12/16/09

मोहभंग

यस ...विनती अधिकारी स्पीकिंग ........


हाय विन्नी ! कैसी है ? फोन के दूसरी ओर से शैली की चहकती आवाज सुनाई दी थी।

ठीक चल रही हूँ, अपनी बता ?

अरे यार मजा आ गया, जानती है समीर आया हुआ है। तेरा फ़ोन नम्बर दे दिया है, ताज्जुब है उसके पास तेरा नम्बर नहीं था, एनी हाओ-कॉल करेगा।

क्या ... आ  अच्छा, कब आया ?

बहुत सम्हालनें पर भी विन्नी की आवाज लड़खड़ा गयी थी।

कल ही तो आया है। यहां कोई इन्टरनेशनल सेमिनार है - प्रवासी भारतीयों की समस्या पर, आते ही फ़ोन किया। मुझे तो एकदम सरप्राइज मिला। उसे अभी भी हमारी याद है। सबके बारे में पूछ रहा था।

शैली थोड़ी देर बाद फ़ोन कर ले तो चलेगा ? अभी डायरेक्टर की मीटिंग होने वाली है।

ओ के यार ! तू तो हमेशा बिजी ही रहती है, कभी अपने लिए भी वक्त निकाल लिया कर, वर्ना उसी आफिस में दफन हो जाएगी। हां समीर से जो बातें हो, बताना मत भूलना। बाय ! बाई दि वे लगता है बीबी का गुलाम बन गया है तुम्हारा हीरो, बीबी की हर अदा पर कुर्बान जाता है। तारीफों के पुल बांध रहा था।

फ़ोन क्रेडिल पर रख विनती सोच में पड़ गयी थी। इसी शहर में समीर कल से आया हुआ है और उसे कॉल भी नहीं किया ? शायद उसकी पत्नी को समीर और विनती के संबंधों पर आपत्ति हो, पर क्या उस संबंध को यूं आसानी से भुलाया जा सकता है ? विनती अपने को जबरन भुलावा दे रही थी।

फोन की घंटी पर विनती का पूरा शरीर सजग हो उठा था। क्या कहेगा समीर ... इतने वर्षो बाद उसकी आवाज सुन, क्या वह सहज रह सकेगी ? घड़कते दिल से विनती ने फोन उठाया था ..........

.......... हलो .......।

जी मैं लाइन दे रही हूँ, प्लीज होल्ड दि लाइन।

मैनेजिंग डाइरेक्टर के लिए मिस्टर बिरमानी का फोन था। कल शैली ने समीर को विनती का नम्बर दे दिया, फिर भी अभी तक उसने कॉल नहीं किया ? पहले तो मम्मी-पापा घर से बाहर कहीं गए नहीं कि समीर फ़ोन पर चालू हो जाता था।

हाय वीनू ! मुझे याद कर रही थीं न ?

ओह समीर ! तुम्हें किसी का डर नहीं, अगर मम्मी ने सुन लिया तो मुश्किल हो जाएगी।

इसीलिए तो मम्मी की ऐबसेंस में फ़ोन कर रहा हूँ।

तुम्हें कैसे पता मम्मी नहीं है ? विनती ताज्जुब में पड़ जाती।

मम्मी-पापा पांच मिनट पहले बाहर गए हैं, बोलों ठीक कहा न ?

तुम क्या ज्योतिषी हो समीर ? भोलेपन से सवाल पूछती विनती भूल जाती, समीर का घर ठीक उसके घर के सामने ही तो था। खिड़की के पास समीर की स्टडी-टेबिल थी। वहां बैठा समीर आसानी से विनती के घर आने-जाने वालों का हिसाब रख सकता था।

उस पड़ोसी-परिवार में पति-पत्नी और एक मात्र पुत्र समीर ही था। एम0एस0सी0 की पढ़ाई पूरी कर, समीर कम्पटीटिव एक्जाम्स की तैयारी कर रहा था।

विनती से समीर का परिचय यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी में हुआ था। पन्द्रह दिन किताब रखने के बाद विनती उसे फिर अपने नाम ईशू कराने गई थी। किताब पर नजर पड़ते ही लाइब्रेरियन ने शिकायत की थी।

आपने पहले ही पन्द्रह दिन ये किताब रख ली। अब ये किताब आपको फिर नहीं दी जा सकती।

क्यों नहीं दी जा सकती ?

