12/16/09

शेफाली नहीं गीता हो तुम

जौनपुर से तीव्र गति से कार चलाने के बाद भी डॉ प्रशान्त यज्ञ की पूर्णाहुति के समय ही इलाहाबाद पहुंच सके थे। चलते समय कार के ब्रेक चेक कराने में समय ज्यादा लग गया था। कल संध्या प्रोफेसर आनंद नारायण का संक्षिप्त नोट मिल था-


”गृहस्थाश्रम का मोह त्याग गुरू-शरण में रहकर भगवान-भजन की कामना है। हरिद्वार जाने के पहले सबसे मिल लेने का मोह नहीं छोड़ पाया, इसीलिए सोमवार की प्रातः एक यज्ञ का आयोजन कर रहा हूँ। गीता भी साथ जा रही है। तुम्हारे आने से प्रसन्नता होगी-आ सकोगे प्रशान्त?
शुभेच्छु-
आनंद नारायण।“

बंगले के बीच वाले हॉल में यज्ञ चल रहा था। श्वेत परिधान में प्रोफेसर नारायण अग्निकुंड में घृताहुति दे रहे थे। पास के दूसरे आसन पर ध्यानस्थ तपस्विनी-सी गीता अग्नि-शिखाओं को एकटक ताक रही थी- गौर वर्ण अग्नि-ताप से रक्ताभ हो उठा था। प्रशान्त की उपस्थिति ने मानो एक पल को उसकी तपस्या भंग कर दी थी। हठीले नयन प्रशान्त के नयनों से जुड़ने की अक्षम्य धृष्टता कर बैठे। दप से उन नयनों में न जाने क्या जल उठा कि उतनी दूर बैठे प्रशान्त उस आँच को सह न सके थे। एक पल को मंत्रविद्ध जुड़े नयन स्वतः नत हो गए थे।

प्रोफेसर नारायण के गुरू स्वामी शारदानंद ने शांति-पाठ के बाद बंधु-बांधवों से प्रोफेसर नारायण और गीता को पुष्प-अक्षत के साथ मंगल कामनाएँ देने का संकेत किया था। चारों ओर से प्रोफेसर और गीता के झुके मस्तक पर पुष्पों की वर्षा होने लगी थी। गीता के मुख की अपूर्व शांति में भी डॉ प्रशान्त उद्विग्नता और कष्ट की लकीरें स्पष्ट पढ़ पा रहे थे। चाह कर भी आशीष रूप में वह हाथ ऊपर नहीं उठा सके थे- हृदय का हाहाकार उद्विग्न कर रहा था। मंगल-कामना-सूचक पुष्प मुट्ठी मे दबाए व हॉल के बाहर आ गए।

अतिथियों की अभ्यर्थना के लिए प्रोफेसर गीता को साथ ले बाहर लगे शामियाने की ओर आ रहे थे। अतिथियों के लंच की इसी शामियाने में व्यवस्था की गई थी। प्रशान्त पर दृष्टि पड़ते ही, गीता को एक महिला से बातें करते छोड़ प्रोफेसर आगे बढ़ आए थे।

”तुम्हारे आने की बहुत खुशी है, प्रशान्त। कुछ दिन पहले ही तो स्टेट्स से लौटे हो, सोच रहा था आ न पाओगे।“

”आपका आदेश हो और मैं न पहुंचूं, सर? गीता को तो लेक्चररशिप मिल गई है, क्या जॉब छोड़कर आपके साथ जा रही है?“

”उसकी जिद तो तुम जानते ही हो, प्रशान्त। बहुत समझाया यहीं रहे, पर कहती है मैं अपनी देख-रेख ठीक से नहीं कर सकूँगा।“ स्नेह-विगलित स्वर के साथ उनका मुख चमक उठा था। प्रशान्त की पीठ थपथपा प्रोफेसर अन्य अतिथियों की ओर बढ़ गए थे।

सामने से आती गीता को रोक प्रशान्त ने पूछा था- ”अच्छी-भली नौकरी छोड़कर हरिद्वार जाने का निर्णय ले डालना क्या उचित है, गीता?“

एक पल को दृष्टि उठा शांत-सधे स्वर में गीता ने उत्तर दिया था- ”मेरी यही नियति थी, डॉ प्रशान्त ................“

प्रशान्त की प्रतिक्रिया की अपेक्षा किए बिना गीता आगे बढ़ गई थी-स्तब्ध प्रशान्त खड़े रह गए थे। मन में आँधी-सी उठ रही थी- ‘गीता का ये निर्णय तेरी ही कायरता का परिणाम है, प्रशान्त। सत्य स्वीकार कर पाने का क्या आज भी साहस है तुझमें? उस हादसे के बाद स्वयं तू इस शहर से ही नहीं देश से भी भाग गया था-कब तक इस झूठे कवच को पहिने अपने को झुठलाएगा, प्रशान्त ? आज गीता के इस निर्णय पर ये व्याकुलता, हाहाकार क्यों? गीता कभी तेरी पूजा थी, आज सबके सामने बढ़कर उसे स्वीकार कर सकोगे, प्रशान्त ?’ गत चार वर्षों का जीवन पुनः जी उठा था..................

