प्यार के नाम

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प्यार के नाम

दूसरी ओर फ़ोन पर एक सुरीली आवाज़ थीलो ! मे आई टॉ टु मिस्टर अधीर प्लीज़।
यस ! अधीर स्पीकिंग।

गुड मार्निग मिस्टर अधीर ! मैं सुप्रिया प्रतिमा चेन ऑ्फ़ हॉलीडे रिजोर्ट्स से बोल रही हूँ। आपने हमारे लकी ड्रा में एक प्राइज़ जीता है। आज शाम छह बजे होटल मौर्या में प्रेजेन्टेशन के लिए आप इंवाइटेड हैं। प्रेजेन्टेशन के बाद रिसेप्शन काउंटर पर आपका गिफ़्ट तैयार रहेगा, प्लीज़ कलेक्ट इट।

आपसे ग़लती हुई सुप्रिया जी, मैंने किसी लकी- ड्रा में भाग नहीं लिया।

आप भूल रहे हैं। मे आई रिमाइंड यू सर, इंडिया इंटरनेशनल एग्जीबीशन में आपने एक कार्ड भरा था, ये उसी का लकी ड्रा का रिजल्ट है।

ओह याद आया, पर देखिए किसी ने रिक्वेस्ट कर फ़ार्म ज़बरन भरवा लिया था। मुझे प्राइज़ में कोई इन्टरेस्ट नहीं है। थैंक्स फ़ार कालिंग।

अधीर जी, हमें एक बार चांस तो दीजिए। विश्वास दिलाती हूँ, निराश नहीं होना पड़ेगा। प्लीज़ हमारे लिए जाइए।

ओके। इतने प्यार से बुला रही हैं तो आना ही पड़ेगा। वैसे जान लीजिए आपको डिसअपांइंट ही करूँगा।
 मंजूर। तो आप हमें निराश करने रहे हैं न। आवाज़ में तनिक. सी शोख़ी उभर आयी थी या शायद वो अधीर का भ्रम था।

ओके  बाय। फोन रख कर अधीर ने डायरी खोली। शाम सात बजे होटल अशोका में कुन्तला आने वाली थी। मना करने पर हज़ार सवाल पूछेगी।

पी00 को फोन करके अधीर ने कुन्तला को मैसेज़ देने को कह दिया। अधीर के लिए चेन ऑ होलीडे रिजोटर्स का कन्सेप्ट नया नहीं था। उसकी समृद्धता ने कभी उस लाइन पर सोचने को बाध्य नहीं किया। पिता का व्यापार इतना फैल चुका था कि जब-तब देश-विदेश जाना होता रहता। जब भी कहीं जाता फाइव स्टार होटल में उसकी बुकिंग रहती। उस दिन भी सुप्रिया जैसी किसी ज़िद्दी लड़की ने कोई कार्ड पीछे पड़ कर भरवा लिया था। अधीर को ताज़्जुब हो रहा था एक अनज़ान लड़की के कहने में आकर क्यों उसने कुन्तला के साथ अपाइंटमेंट कैंसल कर दिया। ख़ैर अब तो होटल मौर्या जाना ही होगा। चलो आज यही सही।

होटल मौर्या में कई कपल्स आमंत्रित थे। अधीर के स्वागत के लिए सुप्रिया सामने आयी थी। अंगूरी रंग के सलवार.कमीज़ और चुन्नी में सुप्रिया की गोरी रंगत पारदर्शी बन पड़ी थी। हल्के मेकअप और लिपस्टिक के साथ कानों और गले में साधारण मोती पहन रखे थे। पहली ही नज़र में अधीर को लगा लड़की की पसंद दूसरी लड़कियों से अलग काफ़ी सूफ़ियाना थी।

हलो अधीर जी, आइए। उस टेबल पर चलते हैं।

आपको लगा था, मैं नहीं आऊँगा।

ऐसी बात नही है, पर अगर सिर्फ निराश करने के लिए कोई इंवीटेशन एक्सेप्ट करे तो उत्सुक्ता ज़रूर होगी।

किस बात की उत्सुकता सुप्रिया जी।
आज तक मुझे किसी ने निराश नहीं किया इसलिए - -

इज इट? वैसे आप निराश करने लायक चीज़ हैं भी नहीं। बताइए क्या करना है मुझे?

