तत्ता पानी

‘तत्ता पानी’ पहुंचते दोपहर हो गई थी। मोटर-साइकिल मंदिर के पास टिका संजय ने पुजारी जी को प्रणाम किया था।


  ‘प्रसन्न रहो बेटा। चश्मे का ठंडा पानी पिओगे?’

   नहीं बाबा, नीचे सतलज का पानी पिएँगे। आओ अनु, नीचे उतरते हैं।

   ओह गॉड! पूरे तीन घंटे मोटर-बाइक पर बैठे-बैठे बदन दुःख गया। पहले पता होता इतनी दूर आना है तो कभी न आती। अनुपमा ने नाराज़गी दिखाई।

   कम ऑन, अनु!  सजलज के ठंडे पानी से हाथ-मुंह धोते ही सारी थकान मिनटों में भाग जाएगी अब जल्दी करो, यार।

   उतना नीचे उतरना क्या आसान है, संजय?

    अगर उतर पाने का साहस नहीं तो बंदा हाजिर है, उठाकर ले चलूं? संजय ने शरारत से पूछा।

   छिः, हमें ऐसा मज़ाक पसंद नहीं। मेरे पावों में काफी ताकत है, किसी पर बोझ बनने का शौक नहीं, समझे।

सिर पर चमकते सूरज के कारण अनुपमा के उजले मुख पर पसीना झिलमिला उठा था। नदी-तट की ठंडी हवा ने अनु को उत्साहित कर दिया।

सलवार के पायंचे ऊपर मोड़, बच्चों की सी आतुरता के साथ, अनुपमा सतलज के ठंडे पानी में जा खड़ी हुई।

मुंह पर ठंडे पानी के छींटे डाले ही थे कि सिर के ऊपर आती पानी की बौछार से अनुपमा भीग उठी। दृष्टि उठाते, सामने खड़ा संजय नज़र आया।

    अच्छा तो यह तुम्हारी शरारत थी। अनुपमा ने संजय पर भी पानी की बौछार कर डाली।

    अरे.......अरे............ये क्या कर रही हो? सारे कपड़े भीग गए।

     और मैं जो पूरी भीग गई, वो कुछ नहीं? बाल सूखने में पूरा एक घंटा लगेगा।

    इतने लम्बे बाल रखती ही क्यों हो? छोटे बाल कटा लो? पाँच मिनट में सूख जाएँगे।

   क्यों मेरे लम्बे बालों से ईर्ष्या होती है?

     वाह! क्या बात कही है, जैसे मैं लम्बे बालों की चोटियाँ गूंथ घूमूँगा। डरता हूं, कहीं हमारी अनुपमा के लम्बे-लम्बे बालों को दुश्मन की नज़र न लग जाए। आखिर दोस्त हुँ आपका।

     ओह, ऐसे हमदर्द है आप?

     ऑफकोर्स........और देखो इस बात को कभी भूलना नहीं.........।

      भला ये भी भूलाने की बात है, संजय? अनुपमा गम्भीर हो उठी थी।

     यहाँ आना अनु.........तुम्हारे लिए एकदम अनोखी चीज़ है मेरे पास। नदी-तट के पास की जमीन पर हाथों से एक छोटा-सा गढ़ा खोद, संजय ने अनु को पुकारा था।

     अब कौन-सा तिलिस्म दिखा रहे हो, संजय? समझ में नहीं आता इस जगह का नाम ‘तत्ता पानी’ क्यों रखा गया है, यहाँ तो बस ठंडा पानी है।

     थोड़ा धैर्य रखें मिस अनुपमा, सब समझ में आ जाएगा। जरा इस पानी का टेम्परेचर तो बताना। हाथ से खोदे उस गड्ढे में नदी का पानी भर आया था।

     अरे वाह तुम तो सचमुच जादूगर हो, इतनी सी देर में कुआँ खोद डाला। अनुपमा ने परिहास किया।

     जनाब, यह अंडर-ग्राउंड वाटर का कमाल है। इस पानी की महिमा ही अलग है- पापियों के सारे पा धो डालता है। विश्वास न हो तो आज़मा कर देख लो।

      मैंने कौन पाप किए हैं जो आज़माने की ज़रूरत पड़े। देखूं कितना गहरा कुआँ खोद पाये हैं-मिस्टर जादूगर। हॅंसी-हॅंसी में गहराई नापने के लिये अनुपमा पानी से भरे उस गड्ढे में जा खड़ी हुई थी। पल भर में अनुपमा चीख सी पड़ी।

       क्यों पता लग गया न -‘तत्ता-पानी’ नाम क्यों दिया गया? संजय हॅंस रहा था।

       नहीं बोलना है तुमसे। इत्ता गरम पानी-जैसे उबलते पानी में पाँव जा पड़ा हो। कितनी जलन हो रही है। अनुपमा रूंआसी हो आई।

    आई एम रियली सॉरी। मैंने कब सोचा था, सीधे पानी में जा खड़ी होगी? संजय सचमुच कंसर्न दिख रहा था।

पास पड़े पत्थर पर अनुपमा को बैठा, संजय ने सतलज के ठंडे पानी में अपना रूमाल भिगोकर अनुपमा के दोनों तलवों पर लपेट दिया।

     अब जलन कम हो रही है न, अनु?

     उहुंक और बढ गई है।

    इस जलन की वजह जानती हो, अनु?