भौतिक विज्ञान में विशेष योग्यता के साथ एम0एस-सी0 की परीक्षा उत्तीर्ण कर प्रशान्त ने प्रोफेसर आनंद नारायण की गाइडेंस में शोध-कार्य प्रारम्भ किया था। भौतिकशास्त्री के रूप में प्रोफेसर आनंद नारायण अंतरराष्ट्रीय ख्याति के विद्वान थे। विधुर प्रोफेसर का पुत्र अमेरिका में ही रच-बस गया था, पर तीन-चार महीनों में पिता को पत्र डालने में सुधीर गफ़लत नहीं करता था। घर में प्रोफेसर नारायण की पोषिता पुत्री गीता की ही चलती थी। रिश्ते की विधवा बहिन की मृत्यु के बाद गीता का लालन-पोषण प्रोफेसर नारायण के घर पर ही हुआ था। पिछले कुछ वर्षो में वही नन्हीं गीता अब प्रोफेसर की पक्की अभिभाविका बन गई थी। इस वर्ष गीता हिन्दी साहित्य में एम0ए0 कर रही थी। अपनी मेधावी पोषिता पुत्री पर प्रोफेसर का अगाध स्नेह था।

प्रशान्त के शोध-कार्य पर विचार-विमर्श के लिए प्रोफेसर नारायण उसे शाम को घर ही बुला लिया करते थे। कुछ ही दिनों में वह प्रशान्त को पुत्रवत् स्नेह देने लगे थे। संध्या चाय के समय अतिथियों के जलपान की व्यवस्था गीता ही करती थी। गीता के निर्देशानुसार उन्हें फल या नमकीन बिस्किट ही प्राप्य थे। कभी लाडली बिटिया की दृष्टि बचा अगर उन्होंने प्रशान्त की प्लेट से छोटी-सी बर्फी उठा ली तो गीता की फटकार सुननी पड़ती थी ........
. ये क्या पापा, आप बर्फी खा रहे हैं। पता है डॉ0कयार्ड क्टर ने आपको शुगर की सख्त मनाही की है। ऐसा ही करना है तो मुझे होस्टेल भेज दीजिए फिर जो मन में आए करते रहिएगा।

गीता की धमकी का तुरन्त असर होता था। बर्फी का टुकड़ा प्लेट में वापिस रखते प्रोफेसर क्षमा माँग बैठते थे.........
”ये लो बिटिया कान पकड़े अब कभी ऐसी गलती नहीं होगी। अब तो हॉस्टल नही जाएगी न।“ प्रोफेसर नारायण के प्रति अगाध श्रद्धावश यदि कभी प्रशान्त ने उनके सामने भूल से भी मिठाई की प्लेट बढ़ा दी तो उसे गीता का कोप-भाजन बनना पड़ता था-
 ”आप पापा को उल्टा-सीधा खाने को दे देते हैं, तबियत खराब होने पर पापा की तमारदारी आपको ही करनी होगी।“

मौन स्मिति के साथ प्रशान्त तो गीता का अभियोग स्वीकार कर लेता, पर प्रोफेसर ठठा कर हॅंस पड़ते थे.........

”अच्छा तो प्रशान्त को उल्टा-सीधा खाने की अनुमति है- भई ये न्याय हमारी समझ से बाहर है..........“

”अगर वो भी उल्टा-सीधा खाएँगे ओर बीमार पड़ेंगे तो आप देखिएगा पापा, मैं जल्दी अपराध क्षमा करने वालों में से नहीं हूँ।“

”तब तो तुझे पुलिस अफ़सर बनना चाहिए बिटिया, एक भी अपराधी नजर से नहीं छूटेगा।“

”सच पापा, आपको तो पुलिस की हिरासत में ही रखती।“

”वो तो माना, पर बिटिया जब तुझे कोई अपनी हिरासत में रखेगा तब क्या करेगी?“ अपने परिहास पर प्रोफेसर मुक्त कंठ से हॅंस पड़ते थे।

”गीता को बंधन में रखने वाला अभी जन्मा ही नहीं है, पापा.............“ गीता के चुनौती देते नयन प्रशान्त के नयनों से अनायास ही टकरा गए थे। प्रशान्त के नयनों में परिहास की कौंध या उसके भ्रम से गीता तिलमिला उठी थी।

प्रशान्त हॉस्टल के स्थान पर कहीं अलग कमरा ले शोध-कार्य करना चाहता था। इधर कुछ दिनों से प्रशान्त के साथ शोध के पेपर्स डिस्कस करते काफी रात हो जाती थी। रात्रि-भोजन तो प्रशान्त प्रोफेसर के आग्रह पर उनके साथ ही कर लेता था, पर उतनी रात में उसे साइकिल से जाते देख प्रोफेसर नारायण को बहुत कष्ट होता था। एक दिन गीता से मनुहार-सी करते उन्होंने प्रस्ताव रखा था...............