पहले बताइए आपके पास हमारे लिए समय है या नहीं, कहकर निराश करेंगे।

आज की अपनी शाम आपके नाम कर दी है। अब बताइए क्या करना है।

वेरी सिंपल ! आपने प्रतिमान चेन रिजोटर्स का नाम सुना होगा,  हमारी चेन पूरी तरह विश्वसनीय है।

मुझे आप पर विश्वास है, कंपनी को मैं महत्व नहीं देता। अधीर के धीमे से कहे शब्दों ने सुप्रिया को रोमांचित कर दिया।

यह देखिए स्विटलरलैंड पेरिस के हमारे रिजोटर्स की लोकेशन कितनी अच्छी है ! स्पेन के इस होटल का रिफ्लेक्शन क्रिस्टल क्लीयर वाटर में कितना स्पष्ट है न? एलबम दिखाती सुप्रिया की आँखे सपनीली थीं।

जल्दी बताइए मुझे क्या करना है।
आप बहुत ज़ल्दी में हैं।

नहीं, पर इन जगहों से मैं अच्छी तरह परिचित हूँ।

मतलब आप इन जगहों पर जा चुके हैं।

जाता रहता हूँ, कहना ठीक होगा।

ओह ! तब तो यह स्कीम आपके फ़ायदे की है। अगर आप मेंबर बन गए तो निन्यानवे वर्षों के लिए विश्व के एक सौ छह रिजोटर्स में आप फ्री रह सकते है।

वाह, यह तो बड़ी अच्छी स्कीम है। मेंबरशिप के लिए कितने का चेक देना होगा?
सच आप तो आसानी से एग्री कर गए। हाँ अगर आप वी0आई0पी0 मेंबरशिप लेंगे तो आपको और बहुत से कन्सेशंस मिलेंगे। चार हज़ार प्वाइंट स्कोर कर लेने पर एनीवेयर अब्रॉड के दो टू एंड फ्रो टिकट फ्री मिलेंगे।

अगर मैं दस लोगों की मेंबरशिप के पैसे अभी दे दूँ। तो मेरे चार हज़ार प्वाइंट हो जाएँगे न।

पर उतना पैसा देने पर तो आप कई बार कई लोगों के साथ अब्रॉड जा सकते हैं। दस लोगों की मेंबरशिप लेने की क्या ज़रूरत है

क्योंकि इतने रूपए खर्च कर देने से मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़नेवाला है, पर शायद इसके कमीशन से आपको खासा बड़ा अमाउंट मिल जाए जो आपको काफ़ी काम सकेगा।

व्हाट डू यू मीन बाई दिस। हाऊ डेयर यू टॉ लाइक दिस? आपने मुझे समझा क्या है  हम यहाँ नौकरी करते हैं, किसी से भीख नही लेते। 
आय एम सॉरी। मेरा वैसा कोई मतलब नहीं था।

फिर क्या मतलब था आपका, मिस्टर? आपने सममुच  मुझे डिसअपाँइंट किया है। आप जा सकते हैं। हाँ, एक बार फिर यहाँ आने की तक़लीफ़ उठाने का शुक्रिया। सुप्रिया उठकर खड़ी हो गयी।

एक पल उसे ताकते रहने के बाद अधीर भी खड़ा हो गया। सुप्रिया जलती हुई दृष्टि से उसे जाता हुआ देखती रही। क्या सच इतना कड़वा होता है? कैंसरग्रस्त माँ के इलाज के लिए जितना भी कमाओ कम है। दो छोटे भाई.बहनों की शिक्षा-व्यवस्था के लिए सुप्रिया को जी तोड़ मेहनत करनी होती हैए फिर भी घर के अभाव कम होने में नहीं आते।

