहीं हट सकते। राजा हरिश्चंद्र की तरह ही उनकी रानी शैव्या और राजकुमार रोहिताश्व भी वचन का पालन करना अपना कर्तव्य मानते थे।
राजा की प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैल गई। ऋषि विश्वामित्र ने राजा हरिश्चंद्र की परीक्षा लेने का निश्चय किया। उसी रात राजा हरिश्चंद्र ने एक सपना देखा। सपने में उन्होंने देखा, ऋषि विश्वामित्र को राजा ने अपना पूरा राज-पाट दान में दे दिया है।
आँख खुलने पर राजा ने सोचा, अगर सपने में भी उन्होंने अपना साम्राज्य मुनि विश्वामित्र को दान में दे दिया, तब अपने साम्राज्य पर उनका कोई अधिकार नहीं रह गया है। प्रातःकाल विश्वामित्र साधु के वेष में राजा के महल में पहुंचे। राजा हरिश्चंद्र ने उन्हें प्रणाम कर पूछा-
”मेरे लिए क्या आज्ञा है, मुनिवर?“
”जो माँगूँगा दे सकोगे राजन्?“ मुस्कराकर ऋषि ने पूछा-
”मेरा सब कुछ आपका ही है, ऋषिवर। बताइए क्या सेवा करूँ? राजा हरिश्चंद्र ऋषि विश्वामित्र को पहचान गए थे।“
”मुझे तुम्हारा पूरा राज्य, धन-संपत्ति और खजाना चाहिए।“
”यह सब तो पहले ही आपको दे चुका हूँ, ऋषिवर।“ मुस्करा कर राजा ने कहा।
”वह कैसे राजन्?“ ऋषि विश्वामित्र आश्चर्य में पड़ गए।
”आज रात सपने में ही अपना पूरा राज-पाट, धन-संपत्ति आपको दे चुका हूँ, मुनिवर। अब मेरा सब कुछ आपका है।“
”मुझे खुशी है, तुम अपने वचन के पक्के हो, राजन्। चलो, तुम्हारा साम्राज्य अब मेरा हुआ। अब बताओ दक्षिणा में तुम क्या दोगे?“ ऋषि उनकी पूरी परीक्षा ले रहे थे।
राजा सोच में पड़ गए। वह जानते थे दक्षिणा के बिना दान पूरा नहीं होता। कुछ देर सोचने के बाद उन्होंने कहा-
”मुनिवर, अब तो हमारे पास केवल हमारे शरीर बचे हैं। काशी नगरी के बाजार में हम अपने को बेचेंगे। जो मूल्य मिलेगा, वही आपकी दक्षिणा होगी।“
राजा अपनी रानी और पुत्र के साथ काशी की मंडी मे गए। वहाँ उन्होंने कहा- ”हम तीनों अपने को बेचने आए हैं। जो हमें खरीदेगा, हम उसकी जीवन भर सेवा करते रहेंगे।“
बाजार में एक डोम आया था। उसके पास बहुत काम था और उसे एक नौकर की आवश्यकता थी। डोम ने राजा को खरीद लिया। एक ब्राह्ममण ने रानी शैव्या और राजकुमार रोहिताश्व को खरीदा। राजा होकर भी हरिश्चंद्र ने एक डोम के यहाँ काम करना स्वीकार किया। वह उसकी हर तरह से सेवा करते। छोटे-से-छोटे काम करने में भी न हिचकते।
रानी शैव्या और राजकुमार रोहिताश्व ब्राह्ममण परिवार की सेवा करते। एक दिन रोहिताश्व ने माँ से पूछा-
”माँ, हम राजमहल में रहते थे, हमारे यहाँ इतने दास-दासी थे। अब हम दूसरों के यहाँ काम करके रूखा-सूखा क्यों खाते हैं?“
”बेटा, वचन का पालन करने के लिए तुम्हारे पिता ने अपना सब कुछ दान में दे दिया। अब हमारे पास कुछ नहीं बचा है।“
”माँ, पिता जी ने अपना पूरा राज-पाट खजाना, सब कुछ दान में क्यों दे दिया?“
”बेटा, तुम्हारे पिता जी से अगर कोई कुछ माँगे तो वह देने में कभी नहीं चूकते। वे दानी हैं। ऋषि विश्वामित्र ने तुम्हारे पिता से उनका साम्राज्य माँगा। तुम्हारे पिता ने सहर्ष अपना साम्राज्य उन्हें दान में दे दिया। बताओ क्या उन्होंने गलती की?“
”नहीं माँ, पिता जी ने ठीक ही किया है। लेकिन वे हमारे साथ क्यों नहीं रहते?“
”वे एक दूसरी जगह रहकर अपने कर्तव्य का पालन कर रहे हैं, पुत्र। अब अपने शरीर पर भी हमारा अधिकार नहीं है।“
”वो क्यों माँ?“
”हमारे शरीर बेचकर जो मूल्य मिला, वो ऋषि विश्वामित्र को दक्षिणा में दे दिया गया। अब हमारे शरीरों पर हमारे स्वामी का अधिकार है। वह हमें जैसे रखेंगे, हम वैसे ही रहेंगे। उनकी सेवा करना हमारा धर्म है।“
”ओह माँ, पिता जी बहुत महान हैं। मैं जानता हूँ आने वाले समय में लोग पिता जी को बहुत आदर देंगे। उनका यश दूर-दूर तक फैलेगा।“
”तेरे पिता जी ने जो किया है, वह नाम या यश पाने के लिए नहीं किया पुत्र। उनका यही स्वभाव है।“ रानी ने बेटे को समझाया।
”तुम ठीक कहती हो, माँ।“
बहुत दिन बीत गए। राजा हरिश्चंद्र, रानी शैव्या और राजकुमार रोहिताश्व तन-मन से अपने-अपने मालिकों की सेवा करते रहे। उनके कष्ट देखकर भगवान का दिल भी पसीज गया। विश्वामित्र की परीक्षा पूरी हुई। विश्वामित्र ने राजा हरिश्चंद्र के पास जाकर कहा-
”तुम्हारी परीक्षा पूरी हुई, राजन्। तुम परीक्षा में खरे उतरे। वचन-पालन, दान और सच्चाई के लिए तुम्हारा नाम हमेशा आदर के साथ लिया जाता रहेगा। मैं तुम्हें तुम्हारा पूरा साम्राज्य वापस लौटाता हूँ।“
”नहीं मुनिवर, दिया हुआ दान वापस लेना अधर्म है। अब इस साम्राज्य पर मेरा कोई अधिकार नहीं है।“ हाथ जोड़कर राजा ने अपना राज्य वापस लेना अस्वीकार कर दिया।
”मैं ऋषि होकर इस साम्राज्य का क्या करूँगा, राजन्। तुम राजा की तरह शेष जीवन बिताओ।“
”यह असंभव है, ऋषिवर। अब मैं राज-पाट त्याग कर, भगवान की सेवा करूँगा।“
बहुत कहने पर भी राजा हरिश्चंद्र ने अपना साम्राज्य वापस नहीं लिया। अंत में राजकुमार रोहिताश्व को युवराज बनाया गया। राजा हरिश्चंद्र ने रानी शैव्या के साथ वानप्रस्थ ग्रहण कर लिया।
राजा हरिश्चंद्र का त्याग और वचन-पालन, आदर्श है। वचन-पालन और त्याग के लिए राजा हरिश्चंद्र को आज भी याद किया जाता है।
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई
