अधिकार

नई अध्यापिका के कक्षा में पहॅुुचते ही शांति छा गई। सुस्मिता सेन ने उपस्थिति रजिस्टर खोल, बच्चों के नाम पुकारने शुरू किए। अपने-अपने नामों पर बच्चे 'उपस्थित मैडम' कहते जा रहे थे। राजा का नाम पुकारते ही कक्षा में खलबली सी मच गई। एक उदंड दबंग से लड़के ने आवाज कसी।

'उसका नाम राजा है, पर वह स्वीपर का बेटा है एमैडम। है न मजेदार बात।' उसकी बात पर कक्षा के लड़कों को जैसे जी खोल, हंसने का बहाना मिल गया।

रजिस्टर से दृष्टि उठा सुस्मिता ने जिधर से एक धीमी आवाज में 'उपस्थित' का शब्द आया था उधर निगाह डाली। मामूली कपड़ों में सिर मे तेल लगाकर संवारे गए बालों वाला लड़का, साथियों की खिलखिलाहट पर सहम सा गया था।

स्वीपर का लड़का क्या राजा नहीं हो सकता? ईमानदारी से किया जाने वाला हर काम इज्ज़त का होता है, सुधीर।'

'जी................जी............, पर स्वीपर को क्या कोई और नाम नहीं मिला?'

'एक बात जान लो बच्चों। तुम सब एक प्रजातंत्र देश में रहते हो। यहाँ हर इंसान को अपने तरीके से जीने का अधिकार है। मैं चाहती हूँ, तुम सब मिलकर रहो। इस तरह की बातें अच्छे बच्चे नहीं करते।'

सुस्मिता सेन को लगा उनकी बातें सुनकर राजा की आँखों में खुशी की चमक झलक आई।

बच्चों का परिचय ले, सुस्मिता सेन ने अपना परिचय दिया था।

'मैं तुम्हारी क्लास-टीचर हूँ और तुम्हें गणित और अंग्रेजी पढ़ाया करूँगी। तुममें से किस-किस को ये विषय अच्छे लगते हैं।'

आधे से कम बच्चों ने हाथ ऊपर किए थे। राजा ने भी जैसे डरते-डरते हाथ उठाया था।

'राजा, पिछली कक्षा में तुम्हें इन विषयों कितने अंक मिले थे?'

'जब टीचर ने कापी दिखाई तब तो सौ में से सौ अंक मिले थे, पर रिज़्ल्ट कार्ड में बस पचहत्तर ही अंक थे।'

'यह झूठ बोलता हैए मैडम। असल में टीचर के घर इसकी माँ खाना बनाने का काम करती है इसीलिए उन्होंने इसे पूरे-पूरे नम्बर दे दिए। मेरी रिपोर्ट पर प्रिन्सिपल ने कापी की जाँच की तो इसके नम्बर काट दिए गए। क्यों दोस्तों, यह सच है न?'

सगर्व सुधीर ने साथियों पर दृष्टि डाली थी।

'जी मैडम, सुधीर सच कहता है।' रोहित ने सुधीर की बात का समर्थन किया ।

'यह सच नहीं है, मैडम। हमने सारे सवाल सही किये थे............।' राजा का चेहरा उदास था।

'ठीक है अब मैं देखूँगी किसको कितने नम्बर मिलते हैं। तो आज मैं तुम्हें एक बहादुर लड़के नेल्सन की कहानी पढ़ाती हूँ।'

सुस्मिता ने नोटिस किया राजा पूरी तन्मयता और एकाग्रता के साथ पाठ पढ़ रहा था। नेल्सन की पितृ-भक्ति पर वह गर्वित था। सुधीर के मित्रों को जबरन पुस्तक पर ध्यान देना पड़ रहा था क्योंकि बार-बार उनकी दृष्टि अपनी कलाइयों पर बंधी घड़ियों पर जा रही थी, कभी बाहर उड़ती चिड़ियाँ उनका ध्यान खींच लेती।

खाने की छुट्टी की घंटा बजते ही बच्चे बाहर भाग गए। राजा को अपने स्थान पर बैठा देख, सुस्मिता उसके पास चली गई।

'तुम खाना नहीं खाओगे?'