काश ! पापा उन्हें अचानक यूँ ना छोड़ गए होते। उनकी अचानक मृत्यु हो गयी थी। बड़ी बेटी होने के कारण घर के दायित्व सुप्रिया पर पड़े। एम00 की मेधावी छात्रा सुप्रिया को पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी। रिश्तेदारों से उम्मीद करना बेकार था। सगे चाचा ने भी उल्टे.सीधे कागज़ों पर दस्तख़्त करा उन्हें बेघर कर दिया था। सुप्रिया की सहेली नीना ने उसे इस कंपनी में नौकरी दिला दी थी। कंपनी स्कीम में मेंबर बनाने पर प्रति मेंबर कमीशन का प्रावधान था। कमीशन की राशि से सुप्रिया की सचमुच कई कठिनाइयाँ आसान हो जातींए पर अधीर की उस बात ने उसे तिलमिला दिया। अपने स्वाभिमान के कारण ही तो उसे आज तक अपना सिर ऊँचा उठाए रखना संभव हो सका है। मूड बेहद ख़राब हो आया।

नीना ने पूछा था, क्या हुआ प्रिया? आज बिजनेस नहीं हुआ तो इतनी मायूस क्यों होती है?  कल अच्छा बिजनेस हो जायेगा।

बात बिजनेस की नहीं है, नीना। उसने मेरी इंसल्ट की, मुझे भीख देने की कोशिश की।

सच बात तो यह है कि वो जिस क्लास का था, उसे यहाँ बुलाना ही ग़लती थी। उसे पैसे बचाने की ज़रूरत नहीं है। बहुत बड़े बिजनेस टाइकून का बेटा है।

फिर यहाँ आया ही क्यों?                                                       तूने उसे इत्ते प्यार से उसे बुलाया जो  था! नीना ने शैतानी से कहा।

हे भगवान, ऐसे लोगों से फिर कभी वास्ता ना पड़े।

चल, इसी बात पर डिनर मैं खिलाती हूँ। आज मैंने दो मेंबर्स बनाए हैं।

हाऊ लकी ! कांग्रेटस, पर आज पॉसिबिल नहीं होगा। माँ के लिए डॉक्टर के साथ अपाइंटमेंट        अब कैसी हैं, आंटी? .

डॉक्टर कहते हैं, जब तक दर्द ना बढ़े तभी तक ठीक है। जिस दिन दर्द बढ़ेगा, हम सब भी उनका कष्ट नहीं झेल पाएँगे। भगवान ना करे वो दिन कभी आए।

बी प्रेक्टिकल, सुप्रिया। वो दिन तो आना ही है। कड़वा सच तो यह है कि आंटी को ज़ल्दी मुक्ति मिलने की कामना करती हूं। उनका भी कष्ट दूर हो जाएगा और उनकी मुक्ति में ही तुम सबकी मुक्ति है।
ऐसा मत कह, नीना, मैं सह नहीं पाती। भीगे स्वर में सुप्रिया ने कहा।
अपने को तैयार कर ,सुप्रिया ! कब तक सच से मुँह छिपाती रहेगी? एक दिन तो ये सच फ़ेस करना ही होगा।

शायद तू ठीक कहती है, नीना। चलती हूँ, देर हो रही है।

दूसरी सुबह ऑफिस पहुँचते ही सीनियर सेल्स मैनेजर राहुल देव ने उसे बुलाया था। उनके कमरे का दरवाज़ा जैसे ही खोला, राहुल देव खड़े हो गए। खुशी से उनका मुख चमक रहा था।

काँग्रेचुलेशन्स, सुप्रिया ! तुमने इतना अच्छा बिजनेस किया है कि कंपनी की ओर से ज़ल्दी ही तुम्हें रिवार्ड मिलेगा।

ऐसा मैंने क्या किया है, सर ?

अरे तुमने तो कमाल ही कर दिया ! कल मिस्टर अधीर पुरी आए थे। तुमने उन्हें इस तरह कन्विंस किया कि आज मॉर्निग में ही कॉ करके हमें पाँच वी0आई0पी0 मेंबर्स दिए हैं और साथ ही पार्टनरशिप की पेशकश की है। अगर वह हमारे पार्टनर बन गएए तो समझो, कंपनी की किस्मत बदल गयी।