तुम लोगों ने रानी लक्ष्मीबाई का नाम सुना होगा। वे झाँसी की रानी थीं। उन्होंने भारत पर शासन कर रहे अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध किया था।
वे बचपन से ही वीर थीं। वे और बालिकाओं की तरह गुड्डे-गुड़िया का खेल नहीं खेलती थीं, बल्कि युद्ध के खेल खेलती थीं। तलवार, कटार ही उनके खिलौने थे।
आओ, हम उनके बचपन की कहानी पढ़े।,
कक्षा में बच्चे कविता-पाठ कर रहे थे-
”चमक उठी सन् सत्तावन में,
वह तलवार पुरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुंह,
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो,
झाँसी वाली रानी थी।“
कविता दोहराती नेहा, अचानक चुप हो गई। अध्यापिका की नजर नेहा पर पड़ी, वह न जाने क्या सोच रही थी। उन्होंने प्यार से पूछा-
”क्या बात है नेहा, कविता पाठ करते हुए तुम चुप क्यों हो गई?“
”गुरू जी, मैं सोच रही थी, लक्ष्मीबाई तो स्त्री थीं। उन्होंने अंग्रेजो से लड़ाई कैसे की होगी?“
”हाँ नेहा, लक्ष्मीबाई स्त्री जरूर थीं, पर कमजोर स्त्री नहीं। वीरता में पुरूषों से कहीं कम नहीं थीं। भारत की आज़ादी के लिए, घोड़े की पीठ पर बैठकर, उन्होंने दोनों हाथों से तलवार चलाई थी। कितने ही अंग्रेजों को तलवार से मार गिराया।“
”गुरू जी, क्या वह बचपन से ही इतनी वीर थीं?“ नेहा ने दूसरा सवाल किया।
”हाँ नेहा, लक्ष्मीबाई साधारण लड़की नहीं थीं। चलो बच्चों, आज मैं तुम्हें लक्ष्मीबाई की कहानी सुनाती हूँ।“
”जी गुरू जी, हमें उनके बचपन की बातें सुनाइए।“ बच्चे कहानी सुनने को उत्सुक थे।
”प्यारे बच्चों, लक्ष्मीबाई के बचपन का नाम मनुकर्णिका था, पर सब प्यार से उसे मनु पुकारते थे।“
”गुरू जी, उनके पिता का क्या नाम था?“ रोहित ने पूछा।
”मनु के पिता का नाम मोरोपंत तांबे था। मनु उनकी अकेली संतान थी। पिता ने बेटी को बेटे की तरह पाला। मनु के मुंहबोले भाई का नाम ‘नाना’ था। नाना प्यार से मनु को ‘छबीली’ पुकारते। मनु का बचपन नाना के साथ बीता। वे वीर सैनिकों के कपडे़ पहनतीं, नाना के साथ खेलतीं और पढ़तीं। उन्हें लड़कियों वाले खेल पसंद नहीं थे।“
”गुरू जी, उन्हें कौन-से खेल पसंद थे?“ नेहा जानने को उत्सुक थी।
”बचपन से ही लक्ष्मीबाई लड़कों की तरह बरछी और ढाल लेकर नकली युद्ध करतीं। घोड़े पर सवारी करतीं और कटार और कृपाण ही उनकी सहेली थीं।“
”गुरू जी, देखिए इस कविता में भी यही बात लिखी है।“ रोहित ने किताब खोलकर कविता पढ़ी-
”बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी, उसकी यही सहेली थीं।“
”हाँ रोहित, उन्हें लड़कियों की तरह चूड़ियाँ पहनने या मेंहदी लगवाने का शौक नहीं था।“
”तब तो वे गुड़िया की शादी भी नहीं रचाती होंगी।“ नेहा ने ज्ञान बघारा।
”हाँ नेहा, वे तो लड़ाई के खेल खेलतीं। दुश्मनों को झूठे घेरे में डालकर, उन्हें हरातीं। उनके पास गुड़िया से खेलने का समय ही कहाँ था?“
”तब तो वे राजा-रानी या परियों की कहानी भी नहीं सुनती होंगी।“ रोहित गंभीर था।
”हाँ रोहित, मनु को तो वीरों की कहानियाँ सुनने में आनंद आता। शिवाजी जैसे वीरों की कहानियाँ उन्हें मुंहज़बानी याद थीं। मनु की वीरता देखकर लोगों को लगता मानो मनु के रूप में स्वयं दुर्गा ने जन्म लिया है।“
”वे बचपन से युद्ध का अभ्यास करती रहीं, इसीलिए तो अंग्रेजों से लड़ सकीं।“ एक लड़की ने कहा।
”ठीक कहती हो। वे युद्ध के नकली चक्रव्यूह यानी शत्रु को घेरने के लिए घेराबंदी करतीं। फिर उस घेरे में तलवार लेकर घुस जातीं। शत्रुओं को तलवार से मार गिरातीं। कभी-कभी झूठे शिकार का खेल खेलतीं। कभी शत्रु के किले के फाटक तोड़कर शत्रु को हरातीं।“
”क्या वे सचमुच किले का फाटक तोड़ती थीं, गुरू जी?“ नेहा विस्मित थी।
”अरे बुद्धू, सुना नहीं, गुरू जी ने कहा कि वे ये सब खेल खेलती थीं।“ रोहित ने नेहा को चिढ़ाया।
”हाँ नेहा, देखो तुम्हारी कविता में भी यही बात लिखी है न-“
”नकली युद्ध, व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना, ये थे उसके प्रिय खिलवाड़।“ अध्यापिका ने पंक्तियाँ पढ़कर सुनाई।
”एक बात और है, वे अपने कुल की देवी की सच्चे मन से पूजा करतीं। उन्हें अपनी कुलदेवी की शक्ति में बहुत विश्वास था।“
”गुरू जी, क्या लक्ष्मीबाई का विवाह हुआ था?“ नेहा ने प्रश्न पूछा।
”हाँ नेहा, लक्ष्मीबाई का विवाह झाँसी के राजा गंगाधर राव से हुआ था। विवाह के बाद मनुकर्णिका का नाम रानी लक्ष्मीबाई रखा गया। विवाह के समय झाँसी में खूब खुशियाँ मनाई गई। झाँसीवासी लक्ष्मीबाई को पाकर बहुत खुश थे।“
”क्या विवाह के बाद भी लक्ष्मीबाई युद्ध के खेल खेलती थीं, गुरू जी?“ रोहित भी जानने को उत्सुक था।
”हाँ रोहित, लक्ष्मीबाई ने राजमहल में स्त्रियों की एक सेना बनाई। उन्हें अपनी तरह बरछी, भाला, तलवार, कटार चलाने की शिक्षा दी। युद्ध में लड़ने के तरीके सिखाए।“
”वाह! यह तो बड़ी अच्छी बात थी। उन्होंने दिखा दिया कि स्त्रियाँ भी युद्ध कर सकती हैं।“ नेहा खुश थी।
”हाँ नेहा! पर झाँसी वालों की खुशी ज्यादा दिन टिक न सकी। कुछ समय बाद राजा की मृत्यु हो गई। सारे राज्य में शोक छा गया।
