खिलाड़ी


रोज की तरह उस दिन भी मुहल्ले के लड़के क्रिकेट खेलने के लिए जमा हुए थे। दीनू चैकीदार के ग्यारह वर्षीय पुत्र गोकुल के लिए यह समय सबसे अधिक प्रसन्नता का होता। घर के कामकाज जल्दी-जल्दी निबटा गोकुल, राजा भइया के साथ मैदान में पहॅुंच जाता। आठ वर्ष की आयु से गोकुल, राजा भइया के घर में माँ जी के कामों में हाथ बटाता आया है। इकलौता पुत्र होने के कारण घर में राजा का बहुत प्यार-दुलार होता। वह दुलार गोकुल के मन में कसक जगा जाता, काश उसकी भी माँ होती।
शराब पीकर दीनू, बिन माँ के बच्चे गोकुल को निर्दयता से पीटता। गोकुल के करूण विलाप से पसीजकर, राजा की माँ ने गोकुल को घर के कामकाज में मदद के लिए रख लिया था। सच तो यह है उस घर में आकर गोकुल ने सुख ही माना था। पेट भर रोटी, सोने के लिए स्थान मिल जाने में उसे अपना सौभाग्य दिखा था। दिन-रात खटने को उसने अपनी नियति स्वीकार किया था।
राजा की उम्र गोकुल से एकाध वर्ष अधिक रही होगी, पर अच्छे खानपान के कारण वह गोकुल से काफ़ी बड़ा लगता। राजा का हर आदेश पूरा करने में गोकुल को बहुत प्रसन्नता होती। राजा को बचपन से क्रिकेट खेलने का बहुत शौक था। तेरहवीं वर्षगांठ पर जब राजा को उसके पापा ने क्रिकेट-सेट का उपहार दिया तो राजा फूला न समाया।
बढ़िया क्रिकेट-सेट के कारण मुहल्ले के सभी लड़कों ने राजा को सहज ही टीम का कप्तान स्वीकार कर लिया। राजा की कृपा से दूर फेंकी गई बाँल उठाने के लिए गोकुल को भी टीम में रख लिया गया,पर बैटिंग का उसे कभी अवसर नहीं दिया जाता।
जब भी कोई खिलाड़ी चौआ या छक्का लगाता तो गोकुल की आँखें विस्मय से फैल जाती। लकड़ी के डंडे से वह रबर की गेंद को ज़ोर से मारता, पर बैट छू पाने का साहस कभी न कर सका। अक्सर छुट्टी के दिन राजा अकेले बैटिंग की प्रैक्टिस करता, उस समय गोकुल को बाँलिंग का चांस मिलता। चार वर्षो से बाँलिंग करते-करते गोकुल का हाथ काफी सध गया था। टीवी पर आने वाले क्रिकेट मैचों को वह पूरे ध्यान से देखता।
'राजा भइया स्पिनिंग क्या होती है?'
'अरे बुद्धू तू वो सब जानकर क्या करेगा? तू बाँल फेंक ले, उतना ही बहुत है।'
राजा से ठीक जवाब न मिलने पर गोकुल चुप रह जाता। कभी उसे लगता अगर वह भी पढ़ना-लिखना जानता तो राजा की तरह स्पिनिंग बाँलिंग का मतलब समझ पाता। कभी उसका जी चाहता राजा की तरह उसकी भी सुविधापूर्ण जिदगी होती, पर उन बातों के बारे में क्या सोचना, जो उसे मिल ही नहीं सकती।
एक दिन अपनी मम्मी-पापा के साथ राजा भी एक विवाह में शहर से बाहर गया था। राजा की अनुपस्थिति में उसके क्रिकेट बैट को गोकुल ललचाई निगाहों से देखता। बार-बार जी चाहता एक बार वह भी बैट उठाकर खेल पाता। गोकुल की तरह पास के दूसरे घरों में घर के काम करने वाले उस जैसे लड़कों में रामू, नरेन्दर, गनेशी भी थे। सबने मिलकर राजा के क्रिकेट-सेट को बड़े चाव से छू-छूकर देखा था। वैसे बैट और गेंद से खेलना, उनके भाग्य में कहाँ?