सच्चाई यह है कि मैंने कुछ नहीं किया, सर। वे ना जाने क्यों तरस खाकर हमारी मदद करना चाहते हैं।                                                                  व्हाट रबिश ! उन्होंने ख़ास तुम्हारा नाम लेकर कहा है कि वे तुम्हारी कन्विंसिंग बातों की वज़ह से यह निर्णय ले रहे हैं। अकाउंट सेक्शन से आज अपना चेक ले लेना। यू हैव डन वंडरफुल जॉब माई गर्ल्।
माफ़ करें, सर। मैं यह चेक नहीं ले सकती।
आर यू ओके सुप्रिया? बात क्या है? ठंडे दिमाग़ से काम लो इतने अच्छे अवसर बार.बार नहीं आते।

पूरी बात सुन नीना उछल पड़ी।

इसे कहते हैं किस्मत ! हाय तेरी जगह हम ना हुए ! लगता है, ज़नाब को तुझसे इश्क हो गया है।

इश्क नहीं, अपनी ग़लती का प्रायश्चित कर रहा है।

इसका मतलब वो ख़राब आदमी नहीं है, यह तो मानोगी न? आंटी को शायद ज़ल्दी ही हॉस्पिटलाइज करना होगा। चेक स्वीकार कर ले, वरना पछताएगी। अपने लिए ना सही,आंटी,सुधा और रजत की तो सोच।

कुछ भी हो जाए, इस चेक की भीख मुझे स्वीकार नही है, नीना।

उसी शाम सुप्रिया के घर के सामने एक इम्पोर्टेड कार आकर रूकी। मोहल्लेवाले कौतुक से उस कार के वर्दीधारी ड्राइवर और उसमें से उतरते सुदर्शन युवक को देख रहे थे। अधीर ने दरवाजे पर दस्तक दी थी। अधीर को खड़ा देख सुप्रिया चौं गयी। अधीर यहां क्यों?
अंदर आने की इज़ाज़त नहीं देंगी ।सुप्रिया के मौन को अधीर ने तोड़ा।
पीछे हटती सुप्रिया ने अधीर को जगह दी थी। छोटे से कमरे में एक ओर रूग्ण माँ का बिस्तर था। एक कोने में भाई.बहनों के पढ़ने के लिए मेज़ और दो कुर्सियाँ थीं। बीच में चार केन की कुर्सियाँ और केन की मेज़ थी। दीवारों पर सुप्रिया की पेंटिंग्स टंगी थीं। एक दृष्टि कमरे पर डाल, अधीर ने आगे बढ़ बिस्तर पर सो रही माँ को मूक प्रणाम किया था। भाई.बहन ट्यूशन लेने गए थे। एक कुर्सी पर बैठने को कह सुप्रिया ने अधीर की ओर सवालिया नज़र डाली थी।                                                सुप्रिया जी, क्या हम कुछ बातें कर सकते हैं?                                                                              अगर आप यह बताने के लिए आए हैं कि आपको अपनी ग़लती का अहसास हुआ है तो ये सब बेकार है। आप जैसे अमीरों का शायद यह शौक़ होता है।

नहीं सुप्रिया, माफ़ करना। फ़ार्मेलिटी छोड़कर तुम्हें सुप्रिया पुकार गया। दरअसल मैं सिर्फ़ यह कहने आया था कि तुम जैसी स्वाभिमानी लड़की का अपमान करने की मैंने जो ग़लती की है, उसके लिए कोई भी सज़ा कम है। मैं तुम्हारा अपराधी हूँ। मुझे कड़ी से कड़ी सज़ा मंजूर होगी।

सज़ा देनेवाली मैं कौन होती हूँ, अधीर जी ? दंड देना आपको शोभा देता है।

वैसे सच बात यही है सुप्रिया कि तुम्हारी बातों ने मुझे सोचने को विवश किया। इस स्कीम से आसानी से काफी पैसा बचाया जा सकता है। इसलिए अपने अधिकारियों के लिए भी मेंबरशिप लेने का निर्णय लिया है। सच मानो तुम पर दया करने का मेरा कोई इरादा नहीं था

मैं जानती हूँ आपके लिए पैसों का क्या महत्व है ! असल में प्रेजेन्टेशन के लिए आपको बुलाया जाना ही ग़लती थी।
अपनी बात पर अड़े रहना अच्छी बात है, पर कभी.कभी अच्छे बच्चों की तरह दूसरों की बात भी मान लेनी चाहिए।अधीर के चेहरे पर मुस्कान थी।

क्षमा करें, मैं बच्ची नही हूं। कुछ नाराज़गी से सुप्रिया ने कहा।

वह तो देख रहा हूँ। अधीर हल्के से हंस दिया।

और क्या.क्या देख रहेपा रहे हैं, अधीर जी?