    हमें बेकार की बातें अच्छी नहीं लगतीं।

    तब क्या अच्छा लगता है, अनु?

      सतलज के ठंडे पानी के पास- इतना गर्म पानी-बहुत अच्छा लगा ये अजूबा, संजय।

       यही तो चमत्कार है। जानती हो इस जगह को तीर्थ माना जाता है। जाड़ों में यहाँ मेला जुटता है। तीर्थ-यात्री गर्म पानी में स्नान कर, पुण्य कमाते हैं।

         वाह, क्या नेचुरल अरेंजमेंट है, वर्ना पिघली बर्फ़ की नदी के पास, इतने गर्म पानी की बात भला सोची जा सकती है। सच ये विरोधाभास तो बस भगवान को ही सम्भव है।

      बड़े-बुजुर्गो का कहना है ‘तत्ता-पानी’ के दो घूंट पीने से पत्थर भी हजम हो जाता है।

     बशर्ते पत्थर खाए जाएँ। अनु हॅंस दी थी।

    चलो आज हम भी आज़मा देखें। दो घूंट पानी पीकर नाल डेहरा चलते हैं। लंच वहीं लिया जाए, ठीक है न

    ठीक है, यह एक्सपेरिमैंट भी कर डालें। पर पानी हाथ में लेते ही उसकी उष्णता ने अनुपमा को तिलमिला दिया।

       सतलज का ठंडा पानी मिलाकर दो घूंट पी लो-वर्ना सह नही पाओगी।

      वाह दूसरा पानी मिलाने से इसका असर कम न हो जायेगा?

  थोड़ा-सा पानी मुंह में लेते ही अनुपमा का मुंह बन गया -

    ओह नो! ये तो एकदम खारा है.............।

    इसमें गंधक जो मिला है, गंधक की तासीर जानती हो?  संजय ने जानकारी देनी चाही थी।

   भाड़ में जाये गंधक की तासीर............. पर इतने गर्म पानी में तो चावल पक सकते हैं न, संजय?

     चावल लाई हो क्या? चलो लंच यहीं तैयार कर डालते हैं। ये भी एक नया एक्सपीरिएंस होगा। संजय अनुपमा को चिढा रहा था।

      यह हंसी मे उड़ाने की बात नहीं है, संजय। इस गर्म पानी में चावल पका लो ओर सतलज में कुलफ़ी जम जाये। अगली बार हम पूरी तैयारी के साथ यहाँ आएँगे।

      उसके लिये तो जाड़े के मौसम का इन्तज़ार करना होगा। जाड़ों में कुलफ़ी का मज़ा ही और होता है। संजय कल्पना का आनन्द ले रहा था।

        प्रकृति में कितना कुछ है, संजय-जितना ही डूबो-डूबते ही जाओ। अनुपमा जैसे सपना देख रही थी।

       तुम्हारा फ़िलॉसफर जाग जाये उसके पहले चल दीजिए, मैडम, वर्ना यहीं बैठे रह जायेंगे। पैंट की क्रीज ठीक करता संजय उठ खड़ा हुआ।

       बाई दि वे, आपके पाँव की जलन अब कैसी है, मिस अनुपमा सि़द्धार्थ?

      आपकी सेवा बेकार नहीं गई, एकदम ठीक हूं, चलें?

     ‘नाल-डेहरा’ पहुंचते-पहुंचते अनुपमा को सचमुच तेज भूख लग आई थी।

     संजय, तुम्हारा नुक्सान हो गया।

      वो कैसे?

        गंधक के पानी ने पूरा असर दिखाया है, इतनी ज़ोर से भूख लग आई है कि तुम्हारा बिल डबल हो जायेगा।

       बस इतनी सी बात है? आपके लिये तो हमारी जान भी हाज़िर है। इस छोटे से बिल के लिये परेशान हो, हमें निराश कर रही हो जानेमन।

फिर डायलॅागबाजी! तुम्हे तो कोई नाटक कम्पनी ज्वाइन करनी चाहिए थी। अपना एक्टिंग छोड़ पहले लंच का आर्डर प्लेस करें एजनाब। अनुपमा ने रोष दिखाया था।

  ऐट योर सर्विस मैम ......वेटर.........।

     सच, आज मज़ा आ गया। पहले से जानती तो आज तक न जाने कितनी बार यहाँ आ चुकी होती। पापड़ दाँत से काटती अनुपमा ने कहा था।

     पहले कैसे आ पातीं? यहां तक ढ़ोकर लाने को कोई चाहिए था न?

    अच्छा तो तुम मुझे ढोकर लाये हो? तुम नहीं तो कोई और मिल जाता...........।

   कोई और कैसे मिल जाता-? तुम्हारी किस्मत में तो मेरा साथ लिखा था।

    ठीक कहते हो, संजय, यहाँ न आती तो क्या तुम मिलते?

    अरे इसीलिए तो कहा जाता है जोड़े ऊपर बनकर आते हैं, वर्ना तुम यहाँ आती ही क्यों?

      सच, जब यहाँ के एडमीशन की इन्फ़ार्मेशन घर पहुँची तो शिमला आने का खूब विरोध हुआ था। दादी ने तो खाना छोड़ने तक की धमकी दे डाली थी, संजय।

    फिर कैसे आ पाई, अनु?

