प्यारी गिलहरी

ख् तुम जानते होगे कि संसार के सारे देशों में गिलहरियाँ हैं, जो पेड़ों पर दौड़ती हैं और फल-बीज चुनकर खाती हैं। बड़ी सुंदर लगती हैं न। केवल भारत की गिलहरियों की पीठ पर तीन धारियाँ मिलती हैं। ऐसा क्यों? इसके पीछे बड़ी ही रोचक कहानी है। आओ, हम यह कहानी पढ़ें।,




यह कहानी बहुत पुरानी है। उन दिनों लंका में रावण नाम का राजा राज्य करता था। लंका और भारत के बीच में एक गहरा सागर है। अयोध्या के राजा दशरथ के बड़े पुत्र श्री रामचंद्र पिता की आज्ञा से जंगल में वास कर रहे थे। उनके साथ उनका छोटा भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता भी थे।

एक दिन रावण धोखे से सीता जी को अपने साथ लंका ले गया। सीता ने रावण के महल में रहना स्वीकार नहीं किया। वे अशोक वाटिका में पेड़ों की छाया में रहतीं और श्री रामचंद्र का नाम जपती थीं।

सीता को रावण से छुड़ाने के लिए लंका जाना जरूरी था। सागर पर पुल बनाए बिना लंका नहीं पहुंचा जा सकता था। सब सोच में पड़ गए, सागर को कैसे पार किया जाए? लक्ष्मण ने श्रीराम से कहा-

”भ्राताश्री, अगर आप चाहें तो एक बाण चलाकर करोड़ों सागरों का पानी सुखा सकते हैं। आप किस सोच में हैं?“

”नहीं भाई, हम पहले सागर से प्रार्थना करेंगे। हो सकता है सागर राज हमें पार जाने का कोई उपाय बताए। बिना कारण किसी पर अन्याय करना ठीक बात नहीं होती।“ श्री राम ने उत्तर दिया।

प्रार्थना करने पर भी सागर राज नहीं माना। तब श्री रामचंद्र ने अपना धनुष-बाण उठाया। यह देखकर सागर राज डर गया। वह जानता था श्री राम के बाण से सागर का पानी सूख जाएगा। सागर राज ने श्री राम से कहा-

”हे भगवान! आपकी सेना में नल और नील नाम के दो वानर भाई हैं। उन्हें वरदान मिला है कि वे जिस पत्थर को छूएँगे वह सागर पर तैरता रहेगा। बड़े-बड़े पत्थर भी पानी में डालेंगे तो भी वे नहीं डूबेंगे। आप उनकी मदद से सागर पर पुल बनवाइए। इस तरह मेरा भी सम्मान बना रहेगा।“

बस फिर क्या था। नल और नील के साथ सारी वानर सेना सागर में बड़ी-बड़ी शिलाएँ डालने लगी। पत्थर पानी में तैरने लगे। धीरे-धीरे समुद्र पर पुल बनने लगा।

उसी जगह एक पेड़ पर एक छोटी-सी गिलहरी रहती थी। गिलहरी बहुत चंचल थी। एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर फुदकती रहती। कभी वह फल कुतरकर खाती, कभी रेत में लोटती, कभी समुद्र के पानी में नहाती।

गिलहरी ने देखा कि सारे वानर पत्थर उठा-उठाकर समुद्र में डाल रहे हैं। एक वानर को रोक कर गिलहरी ने पूछा-

”वानर भइया, आप लोग किनारे से पत्थर उठाकर पानी में क्यों डाल रहे हैं? सागर मामा का पानी गंदा होगा तो वे नाराज होंगे।“

”नहीं पगली, हम समुद्र का पानी गंदा नहीं कर रहे हैं। हम लोग तो सागर पर पुल बना रहे हैं।“ वानर ने कहा।

”आप पुल क्यों बना रहे हैं एभइया?“ गिलहरी ने पूछा।

”देख गिलहरी, समुद्र के उस पार लंका देश है। लंका में सीता जी कैद हैं। उन्हें छुड़ाने के लिए सागर पर करना होगा। इसीलिए हम पुल बना रहे हैं।"
" हम भी आपके काम में मदद करेंगे।“ गिलहरी बोली।

”अरे रहने दे। तू इतनी छोटी-सी है, पत्थर के नीचे दबकर ख़त्म हो जाएगी। यह काम हमें ही करने दे।“ वानर हॅंस पड़ा।

”छोटे हैं तो क्या हुआ? छोटे भी तो बड़ों की मदद कर सकते हैं। एक-एक बूंद से सागर बन सकता है, तो पुल बनाने में हम आपकी मदद क्यों नहीं कर सकते?“ गिलहरी ने कहा।

नन्ही गिलहरी ने वानर के जवाब का इंतजार नहीं किया। उछलती हुई, तेजी-से जाकर सागर के पानी में डुबकी लगा आई। उसका सारा बदन गीला हो गया था। भीगे शरीर के साथ गिलहरी रेत में लोट लगाने लगी। उसके शरीर पर रेत-कण चिपक गए। फुदकती हुई गिलहरी फिर समुद्र में गई और पानी में अपनी रेत झाड़ आई।

गिलहरी बार-बार ऐसा ही करती रही। श्री रामचंद्र गिलहरी के मन की बात समझ गए। अपने शरीर के रेत-कण समुद्र के पानी में झाड़कर, गिलहरी पुल बनाने में मदद कर रही थी।

सागर पर पुल बनकर तैयार हो गया। सारे वानर खुशियाँ मना रहे थे। गिलहरी भी रेत में लोटकर उनकी खुशी में शामिल हो गई। कुछ देर पहले वह सागर में नहाकर लौटी थी। उसके शरीर पर रेत के कण चिपके हुए थे। श्रीरामचंद्र ने स्नेह से गिलहरी को उठा लिया-

”तू छोटी ज़रूर है, पर तूने एक बड़े काम को पूरा करने में मदद की है, नन्ही गिलहरी। तुझे हमेशा याद रखा जाएगा।“

रामचंद्र जी ने प्यार से गिलहरी की पीठ सहलाई। उनकी उंगलियों से गिलहरी की पीठ पर लगी रेत, तीन जगह से झड़कर गिर गई। उसकी पीठ पर तीन धारियाँ-सी बन गई। तब से गिलहरी के शरीर पर तीन धारियाँ बनी दिखाई देती हैं।

गिलहरी के शरीर की ये धारियाँ मर्यादा पुरूषोत्तम श्री रामचंद्र के प्यार की निशानी हैं। श्री रामचंद्र ने छोटे-बड़े, उच्च-नीच सबको अपना प्यार दिया। हमें भी किसी को छोटा नहीं समझना चाहिए। सबको अपना प्यार देना चाहिए। छोटे प्राणी भी महान कार्य करने में मदद कर सकते हैं। एक नन्ही-सी गिलहरी ने सागर पर पुल बनाने में मदद करके यह सच साबित कर दिया है।

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