जो बिना देखे नहीं जान पाता, सुप्रिया।

मेरे अभाव यही न?

नहीं, अभावों का तुम्हारे साथ कोई नाता हो ही नहीं सकता। मैं आज तक उन्हें जानता रहा हूं, जो अपार धन.संपत्ति के स्वामी होते हुए भी बेहद अभावग्रस्त हैं। धन के लिए कोई भी रास्ता चुनने में उन्हें हिचक नहीं होती। तुमने धन को क्या कभी महत्व दिया है, सुप्रिया?                                         ना चाहते हुए भी कभी कभी देना पड़ा है, अधीर जी हाँ माँ और भाई.बहनों के कारण मैं धन कमाने की मशीन ही तो बन गयी हूँ। अचानक वह उदास हो आयी। उस मासूम उदास चेहरे के लिए अधीर के मन में ढेर सारा प्यार उमड़ आया। जी चाहा, उसे बाँहों में समेट अपना सब कुछ दे डाले। अचानक चैतन्य हो वह उठ खड़ा हुआ।

एक रिक्वेस्ट है, मेरी ग़लती भुला दो, सुप्रिया। मैं तुमसे स्नेह का नाता चाहता हूँ, दुश्मनी का नहीं। हम मित्र तो बन सकते हैं।

अगर मैं कोई नाता ना रखना चाहूँ? 

तो समझूँगा मेरा अपराध अक्षम्य रहा्। आजीवन यह अपराधबोध सालता रहेगा। कलाकार का दिल कोमल होना चाहिए सुप्रिया्।
नहीं-नहीं, जीवनभर मेरे अपराधी बन मुझे याद ना करें। चलिएए आपसे मेरी कोई दुश्मनी नहीं है।

फिर हम मित्र हुए न?  अधीर की आँखों में चमक थी।

ठीक है, अगर आप मुझे इस लायक समझते हैंए तो यही सही।

तो हमारी मित्रता के नाम पर कल शाम का डिनर मेरे साथ लोगी,सुप्रिया।

माफ़ करें,  मेरी परिस्थितियाँ मुझे किसी फ़ाइव स्टार होटल में डिनर की अनुमति नहीं देंगी।

तुम्हारे घर में तो डिनर ले सकता हूँ, सुप्रिया? अगर नहीं तो मेरा इन्वीटेशन क़बूल करना पड़ेगा।

ओके, आप कल रात यहाँ डिनर लें। मुझे मंज़ूर है।

अपने साथ अपने एक और दोस्त को भी यहाँ लाने की इज़ाज़त देनी होगी।

देखिए, मिस्टर अधीर, हम बाहरी लोगों को एंटरटेन नहीं करते। अगर पापा होते तो बात दूसरी थी, पर अब हमारी स्थिति भिन्न है।

मैं साथ में किसी अवांछित व्यक्ति को लाऊँगाए ऐसा सोचती हो, सुप्रिया ! मेरा  वह मित्र कैंसर स्पेशलिस्ट है।

उसे लाने की वज़ह बता सकते हैं, अधीर जी?                                         अब हम दोनों दोस्त हैं। दोस्ती में वज़ह नहीं पूछी जाती, विश्वास किया जाता है। मुझ पर विश्वास रखो, सुप्रिया।

सुप्रिया को उत्तर देने का समय दे त़ेजी से उठ कर अधीर बाहर चला गया था।

सुप्रिया परेशान थी। अधीर डिनर पर क्यों रहा था? 