     अम्मा ने जो साथ दिया था। पापा से कहा था कि आज अकेली लड़की अमरीका इंग्लैंड तक जा सकती है हमारी अनु शिमला ही तो रहेगी। इंजीनियर बन अपने पाँव पर खड़ी हो सकेगी, किसी की मोहताज तो न रहेगी।

       तुम्हारी माँ तुम्हारी नौकरी के फ़ेवर में हैं, अनु? हमारी कम्यूनिटी की यही खराबी हैं, लड़कियों की नौकरी को सम्मानजनक नहीं माना जाता।

      तुम भी ऐसा ही सोचते हो, संजय?

      अभी मैं निर्णय ले सकने की स्थिति में नहीं हूं, अनु! कभी कुछ बन सका तब सोचूँगा। तुम्हारे पापा आसानी से तुम्हें शिमला भेजने को राजी हो गए थे, अनु?

      अम्मा और मेरी ज़िद के आगे पापा को हथियार डालने पड़ गए थे......अन्ततः उनकी इकलौती बेटी हूं न। जरा सा दर्प छलक आया था अनु के स्वर में।

      यू आर रियली लकी, अनु तुम जो चाहो पा सकती हो।कुछ गंभीर स्वर मे संजय ने कहा।

     जैसे तुम कम लकी हो, संजय-तुम्हें किस बात की कमी है? जो चाहोगे-पाओगे। मेरा विश्वास करो।

      तुम बहुत अच्छी हो, अनु। सोचता हुँ पहले दो वर्ष हम अजनबी क्यों बने रह गये?

       तुम्हारी नज़र ओर लड़कियों पर जो लगी रहती थी.......मुझ पर दृष्टि कहाँ पड़ी थी? कुछ शोखी से अनुपमा ने जवाब दिया।

       अपना भाग्य सराहो, मैंने सिर्फ़ तुम पर निगाह डाली है, वर्ना लड़कियों की क्या कमी थी

       बड़े आए अपने मुंह-मिया मिट्ठू। वैसे जनाब हम भी किसी से कम नहीं। मेरे लिये आपकी यह दीवानगी इस सत्य की साक्षी है।

    दीवानगी तो ठीक है, पर अब भविष्य मुझे चिन्तित कर रहा है, अनु।

      भविष्य की चिन्ता तुम्हें क्यों? एक माह बाद फ़ाइनल परीक्षा होगी और तुम्हें आराम से कहीं अच्छा जॉब मिल जायेगा, संजय।

      परेशानी सिर्फ़ जॉब की ही तो नहीं है........जीवन में तुम आई हो, क्या तुम्हें बीच रास्ते मे छोड़, कहीं जा सकता हूं, अनु

      क्या मैं इतनी गई-गुजरी हूं कि मुझे लेकर तुम परेशान हो,संजय? अनुपमा उदास सी थी।

      ऐसी बात नहीं हैंए अनु, पर माँ-बाबूजी भी तो अपने एकमात्र पुत्र के विवाह के लिए कुछ अरमान रखते होंगे। विजातीय विवाह पर वे आपत्ति तो अवश्य करेंगे।

      ये बातें तुमने पहले नहीं सोची थीं, संजय? अनुपमा का स्वर तनिक तिक्त हो आया था।

      इश्क पर ज़ोर नहीं चलता, डार्लिंग। वैसे भी यह मेरी प्रॉब्लेम है, मैं ही सॉल्व करूँगा। तुम्हारे लिए चपाती और मंगाऊं?। संजय वैसे ही सहज हो आया था।

     न ......अब भूख नहीं रही। अनुपमा ने प्लेट सरका दी थी।

    चियर-अप माई डियर। एक वह सीता जी थीं पति के साथ जंगल-जंगल घूमी, यहाँ जरा सी बात पर भूख-हड़ताल की जा रही है। हे भगवान, कैसे कटेगी ये ज़िन्दगी। संजय की नाटकीय मुद्रा पर अनुपमा हॅंस पड़ी।

गर्ल्स-होस्टेल में ड्राप करते संजय को अनुपमा ने जब ‘थैक्स’ देने के लिए मुंह खोलना चाहा, तो अचानक उसके अधखुले अधरो पर संजय ने अपना स्नेह चुम्बन अंकित कर, मोटर साइकिल तीव्र गति से भगा ली।

फ़ाइनल परीक्षा के अंतिम दिन अनुपमा उदास हो उठी। कल उसे वह होस्टेल, संगी-साथी छोड़, घर चले जाना था। घर जाने की खुशी के स्थान पर गहरे अवसाद ने उसे घेर लिया था। संजय से मिलने के पूर्व कॉलेज का जीवन नितान्त नीरस सा था। छुट्टियों में घर जाने के लिए वह कितनी व्यग्र हुआ करती थी, पर आज घर जाना कितना कठिन लग रहा था। संजय का उसके जीवन में आगमन कितना सहज और स्वाभाविक लगा था।

  लोकल गार्जियन की बेटी शिखा, संजय के मित्र की बहिन थी। पहली बार संजय से बातचीत शिखा के घर में ही हुई थी-
 
   हलो, अनुपमा। संजय ने अनु से कहा।

   हलो........? अपरिचय का भाव अनु के चेहरे पर स्पष्ट था।

     कमाल हैं, अपने क्लासमेट को यूँ देख रही हैं मानो कोई अजनबी हूं। आपके ठीक पीछे बैठता हूं, हमेशा का बैक- बेंचर रहा हूं। संजय के चेहरे पर मुस्कान थी।

   ओह .........। अनुपमा ने जैसे आश्वस्ति की श्वास ली थी।

   एक बात बताइए, एक्जाम्स में इतने अच्छे मार्क्स हमेशा कैसे पा लेती हैं आप?