क्योंकि इसकी औरों को भी डिमांड है, मिस।

ओ के तब मैं आज इसे वापस ही नही करती, जो फ़ाइन लेना है, ले लेना।

देखिए मिस, ऐसा गजब मत कीजिएगा। मुझे इस किताब की सख्त जरूरत है। एक्जाम में मैंने इन्टरनेशनल लॉ का स्पेशल पेपर ले रखा है। पूरा शहर खोज मारा, कहीं ये किताब नहीं मिली। पीछे से समीर ने अनुनय की थी।

मुझे भी अपने एक्जाम्स के लिए ही ये किताब चाहिए।

एक मिनट ..... आप पैंतिस नम्बर मनीलाल स्ट्रीट पर रहती हैं न ?

जी.....ई..... आप कैसे जानते हैं ? विनती अचकचा गई थी।

वाह ! तब तो बात बन गई। हम दोनों तो पड़ोसी निकले। अब तो पड़ोसी-धर्म निभाना ही पड़ेगा मिस ...। दिन में किताब मैं देख लूंगा, रात में आप रख लें।

अगर दिन में मुझे बुक कंसल्ट करना हो तो ?

फ़ोन कर दीजिएगा, बंदा किताब सहित तुरन्त हाजिर हो जाएगा, पर आज ये बुक मेरे नाम जाने दीजिए। क्यों बेकार का फाइन भरेंगी ? जेंटलमेन्स-वर्ड पर तो विश्वास है न ?

लइब्रेरियन ने भी उसकी सिफारिश की थी। उस किताब के आदन-प्रदान में दोनों अच्छे मित्र बन गए थे। कई बार विनती को जो बात समझ में नहीं आती, समीर उस कठिनाई को आसानी से समझा देता।

दोनों की भित्रता बढ़ाने मे उनका फोन भी सहायक बना था और अन्ततः दोनों इतने नजदीक आ गए कि एक दिन भी बिना बात किए उन्हें चैन ही नहीं पड़ता था। मम्मी-पापा को इस राज़ का पता कैसे चलता समीर तो उसे तभी फ़ोन करता था, जब वे कहीं बाहर निकले होते। रही बात समीर के घरवालों की, तो उसकी मां स्कूल में टीचर थीं। सुबह जातीं तो शाम के चार-साढ़े चार पर ही लौटतीं। उसके पापा तो बिजनेस के सिलसिले में अक्सर ही बाहर रहते।

सच तो यह था, समीर बहुत अकेला रह जाता था। विनती ने उसके अकेलेपन को भर दिया था। दोनों मिलकर दुनिया भर की बातें किया करते। एक के बिना दूसरा अपने को अधूरा पाता था।
एक दिन समीर ने कहा था-
समझ मे नहीं आता,इतने दिन  तुम्हारे बिना कैसे जी सका, वीनू ? अब तो एक पल का बिछोह नहीं सह सकता।

रहने दो, कल को आई0ए0एस0 बन गए तो याद भी नहीं रखोगे, विनती नाम की कोई लड़की भी थी। विनती ने चिढ़ाया था।

इतना ही जान सकीं अपने समीर को ? अपने को भूल सकता हूँ, पर विनती तो मेरी आत्मा की गहराइयों में है। प्राण रहते उसे भुला देना आसान नहीं है, वीनू। तुम्हें भुलाकर भला अपने को याद रख सकूंगा ? समीर ऐसी बातों में हमेशा भावुक हो जाता और विनती उसके आगे सारी शिकायतें भूल जाती।

एक्जाम्स की तैयारी के लिए समीर को दिल्ली जाना था। विनती की तो जैसे जान ही निकल गई, कैसे रह पाएगी उसके बिना ?

तुम तो यूं परेशान हो रही हो मानों मैं अपनी शादी के लिए जा रहा हूँ। तुम्हारे बिना क्या मैं खुश रह सकूंगा, पर यही तो हमारी परीक्षा का समय है। हम दूर रहकर भी पास रहेंगे, विन्नी।

बड़ी मुश्किल से समीर विनती को समझा सका था। समीर के जाने के बाद से तो गर्मी की लम्बी दोपहरियां और भी लम्बी और बोझिल हो उठी थीं। मम्मी उसके चुप से परेशान थीं। धीमे स्वर में पापा को चेतातीं ..............