उस रोज जब मुहल्ले के लड़के क्रिकेट खेलने जमा हुए तो राजा के क्रिकेट-सेट के विकेट और बैट के बिना खेल जम नहीं पा रहा था। पिछले कई दिनों से राजा बाहर गया हुआ था। वाइस कैप्टन नवीन ने गोकुल को फुसलाया-
'ऐ गोकुल, राजा का बैट और गेंद क्या ताले में बंद है?'
'नहीं, भइया का कमरा खुला है। उनका सामान वहीं है।'
'तो एक काम कर, क्रिकेट का सामान उठा ला। तुझे टाँफी देंगे।'
'नहीं। भइया से बिना पूछे हम उनका सामान नहीं छू सकते।' दृढ़ स्वर में गोकुल ने 'न' कर दी।
'अगर तू सामान ले आया तो हम तुझे बैटिंग करने का चांस देंगे। नवीन ने गोकुल को लालच दिया था। वह गोकुल का बैटिंग के प्रति मोह जानता था।'
अगर राजा भइया को पता लग गया तो हमे मार पडे़गी। गोकुल शंकित था।
'अरे उसे कैसे पता चलेगा। हममे से कोई नहीं बताएगा। क्यों दोस्तो ठीक कह रहा हूँ न?'
'हाँ-हाँ, हम राजा को नहीं बताएंगे।' टीम के लड़कों ने वादा किया।
'अगर हम बैट और बाँल लाएंगे तो आप हमें बैटिंग करने देंगे न?' गोकुल विश्वास नहीं कर पा रहा था।
'ज़रूर, पर विकेट भी तो लाने होंगे।'
'जी, अभी लाया।' गोकुल तेजी से अन्दर दौड़ गया था। थोड़ी ही देर में हाथ में सामान लिये गोकुल मैदान में आ गया।
मैदान में हमेशा की तरह विकेट गाडे़ गए। आज का खेल, गोकुल के जीवन का एक नया अध्याय खोलने वाला था। आज उसकी जगह कोई और गेंद फेंकेगा और वह बल्ला घुमाएगा। उत्तेजना से गोकुल का चेहरा चमक रहा था।
'नवीन भइया, हम बैटिंग करें? उत्साहित गोकुल को समय काटना मुश्किल लग रहा था।'
'अरे थोड़ा रूक नहीं सकता? ऐसा लगता है जैसे तू ही सबसे बड़ा खिलाड़ी है। तुझे सबसे आखिर में चांस मिलेगा समझा।'
'अपनी किस्मत सराह, हमारे साथ खेलने का मौका मिल रहा है, वर्ना क्या हमारे साथ खेलने की तेरी औक़ात है?' चेहरे पर घृणा के भाव दर्शाता विनोद, काफ़ी सीमा तक क्रूर हो उठा।'
'जी भइया जी।' गोकुल का चेहरा उतर गया। इसका मतलब अगर कोई आउट नहीं तो उसे बैटिंग का चांस ही नहीं मिलेगा।
'गोकुल जब तक तेरी बैटिंग का चांस नहीं आता, तू गेंद दूर जाने पर पकडे़गा।' नवीन ने आदेश दे दिए।
दिन समाप्त होने वाला था और अभी तक पाँच खिलाड़ी ही आउट हो सके थे। दिन भर दौड़ते गोकुल का चेहरा लाल हो उठा था। बैटिंग वाली टीम के खिलाड़ी आराम से पेड़ के नीचे बैठे मैच का आनंद ले रहे थे, पर गोकुल तो उनकी दया का पात्र था, क्रिकेट का खिलाड़ी नहीं।
अचानक नवीन ने ज़ोर से छक्का मारा और न जाने कैसे बैट दो टुकड़ों में टूट गया। अपनी बहादुरी पर नवीन ठठाकर हॅंस पड़ा। लड़कों ने खुशी में तालियाँ बजाई, पर उस टूटे बैट ने गोकुल के सारे सपने तोड़ दिए। अब बैटिंग कर सकने का सपना बस सपना ही रह जाएगा।