     कोई ख़ास बात तो नहीं, बस यूँही.........।

      मैं बताऊं संजय भइया, अनुपमा दीदी आपकी तरह घूमने में समय जो व्यर्थ नहीं करती। अगर आप भी सिर्फ़ पढ़ाई पर ध्यान दें तो आपको भी अच्छे नम्बर मिल सकते हैं, संजय भइया।  शिखा ने गम्भीरता से उत्तर दिया था।

      हियर.........हियर..........आपकी सलाह सिर-आँखों और कोई हुक्म? सब हॅंस पड़े थे।

प्रायः शिखा के परिवार की पिकनिक, पार्टीज में अनुपमा के साथ संजय भी सम्मिलित होता था। धीमे-धीमे अनुपमा का संकोच कम होता गया था। संजय को अनुपमा के गाम्भीर्य और सौन्दर्य ने आकृष्ट किया था, और अनुपमा उसके खुले स्वभाव पर मुग्ध हुई थी। अनुपमा के गाम्भीर्य का कवच भेद, संजय उसके हृदय के इतने नजदीक पहुंच गया था कि आज उससे बिछोह अनुपमा को असंभव लग रहा था।

घर वापिसी के समय संजय अनुपमा को छोड़ने स्टेशन आया था। अनुपमा के उदास मुख पर संजय हॅंसी ले आया था-

      घर पहुंच हमें भूलने की जुर्रत मत करना, अनु। कोई दूसरा खोज लिया तो उसका हत्यारा मैं ही बनूंगा-समझीं।

अगर तुमने देर की तो अम्मा-पापा प्रतीक्षा नहीं करेंगे। उन्हें मेरे फ़ाइनल एक्ज़ाम्स की ही प्रतीक्षा थी, वर्ना अब तक डोली पर बिठा, विदा कर दी गई होती।

मेरे रहते अनु की डोली किसी और के घर में नहीं जा सकती, ये बात माँ-पापा को ठीक से समझा देना, अनु।

चलती गाड़ी से अनु देर तक संजय को हाथ हिलाते देखती रही।

घर में अम्मा-पापा से अधिक दादी उसके लिए व्यग्र थीं।

      चल छोकरी की ज़िद पूरी हो गई-इंजीनियर बन आई। अब तो इसके हाथ पीले कर बेटा, वर्ना मैं चैन से मर भी न सकूंगी।

    वाह दादी, बियाह मेरा नहीं होगा और चैन से दादी नहीं मरेंगी..........भला ये भी कोई बात हुई।

     हाय राम, जरा लड़की की बातें तो सुनो। इसीलिए कहते हैं, लड़की को जियादा न पढ़ाओ। दस गज की लम्बी जबान चलाए है छोकरी। दादी क्रुद्ध हो उठी थीं।

      अम्मा, तुम सब मेरी चिन्ता छोड़ दो। कुछ ही दिनों में मुझे माँगने वह आएगा।

    कौन आएगा अनु , कहीं कुछ उल्टा-सीधा तो नहीं कर आई है, बेटी; मेरे नाम को तो नहीं लजाएगी? अम्मा व्यग्र हो चुकी थीं।

     नहीं अम्मा, तुम्हारी बेटी ऐसी गलती नहीं कर सकती। कुछ दिन और प्रतीक्षा करो, सब ठीक हो जाएगा।

संजय का पत्र पाकर अनुपमा का मन फीका पड़ गया-

मेरी अनु,

माँ-बाबूजी को समझा पाना कितना कठिन है............बात-बात में समाज और रीति-रिवाजों की दुहाई देते हैं। मेरे विजातीय विवाह के कारण मेरी दो छोटी बहिनों का भविष्य प्रभावित हो सकता है। एक रास्ता है. अगर उनके विवाह में भारी दहेज दे दिया जाए तो शायद उनका रिश्ता अच्छे परिवारों में हो सके, पर मेरे वेतन से यह शर्त पूरी कर पाना संभव नहीं है, अनु।

मेरी बात, मेरी परेशानी समझ रही हो न; तुम्हारे सिवा किसी अन्य की कल्पना भी नहीं कर सकता वर्ना माँ-बाबूजी ने तो धनाढ्य परिवारों की एकलौती लड़कियाँ मेरे लिए देख रखी थीं, पर किसी ओर से विवाह के लिए वे मुझे राजी नहीं कर सकते।

मेरी अनु, तुम अपने पापा को राजी करके मेरे बाबूजी के पास भेज दो। तुम्हारी ज़िद वे ज़रूर मान जाएँगे। एक बात और कहनी है, दहेज में बाबूजी की जो भी माँग हो, उसे अपने पापा से कहकर स्वीकृति दिला देना। हम दोनों मिलकर पापा का दिया सब वापिस कर देंगे (सिवाय उनकी बेटी के), यह मेरा वादा है। हम दोनों अलग तो नहीं है न? इसी विश्वास से यह सब लिख रहा हुँ। बहुत याद आती हो।

प्यार सहित-

तुम्हारा ही संजय

अनुपमा के उदास मुख को ताकती अम्मा चिन्तित हो उठी थी।

        किसका पत्र है, अनु? कोई बुरी खबर तो नहीं है, बेटी?  प्रत्युत्तर में पत्र माँ को थमा अनुपमा मौन रह गई थी।