राजा की मृत्यु से अंगे्रजों को मौका मिल गया। अंग्रेज सेना ने झाँसी पर आक्रमण कर दिया। पुरूषों के कपड़े पहन, रानी लक्ष्मीबाई घोड़े पर सवार होकर युद्ध भूमि में पहुंच गई। रानी के दोनों हाथों में तलवार थी। वे अंग्रेजों की सेना को काटती-गिराती आगे बढ़ती गई। उनकी सहेलियों ने भी अंग्रेजों की सेना में खूब मारकाट मचाई थी। अंग्रेजी सेना की संख्या बहुत अधिक थी। अंत में रानी को घेर लिया गया।“
”हाँ गुरू जी, कविता में यही लिखा है“-रोहित ने जल्दी से कविता की पंक्तियाँ पढ़ीं-
”घोड़ा अड़ा नया घोड़ा था, इतने में आ गए सवार,
रानी एक शत्रु, बहुतेरे होने लगे वार पर वार,
घायल होकर गिरी सिंहनी,
उसे वीरगति पानी थी।“
”हाँ रोहित, अंत समय तक रानी ने हार नहीं मानी। अपनी झाँसी की रक्षा करते हुए रानी लक्ष्मीबाई ने प्राण त्याग दिए। भारत के इतिहास में रानी लक्ष्मीबाई का नाम सुनहरे अक्षरों में लिखा गया। उन्होंने हमें आजादी का महत्व सिखाया है, बच्चों।“
बच्चों ने कविता की अंतिम पंक्तियाँ आदर के साथ दोहराई।
”दिखा गई पथ, सिखा गई।
हमको जो सीख सिखानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झाँसी वाली रानी थी।“
घीसा
महादेवी जी को बच्चों से बहुत प्यार है। बच्चे प्यार से उन्हें गुरू जी कहते हैं। महादेवी गरीब बच्चों को पढ़ाने के लिए इलाहाबाद से झूंसी गाँव जाती थीं।
घीसा के पिता नहीं हैं। वह पढ़ने के लिए उनकी कक्षा में आता है। वह गुरू जी का बहुत आदर करता है। उनका कहा मानता है। उसे अपनी माँ और अपने पिल्ले से भी बहुत प्यार है।,
इलाहाबाद शहर में गंगा नदी के पार झूंसी नाम का एक छोटा-सा गाँव है। इसी गाँव में आठ-नौ वर्ष का एक बालक घीसा रहता था। घीसा की विधवा माँ मेहनत-मजदूरी करके किसी तरह अपना और घीसा का पेट पालती थी।
महादेवी जी अक्सर नाव से झूंसी जाया करतीं। झूंसी में गरीब बच्चों के लिए कोई स्कूल नहीं था। महादेवी जी ने एक पीपल के पेड़ के नीचे बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया। बच्चे उन्हें गुरू जी पुकारते।
एक दिन घीसा का हाथ पकडे़, उसकी माँ गुरू जी के पास आ पहुंची। हाथ जोड़कर उनसे बोली-
”इन बच्चों के साथ इसे भी बैठा लें ।गुरू जी। बिना बाप का बच्चा है। दिन भर इधर-उधर घूमता फिरता है। इनके साथ चार अक्षर पढ़ लेगा। आपका बड़ा उपकार होगा गुरू जी।“
”क्या नाम है तेरा?“ महादेवी जी ने पूछा।
”घीसा।“ घीसा की आँखें चमक उठीं। फिर उसने पूछा-
”गुरू जी, आप हमें पढ़ाएँगी?“
”क्यों नहीं घीसा। मन लगाकर पढ़ोगे तो कुछ बन जाओगे।“
”हम खूब मन लगा के पढेंगे। आपका कहा मानेंगे गुरू जी।“
महादेवी जी चार दिन झूंसी जातीं। घीसा के लिए ये चार दिन बड़ी खुशी के होते। वह सुबह-सुबह पीपल के पेड़ के नीचे झाडू लगाता। गोबर से जमीन लीपता। गुरू जी के लिए चटाई बिछाता, उनकी कलम-दवात सजाकर रखता। जब गुरू जी पढ़ातीं, घीसा की आँखें उनके चेहरे पर गड़ी रहतीं। उनकी हर बात वह ध्यान से सुनता। एक दिन गुरू जी ने बच्चों को समझाया-
”बच्चों को सफ़ाई से रहना चाहिए। रोज नहाकर साफ़ कपड़े पहनने चाहिए। गंदे कपड़े जरूर धोने चाहिए।“
दूसरे दिन घीसा पढने नहीं आया। गुरू जी ने बच्चों से पूछा-
”क्या बात है आज घीसा पढ़ने नहीं आया?“
रामू ने हॅंसते हुए जवाब दिया-
”आपने कल कहा था कि गंदे कपड़े धोकर, साफ कपड़े पहनने चाहिए। कल से ही घीसा माँ के पीछे पड़ा था। आज पैसे लेकर साबुन लाया है। इस वक्त वह अपना फटा कुरता साबुन की बट्टी से धो रहा है।“
थोड़ी देर बाद घीसा आ पहुंचा। उसका कुरता अभी कुछ गीला था। गुरू जी ने प्यार से कहा-
”क्यों रे घीसा, पढ़ने के समय तू क्या कर रहा था?“
”गुरू जी, हमारा कुरता बहुत गंदा था। आपने बताया साफ़ कपड़े पहनने चाहिए। कुरता धोने में देर हो गई। हमें माफ़ कर दें।“ धीमे से घीसा ने देरी का कारण बताया।
उसने शाम को जाते ही माँ से कहा-
”माँ, गुरू जी कहती हैं कि रोज कपड़े धोकर पहना करो। मैं आज कुरता धोऊंगा। साबुन की बट्टी मॅंगा दो न।“
माँ के पास पैसे नहीं थे। उसने कहीं से माँगकर रात को उसे पैसे दे दिए। वह सवेरे ही दुकान पर गया। तुरंत कुरता धोकर सुखाया। लेकिन कुरता सूख नहीं रहा था। स्कूल के लिए देर हो चुकी थी। इसीलिए वह गीला ही कुरता ऊपर डालकर भागता हुआ कक्षा में आया है।
गुरू जी ने देखा ज्यादातर बच्चों के पास एक ही कुरता था। घीसा का कुरता तो बिल्कुल फट चुका था। दूसरे दिन गुरू जी बच्चों के लिए नए कुरते और जलेबियाँ ले गई। नया कुरता पाकर घीसा की आँखें चमक उठीं। जल्दी से कुरता बदन पर लटका, गुरू जी के पाँव छू लिए।
सब बच्चों को पाँच-पाँच जलेबियाँ मिलीं। दूसरे बच्चों ने चटपट जलेबियाँ खा डालीं, पर घीसा अपनी जलेबियाँ लेकर घर भाग गया। लौटने पर गुरू जी ने पूछा-
”घीसा, तूने जलेबियाँ यहाँ क्यों नहीं खाई?“ शर्माते हुए घीसा ने बताया-
”दो जलेबियाँ माँ के लिए रख आया। एक जलेबी अपने पिल्ले को खिला दी। दो हमने खाई हैं। पिल्ले को एक जलेबी कम मिली है। अगर गुरू जी एक जलेबी और दे दें तो उसे भी पूरा हिस्सा मिल जाए।“
अपनी माँ से तो घीसा प्यार करता ही था। पर अपने पालतू पिल्ले के लिए भी उसके मन में प्यार था। गुरू जी की तो घीसा पूजा करता। कड़ी धूप में बैठा वह गुरू जी का इंतजार करता।