लड़की की उम्र हो गई, आपको कोई चिन्ता ही नहीं है, देखते नहीं कैसी खोई-खोई रहती है।

मम्मी के डर पर पापा हंस पड़ते। तुम बेकार परेशान रहती हो, जब वक्त आएगा, सब ठीक हो जाएगा। याद करो इस उम्र में तुम क्या सपने नहीं देखती थी ?

मम्मी ने कई बार कुरेदना चाहा, पर विनती की ओर से निराशा ही मिली। उधर समीर से पत्र- व्यवहार भी तो संभव नहीं था। वह घर के पते पर उसे पत्र भेज नहीं सकता था और कालेज, गर्मी की छुट्टियों के लिए बन्द थे। स्कूल बन्द होने पर समीर की मम्मी भी उसके साथ दिल्ली चली गई थीं। दिल्ली में समीर के मामा का बड़ा भारी कारोबार था। उनके घर रहकर पढ़ाई करने में सुविधा ही सुविधा थी।

गर्मी की लम्बी छुट्टियां किसी तरह खत्म हुई, समीर की मां अकेली ही वापिस आई थीं। खिड़की से उन्हें अपना घर खोलते देख विनती उमग आई थी।

मम्मी वो सामने घर वाली आंटी आ गई हैं।

अच्छा-अच्छा। जा उनसे कह दे ! आज हमारे साथ ही खाना खाएं थोड़ी देर में चाय पहुंचा आना।

अच्छा मम्मी ! अभी आई। पंख लगे पावों के साथ विनती समीर के घर उड़ चली थी। उस समय मम्मी का वैसा प्रस्ताव कितना अच्छा लगा था।

नमस्ते आंटी ! मम्मी ने कहा है, आज आप हमारे यहां ही खाना खाएं। थोड़ी देर में चाय लेकर आती हूँ।

अरे नहीं, बेटी ! भाभी ने इतना खाना साथ रख दिया है कि चार दिन खत्म न हो। मम्मी को मेरा धन्यवाद देना, फिर कभी सही और हां चाय तो मैं पीती ही नहीं, इसलिए परेशान न हों। बस अब नहा-धोकर आराम करूंगी।

विनती को उस न से कितनी निराशा हुई थी। वैसे भी समीर की मां ज्यादा मिलनसार थीं भी नही। सामने पड़ जाने पर बस दुआ-सलाम भर से वास्ता रखती थीं। पूरा दिन तो स्कूल में निकल जाता, शाम को समीर के मन का खाना बनाने में टाइम चला जाता। कहीं आने-जाने की छुट्टी ही कब मिलती। हां जिन दिनों समीर के पापा घर आते, तीनों खूब शापिंग करते, रेस्ट्रॉज़ जाते। अपनी दुनिया में वे संतुष्ट और सुखी थे।

हिचकती विनती पूछ ही बैठी थी।

समीर जी की पढ़ाई कैसी चल रही है ? एक्जाम्स कब होंगे उनके ?

अरे उसे तो उसके मामा ने एम0बी0ए0 की पढ़ाई के लिए अमेरिका भेज दिया। भइया कहते हैं, आजकल नौकरी करके ज़िन्दगी बेकार करनी है। बिज़नेस में धन सम्पत्ति, मान-सम्मान सब है।

वह अमेरिका चले गए ? विनती की आंखें विस्मय में फैल गई थीं।

हां, परसों की फ्लाइट से चला गया। अब मैं भी अपना ट्रांसफर करा कर दिल्ली चली जाऊंगी। समीर के पापा का भी वहां काम अच्छा चलेगा। अच्छा बेटी फिर मिलेंगे।

विनती को विदा कर उन्होंने दरवाजा बन्द कर दिया था।

विनती को लगा था, उसके पैरों के नीचे सचमुच जमीन नहीं रह गई थीं खुशी में आदमी हवा में उड़ सकता है और दुख में, मन-मन भर भारी पांव होते हुए भी जमीन पकड़ में नही आती। समीर इतनी दूर चला गया, उससे विदा भी नहीं ली ? कोई संदेश नहीं, तसल्ली के दो शब्द नहीं ...........।