       तेरी क्या सम्मति है, बेटी?  तेरी खुशी में हमारी खुशी है, पर निर्णय सोच-समझ के लेना। शुरू में ही जहाँ अड़चने हैं, वहाँ आगे की सोच, मुझे तो डर लगता है।

       बस इतना जान लो अम्मा, मैं संजय के बिना जी नहीं सकूंगी। अश्रुपूरित नयनों के साथ, माँ के कंधे पर सिर रख अनुपमा सिसक पड़ी थी।

     मैं समझ गई। तेरे पापा को मैं राज़ी कर लूंगी, अनु।

   माँ-बेटी की जिद पर पापा, अनुपमा के विवाह का प्रस्ताव ले, संजय के घर गए थे। वे दो दिन अनुपमा ने बेहद बेचैनी में काटे थे।

घर वापिस आए पिता के मुख पर संतोष देख अनुपमा जी गई थी।

       लड़का होनहार और समझदार है, अनु की माँ। उसके माँ-बाप को पैसे का लालच ज़रूर है, पर हमें कौन-सी अपनी जायदाद साथ ले जानी है। मैंने कह दिया मेरी एक ही बेटी है, सब कुछ उसी का है।

अम्मा-पापा ने जी खोल विवाह में खर्च किया था। संजय के पिता की माँग की लम्बी सूची देख दादी रूष्ट हो उठी थीं-

       भला ये भी कोई बात हुई? कंगलों में बेटी दे रहे हो। हमारे दिए से घर भरेंगे।

      ऐसे कुबोल न बोल, अम्मा। अरे लड़के ने तो साफ़ कहा था उसे हमारा कुछ नहीं चाहिए, पर बाप के आगे विवश है। पूरा घाघ है संजय का पिता, फिर हमारे पास क्या कमी है? इतना देकर क्या हम कंगाल हो जाएँगे? पापा ने हॅंस कर बात टालनी चाही थी।

       और अम्माजी जब हम अपनी लड़की ही दे रहे हैं, तो और सब सामान की क्यों चिन्ता करें? सब कुछ उसी का तो है। अनुपमा की माँ ने सास को समझाना चाहा था।

धूमधाम से विवाह के बाद अनुपमा ससुराल पहुँची थी। ससुराल के छोटे से दरबेनुमा घर को देख अनुपमा का जी कसक उठा था। यह घर देखकर भी पापा ने उसके विवाह के लिए अपनी स्वीकृति दी थी? पापा कर भी क्या सकते थे, लाड़ली बेटी का हठ उन्हें विवश बना गया था।

अपने कमरे के लिए सीढ़ियाँ चढ़ती अनुपमा उदास हो उठी। । घूंघट काढे बैठी अनु को देखने आई औरतें बार- बार घूंघट हटा उसे तौलती सी लगतीं । अनु की परेशानी के जवाब मे संजय ने कहा--
         नई बहू  के मुख को देखने को मेला जुटता है, बाद में कौन पूछता है। चार दिन इसका भी आनन्द उठा लो, अनु। कितनी सहजता से संजय ने समझा दिया था।

अनगिनत रीति-रिवाज निभाती पूजा-आरती करती अनुपमा थक गई थी। जमाना कहाँ बदला था-उसकी इंजीनियरिंग की डिग्री का क्या मूल्य था? और तो और अपने घर के पुरातनपंथी आचार-विचार को पूर्ण निष्ठा से निभाता संजय भी अनुपमा के लिए एक नया व्यक्ति था। हर बात में माता-पिता के सेंटीमेट्स का हवाला दे, वह अपने को सर्वथा मुक्त रखता था।

विवाह के दो माह बाद दिल्ली के एक कार्यालय से अनुपमा के लिए साक्षात्कार में उपस्थित होने का पत्र आया था। प्रसन्नता से अनुपमा खिल उठी-

    सोलह जुलाई को दिल्ली में इन्टरव्यू अटेंड करना है। रिजर्वेशन कराना है, संजय, वहाँ मेरे कजिन रहते हैं, वह मुझे रिसीव कर लेंगे।।

   तुम दिल्ली में जॉब लोगी?

इतना अच्छा चांस छोड़ना क्या बुद्धिमानी है!

     मैं शिमला रहूंगा और तुम दिल्ली में नौकरी करोगी!  नौकरी का ऐसा ही शौक था तो शादी क्यों की, अनु! संजय के रूखे स्वर पर अनुपमा चैंक गई थी।

    यह क्या कह रहे हो! शिमला में तुमने ही तो जॉब नहीं लेने दिया था, संजय............।

     वह तो ठीक ही था, अनु। घर की बहू नौकरी करेगी तो क्या माँ-बाबूजी अपने समाज में सिर ऊंचा करके चल सकेंगे!  नन्दा-मन्दा के विवाह में पहले ही इतनी मुश्किलें आ रही है.......तुम हमारी कम्यूनिटी को नहीं जानतीं, अनु। पहले ही गैर-जाति में विवाह करने के कारण माँ-बाबूजी के लिए कम मुश्किलें नहीं खड़ी कर चुका हूं, अब तुम उनकी और मुश्किलें न बढ़ाओ।