अचानक गुरू जी के पेट में दर्द रहने लगा। डॉक्टर ने उन्हें आपरेशन कराने की सलाह दी। जब गुरू जी ने बच्चों को बताया वह कुछ दिनों तक झूँसी नहीं आ सकेंगी तो घीसा रो पड़ा।
गुरू जी थोड़ी देर यहाँ ठहरिएगा। हम अभी आते हैं। जाइएगा नहीं। गुरू जी से विनती कर, घीसा तेजी से भाग गया। थोड़ी देर बाद नंगे बदन घीसा वापस आया। उसके हाथ में एक बड़ा-सा तरबूज था। तरबूज में एक छोटी-सी फाँक काटी गई थी। उसमें से अंदर का लाल रंग झलक रहा था।
”गुरू जी, यह तरबूज आपके लिए खेत से लाए हैं। लाल है या नहीं इसलिए थोड़ा-सा कटवाकर देखना पड़ा।“ घीसा दौड़ने के कारण हाँफ़ रहा था।
”मेरे लिए क्यों, घीसा? यह तरबूज तू खा और अपनी माँ के लिए ले जा।“ गुरू जी ने कहा।
”नहीं गुरू जी, आप तो माँ और भगवान से भी ऊपर हैं। यह तरबूज लाने के लिए पैसे नहीं थे, गुरू जी। नया कुरता देकर आपके लिए यह तरबूज लाए हैं। गर्मी में हम नंगे बदन रह सकते हैं।“ खुशी से घीसा का चेहरा जगमगा रहा था। यह सुनकर गुरू जी की आँखें नम हो गई।
नया कुरता घीसा को बहुत प्यारा था, पर उसके दिल में गुरू जी के लिए उस कुरते से कहीं ज्यादा प्यार था। गुरू जी को तरबूज देकर उसे जो खुशी मिली, उसके मुकाबले नया कुरता खो देने का दुख कुछ नहीं था।
गुरू जी ने घीसा को सीने से चिपटा लिया। दोनों की आँखों से आँसू बह निकले।
घीसा के पिता नहीं हैं। वह पढ़ने के लिए उनकी कक्षा में आता है। वह गुरू जी का बहुत आदर करता है। उनका कहा मानता है। उसे अपनी माँ और अपने पिल्ले से भी बहुत प्यार है।,
इलाहाबाद शहर में गंगा नदी के पार झूंसी नाम का एक छोटा-सा गाँव है। इसी गाँव में आठ-नौ वर्ष का एक बालक घीसा रहता था। घीसा की विधवा माँ मेहनत-मजदूरी करके किसी तरह अपना और घीसा का पेट पालती थी।
महादेवी जी अक्सर नाव से झूंसी जाया करतीं। झूंसी में गरीब बच्चों के लिए कोई स्कूल नहीं था। महादेवी जी ने एक पीपल के पेड़ के नीचे बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया। बच्चे उन्हें गुरू जी पुकारते।
एक दिन घीसा का हाथ पकडे़, उसकी माँ गुरू जी के पास आ पहुंची। हाथ जोड़कर उनसे बोली-
”इन बच्चों के साथ इसे भी बैठा लें ।गुरू जी। बिना बाप का बच्चा है। दिन भर इधर-उधर घूमता फिरता है। इनके साथ चार अक्षर पढ़ लेगा। आपका बड़ा उपकार होगा गुरू जी।“
”क्या नाम है तेरा?“ महादेवी जी ने पूछा।
”घीसा।“ घीसा की आँखें चमक उठीं। फिर उसने पूछा-
”गुरू जी, आप हमें पढ़ाएँगी?“
”क्यों नहीं घीसा। मन लगाकर पढ़ोगे तो कुछ बन जाओगे।“
”हम खूब मन लगा के पढेंगे। आपका कहा मानेंगे गुरू जी।“
महादेवी जी चार दिन झूंसी जातीं। घीसा के लिए ये चार दिन बड़ी खुशी के होते। वह सुबह-सुबह पीपल के पेड़ के नीचे झाडू लगाता। गोबर से जमीन लीपता। गुरू जी के लिए चटाई बिछाता, उनकी कलम-दवात सजाकर रखता। जब गुरू जी पढ़ातीं, घीसा की आँखें उनके चेहरे पर गड़ी रहतीं। उनकी हर बात वह ध्यान से सुनता। एक दिन गुरू जी ने बच्चों को समझाया-
”बच्चों को सफ़ाई से रहना चाहिए। रोज नहाकर साफ़ कपड़े पहनने चाहिए। गंदे कपड़े जरूर धोने चाहिए।“
दूसरे दिन घीसा पढने नहीं आया। गुरू जी ने बच्चों से पूछा-
”क्या बात है आज घीसा पढ़ने नहीं आया?“
रामू ने हॅंसते हुए जवाब दिया-
”आपने कल कहा था कि गंदे कपड़े धोकर, साफ कपड़े पहनने चाहिए। कल से ही घीसा माँ के पीछे पड़ा था। आज पैसे लेकर साबुन लाया है। इस वक्त वह अपना फटा कुरता साबुन की बट्टी से धो रहा है।“
थोड़ी देर बाद घीसा आ पहुंचा। उसका कुरता अभी कुछ गीला था। गुरू जी ने प्यार से कहा-
”क्यों रे घीसा, पढ़ने के समय तू क्या कर रहा था?“
”गुरू जी, हमारा कुरता बहुत गंदा था। आपने बताया साफ़ कपड़े पहनने चाहिए। कुरता धोने में देर हो गई। हमें माफ़ कर दें।“ धीमे से घीसा ने देरी का कारण बताया।
उसने शाम को जाते ही माँ से कहा-
”माँ, गुरू जी कहती हैं कि रोज कपड़े धोकर पहना करो। मैं आज कुरता धोऊंगा। साबुन की बट्टी मॅंगा दो न।“
माँ के पास पैसे नहीं थे। उसने कहीं से माँगकर रात को उसे पैसे दे दिए। वह सवेरे ही दुकान पर गया। तुरंत कुरता धोकर सुखाया। लेकिन कुरता सूख नहीं रहा था। स्कूल के लिए देर हो चुकी थी। इसीलिए वह गीला ही कुरता ऊपर डालकर भागता हुआ कक्षा में आया है।
गुरू जी ने देखा ज्यादातर बच्चों के पास एक ही कुरता था। घीसा का कुरता तो बिल्कुल फट चुका था। दूसरे दिन गुरू जी बच्चों के लिए नए कुरते और जलेबियाँ ले गई। नया कुरता पाकर घीसा की आँखें चमक उठीं। जल्दी से कुरता बदन पर लटका, गुरू जी के पाँव छू लिए।
सब बच्चों को पाँच-पाँच जलेबियाँ मिलीं। दूसरे बच्चों ने चटपट जलेबियाँ खा डालीं, पर घीसा अपनी जलेबियाँ लेकर घर भाग गया। लौटने पर गुरू जी ने पूछा-
”घीसा, तूने जलेबियाँ यहाँ क्यों नहीं खाई?“ शर्माते हुए घीसा ने बताया-
”दो जलेबियाँ माँ के लिए रख आया। एक जलेबी अपने पिल्ले को खिला दी। दो हमने खाई हैं। पिल्ले को एक जलेबी कम मिली है। अगर गुरू जी एक जलेबी और दे दें तो उसे भी पूरा हिस्सा मिल जाए।“
अपनी माँ से तो घीसा प्यार करता ही था। पर अपने पालतू पिल्ले के लिए भी उसके मन में प्यार था। गुरू जी की तो घीसा पूजा करता। कड़ी धूप में बैठा वह गुरू जी का इंतजार करता।
