सिस्टर रोजी

बन्द कमरे से अनिता की चीखें स्पष्ट सुनाई दे रही थीं, साथ ही सिस्टर रोजी का डपटता हुआ कर्कश स्वर मेरे सीने पर हथोड़े मार रहा था। बार-बार जी चाहता था, दरवाजा तोड़ कर अन्दर घुस जाऊं, पर साथ खड़ी मीनाक्षी ने मुझे रोक रखा था। अचानक दरवाजा खोल मुझ पर आग्नेय दृष्टि डाल न जाने क्या बड़बड़ाती हुई सिस्टर रोजी तेजी से बाहर निकल गयी और अनिता मेरे सीने से लिपट कर बिलख उठी-
”मम्मी सिस्टर ने मुझे मारा जानकर बार-बार फोड़ा काट रही थी। मुझे कितनी जोर से डाँटा-बहुत दर्द हो रहा है, मम्मी।“


अनिता की सहनशक्ति सचमुच प्रशंसनीय है। स्पष्टतः उस युवा डाक्टर के प्रति सिस्टर रोजी का आक्रोश अनिता पर निकला था। अनिता की नाक के पास छोटा-सा दाना भयंकर फोड़े का रूप धारण कर चुका था। देखते ही डाँक्टर ने कहा था, थोड़ी-सी लापरवाही भयंकर भूल का कारण बन सकती थी। आवश्यक निर्देशों के साथ अनिता को फ़ौरन सिस्टर रोजी के पास ले जाने को कह, युवा डाँक्टर मनीष व्यस्त हो उठे थे।

अधेड़ वयसा सिस्टर रोजी अपने शुष्क व्यवहार के कारण मरीजों में भय का कारण थी। डाँक्टर के बताये निर्देश सुनते ही सिस्टर रोजी की ‘ना’ सुनते ही झुँझला उठे। ये रोजी रोज कोई न कोई तमाशा करती है।

दो बार बुलाने के बाद सिस्टर रोजी विद्रोह की मूर्ति बन डाँक्टर मनीष के सामने आ खड़ी हुई। डाँक्टर ने सख्त आवाज में कहा -
”सिस्टर पहले सुई से मवाद खींचने की कोशिश कीजिए, अगर मवाद नहीं निकले तो जरा-सा नाइफ़ से काटकर जो बहे बहने दीजिए। हाँ यह ध्यान रखिए ‘कट’ न ज्यादा गहरा हो न लम्बा।“

सिस्टर रोजी जैसे ही अपने कक्ष में जाने के लिए पलटी, मैंने डरते-डरते अपनी शंका व्यक्त की थी- ”डाँक्टर कहीं ऐसा तो नहीं अपना आक्रोश सिस्टर इस बच्ची पर निकाले।“
सस्मित डाँक्टर ने मेरी शंका निर्मूल बताई थी। अवश हम सिस्टर रोजी के कमरे की ओर चल दिये थे। अनिता का तो मुंह ही सूख गया था। रास्ते में ही सिस्टर का बड़बड़ाना शुरू हो गया था। वार्ड की छोटी नर्स से कहती गयी-
”कहता है कट न गहरा हो न लम्बा, खुद ये काम क्यों नहीं करता? सब अपना काम रोजी को देते हैं। सिस्टर रोजी फालतू की चीज है न!“

"ऐ लड़की, इधर बैठो, कहती सिस्टर रोजी ने कड़े शब्दों में मुझे कमरे से बाहर निकलने का आदेश दे दिया। अनिता ने जैसे ही मेरा आँचल पकड़ा, मैं द्रवित होकर अनुरोध कर बैठी-
”सिस्टर प्लीज, मुझे यहाँ रहने दीजिए, मैं कुछ नहीं बोलूँगी।“

”नहीं-नहीं, तुमको यहाँ एकदम नहीं रहना माँगता,“ कह मानो सिस्टर रोजी ने मेरे मुंह पर ही दरवाजा बन्द कर दिया।

कमरे के अन्दर सिस्टर रोजी का क्रुद्ध स्वर बाहर तक स्पष्ट आ रहा था।
"कुछ भी नहीं है, ये नया डाँक्टर फालतू में सबको इधर भेज देता है। ऐ छोकरी चुप बैठ, हिलना एकदम नहीं।"
 क्रोध से मेरा रोम-रोम सुलग रहा था। असहाय अनिता सिस्टर रोजी की झिड़कियों से अधिक पीड़ित अब सिसक रही थी। आवेश में अनिता को साथ ले डाँक्टर के सामने अपना संयम खो बैठी। ”डाँक्टर अगर आपने इस बच्चे को सिस्टर रोजी के पास भेजा तो इसमें इसका क्या दोष? सिस्टर रोजी ने आपके प्रति क्रोध इस बच्ची पर उतारा है। ये नर्स बनी है, इसका काम मरीज के घाव पर मरहम रखना है या उनके मन पर धाव करना है। आखिर किस बात का पैसा लेती है?“
आवेश में मैं न जाने क्या कुछ कह गयी! युवा डाँक्टर भी उत्तेजित हो उठा,
”ठीक है मिसेज कांत, आप मुख्य चिकित्सा अधिकारी को लिखित शिकायत भेजिए, मैं भी बात करूँगा। “