'हम घर से खाकर आए है, टीचर जी।'

'घर से तो तुम बहुत सुबह आए थे।'

'हमें दो वक्त खाने की आदत है, टीचर जी।'

गम्भीरता से बात कह, राजा ने पढ़ने के लिए एक किताब निकाल ली।

दस-ग्यारह वर्ष के राजा की उस गम्भीरता ने सुस्मिता को द्रवित कर दिया। परिस्थितियों ने बच्चे को प्रौढ़ों वाली गम्भीरता दे दी थी।

कक्षा में पूछे जाने वाले हर प्रश्न के उत्तर में राजा का हाथ जरूर उठता। उसके उत्तर हमेशा ठीक होते, पर उत्तर देते वक्त वह जैसे डरा सा रहता। सुस्मिता उसके उत्तरों की जब प्रशंसा करती तो उसका चेहरा चमक उठता। सुस्मिता की प्रशंसा पर सुधीर का चेहरा उतर जाता। राजा के प्रति सुधीर की ईष्र्या का कारण सुस्मिता सेन को जल्दी ही ज्ञात हो गया। सुधीर के पिता शहर की नामी हस्तियों में होने के साथ ही स्कूल के चेयरमैन थे। स्कूल के सभी अध्यापक. अध्यापिकाएं सुधीर को प्रसन्न रखने की प्राणपण चेष्टा करते। बिना पढ़े प्रथम आना एसुधीर का अधिकार था। कुछ टीचर तो घर जाकर परीक्षा के प्रश्न-पत्र पहले ही सुधीर से हल करा लेते। दिव्या नारायण ने पिछली कक्षा में राजा को सर्वोच्च अंक देने का अपराध कर डाला, उसका दंड उसे भरना पड़ा था। चेयरमैन दहाड़ उठे थे।

'यह कैसी टीचर रख ली है आपने। हमारे टुकड़े तोड़ने वाला स्वीपर का बेटा प्रथम आएगा और हमारा बेटा गणित विषय में फ़ेल रहे? क्या इसीलिए हमने स्कूल चलाया हैं।'

दिव्या नारायण को लापरवाह करार दे, स्कूल की नौकरी से निकाल दिया गया। प्राइवेट स्कूलों की यही नियति सुस्मिता सेन को असह्य थी। उसके पिता ने हमेशा न्याय का साथ दिया, उनकी शिक्षा सुस्मिता के रक्त में बहती थी।

स्कूल की वार्षिक परीक्षाएं शुरू हो गई। प्रिन्सिपल ने सुस्मिता को अपने कक्षा में बुलाकर कहा था-

मिस सेन, आप स्कूल में नई आई हैं। सुधीर चंद्र चेयरमैन साहब का इकलौता बेटा है हमें उसका भविष्य संवारना है, उसका ख़ास ख्याल रखिएगा।

'जी सर, मैं अपना दायित्व अच्छी तरह समझती हूँ। बच्चा देश का भविष्य है।' दृढ़ता से अपनी बात कह सुस्मिता वापस लौट आई।

उसी शाम राजा का पिता रामलाल, सुस्मिता के घर आया। सुस्मिता विस्मित हो उठी, कहीं सुधीर ने जो कहा वही सच तो नहीं। रामलाल पुत्र को अधिक अंक देने की सिफ़ारिश तो नहीं लाया है, पर पिछले कुछ महीनों में वह इतना अवश्य जान गई थी राजा जैसे मेधावी लड़के के लिए किसी सिफ़ारिश की आवश्यकता नहीं थी। सुस्मिता के प्रोत्साहन और प्यार ने एक सहमे लड़के की जगह आत्मविश्वास से परिपूर्ण नए राजा को जन्म दिया था।

'कहो, रामलाल क्या बात है?' न चाहते हुए भी सुस्मिता सेन का स्वर रूखा हो उठा।

'राजा आपकी बहुत तारीफ करता है दीदी जी, इसीलिए एक विनती करने आया हूँ..........'

देखो रामलाल, मैं ईमानदारी में विश्वास रखती हूँ इसलिए कोई ग़लत काम नहीं कर सकती।

'पर हमारे लिए तो आपको ग़लत काम करना ही होगा, दीदी जी।'

'कभी नहीं। मैं ऐसा कोई काम नहीं करूँगी जिससे किसी का अहित हो।'

'दीदी जी, आपसे विनती है राजा को सब जवाब ठीक होने पर भी पूरे नम्बर मत दीजिएगा। हम जानते हैं अभागे को भगवान ने गरीब ज़रूर बनाया है, पर दिमाग देने में कोताही नहीं की है, उसकी तेज बुद्धि ही उसका दोष है, दीदी।'

'यह क्या कह रहे हो रामलाल।' अगर वह ठीक जवाब देता है तो पूरे नम्बर मिलना उसका अधिकार है। तुम्हारा बेटा सचमुच ज़हीन है।