अचानक गुरू जी के पेट में दर्द रहने लगा। डॉक्टर ने उन्हें आपरेशन कराने की सलाह दी। जब गुरू जी ने बच्चों को बताया वह कुछ दिनों तक झूँसी नहीं आ सकेंगी तो घीसा रो पड़ा।
गुरू जी थोड़ी देर यहाँ ठहरिएगा। हम अभी आते हैं। जाइएगा नहीं। गुरू जी से विनती कर, घीसा तेजी से भाग गया। थोड़ी देर बाद नंगे बदन घीसा वापस आया। उसके हाथ में एक बड़ा-सा तरबूज था। तरबूज में एक छोटी-सी फाँक काटी गई थी। उसमें से अंदर का लाल रंग झलक रहा था।
”गुरू जी, यह तरबूज आपके लिए खेत से लाए हैं। लाल है या नहीं इसलिए थोड़ा-सा कटवाकर देखना पड़ा।“ घीसा दौड़ने के कारण हाँफ़ रहा था।
”मेरे लिए क्यों, घीसा? यह तरबूज तू खा और अपनी माँ के लिए ले जा।“ गुरू जी ने कहा।
”नहीं गुरू जी, आप तो माँ और भगवान से भी ऊपर हैं। यह तरबूज लाने के लिए पैसे नहीं थे, गुरू जी। नया कुरता देकर आपके लिए यह तरबूज लाए हैं। गर्मी में हम नंगे बदन रह सकते हैं।“ खुशी से घीसा का चेहरा जगमगा रहा था। यह सुनकर गुरू जी की आँखें नम हो गई।
नया कुरता घीसा को बहुत प्यारा था, पर उसके दिल में गुरू जी के लिए उस कुरते से कहीं ज्यादा प्यार था। गुरू जी को तरबूज देकर उसे जो खुशी मिली, उसके मुकाबले नया कुरता खो देने का दुख कुछ नहीं था।
गुरू जी ने घीसा को सीने से चिपटा लिया। दोनों की आँखों से आँसू बह निकले।
प्यारी गिलहरी
ख् तुम जानते होगे कि संसार के सारे देशों में गिलहरियाँ हैं, जो पेड़ों पर दौड़ती हैं और फल-बीज चुनकर खाती हैं। बड़ी सुंदर लगती हैं न। केवल भारत की गिलहरियों की पीठ पर तीन धारियाँ मिलती हैं। ऐसा क्यों? इसके पीछे बड़ी ही रोचक कहानी है। आओ, हम यह कहानी पढ़ें।,
यह कहानी बहुत पुरानी है। उन दिनों लंका में रावण नाम का राजा राज्य करता था। लंका और भारत के बीच में एक गहरा सागर है। अयोध्या के राजा दशरथ के बड़े पुत्र श्री रामचंद्र पिता की आज्ञा से जंगल में वास कर रहे थे। उनके साथ उनका छोटा भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता भी थे।
एक दिन रावण धोखे से सीता जी को अपने साथ लंका ले गया। सीता ने रावण के महल में रहना स्वीकार नहीं किया। वे अशोक वाटिका में पेड़ों की छाया में रहतीं और श्री रामचंद्र का नाम जपती थीं।
सीता को रावण से छुड़ाने के लिए लंका जाना जरूरी था। सागर पर पुल बनाए बिना लंका नहीं पहुंचा जा सकता था। सब सोच में पड़ गए, सागर को कैसे पार किया जाए? लक्ष्मण ने श्रीराम से कहा-
”भ्राताश्री, अगर आप चाहें तो एक बाण चलाकर करोड़ों सागरों का पानी सुखा सकते हैं। आप किस सोच में हैं?“
”नहीं भाई, हम पहले सागर से प्रार्थना करेंगे। हो सकता है सागर राज हमें पार जाने का कोई उपाय बताए। बिना कारण किसी पर अन्याय करना ठीक बात नहीं होती।“ श्री राम ने उत्तर दिया।
प्रार्थना करने पर भी सागर राज नहीं माना। तब श्री रामचंद्र ने अपना धनुष-बाण उठाया। यह देखकर सागर राज डर गया। वह जानता था श्री राम के बाण से सागर का पानी सूख जाएगा। सागर राज ने श्री राम से कहा-
”हे भगवान! आपकी सेना में नल और नील नाम के दो वानर भाई हैं। उन्हें वरदान मिला है कि वे जिस पत्थर को छूएँगे वह सागर पर तैरता रहेगा। बड़े-बड़े पत्थर भी पानी में डालेंगे तो भी वे नहीं डूबेंगे। आप उनकी मदद से सागर पर पुल बनवाइए। इस तरह मेरा भी सम्मान बना रहेगा।“
बस फिर क्या था। नल और नील के साथ सारी वानर सेना सागर में बड़ी-बड़ी शिलाएँ डालने लगी। पत्थर पानी में तैरने लगे। धीरे-धीरे समुद्र पर पुल बनने लगा।
उसी जगह एक पेड़ पर एक छोटी-सी गिलहरी रहती थी। गिलहरी बहुत चंचल थी। एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर फुदकती रहती। कभी वह फल कुतरकर खाती, कभी रेत में लोटती, कभी समुद्र के पानी में नहाती।
गिलहरी ने देखा कि सारे वानर पत्थर उठा-उठाकर समुद्र में डाल रहे हैं। एक वानर को रोक कर गिलहरी ने पूछा-
”वानर भइया, आप लोग किनारे से पत्थर उठाकर पानी में क्यों डाल रहे हैं? सागर मामा का पानी गंदा होगा तो वे नाराज होंगे।“
”नहीं पगली, हम समुद्र का पानी गंदा नहीं कर रहे हैं। हम लोग तो सागर पर पुल बना रहे हैं।“ वानर ने कहा।
”आप पुल क्यों बना रहे हैं एभइया?“ गिलहरी ने पूछा।
”देख गिलहरी, समुद्र के उस पार लंका देश है। लंका में सीता जी कैद हैं। उन्हें छुड़ाने के लिए सागर पर करना होगा। इसीलिए हम पुल बना रहे हैं।"
" हम भी आपके काम में मदद करेंगे।“ गिलहरी बोली।
”अरे रहने दे। तू इतनी छोटी-सी है, पत्थर के नीचे दबकर ख़त्म हो जाएगी। यह काम हमें ही करने दे।“ वानर हॅंस पड़ा।
”छोटे हैं तो क्या हुआ? छोटे भी तो बड़ों की मदद कर सकते हैं। एक-एक बूंद से सागर बन सकता है, तो पुल बनाने में हम आपकी मदद क्यों नहीं कर सकते?“ गिलहरी ने कहा।
नन्ही गिलहरी ने वानर के जवाब का इंतजार नहीं किया। उछलती हुई, तेजी-से जाकर सागर के पानी में डुबकी लगा आई। उसका सारा बदन गीला हो गया था। भीगे शरीर के साथ गिलहरी रेत में लोट लगाने लगी। उसके शरीर पर रेत-कण चिपक गए। फुदकती हुई गिलहरी फिर समुद्र में गई और पानी में अपनी रेत झाड़ आई।
गिलहरी बार-बार ऐसा ही करती रही। श्री रामचंद्र गिलहरी के मन की बात समझ गए। अपने शरीर के रेत-कण समुद्र के पानी में झाड़कर, गिलहरी पुल बनाने में मदद कर रही थी।