     मुझसे विवाह का निर्णय तुम्हारा भी तो था, संजय...... अनुपमा का स्वर बेहद आहत था।

     मैंने कब कहा यह तुम्हारा ही निर्णय था। नंदा-मंदा का विवाह हो जाने दो, फिर जो जी चाहे करना। वाक्य पूरा करता संजय आवेश में बाहर चला गया था।

अनुपमा स्तब्ध खड़ी रह गई थी। विवाह के पूर्व तो संजय अनुपमा की नौकरी के पक्ष में था-

      कुछ दिन हम दोनों काम करेंगे फिर अपनी कंसलटेंसी शुरू कर देंगे। हमारी फर्म का नाम होगा .अनुसंजय। क्यों पसन्द आया ये नाम! संजय मानों स्वप्न देखता था।

        पर मैनेजिंग डाइरेक्टर मैं ही रहूंगी- तुम अकाउंट सम्हालना, संजय। मुझे अकाउंट्स का काम पसन्द नहीं।

         आपकी आज्ञा शिरोधार्य, मैडम।

विवाह के बाद जब अनुपमा ने अपने जॉब की बात की थी तो घर में सन्नाटा खिंच गया था-

        संजय अगर बहू ने नौकरी की तो हम मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे। हमारी दो बेटियों को कौन ब्याहेगा। संजय के पिताजी दहाड़ उठे थे।

         बहू की नौकरी का शौक हमारे मरने के बाद पूरा कर लेना। इसीलिए तो हम डरते थे-ऐसी लड़की हमारे साथ कैसे निबाहेगी।

माँ ने आँचल आँखों से लगा लिया था।

अनुपमा ने शुरू से स्वावलम्बी बनने का स्वप्न देखा था। पर्याप्त धन-सम्पत्ति होते हुए भी माँ कई बार कितनी दयनीय और निरीह लगती थीं। पुत्र का अभाव पापा को सदैव सालता रहा। कई बार माँ की ज़रूरतें भी पापा को फ़िजूल खर्ची महसूस होती थीं। उन अवसरों पर अम्मा अनुपमा के सामने रो पड़ती थीं-

          काश में भी पढ़ी-लिखी, होती चार पैसे कमाती तो हर बात के लिए दूसरों का मुंह तो न ताकना पड़ता, अनु।

माँ का वह निरीह रूप अनुपमा के स्वावलम्बी स्वरूप की प्रेरणा बना था। माँ ने भी उसे शुरू से ही अपने पैरों पर खड़ी होने का पाठ घुट्टी में पिलाया था, पर आज अपनी डिग्री के साथ भी वह क्या स्वावलम्बी हो सकी है।

चार-पाँच माह अनुपमा ने जिस मानसिक-यंत्रणा में गुजारे, वही जानती थी। संजय ने आफिस के बाद प्राइवेट कंसलटेंसी का काम भी शुरू कर दिया था। अपने को उसने इस कदर व्यस्त कर लिया था कि देर रात में वह घर बस सोने भर के लिए पहुंच पाता था।

         तुम समझती क्यों नहीं अनु, मैं ये जी-तोड़ मेहनत क्या अपने लिए कर रहा हूं? मुझे अपना स्टेटस ऊंचा करना है ताकि नया घर बना सकूं। मैं जानता हुँ यह घर तुम्हारे लायक नहीं है।

        मैं भी तो तुम्हारे काम में साथ दे सकती हूं, हम दोनों मिलकर जल्दी ही लक्ष्य पर पहुंच सकते हैं, संजय। वैसे भी घर में पड़े-पड़े बोर ही तो होती हूं।

      देखो अनु व्यर्थ की बहस मत करो। घर में क्या काम की कमी है? बेचारी माँ अकेली ही खटती है। एक बात और जान लो, मुझे तुम्हारे सहारे ऊपर नहीं उठना है। मुझमें अपने आप कुछ कर गुजरने की क्षमता है। बहुत रात हो गई है, कुछ देर चैन से सोने दोगी या बाहर कहीं जाकर पड़ रहूं।

खिसियाई अनु तकिये में मुंह गड़ा रो पड़ती। कभी उसका जी चाहता सोते संजय को झकझोर जगाकर उससे पूछे-

       सच कहो मुझसे विवाह क्या तुमने अपना स्टेटस ऊंचा करने के लिए नहीं किया था? परिचितों के बीच अपने फादर-इन लॉ के पद-नाम का उल्लेख तुम कितने गर्व से करते हो। पापा से इतना सब पाकर तुमने उनके लिए क्या किया है, संजय! पापा की बीमारी की ख़बर पाकर भी तुम अपनी व्यस्तता के कारण उन्हें देखने न जा सके थे! तुमने तो पापा के पुत्र के अभाव को पूरा करने की बात की थी, संजय। नहीं संजय नहीं......तुम एक बहुत सफल अभिनेता हो, बस।

तकिए पर ढुलके अश्रु-कण, तकिया किस आसानी से सोख लेती थी कि संजय तक कभी भी उनकी नमी नहीं पहुँच सकी।

माँ बनने का स्वप्न अनुपमा ने भी देखा था। अम्मा हमेशा कहती थी-

        तेरे आने के बाद से मैंने कभी अपने को अकेला नहीं पाया अनु, वर्ना तेरे पापा के साथ भी मैं कभी अपने को बहुत अकेला पाती थी- -

डाक्टर ने जब कन्फ़र्म कर दिया तो अनुपमा ने बहुत उत्सुकता और लाड़ से संजय पर दृष्टि डाली थी, अन्ततः उन दोनों के प्यार का प्रतीक अंकुरित होने वाला था। संजय का प्रश्न अनुपमा को व्याकुल बना गया था-

        डाक्टर मैं जानना चाहूंगा हमारा बेटा आने वाला है या बेटी!

