स्वामी विवेकानंद

स्वामी विवेकानंद का नाम तो तुमने सुना ही होगा। वे महान दार्शनिक और समाज सेवी थे।


बचपन में उनका नाम नरेंद्र था। नरेंद्र पशु-पक्षियों से प्यार करते थे। जरूरतमंद लोगों की मदद करते थे। हनुमान जी की कहानी सुनकर उन्होंने सोचा कि वे भी ताकतवर बनेंगे। वे जानते थे कि जब तक लोग ताकतवर नहीं होंगे तब तक दूसरों की सेवा नहीं कर सकेंगे। आओ पढ़ें कि वे जरूरतमंद लोगों की मदद कैसे करते थे।,



”ठहर तो, अभी तुझे मजा चखाता हूँ।“ बालक नरेंद्र अपने पालतू खरगोश के पीछे दौड़ रहा था। खरगोश भागकर नरेंद्र की माँ भुवनेश्वरी की गोद में छिप गया।

”अच्छा तो तू मेरी माँ की गोद में छिपा बैठा है। मेरे खरगोश को अपनी गोद से उतार दो माँ। मैं इसके साथ खेलूंगा।“

भुवनेश्वरी हॅंस पड़ीं। खरगोश को गोदी से उतार उन्होंने बेटे का माथा चूम लिया। नरेंद्र को पशु-पक्षियों से बहुत प्यार था। नरेंद्र के पिता विश्वनाथ दत्त कलकत्ता शहर के मशहूर वकील थे। नरेंद्र माता-पिता की आँखों का तारा था। बेटे की रूचि जानकर पिता ने नरेंद्र के लिए तरह-तरह के पशु-पक्षी मॅंगा रखे थे। नरेंद्र उन्हें दाना खिलाता, उनके साथ खेलता।

नरेंद्र की माँ रोज भगवान की पूजा करतीं। नरेंद्र भी माँ के साथ पूजा में बैठता। उसका गला बहुत मीठा था। माँ जब भजन गातीं तो नरेंद्र भी अपनी मीठी आवाज में माँ के साथ गाता। नरेंद्र की माँ उन्हें रामायण की कहानियाँ सुनातीं, दुर्गा माँ का पाठ करतीं। नरेंद्र को हनुमान जी का शक्तिशाली रूप बहुत अच्छा लगता। माँ ने उन्हें बताया था कि लंका युद्ध में जब लक्ष्मण जी के शक्ति. बाण लगा था तब वे मूर्छित हो गए। उन्हें बचाने के लिए संजीवनी बूटी चाहिए थी। संजीवनी बूटी एक पहाड़ पर उगती थी। हनुमान जी संजीवनी बूटी को नहीं पहचानते थे, इसलिए वह पूरे पर्वत को कंधे पर उठा लाए। नरेंद्र माँ से पूछा करते-

”माँ, क्या मैं भी हनुमान जी की तरह शक्तिशाली बन सकता हूँ?“

”क्यों नहीं, पर इसके लिए पौष्टिक भोजन और व्यायाम जरूरी है।“ माँ बालक को बहलातीं। वे कहते थे कि ताकतवर आदमी ही दूसरों की, देश की सेवा कर सकता है इसलिए ताकतवर बनने के लिए नरेंद्र रोज अखाड़े में जाकर व्यायाम करता, कुश्ती लड़ता। कुश्ती में नरेंद्र अपने साथियों को पछाड़ देता। शरीर से शक्तिशाली होने पर भी नरेंद्र का मन बहुत कोमल था। वह अपने मित्रों को सच्चे मन से प्यार करता। गरीबों पर दया करता। वह किसी को दुःखी नहीं देख सकता था। नरेंद्र की बुद्धि भी बहुत तीव्र थी। वह हमेशा प्रथम आता।

बंगाल में दुर्गापूजा का त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। पूजा पास आ रही थी। कलकत्ता में जगह-जगह पूजा-पंडाल सजाए जा रहे थे। माँ दुर्गा की प्रतिमा बनाई जा रही थीं। भजन-कीर्तन के कार्यक्रम चल रहे थे। एक दिन नरेंद्र अपने मित्र रवि के साथ मुहल्ले के पूजा के पंडाल में घूम रहा था। चारों ओर खुशी का वातावरण था। चनाजोर, मूंगफली, गुब्बारे बिक रहे थे। नरेंद्र ने रवि से कहा-

”सुना है कल बहुत अच्छी भजन. मंडली, आ रही है। हम दोनों भी रात भर भजन सुनेंगे।“

”नहीं नरेंद्र, कल मैं नहीं आ सकूंगा।“ रवि का चेहरा उदास था।

”क्या बात है रवि, तू क्यों नहीं आएगा? तेरा चेहरा इतना उदास क्यों है, दोस्त?“

”नरेंद्र, तू तो जानता है कि मेरे पिता जी नहीं हैं। कल मेरी गलती से माँ की आधी साड़ी जल गई। उसके पास दूसरी साड़ी नहीं है। जली हुई धोती पहनकर माँ पूजा में कैसे आएगी। इसीलिए कल मैं नहीं आऊंगा।“