सागर पर पुल बनकर तैयार हो गया। सारे वानर खुशियाँ मना रहे थे। गिलहरी भी रेत में लोटकर उनकी खुशी में शामिल हो गई। कुछ देर पहले वह सागर में नहाकर लौटी थी। उसके शरीर पर रेत के कण चिपके हुए थे। श्रीरामचंद्र ने स्नेह से गिलहरी को उठा लिया-
”तू छोटी ज़रूर है, पर तूने एक बड़े काम को पूरा करने में मदद की है, नन्ही गिलहरी। तुझे हमेशा याद रखा जाएगा।“
रामचंद्र जी ने प्यार से गिलहरी की पीठ सहलाई। उनकी उंगलियों से गिलहरी की पीठ पर लगी रेत, तीन जगह से झड़कर गिर गई। उसकी पीठ पर तीन धारियाँ-सी बन गई। तब से गिलहरी के शरीर पर तीन धारियाँ बनी दिखाई देती हैं।
गिलहरी के शरीर की ये धारियाँ मर्यादा पुरूषोत्तम श्री रामचंद्र के प्यार की निशानी हैं। श्री रामचंद्र ने छोटे-बड़े, उच्च-नीच सबको अपना प्यार दिया। हमें भी किसी को छोटा नहीं समझना चाहिए। सबको अपना प्यार देना चाहिए। छोटे प्राणी भी महान कार्य करने में मदद कर सकते हैं। एक नन्ही-सी गिलहरी ने सागर पर पुल बनाने में मदद करके यह सच साबित कर दिया है।
यह कहानी बहुत पुरानी है। उन दिनों लंका में रावण नाम का राजा राज्य करता था। लंका और भारत के बीच में एक गहरा सागर है। अयोध्या के राजा दशरथ के बड़े पुत्र श्री रामचंद्र पिता की आज्ञा से जंगल में वास कर रहे थे। उनके साथ उनका छोटा भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता भी थे।
एक दिन रावण धोखे से सीता जी को अपने साथ लंका ले गया। सीता ने रावण के महल में रहना स्वीकार नहीं किया। वे अशोक वाटिका में पेड़ों की छाया में रहतीं और श्री रामचंद्र का नाम जपती थीं।
सीता को रावण से छुड़ाने के लिए लंका जाना जरूरी था। सागर पर पुल बनाए बिना लंका नहीं पहुंचा जा सकता था। सब सोच में पड़ गए, सागर को कैसे पार किया जाए? लक्ष्मण ने श्रीराम से कहा-
”भ्राताश्री, अगर आप चाहें तो एक बाण चलाकर करोड़ों सागरों का पानी सुखा सकते हैं। आप किस सोच में हैं?“
”नहीं भाई, हम पहले सागर से प्रार्थना करेंगे। हो सकता है सागर राज हमें पार जाने का कोई उपाय बताए। बिना कारण किसी पर अन्याय करना ठीक बात नहीं होती।“ श्री राम ने उत्तर दिया।
प्रार्थना करने पर भी सागर राज नहीं माना। तब श्री रामचंद्र ने अपना धनुष-बाण उठाया। यह देखकर सागर राज डर गया। वह जानता था श्री राम के बाण से सागर का पानी सूख जाएगा। सागर राज ने श्री राम से कहा-
”हे भगवान! आपकी सेना में नल और नील नाम के दो वानर भाई हैं। उन्हें वरदान मिला है कि वे जिस पत्थर को छूएँगे वह सागर पर तैरता रहेगा। बड़े-बड़े पत्थर भी पानी में डालेंगे तो भी वे नहीं डूबेंगे। आप उनकी मदद से सागर पर पुल बनवाइए। इस तरह मेरा भी सम्मान बना रहेगा।“
बस फिर क्या था। नल और नील के साथ सारी वानर सेना सागर में बड़ी-बड़ी शिलाएँ डालने लगी। पत्थर पानी में तैरने लगे। धीरे-धीरे समुद्र पर पुल बनने लगा।
उसी जगह एक पेड़ पर एक छोटी-सी गिलहरी रहती थी। गिलहरी बहुत चंचल थी। एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर फुदकती रहती। कभी वह फल कुतरकर खाती, कभी रेत में लोटती, कभी समुद्र के पानी में नहाती।
गिलहरी ने देखा कि सारे वानर पत्थर उठा-उठाकर समुद्र में डाल रहे हैं। एक वानर को रोक कर गिलहरी ने पूछा-
”वानर भइया, आप लोग किनारे से पत्थर उठाकर पानी में क्यों डाल रहे हैं? सागर मामा का पानी गंदा होगा तो वे नाराज होंगे।“
”नहीं पगली, हम समुद्र का पानी गंदा नहीं कर रहे हैं। हम लोग तो सागर पर पुल बना रहे हैं।“ वानर ने कहा।
”आप पुल क्यों बना रहे हैं एभइया?“ गिलहरी ने पूछा।
”देख गिलहरी, समुद्र के उस पार लंका देश है। लंका में सीता जी कैद हैं। उन्हें छुड़ाने के लिए सागर पर करना होगा। इसीलिए हम पुल बना रहे हैं।"
" हम भी आपके काम में मदद करेंगे।“ गिलहरी बोली।
”अरे रहने दे। तू इतनी छोटी-सी है, पत्थर के नीचे दबकर ख़त्म हो जाएगी। यह काम हमें ही करने दे।“ वानर हॅंस पड़ा।
”छोटे हैं तो क्या हुआ? छोटे भी तो बड़ों की मदद कर सकते हैं। एक-एक बूंद से सागर बन सकता है, तो पुल बनाने में हम आपकी मदद क्यों नहीं कर सकते?“ गिलहरी ने कहा।
नन्ही गिलहरी ने वानर के जवाब का इंतजार नहीं किया। उछलती हुई, तेजी-से जाकर सागर के पानी में डुबकी लगा आई। उसका सारा बदन गीला हो गया था। भीगे शरीर के साथ गिलहरी रेत में लोट लगाने लगी। उसके शरीर पर रेत-कण चिपक गए। फुदकती हुई गिलहरी फिर समुद्र में गई और पानी में अपनी रेत झाड़ आई।
गिलहरी बार-बार ऐसा ही करती रही। श्री रामचंद्र गिलहरी के मन की बात समझ गए। अपने शरीर के रेत-कण समुद्र के पानी में झाड़कर, गिलहरी पुल बनाने में मदद कर रही थी।
सागर पर पुल बनकर तैयार हो गया। सारे वानर खुशियाँ मना रहे थे। गिलहरी भी रेत में लोटकर उनकी खुशी में शामिल हो गई। कुछ देर पहले वह सागर में नहाकर लौटी थी। उसके शरीर पर रेत के कण चिपके हुए थे। श्रीरामचंद्र ने स्नेह से गिलहरी को उठा लिया-
”तू छोटी ज़रूर है, पर तूने एक बड़े काम को पूरा करने में मदद की है, नन्ही गिलहरी। तुझे हमेशा याद रखा जाएगा।“