घर आकर वह पलंग पर ढह गई थी। अम्मा ने तब तक चाय तैयार कर ली थी। अरे विन्नी ! क्या हुआ ? ये ले चाय तैयार है, जरा आंटी को थमा आ।

नहीं मम्मी ! उन्हें चाय नहीं चाहिए। खाना भी उनके साथ है, उन्हें कुछ नहीं चाहिए।

पर ये तुझे क्या हो गया ? इत्ती धूप में भागी गई थी, कहीं धूप का असर तो नहीं हो गया, विन्नी ?

कुछ नहीं मम्मी, थोड़ी देर में ठीक हो जाऊंगी। परेशान मत हो।

चादर सिर तक ढांप विनती खूब रोई थी। समीर का बिछोह असह्य लग रहा था।

दूसरे दिन से ही उसने समीर के खत का इंतजार शुरू कर दिया, अच्छी तरह जानते हुए भी कि उतनी दूर से पत्र आने में कम से कम पन्द्रह दिन जरूर लग जाएंगे ! विनती रोज कॉलेज के नोटिस-बोर्ड पर लगी चिठ्ठियों में अपना नाम खोजती रही।

अन्ततः समीर का खत आया था। हजार-हजार बार माफी मांगकर अपने अचानक चले जाने की विवशता लिख भेजी थी। विनती के बिना वह कितना अधूरा है, वो समझ नहीं सकेगी। विनती के सारे गिले-सिकवे दूर हो गए, आंखें भर आई थीं। उतनी दूर होकर भी समीर उसके पास ही रहा।

मम्मी से अब विनती का सूखा मुंह नही देखा जाता था। पापा का आराम से बैठना उन्हें नहीं भाता था।

अब तो उसके हाथ पीले करके ही चैन की सांस लूंगी।

क्या दकियानूसी बातें करती हो। कौन सी भारी है हमारी बेटी ?

तुम अपनी रहले दो, विन्नी का मुंह देखा है ? उसके साथ की लड़कियां सब एक-एक कर ससुराल चली गई, तुम्हारे लाड़ ने उसे बच्ची बना रखा है।

मम्मी हमें शादी नहीं करनी है।

क्यों नहीं करनी है ? हम क्या सब दिन बैठे रहेंगे ? कोई भाई भी नहीं कि मायका बना रहता। उस जगह मम्मी को बेटे की कमी कांटे सी गड़ती थी।

अन्ततः एक जगह बात पक्की हो ही गई थी। रिश्ते की बहिन की शादी में आए उसके देवर नवीन ने, विनती को देख पसंद कर लिया था। उसके घर वालों ने पापा को विनती के लिए प्रस्ताव भेजा था।

मम्मी की खुशी का ओर-छोर नहीं था। विनती घबरा गई थी। उधर समीर था कि हजारों मील दूर बैठा, कभी महीने दो महीने में एक खत डाल उसे विश्वास दिला जाता कि उसे वह अभी भूला नहीं है। दिन-पर-दिन समीर के खत छोटे होते जा रहे थे। वहां पढ़ाई में बहुत मेहनत करनी होती है। खत लिखने का टाइम ही नहीं रहता, हालांकि उसके मन में हर समय विनती ही रहती है।

विनती ने अपनी परेशानी लिख भेजी थी, जल्दी कुछ करने का आग्रह किया था। पत्र के जवाब में इस बार छोटा सा खत आया था - अभी तो अपने पांवों पर ही नहीं खड़ा हो सका हूं वीनू, शादी की कैसे सोचूं ? मुझे लगता है कि तुम मम्मी-पापा का कहना मान लो, यूं मेरे इंतजार में अनिश्चय की जिंदगी कब तक जियोगी ?

उस खत को पढ़ विनती स्तब्ध रह गई थी। समीर के सिवा किसी और का वरण क्या संभव था, वो भी उस दिन की घटना के बाद ? क्या समीर उस शाम को एकदम भूल गया, जब विनती ने अपना सब कुछ उसे समर्पित कर दिया था ?