शान्त गम्भीर मुख्य चिकित्सा अधिकारी डाँक्टर घोष ने स्वंय कहा-
”सिस्टर रोजी की ओर से आपसे मैं क्षमा माँगता हॅं। वस्तुतः वह दिल की खराब नहीं है। शायद यह उसकी परिस्थितियाँ हैं, जिन्होंने उसे उग्र बना दिया है।“

युवा डाँक्टर सुनते ही भड़क गये-
”न जाने क्या बात है, ये हमेशा सिस्टर रोजी का ऐसे ही पक्ष लेते हैं। कितनी बार सिस्टर रोजी के विरूद्ध शिकायतें आयी हैं पर आज तक उसके विरूद्ध कोई कार्रवाई नहीं की गयी। इसीलिए वह इतनी ऊपर चढ़ गयी है।“
मेरा क्रोध भड़क उठा शायद इसी कारण सिस्टर रोजी ने स्वंय कभी क्षमा नहीं माँगी।
”अब कार्रवाई होगी,“ कहती उसी समय कुछ करने की ठान मैं घर आ गयी। फौरन ही स्वास्थ्य मंत्रालय मे उच्च पदस्थ अधिकारी अपने निकट सम्बन्धी के पास शिकायत लिख भेजी, साथ ही शीघ्र उचित कार्रवाई कराने का अनुरोध भी।

शीघ्र ही जाँच कमेटी बैठा दी गयी थी। स्वभावानुरूप जाँच कमेटी के सामने ही सिस्टर रोजी ने उल्टे-सीधे उत्तर दे मेरी शिकायत पर सच्चाई की मोहर लगा दी थी। किसी प्रश्न के उत्तर में तो सिस्टर रोजी चिल्ला ही पड़ी थी। सब कमेटी के सदस्य सिस्टर रोजी के उद्दंड व्यवहार से बेहद खिन्न हो उठे थे। इस प्रकार की महिला इस काम के लिए सर्वथा अनुपयुक्त है। मुख्य चिकित्सा अधिकारी की प्रार्थना पर सिस्टर रोजी की नौकरी कड़ी चेतावनी के साथ छोड़ तो दी गयी पर सिस्टर का तबादला एक नये शहर में कर दिया गया था।

उसी शाम डाँक्टर घोष को अपने घर आया देखकर कुछ अभिमान हो आया शायद अब सिस्टर रोजी के लिए कोई नयी सिफारिश लाये हैं।

”आइए,“ कहते शायद मेरे स्वर में न चाहते भी कुछ अभिमान छलक आया था। छड़ी रख पास की कुर्सी पर बैठ डाँक्टर घोष बोले-
”कल रोजी इस्तीफा देकर जा रही है।“

”त्यागपत्र देने के लिए तो नहीं कहा गया था, खैर यह उसका व्यक्तिगत मामला है पर कमेटी ने पक्षपात रहित न्याय किया, इसकी सचमुच मुझे खुशी है।“ उत्तेजना में भी मेरी वाणी में व्यंग्य स्पष्ट था।

”न्याय का अर्थ जानती हैं मिसेज कांत?“ डाँक्टर घोष के स्थिर स्वर से भी मैं चिढ़ गयी।

”जो कहानी खत्म हो गयी, उस पर व्यर्थ बहस करने से क्या लाभ है, डाँक्टर साहब?“

”एक बात जान लीजिए मिसेज कांत, मरे को मार कर अगर उस विजय पर कोई उल्लासित हो तो उससे बड़ी पराजय कोई नहीं है। रोजी तो आज से पहले बाजी हार चुकी है। रोजी की कहानी तो कब की खत्म हो चुकी है।“

”छोड़िए डाँक्टर साहिब, मुझे उनकी कहानी के आदि और अन्त से कोई मतलब नहीं, मैं चाय लाती हूँ।“

”नहीं आज आपको यह कहानी सुननी होगी, आप न्याय रक्षा का दम भरती हैं, आपको न्याय करना ही होगा।“