रामचंद्र जी ने प्यार से गिलहरी की पीठ सहलाई। उनकी उंगलियों से गिलहरी की पीठ पर लगी रेत, तीन जगह से झड़कर गिर गई। उसकी पीठ पर तीन धारियाँ-सी बन गई। तब से गिलहरी के शरीर पर तीन धारियाँ बनी दिखाई देती हैं।
गिलहरी के शरीर की ये धारियाँ मर्यादा पुरूषोत्तम श्री रामचंद्र के प्यार की निशानी हैं। श्री रामचंद्र ने छोटे-बड़े, उच्च-नीच सबको अपना प्यार दिया। हमें भी किसी को छोटा नहीं समझना चाहिए। सबको अपना प्यार देना चाहिए। छोटे प्राणी भी महान कार्य करने में मदद कर सकते हैं। एक नन्ही-सी गिलहरी ने सागर पर पुल बनाने में मदद करके यह सच साबित कर दिया है।
अधिकार
यह कहानी महात्मा गौतम बुद्ध के बचपन की है। बालक गौतम का हृदय कोमल था। उसमें जीव-जंतुओं के प्रति करूणा थी। उसका चचेरा भाई देवदत्त क्रूर था। उसे जानवरों का शिकार करने में आनंद आता था। एक बार देवदत्त ने हंस पक्षी को मार गिराया और गौतम ने उसकी जान बचाई। देवदत्त कहता है- ”यह मेरा शिकार है। मुझे दे दो।“ गौतम कहता है- ”नहीं ! मैंने इसकी जान बचाई, यह मेरा है।“ देखो कौन जीतता है।,
सुबह का समय था। ठंडी-ठंडी हवा बह रही थी। मगध के राजकुमार सिद्धार्थ राजमहल के बाग में घूम रहे थे। राजकुमार को लोग प्यार से गौतम पुकारते थे। उनके साथ उनका चचेरा भाई देवदत्त भी था। गौतम बहुत दयालु स्वभाव के थे। वह पशु-पक्षियों को प्यार करते, पर देवदत्त कठोर स्वभाव का था। पशु-पक्षियों के शिकार में उसे बड़ा आनंद मिलता।
बाग बहुत सुंदर था। तालाब में कमल खिले हुए थे। फूलों पर रंग-बिरंगी तितलियाँ मॅंडरा रही थीं। पेड़ों पर चिड़ियाँ चहचहा रही थीं। राजकुमार गौतम को देखकर बाग के खरगोश और हिरन उनके चारों ओर जमा हो गए। गौतम ने बड़े प्यार से उन्हें हरी-हरी घास खिलाई। उसी बीच देवदत्त ने एक तितली पकड़ उसके पंख काट डाले। गौतम को बहुत दुख हुआ-
”यह क्या देवदत्त, तुमने तितली के पंख क्यों काटे?“
”मैं इसे धागा बाँधकर नचाऊंगा। बड़ा मजा आएगा।“ देवदत्त हॅंस रहा था।
”नहीं देवदत्त, यह ठीक बात नहीं है। भगवान ने तितली को पंख उड़ने के लिए दिए हैं। उसके पंख काटकर तुमने अपराध किया है।“ गौतम ने कहा।
”अगर तुम तितली और चिड़ियों के बारे में सोचते रहे तो राजा कैसे बन सकोगे गौतम? तुम खरगोश से खेलो, मैं किसी पक्षी का शिकार करता हूँ।“ हॅंसता हुआ देवदत्त बाग के दूसरी ओर चला गया।
गौतम सोच में डूबे बाग में घूम रहे थे। तभी आकाश में सफ़ेद हंस उड़ते हुए दिखाई दिए। सारे हंस पंक्ति बनाकर उड़ रहे थे। उनकी आवाज समझ पाना संभव नहीं था। ऐसा लग रहा था जैसे वे खुशी के गीत गा रहे हों। गौतम हंसों को प्यार से देख रहे थे। अचानक हंस चीख पड़े।
हंसों की पंक्ति टूट गई थी। अचानक खून से लथपथ एक हंस गौतम के पाँवों के पास आ गिरा। हंस के शरीर में एक बाण लगा हुआ था। घायल हंस कष्ट से कराह रहा था। गौतम को लगा मानो हंस उनसे दया की भीख माँग रहा हो। हंस के कष्ट से गौतम को बहुत दुख हुआ। वे सोचने लगे-
”कुछ देर पहले यह हंस कितना खुश था। अपने साथियों के साथ गीत गाता, आकाश में उड़ रहा था। एक बाण ने इसे इसके साथियों से अलग कर दिया। यह अन्याय किसने किया?“
गौतम ने बड़ी सावधानी से उसके शरीर से बाण बाहर निकाल दिया। उसके घाव को धोकर साफ किया। प्यार पाकर हंस ने गौतम की गोद में सिर छिपा लिया।
तभी बाग के दूसरी ओर से देवदत्त तेजी से दौड़ता हुआ आया। उसे आता देख, हंस डर से सिहर गया। गौतम के पास आकर देवदत्त ने तेज आवाज में कहा-
”सिद्धार्थ, यह हंस मेरा है। मैंने इसे बाण मारकर गिराया है।“
”नहीं देवदत्त, यह हंस मेरी शरण में आया है। यह हंस मेरा है।“ गौतम ने शांति से जवाब दिया।
”बेकार की बातें मत करो गौतम। मैंने इसका शिकार किया है। हंस मुझे दे दो।“ देवदत्त ने गुस्से से कहा।
”मैं यह हंस तुम्हें नहीं दूंगा देवदत्त। इसे मैंने बचाया है। इस हंस पर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं है।“ गौतम अपनी बात पर अटल थे।
गौतम और देवदत्त के बीच बहस छिड़ गई। दोनों ही अपनी बात पर अड़े थे। अंत में देवदत्त ने कहा-
”ठीक है, चलो महाराज के पास। वे ही हमारा न्याय करेंगे।“
दोनों बालक गौतम के पिता महाराज शुद्धोधन के पास पहुंचे। देवदत्त बहुत क्रोध में था, पर गौतम शांत थे।
देवदत्त ने महाराज से कहा-
”महाराज, मैंने आकाश में उड़ते इस हंस का शिकार किया है। इस हंस पर मेरा अधिकार है। मुझे मेरा हंस दिलाया जाए।“
महाराज ने गौतम से कहा-
”राजकुमार गौतम, तुम्हारा भाई ठीक कहता है। शिकार किए गए पक्षी पर शिकारी का हक होता है। देवदत्त का हंस उसे दे दो।“
”नहीं महाराज, मारने वाले से बचाने वाला ज्यादा बड़ा होता है। देवदत्त ने इस हंस के प्राण लेने चाहे, पर मैंने इसकी जान बचाई है। अब आप ही बताइए, इस हंस पर किसका अधिकार होना चाहिए?“ गौतम ने कहा।
महाराज सोच में पड़ गए। उन्हें गौतम की बात ठीक लगी। प्राण लेने वाले से जीवन देने वाला, अधिक महान होता है। उन्होंने कहा- ”गौतम ठीक कहता है। इस हंस के प्राण गौतम ने बचाए हैं, इसलिए इस हंस पर गौतम का अधिकार है।“
क्रोधित होकर देवदत्त ने प्रश्न किया- ”अगर हंस मर जाता तो क्या आप यह हंस मुझे दे देते, महाराज?“
”हाँ, तब यह हंस तुम्हारा शिकार होता और तुम्हें तुम्हारा हंस जरूर दिया जाता।“ बड़ी शांति से महाराज ने समझाया।