बरसात की उस अंधेरी शाम अचानक बिजली चली गई थी। मम्मी-पापा रिश्ते के चाचा को देखने अस्पताल गए हुए थे। बिजली गुल होते ही समीर ने दरवाजा खटखटाया था। समीर को अपने साथ पा, विनती का डर दूर भाग गया था। तभी बिजली की कड़क के साथ जोरों की बारिश शुरू हो गई थी। विनती को प्यार से खींचता समीर आंगन में ले आया था। पानी की बूंदों ने दोनों के तन-मन भिगो दिए थे। विनती के भीगे जिस्म को समीर ने कितना प्यार किया था, उसके आगे वह अवश होती गई थी -

नहीं, विनती अब किसी और को पति रूप में स्वीकार नहीं कर सकती, वह समीर की पत्नी है, किसी और की पत्नी बनना पाप होगा। शायद उसी भावुकता में उसने नवीन के नाम पत्र लिख भेजा था, कहीं कुछ नहीं छिपाया था। समीर को भी साफ़ लिख भेजा था, अगर वह उससे विवाह नहीं करेगा तो वह आजीवन कुंवारी बनकर रह सकती है, पर किसी और की पत्नी बनना स्वीकार नहीं करेगी।

विनती का खत नवीन की मां ने खोला था। अपने बेटे को ऐसी दुश्चरित्र लड़की के जाल से मुक्त हो जाने के एवज में उन्होंने मम्मी-पापा को खूब लताड़-भरा पत्र भेजा था।

मम्मी का मुंह राख हो गया था, पापा निर्वाक शून्य में ताकते रह गए थे। इसी दिन के लिए तुझे जन्मा था? इससे तो अच्छा मर जाती कलमुंही। हमें कहीं का नहीं रखा। काश जनमते ही मर जाती। विनती को दोहत्तड़ मारती मम्मी, कोसती जा रही थीं। बड़ी मुश्किल से पापा उसे छुड़ा पाए थे। तुमने ऐसा क्यों किया बेटी? हमसे कहने वाली बात, परायों को लिख भेजी? अपनी मां को बताना था वो सब। पापा बेहद आहत थे।

मुझसे गलती हो गई पापा, आपने मुझ पर हमेशा इतना विश्वास रखा, सच बता पाना बहुत कठिन लगा था। रोत-रोते विनती का बुरा हाल था।

विनती की कहानी एक से दूसरे मुंह, इस तरह फैली कि मम्मी-पापा को वो शहर ही छोड़ना पड़ा। उसके बाद विनती की शादी वाली बात भुला ही दी गई थी। विनती ने पापा से कह दिया था।

जिस सच को मैंने स्वीकार किया है, उसे झूठ कैसे ठहरांऊ पाप ? आपने तो हमेशा यही सिखाया था कि जिसे अन्तरात्मा न स्वीकारे, उसे कभी मत स्वीकार करो।

निःशब्द पापा चुप रह गए थे। मम्मी उम्र के पहले ही बूढ़ी लगने लगी थीं। पापा अक्सर अपने में खोए रहते। मम्मी के ताने-उलाहनों का जैसे उन पर कोई असर ही नहीं होता था।

एम0ए0 के बाद कई जगह इन्टरव्यू देने के बाद विनती पिछले दो वर्षो से इसी कम्पनी में डायरेक्टर के सेक्रेट्री के रूप में काम कर रही है। यहां उसने अपना अतीत पूर्णतः भुलाना चाहा पर जबसे शैली शादी के बाद से इसी शहर में आ गई तब से अक्सर अतीत को कुरेदती रहती है।

शहर छोड़ने के कुछ दिन पहले समीर की शादी का निमंत्रण मिला था। समीर के पापा ने निमंत्रण के अन्त में एक छोटी की पंक्ति लिख भेजी थी -

आपके आने से प्रसन्नता होगी।

मम्मी ने उस दिन फिर उसे जी-भर कोसा था देख लिया उस कमीने को ? उसी के लिए घर आया इतना अच्छा रिश्ता छोड़ा था ? शादी के पहले पाप करने के बाद सती-सावित्री बनने का नाटक करती है, कलमुंही।

