झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई

तुम लोगों ने रानी लक्ष्मीबाई का नाम सुना होगा। वे झाँसी की रानी थीं। उन्होंने भारत पर शासन कर रहे अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध किया था।


वे बचपन से ही वीर थीं। वे और बालिकाओं की तरह गुड्डे-गुड़िया का खेल नहीं खेलती थीं, बल्कि युद्ध के खेल खेलती थीं। तलवार, कटार ही उनके खिलौने थे।

आओ, हम उनके बचपन की कहानी पढ़े।,



कक्षा में बच्चे कविता-पाठ कर रहे थे-

”चमक उठी सन् सत्तावन में,

वह तलवार पुरानी थी।

बुंदेले हरबोलों के मुंह,

हमने सुनी कहानी थी।

खूब लड़ी मर्दानी वह तो,

झाँसी वाली रानी थी।“

कविता दोहराती नेहा, अचानक चुप हो गई। अध्यापिका की नजर नेहा पर पड़ी, वह न जाने क्या सोच रही थी। उन्होंने प्यार से पूछा-

”क्या बात है नेहा, कविता पाठ करते हुए तुम चुप क्यों हो गई?“

”गुरू जी, मैं सोच रही थी, लक्ष्मीबाई तो स्त्री थीं। उन्होंने अंग्रेजो से लड़ाई कैसे की होगी?“

”हाँ नेहा, लक्ष्मीबाई स्त्री जरूर थीं, पर कमजोर स्त्री नहीं। वीरता में पुरूषों से कहीं कम नहीं थीं। भारत की आज़ादी के लिए, घोड़े की पीठ पर बैठकर, उन्होंने दोनों हाथों से तलवार चलाई थी। कितने ही अंग्रेजों को तलवार से मार गिराया।“

”गुरू जी, क्या वह बचपन से ही इतनी वीर थीं?“ नेहा ने दूसरा सवाल किया।

”हाँ नेहा, लक्ष्मीबाई साधारण लड़की नहीं थीं। चलो बच्चों, आज मैं तुम्हें लक्ष्मीबाई की कहानी सुनाती हूँ।“

”जी गुरू जी, हमें उनके बचपन की बातें सुनाइए।“ बच्चे कहानी सुनने को उत्सुक थे।

”प्यारे बच्चों, लक्ष्मीबाई के बचपन का नाम मनुकर्णिका था, पर सब प्यार से उसे मनु पुकारते थे।“

”गुरू जी, उनके पिता का क्या नाम था?“ रोहित ने पूछा।

”मनु के पिता का नाम मोरोपंत तांबे था। मनु उनकी अकेली संतान थी। पिता ने बेटी को बेटे की तरह पाला। मनु के मुंहबोले भाई का नाम ‘नाना’ था। नाना प्यार से मनु को ‘छबीली’ पुकारते। मनु का बचपन नाना के साथ बीता। वे वीर सैनिकों के कपडे़ पहनतीं, नाना के साथ खेलतीं और पढ़तीं। उन्हें लड़कियों वाले खेल पसंद नहीं थे।“

”गुरू जी, उन्हें कौन-से खेल पसंद थे?“ नेहा जानने को उत्सुक थी।

”बचपन से ही लक्ष्मीबाई लड़कों की तरह बरछी और ढाल लेकर नकली युद्ध करतीं। घोड़े पर सवारी करतीं और कटार और कृपाण ही उनकी सहेली थीं।“

”गुरू जी, देखिए इस कविता में भी यही बात लिखी है।“ रोहित ने किताब खोलकर कविता पढ़ी-

”बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी, उसकी यही सहेली थीं।“

”हाँ रोहित, उन्हें लड़कियों की तरह चूड़ियाँ पहनने या मेंहदी लगवाने का शौक नहीं था।“

”तब तो वे गुड़िया की शादी भी नहीं रचाती होंगी।“ नेहा ने ज्ञान बघारा।

”हाँ नेहा, वे तो लड़ाई के खेल खेलतीं। दुश्मनों को झूठे घेरे में डालकर, उन्हें हरातीं। उनके पास गुड़िया से खेलने का समय ही कहाँ था?“

”तब तो वे राजा-रानी या परियों की कहानी भी नहीं सुनती होंगी।“ रोहित गंभीर था।

”हाँ रोहित, मनु को तो वीरों की कहानियाँ सुनने में आनंद आता। शिवाजी जैसे वीरों की कहानियाँ उन्हें मुंहज़बानी याद थीं। मनु की वीरता देखकर लोगों को लगता मानो मनु के रूप में स्वयं दुर्गा ने जन्म लिया है।“