      इससे क्या फर्क पड़ता है! आपकी तो यह पहली सन्तान है, वह स्वस्थ जन्मे,यही चाहिए न! हाँ दूसरे बच्चे के जन्म के लिए थोड़ा गैप रखिएगा।

         नहीं डाक्टर मुझे बेटी नहीं चाहिए, किसी भी हालत में हम उसे स्वीकार करने की स्थिति में नहीं है।

         पर क्यों, आप्को क्या कमी है? डॉक्टर का विस्मय स्वाभाविक था।

        यह मेरा व्यक्तिगत मामला है। आप अनु के भ्रूण का परीक्षण कब करेंगी डॉक्टर?

         पर इसके लिए अनु की स्वीकृति भी तो चाहिए, संजय जी।

          मेरी इच्छा ही अनु की इच्छा है डॉक्टर-यह मेरी पत्नी है। आप भ्रूण-परीक्षण की डेट दे दीजिए। मै देर नहीं करना चाहता।

        अगर ऐसा है तो अगले महीने की तीस तारीख को आ जाइए, पर मैं अब भी कहती हूं, आप दोनों इस विषय में अच्छी तरह सोच-समझ कर ही निर्णय लें। सन्तान पर माँ-बाप दोनों का समान अधिकार है। डॉक्टर का स्वर गम्भीर था।

घर लौटती अनुपमा मौन रही थी, संजय पूरे रास्ते जैसे स्वंय को स्पष्टीकरण देता जा रहा था-

           तुम समझ नहीं सकतीं अनुपमा, अभी हमारे ऊपर कितनी जिम्मेदारियाँ है। अभी हम एक और लड़की का दायित्व उठाने की स्थिति में नहीं हैं। नंदा-मंदा से मुक्त हो लें तब देखा जाएगा। बेटे को तो पढ़ा-लिखा दिया, बस हमारा दायित्व पूर्ण हो जाता है। दहेज का भी झंझट नहीं...........

        बल्कि बेटे की शादी में लिए गए दहेज से हमारा घर भर ही जाएगा............।

        बिल्कुल ठीक कह रही हो। बस याद रखना अगली तीस को डॉक्टर सूद के पास ठीक समय पहुंचना है।

अपने उत्साह में अनुपमा के स्वर में घुले व्यंग्य को भी संजय ने नहीं सुना था। अचानक पच्चीस तारीख को बड़ी मनुहार के साथ अनुपमा ने संजय से अनुरोध किया था-

         एक बार ‘तत्ता पानी’ फिर जाने का बहुत मन है, संजय, ले चलोगे?

        इस कंडीशन में उतनी दूर मोटर-साइकिल में जाना क्या ठीक होगा, अनु!

       हम टूरिस्ट-बस या टैक्सी से भी तो जा सकते हैं.......प्लीज संजय।

        ओ0के0। तुम भी क्या याद रखोगी ऐसा दिलदार पति मिला है। इसी वीकेंड में चलते हैं.......नंदा-मंदा को भी साथ.......।

        न न, यह अनुरोध मैंने सिर्फ़ अपने लिए किया था संजय, परिवार के साथ फिर कभी..

        तुम्हें मेरे परिवार वाले अच्छे नहीं लगते, अनु?

           क्या यह मेरा परिवार नहीं है, संजय? पर कभी कोई पल तुम्हारे साथ अकेले बाँटने की आकांक्षा भी तो अस्वाभाविक नहीं है न?

          ठीक है, तुमसे बहस में जीतना कठिन है। तुम्हारी ही बात रही, सैटरडे को दस बजे निकल सकोगी?

         तुम्हें प्रतीक्षा नहीं करनी होगी, संजय।

शनिवार को ठीक दस बजे कार का हार्न सुनाई पड़ा था। अनु तुरन्त बाहर आ गई , शायद उसकी सुविधा के लिए संजय ने टैक्सी अरेंज की थी। बाहर संजय के मित्र कैलाश नाथ की लाल मारूति में, सामने वाली सीट पर कैलाश के साथ संजय उसकी प्रतीक्षा कर रहा था।

           हलो अनु भाभी, कैसी हैं?

          थैंक्स! आप बाहर क्यों बैठे हैं, आइए।

               अरे उसे घर आने का निमंत्रण दे रही हो, अभी सत्तर किलोमीटर जाना है। व्यर्थ की फ़ार्मेलिटी छोड़ो और जल्दी से आ जाओ, देर हो रही है। संजय का स्वर खीजा सा था।

         क्या कैलाश जी भी जा रहे हैं?

                उसे तो नाल-डेहरा जाना था, पर मेरी रिक्वेस्ट पर ‘तत्ता पानी’ तक चल रहा है। सच्चा यार है मेरा........।

              ऐसे ही जाने को तैयार नहीं हुआ हूं। मेरी शर्त है कि लंच अनु भाभी ही खिलाएंगी। कैलाश जोर से हॅंस पड़ा था।

        आप क्यों व्यर्थ उतनी दूर जाएँगे?  हम लोग फिर कभी और चले जाएँगे। अनु का स्वर बुझा-सा था।

        अब बेकार का झन्झट मत खड़ा करो। तुम्हारी ही ज़िद पर पूरा दिन वेस्ट कर रहा हूं, वर्ना मुझे वहाँ जाने में कोई इन्टरेस्ट नहीं था। संजय झुंझला उठा ।

       ओह समझा। भई संजय यह तो तुम्हारी ज्यादती है। भाभी तुम्हारे साथ अकेले जाना चाहती थीं और तू मुझे पकड़ लाया। विश्वास कीजिए भाभी मैं कवाब में हड्डी नहीं बनूँगा। नाल डेहरा तक तो मुझे टॉलरेट कर सकतीं हैं न?