चुप रहो, बहुत हो गया। गलती हर इन्सान से हो सकती है। पहली बार पापा मम्मी पर नाराज हुए थे। विनती क्या कम दुखी थी? समीर से अब कुछ अपेक्षा रखना निरर्थक था। अपने को दोषी ठहराती विनती ने मां के आगे हाथ जोड़ लिए थे।

तुम्हारी अपराधी ऊं मम्मी, तुम्हारे दूध को लजाया है। मुझे मार डालो .................।

मम्मी ने उसे अंक में भर लिया था, एकमात्र पुत्री के बिछोह की कल्पना भी असह्य थी। शादी के पहले समीर ने अपनी सफ़ाई में खत लिख भेजा था। वही ढेर सारी विवशताओं का रोना, मां-बाप के प्रति कर्तव्य निभाने के लिए वो शादी उसका चरम त्याग मात्र थी। मन से हमेशा विनती का था, है और रहेगा। विनती ने उस खत पर भी विश्वास किया था। तब से आज तक विनती मशीनी ज़िन्दगी जीती आ रही है। उसके शान्त जीवन में समीर के नाम ने आज फिर झंझावात पैदा कर दिया था। वह समीर को भुला चुकी है, यह सोचना कितना गलत था, आज भी उसका नाम उसे इस कदर अस्थिर कर सकता है। विनती को अपने पर बेहद गुस्सा आ रहा था। क्यों हर फोन-कॉल पर उसे समीर की प्रतीक्षा है...... क्यों ?

उसका सर्वस्व लेकर जिसने उसे ऐसा सूना जीवन जीने को बाध्य किया, उसकी प्रतीक्षा करना क्या अपमानजनक नहीं है ? खुद वह पत्नी के साथ मजे उड़ा रहा है। पिछले एक वर्ष से उसका सहकर्मी रजत उसके समक्ष कितनी बार स्पष्ट प्रस्ताव रख चुका है। पिछली बार तो उसने कहा था-

देखिए विनती जी, मुझे आपका एकदम कोरा अतीत नहीं चाहिए, अपने बारे में भी आपसे यही कहूंगा, पर जो बीत गया उसे भुला देने में हमेशा विश्वास रखा है। अपने जीवन साथी के रूप में मुझे जो कुछ चाहिए आप में है, हम दोनों एक नया जीवन शुरू कर सकते हैं, विनती।

आज तक विनती उसे हां नहीं कह सकी क्यों- इसी समीर के लिए न ? ऐसे कायर, कापुरूष की पत्नी बन क्या गौरव पाती तू विनती ? अगर साहसपूर्वक सामने आ कह देता वो क्षण भर की हमारी भावुकता थी वीनू, मुझे माफ करना तो क्या विनती उसे माफ़ नहीं कर देती ? शायद गलती तेरी ही थी विनती, जानते हुए भी तूने समीर की असलियत स्वीकारनी नहीं चाही। स्वप्नों के आदर्श-पुरूष के रूप में उसकी पूजा करते रहने में भी, अहं को एक तरह की शान्ति ही मिलती है न ? शायद दुख और विरह का बाना पहिन, तूने अपनी गलती का प्रक्षालन चाहा था विनती।

अपने मन में उठ रहे ढेर सारे सवालों का जवाब विनती को पाना था। कल से आया समीर भी शायद बहुत से मिश्री-पगे वाक्यों के रिहर्सल के बाद एक विरही की व्यथा-कथा सुनाएगा ........नहीं अब उसे इस मोहपाश से मुक्ति चाहिए। उन लिजलिजी बातों के लिए उसके पास समय नहीं है। फोन की घंटी जोरों से घनघना उठी थी।

हलो ................।

कौन विनती ? ............ मैं समीर बोल रहा हूँ ............. कैसी हो वीनू ?

सॉरी .............. रांग नम्बर।

विनती का पूरा शरीर कंटकित हो उठा था। फ़ोन रखते ही दुबारा घंटी बजी थी।

फ़ोन की लगातार घनघना रही घंटी पीछे छोड़, विनती रजत के कमरे का दरवाजा खोल, अन्दर प्रविष्ट हो गई थी।

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