आज की कर्कश सिस्टर रोजी ने बीस वर्ष पूर्व जब मैडिकल काँलेज में नर्स के रूप में प्रवेश किया था तो उसके अपूर्व रूप, मृदु व्यवहार, मनोहारी मुस्कान पर पूरा मैडिकल काँलेज दीवाना हो उठा था। अपने दक्ष हाथों से जब वह आपरेशन के समय डाँक्टरों को औजार थमाती थी तो उसकी नरम नाजुक उंगलियों के स्पर्श से उस समय भी शायद कुछेक डाँक्टर रोमांचित हो उठते थे। सुगन्धित हवा के झोंके की तरह रोजी बहती थी। डाँक्टर शरद सर्जरी के प्रोफेसर मेरे सहपाठी भी थे। जिस रोजी को पाने के लिए युवा डाक्टर सपने ही देखते रह गये वह कब डाँक्टर शरद के प्रणय- पाश में बॅंध गयी, कोई न जान सका। विवाह के समय न जाने कितनों ने ठण्डी साँस भर कर डाँक्टर शरद के भाग्य से ईष्र्या की होगी? डाँक्टर शरद रोजी को पाकर पूर्ण हो गये थे और रोजी ने भी अपना गंतव्य डाँक्टर शरद में पा लिया था।

विवाह की पहली वर्षगाँठ के दिन ही तो डाँक्टर शरद अस्पताल से जल्दी छुट्टी ले घर वापिस आ रहे थें संध्या समय डाँक्टर शरद के मित्र सपत्नीक आमंत्रित थे। गुनगुनाती रोजी सारे घर को सजाती फिर रही थी। रजनीगन्धा की भीनी सुगन्ध से पूरा घर सुगन्धित था। रोजी ने डाँ शरद के लिए चुनकर मुस्कराने को उत्सुक रजनीगन्धा की कलियाँ अलग रख रखी थीं। उसे उस समय यह आभास भी कहाँ था कि उसकी वही कलियाँ डाँक्टर शरद की शव यात्रा में भी साथ देने वाली थी!

”क्या?“ मेरा विस्मित प्रश्न अनसुना कर डाँक्टर घोष कहते गये-
हाँ सामने से आती तीव्र गति के ट्रक ने अपना संतुलन खो, सीधे डाँक्टर शरद की कार से टक्कर मारी थी। शायद कुछ मुस्कराते अधखुले होंठ वहीं जम गये थे। पास में रोजी के लिए लाई साड़ी एकदम अछूती बच गयी थी।

सूचना पा रोजी स्तब्ध रह गयी थी। आँखें शून्य में स्थिर किये वह शायद यह निर्णय न ले पायी थी कि उसी समय हमेशा के लिए अपनी कहानी समाप्त कर दे या अपनी कोख में पल रहे डाँक्टर शरद के अजन्मे पुत्र को जन्म दे। माँ की ममता तो आप जानती हैं मिसेज कांत? तो रोजी न अपने उस अजन्मे शिशु को जीवित रह जन्म देने की सजा स्वीकार कर ली थी।

उसके बाद की कहानी भी तो साधारण नहीं थी। रूपसी रोजी के आसपास मॅंडराने की कई व्यक्तियों ने बहुत चेष्टा की थी। दो-एक ने तो सचमुच विवाह के प्रस्ताव भी रखे थे, पर रोजी ने अविचलित दृढ़ कंठ से कह दिया था-
”रोजी मर चुकी है, अब तो एक अजन्मे शिशु की माँ जीवित है। और माँ का बोझ उठाना कठिन है, कह रोजी ने सारे प्रस्ताव त्याग दिये थे। इसी पीड़ा में रोजी ने एक शिशु पुत्र को जन्म दिया था।“

हेमंत एकदम अपने पिता डाँ शरद पर पड़ा था। उसे देख रोजी जो गयी थी। सचमुच पुनर्जन्म हुआ था उसका। एक पल को भी वह शिशु को अपने से अलग नहीं करना चाहतीं थी। ड्यूटी के कठिन क्षणों मे अस्पताल के सारे रोगी उसके हेमंत बन जाते थे। हर रोगी रोजी का अधिक से अधिक समय चाहता था। मातृत्व की गरिमा से युक्त रोजी अपना समस्त स्नेह उन्हें देती थी।

हेमंत बड़ा होता गया। एकदम अपने पिता की प्रखर बुद्धि एवं शान्त गम्भीर स्वभाव पाया था उसने। अस्पताल की सब नर्सो का वह सजीव खिलौना था।

रोजी के जीवन में न जाने कितने बसंत आये और उसे बिना स्पर्श किये चले गये। नन्हा हेमंत किशोर बन गया।

बारहवीं कक्षा में सर्वोच्च अंक प्राप्त कर जब हेमंत मुझे प्रणाम कर पैरों पर झुका तो आशीष देते मेरे मन में क्या कोई चोर नहीं था! अनजाने कभी उसे पुत्र रूप में पाने की लालसा क्या मुझमें नहीं जगी थी?