”अरे बस इतनी-सी बात पर तू उदास हो गया। तू यहीं ठहर, मैं अभी आया।“

रवि को वहीं खड़ा छोड़कर नरेंद्र अपने घर चला गया। थोड़ी देर बाद जब वह वापस आया तो उसके हाथ में एक नई साड़ी का पैकेट था।

”अरे तू यह क्या लाया है?“ रवि आश्चर्य में था।

”चल तेरे घर चलते हैं। मौसी के लिए नई धोती लाया हूँ।“

”नहीं नरेंद्र, माँ नाराज होंगी।“

”क्यों, क्या तेरी माँ मेरी मौसी माँ नहीं हैं? क्या मुझे तू भाई की तरह प्यार नहीं करता? डर मत, चल। मौसी माँ को प्रणाम कर आऊं।“

रवि के घर पहुंच, नरेंद्र ने रवि की माँ के पाँव छूकर कहा-

मौसी, मेरी माँ ने यह साड़ी भेजी है। कहा है कि कल पूजा के लिए यही साड़ी पहनकर आना।

रवि की माँ की आँखों में आँसू आ गए। नरेंद्र को ढेर सारे आशीर्वाद दे डाले। नरेंद्र हॅंस पड़ा।

”वाह मौसी, एक साड़ी पहुंचाने भर के लिए इतने आशीर्वाद?“

”हाँ बेटा, भगवान तुझ-सा बेटा हर माँ को दे। देखना एक दिन तेरा नाम सारी दुनिया में फैलेगा।“

”नहीं मौसी, माँ से पूछना उसे कितना परेशान करता हूँ।“

”जिसके दिल में दुखियों के लिए इतनी दया हो, वह जरूर महान व्यक्ति बनेगा। मेरी बात याद रखना।“

शाम को पूजा का पंडाल रोशनी से जगमगा रहा था। लोगों की भीड़ देवी के दर्शन के लिए उमड़ी आ रही थी। भजन-कीर्तन करने वाले अपने साज तैयार कर रहे थे। रवि और नरेंद्र भी उनके पास जाकर बैठ गए। नरेंद्र की संगीत में बहुत रूचि थी। रवि ने नरेंद्र से कहा-

”नरेंद्र तेरी आवाज कितनी मीठी है। जब तू गाता है तो जी चाहता है, तेरा भजन कभी समाप्त न हो। आज तू भी अपना भजन गाना।“

”नहीं रवि, यहाँ बहुत प्रसिद्ध भजनीक आते हैं। मैं उनके सामने कैसे गा सकता हूँ?“

भजन का कार्यक्रम शुरू हो गया। भजनीक के साथ नरेंद्र भी अपनी मीठी आवाज में गीत गा रहा था। नरेंद्र के पिता ने कहा-

”बेटा, तेरा गला इतना सुरीला है। एक भजन तू अकेले गा। देवी माँ तूझे आशीर्वाद देंगी।“

नरेंद्र के गीत पर लोग झूम उठे। कीर्तन मंडली वालों ने भी नरेंद्र की पीठ ठोंकी। एक दिन नरेंद्र को स्वामी रामकृष्ण परमहंस के सामने भी गीत गाने का मौका मिला। स्वामी रामकृष्ण परमहंस एक महान संत थे। नरेंद्र का गीत सुनकर वह प्रसन्न हो उठे। उन्होंने नरेंद्र से कहा-

”तुम लोगों की भलाई करने के लिए इस संसार में आए हो। तुम साधारण मनुष्य नहीं हो।“

नरेंद्र ने स्वामी जी से पूछा-

”क्या आपने भगवान को देखा है, स्वामी जी?“

”हाँ, मैंने भगवान को वैसे ही देखा है, जैसे तुझे देख रहा हूँ।“ हॅंसकर परमहंस जी ने जवाब दिया।

स्वामी रामकृष्ण परमहंस का नरेंद्र पर बहुत प्रभाव पड़ा। वह उनका शिष्य बन गया। नरेंद्र का नाम विवेकानंद रखा गया। उन्होंने कई वर्षो तक उनसे ज्ञान प्राप्त किया। स्वामी विवेकानंद ने लोगों को हिंदू धर्म का सच्चा अर्थ समझाया। उन्हें बताया कि मानव सेवा ही ईश्वर की सच्ची भक्ति है। अमेरिका के शिकागो नगर में उन्होंने एक भाषण दिया। उनके भाषण से कई विदेशी भी उनके भक्त बन गए। उन्होंने अपने गुरू रामकृष्ण परमहंस के नाम पर रामकृष्ण मठ की स्थापना की। यह मठ गरीबों और जरूरतमंदों की सेवा करता है। स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि मानव की सेवा ही वास्तव में ईश्वर की सेवा है। स्वामी विवेकानंद ने लोगों की भलाई और सेवा में अपना पूरा जीवन बिताया।

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