'नहीं दीदी, यह गलती आप न करें, यही विनती लेकर आया था। पिछली परीक्षा में राजा को दिव्या दीदी ने पूरे नम्बर दिए तो वह खुशी से उछल पड़ा, पर उसके नम्बर काट दिए गए। दो दिन तक उसने खाना नहीं खाया। उसे समझा पाना कठिन हो गया था। हम नहीं चाहते राजा को फिर वही चोट सहनी पडे़।'

रामलाल की विनती पर सुस्मिता सेन स्तब्ध रह गई। अपने ही बेटे को कम अंक देने के पीछे रामलाल ने फिर अनुनय की थी-

'दीदी, आप नहीं जानतीं अगर राजा परीक्षा में अव्वल आता गया तो उसे स्कूल से निकाल दिया जाएगा। हमारी नौकरी चली जाएगी। हमारी मदद करें दीदी।'

'ठीक है रामलाल, मैं ऐसा काम नहीं करूँगी जिससे तुम्हारा या राजा का नुक्सान हो। अब तुम घर जाओ।'

'जी दीदी जी, प्रणाम।'

पूरी रात सुस्मिता सो नहीं सकी। आज़ादी के बासठ वर्षो के प्रजातंत्र का सच, उसे मॅंुह चिढ़ाता लग रहा था। रामलाल ने जो कहा उसकी सच्चाई वह समझ रही थी, पर एक अध्यापिका होते हुए भी वह अन्याय करें, क्या यह न्यायोचित हैं? नहीं, वह अन्याय नहीं होने देगी, अन्याय नहीं करेगी।

परीक्षा-परिणाम देख प्रिन्सिपल चैंक उठे। राजा का नाम प्रथम स्थान पर था। तुरन्त ही सुस्मिता सेन की बुलाहट हुई थी।

'यह क्या, इतना समझाने के बाद भी उस स्वीपर के बेटे को आपने प्रथम स्थान दिया है। इसका अंजाम जानती हैं?'

'एक अध्यापिका से ईमानदारी के अलावा आप और क्या अपेक्षा रखते हैं, महोदय?'

'इन बड़ी-बड़ी बातों को अपने पास रखिए। इनसे कुछ नहीं बनने वाला। चेयरमैन साहब, यह रिज़ल्ट नहीं सह सकते।'

'उन्हें यह सहना ही होगा, क्योंकि यह विद्यालय है, जहाँ हम बच्चों को सच्चाई और ईमानदारी की शिक्षा देते हैं। अन्याय के विरूद्ध आवाज उठाने की प्रेरणा देते हैं्। इस मंदिर में अन्याय नहीं किया जा सकता।'

'आप इस बात की गम्भीरता नहीं समझ रही है। आपकी नौकरी चली जाएगी।'

'किस अपराध के लिए मेरी नौकरी जाएगी?' क्षमा करें महोदय, विद्यालय के प्राचार्य रूप में आपका क्या यह कर्तव्य नहीं कि चेयरमैन साहब को समझाएं कि सुधीर को जबरदस्ती अधिक अंक दिलाकर वह उसका अहित कर रहे हैं। अपनी वैशाखी का सहारा दे, वह उसे अपंग बना रहे हैं।

उत्तेजना से सुस्मिता का चेहरा तमतमा आया।

'तो आप इस परिणाम में परिवर्तन नहीं करेंगी?'

'जी नहीं, मेरे परिणाम सौ प्रतिशत ठीक है।'

'बाद में मुझे दोष न दें।'

'अगर आपने न्याय का साथ नहीं दिया तब आपको अवश्य दोष दूँगी। नमस्ते।'

अपनी बात पूरी कर सुस्मिता सेन प्राचार्य के कक्ष से बाहर आ गई।

दूसरे दिन चेयरमैन ने उसे बुलवाया था। सुस्मिता से गम्भीर स्वर में कहा था-

'प्रिन्सिपल साहब ने बताया है आप रिज़ल्ट में परिवर्तन नहीं करेंगी।'

'जी हाँ, उन्होंने ठीक बताया है।'

'आप अपनी ज़िद के परिणाम जानती है?'

'सच की राह पर चलने वाले किसी भी परिणाम से नहीं डरते। मैं आपसे विनती करती हूँ, सुधीर को अपने पाँवों पर खड़ा होने दें। वह बुद्धिमान लड़का है, पर आपकी वैशाखी उसे लंगड़ा बना रही है?'