मैडिकल काँलेज में प्रवेश पाने की सूचना पाते ही रोजी हर्षातिरेक से पागल-सी हो उठी थी। शहर के सारे मन्दिर, मस्जिद, गिरजों में जाकर पूजा की थी, गरीबों को प्रसाद बाँटा था।

हेमंत के जाते समय रोजी टूट-सी गयी थी, इतने वर्षो का अकेलापन उससे कैसे सहा जायेगा? सब के स्नेह और आश्वासनों के बाद भी वह रात-रात-भर रोती थी, यह मैं उसकी लाल आँखें देख समझ जाता था।

एक सप्ताह बाद रोजी के नाम आये तार को मैंने ही रिसीव किया था। तार में जो सूचना थी, वह क्या रोजी को देना सम्भव थी?

उसके रक्त से सिंचित एक मात्र बेटा हेमंत ‘रैगिंग’ में साथियों की क्रूरता का शिकार हो इस संसार से विदा ले चुका था।

साधारण-सी घटना का इतना भीषण परिणाम। ‘रैगिंग’ के समय किसी ने हेमंत की माँ के अपूर्व सौन्दर्य को ले, कोई अश्लील वाक्य उछाला था, हेमंत ने उत्तेजना में उस छात्र को शायद कालर से पकड़ लिया था। हेमंत की यह अशिष्टता भला सीनियर छात्र सह सकते थे?

सीनियर छात्रों की अनगिनत हाकी स्टिक्स हेमंत की पीठ पर टूटती गईं, पर अन्तिम साँस तक माँ का अपमान करने वाले, हेमंत के क्रोध- भाजन ही  बने  रहे। लाख कहने पर भी हेमंत ने उनसे क्षमा-प्रार्थना नहीं की थी। उसका तेजस्वी मुख दृढ़ता से भिचा रहा था। हेमंत की अशिष्टता समाप्त करने के प्रयास में सीनियर छात्रों ने उसे ही समाप्त कर दिया, यह भान होते ही हेमंत का क्षत-विक्षत शरीर वहीं छोड़ सब गायब हो चुके थे।

पुत्र के साथ उस प्राण प्रिय शरीर पर पड़े सारे आघात रोजी हर पल आज भी महसूस करती है। कैसे सहे होंगे उस बच्चे ने इतने सारे आघात? जिसे कभी फूल से भी नहीं छुआ उसने, माँ के सम्मान की रक्षा में मृत्यु तक इतने बड़े आघात निःशब्द कैसे सहे?

उसकी ममता अपने लाल को न बचा सकी और उसका लाला माँ की श्रद्धा में अपने को अर्पित कर गया।

उस रात-नींद की ढेर सारी गोलियाँ खा रोजी ने फिर एक बार अपने को समाप्त करना चाहा था, पर अब डाँक्टरों ने इस जगह कमाल ही कर दिया। जानती हैं मिसेज कान्त, हम आज तक एक शव को जिन्दा रखे हैं! आज वह क्रूर कर्कश बुढ़िया है वो क्या जाने माँ की ममता? अनिता की चीखें सुन आपको इतना क्रोध आ गया, पर एक पल को उस माँ की बात भी सोच सकती हैं, जिसके शरीर पर, मन पर हर पल हजारों हाकी-स्टिक्स टूटती रहती हैं, जिसकी दृष्टि के सामने पीड़ा से कराहता निःशब्द मुख माँ के लिए असीम श्रद्धा से ताकता रहता है। बेटे की साँस टूटने तक अपने लिए उसकी करूण पुकार हर क्षण कानों में गूँजती रहती है।

सब कुछ अनदेखा, अनसुना कर दिन-रात यंत्रवत जीती दूसरों की पीड़ा दूर करती रोजी जा रही है। उसके साथ जो हुआ, क्या उसे न्याय दिला सकेंगी, मिसेज कान्त!

आज भी अनुभवी डाँक्टर रोजी के अलावा गम्भीर केस में अन्य किसी नर्स पर निर्भर नहीं रहते।
कब छड़ी उठा डाँक्टर घोष चले गये, पता ही नहीं लगा। झरते आँसुओं के मध्य पीड़ा से कराहता एक दृढ़ युवा मुख मानो साकार हो उठा। माँ का वात्सल्यपूर्ण काँपता हाथ उस तेजस्वी युवा को अन्तिम समय में सांत्वनापूर्ण स्पर्श भी न दे सका।

”माँ-माँ “ मैं शायद पागल हो रो रही हूँ। अनिता नहीं-नहीं, हेमंत रोजी को पुकार रहा है। नहीं-नहीं, मैं रोजी के प्रति अन्याय नहीं होने दूंगी। आँसू पोंछ मैं रोजी के घर की ओर चल दी।

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