नियत समय पर अधीर अपने मित्रा डॉक्टर सुमंत के साथ पहुँच गया था। कुर्ता.पाजामा पहने अधीर एकदम घर का व्यक्ति लग रहा था। आते ही वह सबसे इस आसानी से घुलमिल गया  मानो उन्हें वर्षों से जानता हो। माँ को अपना परिचय दे, सुमंत उनका बेटा बन गया। सुमंत ने माँ का पूरा चेकअप कर सुप्रिया को विस्मित किया था। बहुत दिनों बाद घर में खुशी का माहौल बना था। छोटे भाई रजत के लिए अधीर विशेष रूप से कंसर्न दिखा। जाते समय अधीर ने एक अच्छी यादग़ार शाम के लिए सुप्रिया को धन्यवाद दिया।

सारी बात सुन नीना सोच में पड़ गयी। यह तो किसी स्वप्नलोक की प्रेम कहानी जैसी बात थी। अधीर क्या सुप्रिया को प्यार कर सकता है?  सुप्रिया जानती थी कि जिस धरती पर वह खड़ी है वहाँ से आकाश में उड़ने की बात सोचना भी मूर्खता है। यह सच है अधीर उसे अच्छा लगता है, पर वह उनको अपने साथ कभी भी नहीं जोड़ सकती है। इन सबके बावजूद अब अधीर का उससे मिलना होने लगा। माँ के इलाज़ की व्यवस्था, छोटी बहन सुधा को टेक्सटाइल डिजाइनिंग क्लासेज़ और रजत को इंजीनियरिंग कालेज में एडमीशन दिलाने में अधीर ने इस तेज़ी से काम किया कि सब काम हो जाने के बाद ही सुप्रिया समझ पायी। विरोध के उत्तर में अधीर का जवाब था यह सब सुप्रिया ने अपनी जिस कमीशन- राशि को लेना अस्वीकार किया था, उसी से संभव हो सका है,

सुप्रिया को अधीर से मिलने, उसके फ़ोन की प्रतीक्षा रहने लगी। वह अपने मन से डरने लगी थी। उस पर उसका नियंत्रण नहीं था। अनजाने ही वह अधीर से प्यार करने लगी थी। अंज़ाम की सोचे बिना वक़्त के प्रवाह में बहती जा रही थी। अधीर ने उसके सामने कभी ना प्रेम का प्रस्ताव रखा ना कभी कहीं सीमा पार करने की कोशिश की, पर सुप्रिया को प्रतीक्षा रहती। अपने मन, अपने सपनों से वह नाराज़ रहती, पर दोनों पर उसका वश नहीं रह गया था।

पिछले कुछ दिनों से अधीर नहीं रहा था। माँ उसे रोज़ याद करती। माँ के पास बैठ उन्हें ना जाने कहाँ.कहाँ की बातें सुना, वह उनका मन बहलाता। सुप्रिया ताज़्जुब में पड़ जाती, उस जैसा व्यस्त व्यक्ति उनके साथ उतना समय कैसे बिताता था? 

उस दिन ऑफिस में नीना ने गंभीर स्वर में बताया था,कार-  एक्सीडेंट में अधीर के सिर में गंभीर चोट आयी है। बहुत खून बह गया है।

सुप्रिया स्तब्ध रह गयी। रजत को साथ ले हॉस्पिटल पहुँची थी। वहीं जाकर सुप्रिया को पता लगा, अधीर जीवन में कितना अकेला था। तीन वर्ष की छोटी आयु में माँ चली गयीं औेर बीस.इक्कीस वर्ष के अधीर के कंधों पर पूरा दायित्व छोड़, पिता चले गए। अपार धन.संपत्ति के एकमात्रा वारिस की जान के पीछे कई लोग पड़े, पर पिता के विश्वस्त साथी रामनाथ ने उसकी अपने बेटे की तरह रक्षा की।

उस अकेले अधीर के लिए सुप्रिया का मन रो पड़ा। जब भी माँ ने उसके घर.परिवार के बारे में जानना चाहा, वह हँस कर टाल जाता स यहीं तो है अम्मा जी। ऑफ़िसवाले अधीर की दीर्घायु के लिए प्रार्थना कर रहे थे।

भगवान ने सबकी सुन ली। अधीर अपने घर वापस चला गया। सुप्रिया ने प्रसाद चढ़ाया था। अब अधीर की सब प्रतीक्षा कर रहे थे। सुप्रिया फ़ोन पर हालचाल पूछती रहती। अधीर से बात नहीं हो पाती। जब भी पूछो, बस यही संदेश मिलता कि वह ठीक है, कहीं गया हुआ है। ऑफिस जाने लगा है। सुप्रिया बेचैन हो उठी, आखिर अधीर उससे बात क्यों नहीं करता, कहाँ गया उसका दोस्ती का दावा? स्वयं जाकर जवाब.तलब करने में उसे अपना अपमान. सा लगता। अपने को समझाती, इस वर्ग से और उम्मीद भी क्या की जा सकती है?  सच तो यह है कि उसने सुप्रिया का स्वाभिमान तोड़ने के लिए ही वे चालें चली थीं। अब उसका अहं संतुष्ट हो गया होगा। सुप्रिया उसके सामने झुक चुकी है।