कुछ ही पलों में कठोर वास्तविकता अपने सही रूप में स्पष्ट हो गयी। राजा भइया को सारी सच्चाई पता लग जाएगी। उनकी सख्त हिदायत है, बिना उनसे पूछे, उनकी किसी चीज़ को गोकुल हाथ न लगाए। एक बार बिना पूछे गोकुल ने उनकी गुलेल उठाकर निशाना लगा लिया था राजा ने गोकुल की जमकर पिटाई की थी। क्रिकेट का बैट तो उन्हें बहुत प्रिय है। अब गोकुल की ख़ैर नहीं।
गोकुल ने अपना डर नवीन पर प्रकट किया-
'नवीन भइया यह बैट आपने तोड़ दिया, राजा भइया हमें मारेंगे।'
'तो पिट लेना। हमने जानकर तो बैट नहीं तोड़ा। बड़ी आसानी से नवीन ने जवाब दे दिया।'
'ग़लती तेरी ही है, हमने ज़बरदस्ती तेरा हाथ थोड़ी पकड़ा था, तू क्यों लाया?' विनोद ने सीधे गोकुल पर वार कर डाला।
गोकुल की चिन्ता का अन्त न था। समस्या का समाधान किसी तरह नहीं मिल पा रहा था। अचानक गोकुल की दृष्टि गले में पड़े चांदी के तावीज पर गई। गोकुल के जन्म के समय उसकी दादी ने वह तावीज, गोकुल के गले में डाला था। पोते पर किसी की बुरी नजर न पडे़। माँ की मृत्यु के बाद गोकुल को दादी ने ही सम्हाला था। जब तक दादी जीवित रही, गोकुल उनकी प्यार की छाया में सुरक्षित था, पर भगवान ने दादी को भी अपने पास बुला लिया। दीनू ने दूसरी शादी कर ली और गोकुल बाप के रहते भी अनाथ बन गया। शराब के नशे में धुत्त दीनू, गोकुल पर ही सारा आक्रोश उतारता। गले में बंधा दादी का तावीज गोकुल को तसल्ली देता, पर आज निर्णय की घड़ी आ पहॅुंची। उसकी वजह से राजा भइया का बैट टूटा है, उसे ही भरपाई करनी होगी। अपनी गलती का प्रायश्चित उसे ही करना होगा।
पास के गिरधारी लाल सर्राफ ने तावीज के जितने पैसे दिए उनमें एक बैट आसानी से खरीदा जा सकता था। प्रसन्न मन गोकुल जब नया बैट लेकर घर वापस पहॅुंचा तो मनसूबे बांधता आया था, आज इस बैट से रामू और नरेन्दर के साथ थोड़ी देर के लिए क्रिकेट जरूर खेलेगा। तावीज बेचते गोकुल के सामने दादी का स्नेहिल चेहरा तैर गया था, पर हाथ में नया बैट पाकर, वह अपना दुख भूल गया।
घर के बाहर राजा को खड़ा देख गोकुल का दिल बैठ गया। राजा का परिवार तो कल आने वाला था-
'क्यों रे गोकुल, कहाँ गायब था? और यह तेरे हाथ में नया बैट कहाँ से आया?' राजा ने कड़कदार आवाज में पूछा।
'जी..........ई............। यह हमने खरीदा है।' गोकुल की जबान लड़खड़ा आई।
'तूने खरीदा है, तेरे पास पैसे कहाँ से आए?' राजा विस्मित था।
'पैसे कहाँ से लाया रे? बोल कहाँ चोरी करके आया है?' साहब का जोरदार थप्पड़ गोकुल को तिलमिला गया।
'हम सच कहते हैं, हमने चोरी नहीं की साहब।' गोकुल की आँखों में आँसू झिलमिला आए।
'चोरी नहीं की तो ये बैट कहाँ से आया? साहब फिर दहाडे़।'
'यह देखिए पापा इसने हमारा बैट तोड़ डाला। जरूर यह अपने दोस्तों के साथ हमारे बैट से क्रिकेट खेलता था। राजा ने भी गोकुल के दो-चार थप्पड़ जमा दिए।'
'आखिर जात का असर कहाँ जाएगा? इन लोगों को लाख प्यार-दुलार दो, पर खून तो नहीं बदल सकता। छोटे लोग छोटे ही रहेंगे। राजा की माँ ने भी अपना सुर मिलाया था।'
'हम यह बैट राजा भइया के लिए लाए है, माँ जी?'