गौतम ने प्यार से हंस को सीने से चिपटा लिया। हंस ने खुश होकर चैन की साँस ली। महाराज ने हंस की प्रसन्नता देखी। अचानक उनके मुंह से निकला-भक्षक से रक्षक बड़ा है। अर्थात् मारकर खाने वाले से रक्षा करने वाला महान है।
बाद में राजकुमार गौतम ही महात्मा गौतम बुद्ध ने सब प्राणियों को प्यार करने की सीख दी। विश्व को अहिंसा और शांति का संदेश दिया। गौतम बुद्ध को लोग आदर से भगवान बुद्ध भी कहते हैं। वे सचमुच महान थे।
सुबह का समय था। ठंडी-ठंडी हवा बह रही थी। मगध के राजकुमार सिद्धार्थ राजमहल के बाग में घूम रहे थे। राजकुमार को लोग प्यार से गौतम पुकारते थे। उनके साथ उनका चचेरा भाई देवदत्त भी था। गौतम बहुत दयालु स्वभाव के थे। वह पशु-पक्षियों को प्यार करते, पर देवदत्त कठोर स्वभाव का था। पशु-पक्षियों के शिकार में उसे बड़ा आनंद मिलता।
बाग बहुत सुंदर था। तालाब में कमल खिले हुए थे। फूलों पर रंग-बिरंगी तितलियाँ मॅंडरा रही थीं। पेड़ों पर चिड़ियाँ चहचहा रही थीं। राजकुमार गौतम को देखकर बाग के खरगोश और हिरन उनके चारों ओर जमा हो गए। गौतम ने बड़े प्यार से उन्हें हरी-हरी घास खिलाई। उसी बीच देवदत्त ने एक तितली पकड़ उसके पंख काट डाले। गौतम को बहुत दुख हुआ-
”यह क्या देवदत्त, तुमने तितली के पंख क्यों काटे?“
”मैं इसे धागा बाँधकर नचाऊंगा। बड़ा मजा आएगा।“ देवदत्त हॅंस रहा था।
”नहीं देवदत्त, यह ठीक बात नहीं है। भगवान ने तितली को पंख उड़ने के लिए दिए हैं। उसके पंख काटकर तुमने अपराध किया है।“ गौतम ने कहा।
”अगर तुम तितली और चिड़ियों के बारे में सोचते रहे तो राजा कैसे बन सकोगे गौतम? तुम खरगोश से खेलो, मैं किसी पक्षी का शिकार करता हूँ।“ हॅंसता हुआ देवदत्त बाग के दूसरी ओर चला गया।
गौतम सोच में डूबे बाग में घूम रहे थे। तभी आकाश में सफ़ेद हंस उड़ते हुए दिखाई दिए। सारे हंस पंक्ति बनाकर उड़ रहे थे। उनकी आवाज समझ पाना संभव नहीं था। ऐसा लग रहा था जैसे वे खुशी के गीत गा रहे हों। गौतम हंसों को प्यार से देख रहे थे। अचानक हंस चीख पड़े।
हंसों की पंक्ति टूट गई थी। अचानक खून से लथपथ एक हंस गौतम के पाँवों के पास आ गिरा। हंस के शरीर में एक बाण लगा हुआ था। घायल हंस कष्ट से कराह रहा था। गौतम को लगा मानो हंस उनसे दया की भीख माँग रहा हो। हंस के कष्ट से गौतम को बहुत दुख हुआ। वे सोचने लगे-
”कुछ देर पहले यह हंस कितना खुश था। अपने साथियों के साथ गीत गाता, आकाश में उड़ रहा था। एक बाण ने इसे इसके साथियों से अलग कर दिया। यह अन्याय किसने किया?“
गौतम ने बड़ी सावधानी से उसके शरीर से बाण बाहर निकाल दिया। उसके घाव को धोकर साफ किया। प्यार पाकर हंस ने गौतम की गोद में सिर छिपा लिया।
तभी बाग के दूसरी ओर से देवदत्त तेजी से दौड़ता हुआ आया। उसे आता देख, हंस डर से सिहर गया। गौतम के पास आकर देवदत्त ने तेज आवाज में कहा-
”सिद्धार्थ, यह हंस मेरा है। मैंने इसे बाण मारकर गिराया है।“
”नहीं देवदत्त, यह हंस मेरी शरण में आया है। यह हंस मेरा है।“ गौतम ने शांति से जवाब दिया।
”बेकार की बातें मत करो गौतम। मैंने इसका शिकार किया है। हंस मुझे दे दो।“ देवदत्त ने गुस्से से कहा।
”मैं यह हंस तुम्हें नहीं दूंगा देवदत्त। इसे मैंने बचाया है। इस हंस पर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं है।“ गौतम अपनी बात पर अटल थे।
गौतम और देवदत्त के बीच बहस छिड़ गई। दोनों ही अपनी बात पर अड़े थे। अंत में देवदत्त ने कहा-
”ठीक है, चलो महाराज के पास। वे ही हमारा न्याय करेंगे।“
दोनों बालक गौतम के पिता महाराज शुद्धोधन के पास पहुंचे। देवदत्त बहुत क्रोध में था, पर गौतम शांत थे।
देवदत्त ने महाराज से कहा-
”महाराज, मैंने आकाश में उड़ते इस हंस का शिकार किया है। इस हंस पर मेरा अधिकार है। मुझे मेरा हंस दिलाया जाए।“
महाराज ने गौतम से कहा-
”राजकुमार गौतम, तुम्हारा भाई ठीक कहता है। शिकार किए गए पक्षी पर शिकारी का हक होता है। देवदत्त का हंस उसे दे दो।“
”नहीं महाराज, मारने वाले से बचाने वाला ज्यादा बड़ा होता है। देवदत्त ने इस हंस के प्राण लेने चाहे, पर मैंने इसकी जान बचाई है। अब आप ही बताइए, इस हंस पर किसका अधिकार होना चाहिए?“ गौतम ने कहा।
महाराज सोच में पड़ गए। उन्हें गौतम की बात ठीक लगी। प्राण लेने वाले से जीवन देने वाला, अधिक महान होता है। उन्होंने कहा- ”गौतम ठीक कहता है। इस हंस के प्राण गौतम ने बचाए हैं, इसलिए इस हंस पर गौतम का अधिकार है।“
क्रोधित होकर देवदत्त ने प्रश्न किया- ”अगर हंस मर जाता तो क्या आप यह हंस मुझे दे देते, महाराज?“
”हाँ, तब यह हंस तुम्हारा शिकार होता और तुम्हें तुम्हारा हंस जरूर दिया जाता।“ बड़ी शांति से महाराज ने समझाया।
गौतम ने प्यार से हंस को सीने से चिपटा लिया। हंस ने खुश होकर चैन की साँस ली। महाराज ने हंस की प्रसन्नता देखी। अचानक उनके मुंह से निकला-भक्षक से रक्षक बड़ा है। अर्थात् मारकर खाने वाले से रक्षा करने वाला महान है।
बाद में राजकुमार गौतम ही महात्मा गौतम बुद्ध ने सब प्राणियों को प्यार करने की सीख दी। विश्व को अहिंसा और शांति का संदेश दिया। गौतम बुद्ध को लोग आदर से भगवान बुद्ध भी कहते हैं। वे सचमुच महान थे।
Subscribe to:
Posts (Atom)