तीन महीने बेचैनी में कट गए। अधीर को भुलाने की हर कोशिश के बावजूद वह हर रात उसके साथ होती। अपनी नियति पर रोने के सिवा सुप्रिया की समझ में कुछ नहीं आता। सब कुछ जानते.समझते उसने प्यार करने की ग़लती क्यों की?  ख़ास बात यह थी कि डॉक्टर सुमंत रेगुलरली माँ को देखने आते। उनकी दवाइयाँ समय पर जातीं। रजत  कॉलेज में अगले चार वर्षों की फ़ीस जमा हो गयी थी। क्यों आखिर क्यों,  नहीं सुप्रिया अब इस दान को स्वीकार नहीं करेगी।

डॉक्टर सुमंत के आते ही उसने साफ़ शब्दों में कहा-डाक्टर माँ के लिए अब आप तकलीफ़ ना करें। सरकारी अस्पताल हम जैसों के लिए ही हैं।

ऐसा क्यों कह रही हैं, सुप्रिया जी? विस्मित सुमंत ने कहा। 

आपकी फ़ीस दे पाने की हमारी सामर्थ्य जो नहीं है।
मैंने क्या कभी आपसे फ़ीस चाही, सुप्रिया?  क्या मैं इसलिए यहाँ आता हूँ? उस आहत स्वर पर सुप्रिया चौं गयी।
मेरे कहने का यह अर्थ नहीं था, पर कोई तो आपको फ़ीस देता होगा न? मैं किसी का अहसान नहीं लेना चाहती।

किसी का एहसान ना लेने से आपका मतलब अधीर से है न? 

सुप्रिया का मौन उसकी स्पष्ट हाँ था।

अगर आप सच्चाई जान पातीं तो उसके लिए ऐसा ना सोचतीं।

क्या है  उसकी सच्चाई डॉक्टर?                                                                             अधीर हमेशा के लिए भारत छोड़ कर जा रहा है।

क्यों आखिर क्यों, वह यहां से जारहे हैं ?सुप्रिया बेचैन हो उठी।

प्रतीक्षा कीजिए, जल्दी ही जान जाएंगी। गंभीरता से डॉक्टर ने कहा।

आज क्यों नहीं जान सकती, डॉक्टर, प्लीज बताइए।सुप्रिया ने विनती सी की।

क्योंकि वह बता पाना मेरे लिए संभव नहीं है। बैग उठा कर सुमंत चले गये।

दो दिन बाद सुप्रिया के नाम एक लिफ़ाफ़ा आया था। हल्के नीले रंग के कागज़ पर अधीर ने लिखा था- - -

सुप्रिया जी,                                                                                         पिछले कुछ दिन जिस मनःस्थिति में कटे, बता नहीं सकता। जीवन को मैंने कभी गंभीरता से नहीं लिया। पर जबसे आपसे मिला, जीने की इच्छा जाग गयी। बहुत सपने बुन डाले। स्विटजरलैंड के दो एअर टिकट और होटल में एडवांस बुकिंग इस शर्त पर करा रखी थी कि जब चाहूँ, आपके साथ जा सकूँ। आपको सरप्राइज देना चाहता था।