        नहीं .........नहीं वैसी कोई बात नहीं थी, मैं तो आपके कष्ट का सोचकर ही कह रही थी.......। अनु संकुचित सी थी।

    अब आ भी जाओ, अनु वर्ना पूरा दिन यहीं बीत जाएगा। संजय रूष्ट हो उठा।

‘तत्ता पानी’ पहुंच अनुपमा ने एक पल के लिए भी संजय की प्रतीक्षा नहीं की थी। सीधें ऊंची कगार से उतरती अनु सतलज तट पर जा पहुँची थी। पीछे से लगभग भागता आया संजय हाँफ उठा था।

             ऐसी भी क्या जल्दी थी,  मुझे भागकर आना पड़ा।

अनुत्तरित अनुपमा दोनों पाँव सहित सीधे गर्म जल-कुंड में जा खड़ी हुई थी। जल की उष्णता का ताप कपोलों पर उतर आया था। नयन छलछला से उठे थे। चारों ओर दृष्टि डालता संजय अनुपमा को वहाँ खड़ा देख  चौंक उठा था-

        ये क्या पागल हो गई हो? पाँव में छाले पड़ जाएँगे, तब पता लगेगा।

        याद है संजय, इसी उष्ण जल का ताप हरने को तुमने अपने रूमाल को सतलज में भिगो-भिगो कर मेरी जलन दूर की थी?

      अब भी मुझसे उसी पागलपन की अपेक्षा रखती हो। जल्दी बाहर आओ।

      नहीं अब मै उस भावुकता की अपेक्षा नही रखती। जानते हो इसी जल-कुँड.....नहीं अग्नि-कुंड से पाँव बाहर निकालने के बाद मैंने तुम्हें वरण करने का निर्णय लिया था, और आज इसी अग्नि-कुंड में खड़े हो मैं तुम्हें त्यागने का संकल्प ले चुकी हूं, संजय।

     कैसी बहकी-बहकी बातें कर रही हो, अनु बस यही बताने, यहाँ इतनी दूर आई हो!

      हाँ संजय, उस दिन मैं विस्मित हुई थी-सतलज के इतने ठंडे जल के साथ इतना गर्म पानी अपना अलग अस्तित्व कैसे बनाए हुए है।- उसका सत्य अब पा गई हूं। मेरा उत्तर तुम हो संजय-विरोधाभास का साकार रूप। विवाह के पहले और बाद वाले संजय के अन्तर के समक्ष इतना फ़र्क तो नगण्य है, संजय। मैं सतलज नहीं बन सकी, वर्ना तुमसे एकाकार कर गुरगुनाती ऊष्मा बन जाती। मैं तुम्हारे साथ नहीं बह सकी, संजय...........।

     तुम्हारा फ़िलॉसफर फिर जाग गया है, अनु! चलो घर भी लौटना हैं। संजय कुछ परेशान हो उठा था।

संजय ने जबरन अनुपमा को उस जल-कुँड से बाहर निकालना चाहा था, पर अनुपमा ने अपने कॅंधे से उसका हाथ हटा दिया। गर्म जल-कुंड से बाहर निकल सतलज के शीतल जल में पाँव डाल अनुपमा वहीं एक शिला पर बैठ गई।

      मैं कल शिमला छोड़ रही हूं, कहीं जॉब ले लूंगी। एक बात और बतानी थी-मैं अपनी बेटी को जन्म दूंगी, यह मेरा दृढ संकल्प है। तुम्हारी इच्छा-अनिच्छा से मेरी बेटी का जन्म नहीं होगा। मेरी इच्छा तुम्हारे अधीन नहीं है, संजय।

      तुम डॉक्टर से कब मिलीं अनु, मुझे बताया भी नहीं!  संजय चैंक गया था।“

     अपनी बेटी के जीवन के लिए ही नहीं, अपने लिए भी मुझे तुमसे दूर जाना ही होगा,संजय। वैसे भी जिसका अस्तित्व ही तुम्हें भयभीत करे, उस बेटी से तुम्हारा क्या नाता?  शायद अनु के स्वर में हल्की आर्द्रता आ गई थी।

     अच्छा पहले घर तो चलो, वहाँ शांति से कोई निर्णय लेंगे। संजय ने मनुहार सी की थी।

      निर्णय तो पहले ही ले चुकी थी, संजय । इस तीर्थ-स्थल पर तो तुम्हारे सामने अपना संकल्प दोहराने भर आई थी। एक स्वप्न जीने ओर खंडित होने के लिए हमेशा तुम्हारी आभारी रहूंगी,संजय।

-अलविदा ‘तत्ता पानी’, अलविदा, संजय ............।

सधे कदमों से पग बढाती अनुपमा और पीछे-पीछे बोझिल कदम धरता पराजित-सा संजय-निरन्तर दूर और छोटा होता हुआ-

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