'चोरी के पैसों से हमारा बेटा नहीं खेलेगा। ले जा अपना बैट और दफ़ा हो जा हमारी आँखों के सामने से। पापा ने गोकुल को धक्का देकर बाहर कर दिया। उसके हाथ का बैट उठाकर दूर फेंक दिया।'
घर में शोरगुल सुनकर पड़ोस के घर से विवेक आ पहॅुंचा। पड़ोसी लड़कों में विवेक का स्वभाव दूसरे लड़कों से अलग था, उसे गोकुल से भी सहानुभूति थी। कल की पूरी घटना का वह चश्मदीद गवाह था। उसने नवीन और विनोद से बात भी की थी कि उनके कारण बैट टूटा है अतः उन्हें मिलकर राजा को सच्चाई बतानी चाहिए वर्ना बेचारा गोकुल मारा जाएगा। विवेक ने चंदा करके नया बैट खरीदने की भी पेशकश की थी, पर उन लड़कों ने विवेक की बात हॅंसकर टाल दी। नवीन ने तो साफ़-साफ़ कह डाला-
'अरे इन लोगों को रोज मार-डांट खाने की आदत ही होती है एक दिन और सही।'
रोता हुआ गोकुल घर के बाहर ही मिल गया।
'यह बैट तू कहाँ से लाया,गोकुल?' प्यार से गोकुल के कंधे पर हाथ रख विवेक ने पूछा।
गोकुल ने सारी बात कह सुनाई। विवेक का मन भर आया। यह गरीब लड़का अपनी दादी की अंतिम निशानी बेच, एक पुराने लकड़ी से बने बैट का मूल्य चुका रहा है।
विवेक के मॅुंह से गोकुल की सच्चाई सुन, सारा परिवार स्तब्ध रह गया।
'तूने ऐसा क्यों किया, गोकुल? अपनी दादी का तावीज एक पुराने बैट के लिए क्यों बेचा?' राजा ने विस्मय से पूछा।
'हमने बिना पूछे आपका सामान दूसरों को दिया, यह हमारी ग़लती थी, राजा भइया। आपके बैट से खेलने का हमें लालच आ गया था....................'