'यह क्या बकवास कर रही हो?' चेयरमैन क्रोधित हो उठे।

'मैं बिल्कुल ठीक कह रही हूँ। इस विद्यालय में सुधीर प्रथम आता रहेगा, पर इस विद्यालय के बाहर की दुनिया की प्रतिस्पद्र्धा का वह सामना कैसे कर पाएगा। अगर आप उसका हित चाहते हैं तो उसे सच्चाई का सामना करने दीजिए। एक बार चोट खाने से शायद वह स्वयं प्रथम आने का प्रयास करेगा। प्रतिस्पद्र्धा बच्चों को आगे बढ़ने को प्रेरित करती हैं उसे अपनी लड़ाई लड़ने दीजिए एचेयरमैन साहब।'

'अगर आपको नौकरी से निकाल दिया जाए, तब भी आप अपना निर्णय नहीं बदलेंगी?'

'मेरा निर्णय अटल है, क्योंकि यही न्यायेचित है। मैं राजा के साथ अन्याय नहीं होने दूँगी।'

'एक स्वीपर के बेटे के लिए इतनी हमदर्दी की क्या वजह है, मिस सेन?' चेयरमैन के प्रश्न में व्यंग्य था।

'मेरे लिए मेरी कक्षा के सारे बच्चे समान है। उन पर कोई लेबल नहीं लगा है। उनकी प्रतिभा, उनकी मेहनत का फल उन्हें मिलना ही चाहिए। मैं कहती हूँ आपके विद्यालय के लिए यह बहुत गौरव की बात होगी कि यहाँ काम करने वाले एक कर्मचारी का बच्चा अपनी मेहनत का फल प्राप्त कर सके।'

'धन्यवाद, मिस सेन। आपने मेरी आँखें खोल दीं। काश्, आपकी तरह किसी और ने मुझे समझाया होता। बताइए अपनी पिछली ग़लतियों का प्रायश्चित कैसे कर सकता हूँ?'

'मुझे शर्मिन्दा न करे, सर। अगर आप सचमुच प्रायश्चित करना चाहते हैं तो सुधीर को समझाइए वह राजा को स्वीपर का बेटा न कहकर, उसके साथ मित्रतापूर्ण व्यवहार करे। सुधीर के भविष्य के लिए यह छोटी-छोटी बातें महत्वपूर्ण सिद्ध होंगी।'

'आप ठीक कहती हैं, मिस सेन, वस्तुतः यह ग़लती मेरी थी। अपने अहं में मैं यह भूल ही गया हमारे संविधान ने सबको समान अधिकार दिए हैं स्वीपर भी स्वतंत्र भारत का सम्मानित नागरिक है।'

'मैं आपकी बहुत आभारी हूँ, सर।'

'नहीं मिस सेन, आभार मुझे मानना चाहिए। मेरी ओर से राजा को प्रथम आने के लिए छात्रवृत्ति की घोषणा की जाएगी। उसे हर सुविधा इस विद्यालय से दी जाएगी।'

'धन्यवाद, सर।'

कक्षा में रिज़ल्ट कार्ड बांटती सुस्मिता ने प्रथम स्थान पर राजा का नाम जब पुकारा तो वह अपनी जगह पर ही बैठा रहा।

'क्या बात है राजा, अपना प्रथम आना तुम्हें अच्छा नहीं लगा?'

'नहीं मैडम, क्योंकि मैं जानता हूँ, कल मेरे अंक काटकर मुझे नीचा स्थान दे दिया जाएगा।' उदास राजा ने मन का सच बता दिया।

'अब ऐसा नहीं होगा, मेरे दोस्त। मैं अपनी गलती समझ गया हूँ। पिछली परीक्षा में भी तुम्हीं पहले नम्बर पर थे। मेरी वजह से तुम्हें नीचा देखना पड़ा। मुझे माफ़ कर दो, राजा।'

सुधीर का गला भर आया।

'क्या..............सच हम प्रथम आए है।' प्रसन्नता के आवेग से राजा बोल नहीं सका।

'हाँ राजा, तुम प्रथम आए हो। आज तुम्हें अपना अधिकार मिल गया।' खुशी से सुस्मिता सेन का चेहरा जगमगा रहा था।

'पर मैडम, देख लीजिएगा अगली परीक्षा में मैं राजा को अपनी मेहनत से ज़रूर हरा दूँगा। क्यों राजा, लगाता है शर्त?'

सुधीर के आगे बढ़े हाथ में राजा ने अपना हाथ दे दिया। दोनों के चेहरों पर खुशी की जगमगाहट थी।

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