एक्सीडेंट ने सब कुछ ख़त्म कर डाला। खून चढ़ाए जाने की ज़रूरत पड़ने पर मेरा ब्लड टेस्ट किया गया। जानती हैंए मेरा खून एच0आई0वी0 पॉजिटिव निकला। मौत के शिकंजे में जकड़ा मैं जीवन के लिए कितना तड़प रहा हूँ। अगर आप मेरी ज़िंदग़ी में ना आयी होतीं तो मौत मुझे बिलकुल ना डरा पाती। एच0आई0वी0 विषाणु कहाँ से गए इसके लिए मैं ज़िम्मेदार नहीं हूँ। हाँ सुप्रिया, मैंने कभी ग़लत काम नहीं किया। डॉक्टर का कहना हैए तीन वर्ष पहले जिस अंजान इंसान का खून चढ़ाया गया थाए शायद वह एड्स का रोगी रहा होगा। शिकार का शौक़ पूरा करने गया था और एड्स का शिकार बनकर वापस आया। घायल अवस्था में उस छोटे से क़स्बे में खून चढ़ाया गया था। वहाँ शायद एड्स का लोगों ने नाम भी नहीं सुना था। मेरी ज़िंदग़ी की बस यही सच्चाई है कि पूरी परवाह रखने के बावजूद कुछ वर्षों बाद खत्म हो जाऊँगा।

सब कुछ छोड़ कर जाना कठिन नहीं है, पर तुम्हें छोड़ कर जाने की कल्पना मात्र से मेरा रोम-रोम रो रहा है।
पहली बार तुमसे मिलने के समय कहा था, तुम्हें निराश करूँगा। सच कहो प्रिया, मैंने तुम्हें निराश कियाए है न?  दोस्त को माफ़ी दे सकोगी, प्रिया?

अधीर

पत्रा पढ़ कर सुप्रिया शून्य में ताकती रह गयी। अचानक सपने से जागी सुप्रिया अधीर के घर पहुँची थी। किसी की परवाह ना कर लोगों के बीच से होती हुई सुप्रिया अधीर के ठीक सामने जा खड़ी हुई।

तुम यहां? अधीर उसे देख चौंक गया। गया।

तुमने मुझे सचमुच निराश किया हैए,अधीर। दोस्ती का दावा तो ज़रूर किया, पर दोस्ती की एबीसी भी नहीं जानते।

मैं दोस्ती का अर्थ नहीं जानता, प्रिया? 

हां, नहीं जानते इसीलिए तो बिना बताए अकेला छोड़ कर जा रहे हो।

अकेलापन मेरी सज़ा है, सुप्रिया !

अपने को सज़ा देने का अधिकार मुझसे पूछे बिना ही ले लिया अधीर? 

तुम्हारी ज़िंदग़ी नष्ट करने का मुझे अधिकार नहीं है, प्रिया।

मेरा हित चाहते हो तो तुम्हें यहीं रहना होगा अधीर। मैं तुम्हारे साथ हूँ।

तुम पागल हो, प्रि्या। मैं तुम्हारा साथ नहीं ले सकता। ऐसा करना मेरा स्वार्थ होगा।

ठीक कहते हो। पाग़ल ना होती तो तुमसे प्यार क्यों करती ?

प्यार करना पाग़लपन नहीं, पर मौत के राही के साथ ज़िंगद़ी काटने की सोचना सचमुच पाग़लपन है। मेरे पास कुछ इनेगिने वर्ष शेष हैं, सुप्रिया।

जानते हो, अधीर, कोई इंसान ज़िंदग़ी के दस दिन ऊब भरे दस वर्षों की तरह मज़बूरी में काटता है। मुझे विश्वस है, हमारे जीवन का हर पल आनंदमय होगा।

मैं कभी भी एड्स के शिकंजे में जकड़ जाऊंगा, इस सच्चाई को कैसे भुला सकती हो, प्रिया?

एड्स होने का मतलब ज़िंदग़ी खत्म हो जाना नहीं होता, अधीर। मेरा प्यार तुम्हें जीने की ताकत देगा। हमने दोस्ती का वादा किया है,हम हमेशा दोस्त की तरह रहेंगे।

समझ में नहीं आता, मैं क्या करूँ ? अधीर परेशान हो उठा।

मैं बताऊँ,  अपना पलायन मतलब बाहर जाने का प्रोग्राम कैंसल कर दो।अचानक प्रवेश करते  डॉक्टर सुमंत ने चौंका दिया।

अगर तुम भी ऐसा सोचते हो तो यही सही। अधीर मुस्करा दिया।

ये हुई ना बात। अभी बाहर जाकर सबको यह शुभ सूचना देता हूँ।

सुमंत के जाते ही अधीर की फैली बाँहों में सुप्रिया समा गयी।


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