'तूने उन्हें हमारा बैट-बाँल दी, फिर भी क्रिकेट तो खेल नहीं पाया।'
'यह हमारी किस्मत है। हम हैं ही अभागे, वर्ना अम्मा और दादी हमें क्यों अकेला छोड़ जातीं।' गोकुल की आँखें भर आई।
'नहीं राजा तू अभागा नहीं है, अभागे हम है जो तुझ जैसे हीरे को पहचान नहीं सके।' पापा का स्वर गदगद था।
'गोकुल आज से तू मेरा दोस्त है। तू सच्चा खिलाड़ी है, अब तू हमेशा मेरे साथ टीम मे खेला करेगा। जिंदगी के आनंद उठाने का तुझे भी उतना ही अधिकार है जितना हमें।' राजा का स्वर गम्भीर था।
'ठीक कहते हो राजा, हमने कभी नहीं सोचा गोकुल भी एक बच्चा है, इसके मन में भी वही सब कुछ करने की इच्छाएँ होंगी जो दूसरे बच्चे करते है।' राजा की माँ भी उदास हो आई थी।
'अभी कुछ नहीं बिगड़ा है, कल से गोकुल भी हमारी टीम मे शामिल होगा।ष्राजा ने प्यार से कहा।  
गोकुल की खुशी की सीमा न थी। उसे गेंद फेंकने में बहुत मज़ा आता। बैटिंग का चांस छोड़कर खिलाड़ी को आउट करना उसे अच्छा लगता। कुछ ही दिनों के अभ्यास से गोकुल टीम के अच्छे खिलाड़ियों को अपनी गेंद से आउट करने लगा। फिर भी उसे पक्का गेंदबाज नहीं समझा जा सकता था।'
दुर्गा-पूजा की छुट्टियों में दूसरे मुहल्ले के लड़कों ने क्रिकेट-मैच की चुनौती दे डाली। राजा की टीम तैयारी में जुट गई। गोकुल को बारहवें खिलाड़ी की तरह रखा गया था। उतने से ही वह बहुत उत्साहित था।
नियत दिन मैच शुरू होने वाला था, पर बाँलर सुमीत गायब था। तभी किसी ने बताया कल उसके पाँव में चोट आ गई है। आज वह क्रिकेट नहीं खेल सकेगा। राजा की टीम वालें के चेहरों पर हवाइयाँ उड़ने लगीं। तभी गोकुल ने कहा ................
'राजा भइया, आप घबराइए नहीं। बाँलिंग मैं करूँगा।' गोकुल के चेहरे पर आत्मविश्वास था।
कोई उपाय न देख, गोकुल को बाँलिंग का चांस देना ही पड़ा। दूसरी टीम ने टास जीत कर बैटिंग का निश्चय किया।
खेल शुरू होते ही दूसरी टीम के खिलाड़ी ने जोरदार खेल शुरू कर दिया। गोकुल की गेंद पर दो चौके मारते ही राजा को घबराहट शुरू हो गई। अगर ऐसा ही चलता रहा तब तो हार निश्चित थी। थोड़ी ही देर में दूसरी टीम ने सौ के ऊपर रन बना लिए। अचानक गोकुल की गेंद ने सीधे विकेट पर गेंद मार, एक खिलाड़ी को आउट कर दिया। राजा ने गोकुल की पीठ ठोंकी।
अब तो मानो चमत्कार ही हो गया। गोकुल ने एक-एक करके तीन खिलाड़ी आउट कर दिए। तालियों की गड़गड़ाहट से गोकुल का चेहरा चमक उठा। यह तो शुरूआत थी। गोकुल की गेंद ने धमाका ही कर दिया। छह खिलाड़ी अकेले गोकुल की गेंद से ही आउट हो गए। फिर तो खुद राजा और विवेक ने भी धुंआधार बाँलिंग कर, दूसरी टीम को मात्र एक सौ पचहत्तर रन पर आउट कर दिया।
राजा की टीम ने जोश से खेलना शुरू कर दिया। शुरू में दो खिलाड़ी जल्दी आउट हो गए। राजा बस दस रन बना सका, पर बाद के खिलाड़ी जम गए। गोकुल को अच्छा गेंदबाज जरूर माना जाता था, पर उस दिन दो छक्के मारकर टीम को जीत के नजदीक पहॅुंचा दिया। गोकुल ने आखिरी जीत का रन बनाकर, खुशी की लहर दौड़ा दी।
खेल ख़त्म होते ही सबने गोकुल को कंधों पर उठा लिया। निश्चय ही आपकी जीत गोकुल की वजह से संभव हो सकी थी। राजा ने जोर से घोषणा की-
"आज का मैन आफ़ दि मैच गोकुल है।" तालियों के बीच गोकुल का चेहरा खुशी से जगमगा उठा।

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