”वे बचपन से युद्ध का अभ्यास करती रहीं, इसीलिए तो अंग्रेजों से लड़ सकीं।“ एक लड़की ने कहा।

”ठीक कहती हो। वे युद्ध के नकली चक्रव्यूह यानी शत्रु को घेरने के लिए घेराबंदी करतीं। फिर उस घेरे में तलवार लेकर घुस जातीं। शत्रुओं को तलवार से मार गिरातीं। कभी-कभी झूठे शिकार का खेल खेलतीं। कभी शत्रु के किले के फाटक तोड़कर शत्रु को हरातीं।“

”क्या वे सचमुच किले का फाटक तोड़ती थीं, गुरू जी?“ नेहा विस्मित थी।

”अरे बुद्धू, सुना नहीं, गुरू जी ने कहा कि वे ये सब खेल खेलती थीं।“ रोहित ने नेहा को चिढ़ाया।

”हाँ नेहा, देखो तुम्हारी कविता में भी यही बात लिखी है न-“

”नकली युद्ध, व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,

सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना, ये थे उसके प्रिय खिलवाड़।“ अध्यापिका ने पंक्तियाँ पढ़कर सुनाई।

”एक बात और है, वे अपने कुल की देवी की सच्चे मन से पूजा करतीं। उन्हें अपनी कुलदेवी की शक्ति में बहुत विश्वास था।“

”गुरू जी, क्या लक्ष्मीबाई का विवाह हुआ था?“ नेहा ने प्रश्न पूछा।

”हाँ नेहा, लक्ष्मीबाई का विवाह झाँसी के राजा गंगाधर राव से हुआ था। विवाह के बाद मनुकर्णिका का नाम रानी लक्ष्मीबाई रखा गया। विवाह के समय झाँसी में खूब खुशियाँ मनाई गई। झाँसीवासी लक्ष्मीबाई को पाकर बहुत खुश थे।“

”क्या विवाह के बाद भी लक्ष्मीबाई युद्ध के खेल खेलती थीं, गुरू जी?“ रोहित भी जानने को उत्सुक था।

”हाँ रोहित, लक्ष्मीबाई ने राजमहल में स्त्रियों की एक सेना बनाई। उन्हें अपनी तरह बरछी, भाला, तलवार, कटार चलाने की शिक्षा दी। युद्ध में लड़ने के तरीके सिखाए।“

”वाह! यह तो बड़ी अच्छी बात थी। उन्होंने दिखा दिया कि स्त्रियाँ भी युद्ध कर सकती हैं।“ नेहा खुश थी।

”हाँ नेहा! पर झाँसी वालों की खुशी ज्यादा दिन टिक न सकी। कुछ समय बाद राजा की मृत्यु हो गई। सारे राज्य में शोक छा गया।

राजा की मृत्यु से अंगे्रजों को मौका मिल गया। अंग्रेज सेना ने झाँसी पर आक्रमण कर दिया। पुरूषों के कपड़े पहन, रानी लक्ष्मीबाई घोड़े पर सवार होकर युद्ध भूमि में पहुंच गई। रानी के दोनों हाथों में तलवार थी। वे अंग्रेजों की सेना को काटती-गिराती आगे बढ़ती गई। उनकी सहेलियों ने भी अंग्रेजों की सेना में खूब मारकाट मचाई थी। अंग्रेजी सेना की संख्या बहुत अधिक थी। अंत में रानी को घेर लिया गया।“

”हाँ गुरू जी, कविता में यही लिखा है“-रोहित ने जल्दी से कविता की पंक्तियाँ पढ़ीं-

”घोड़ा अड़ा नया घोड़ा था, इतने में आ गए सवार,

रानी एक शत्रु, बहुतेरे होने लगे वार पर वार,

घायल होकर गिरी सिंहनी,

उसे वीरगति पानी थी।“

”हाँ रोहित, अंत समय तक रानी ने हार नहीं मानी। अपनी झाँसी की रक्षा करते हुए रानी लक्ष्मीबाई ने प्राण त्याग दिए। भारत के इतिहास में रानी लक्ष्मीबाई का नाम सुनहरे अक्षरों में लिखा गया। उन्होंने हमें आजादी का महत्व सिखाया है, बच्चों।“

बच्चों ने कविता की अंतिम पंक्तियाँ आदर के साथ दोहराई।

”दिखा गई पथ, सिखा गई।
 हमको जो सीख सिखानी थी,
 खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झाँसी वाली रानी थी।“

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