”हमारा इतना बड़ा घर है बेटी, हम बाप-बेटी का काम तो चार कमरों में मजे से चल जाएगा!“

”तो.............?“

”मैं सोचता हूँ एक कमरा उस बेचारे लड़के को दे दें............देखो न कितनी देर में घर जाता है। अच्छा-भला लड़का है!“

”पापा, आपको व्यर्थ के झमेले पालने का बहुत शौक है, क्यों व्यर्थ ही उन्हें यहाँ रख बंधनों में जकड़ना चाहते हैं?“

”अरे बंधन कैसा? बाहर वाला कमरा उसे दे देंगे। कभी वक्त जरूरत पर काम ही आएगा। सुधीर का कमरा भी तो खाली पड़ा है, न हो उसे वही कमरा दे देंगे।“

”न पापा, सुधीर भइया के कमरे में कोई और नहीं रहेगा। अगर आपको अपने शिष्य के प्रति इतना ही मोह-भाव है तो बाहर वाला कमरा उन्हें दे दो, पर उनके नखरे मैं नहीं सहूँगी, ये पहले ही बताए दे रही हूँ।“

फिर स्वयं नौकर की सहायता से गीता ने प्रशान्त का कमरा सजाया था। प्रशान्त की हर आवश्यकता की मानो गीता को पूर्व जानकारी थी। कमरे की सज्जा देख मुग्ध प्रशान्त ने धन्यवाद देना चाहा था..............

”इतने सुन्दर कमरे में पहले रहने का अभ्यास नहीं है। इस सज्जा के लिए हार्दिक धन्यवाद देना चाहूँगा........“

”ये तो मेरा कर्तव्य था, इस घर की केयर-टेकर हूँ न, सो सबकी सुविधा-असुविधा का ध्यान मुझे ही तो रखना पड़ता है। हाँ, यहाँ के नियम-पालन में आप अटपटा तो अनुभव नहीं करेंगे?“

”शायद इतनी सुविधाएँ परेशान करें-आदत जो नहीं है..........।“

प्रशान्त के घर में आ जाने से प्रोफेसर नारायण के हृदय का खाली कक्ष मानो लबालब भर गया था। पुत्र के विदेश बस जाने से खाली हुआ घर फिर मानो पूर्ण हो उठा था। घंटो लम्बी दोनों की बातचीत पर गीता खीज उठती थी-
”इन्ही बातों से बोर करने के लिए पापा आपको लाए है!“

”वर्षो से तुलसी का चरणामृत पान करते-करते क्या कुछ और पाने की इच्छा नहीं होती, गीता? कभी विज्ञान की समस्याओं में डूबो, तुलसी और सूर को भूल जाएगी मेरी बिटिया!“

”छोड़िये पापा, बंदर क्या जाने अदरख का स्वाद! अरे आपने हिन्दी साहित्य का गहन अध्ययन किया होता तो जान पाते।“

”क्यों नहीं- कुछ उल्टा-सीधा लिख दो एक नया वाद बन जाएगा- ठीक कहा न, प्रशान्त?“ प्रोफेसर गीता को चिढ़ाते जाते।

”जी सर, विज्ञान तथ्य देखता है, अन्य विषयों की तरह मनगढ़न्त कहानियों पर विश्वास थोड़ी करता है।“ निश्चय ही प्रशान्त की टिप्पणी सीधी गीता के हिन्दी-साहित्य पर प्रहार करती।

”तभी तो वैज्ञानिक रिने नीरस, रूखे और उदासीन होते हैं। अगर दिल न हो तो अकेला दिमाग क्या करेगा जनाब? दिल के बिना मनुष्य रोबोट बनकर रहेगा-अच्छा हो अपना साहित्यिक ज्ञान बढ़ाएँ आप।“
प्रशान्त की शरारती मुस्कान गीता को और अधिक खिजा जाती थी। घर के छोटे-मोटे दायित्वों के साथ गीता को भी प्रशान्त पर छोड़ प्रोफेसर निश्चिन्त हो गए थे। अब गीता की फर्माइशें पूरी करने न उन्हें बाजार भागना पड़ता था, न तीन घंटे गीता की जिद पर पिक्चर हॉल में सोकर बिताने होते थे। शुरू में गीता उन्हें साथ ले जाने की जिद करती थी, धीरे-धीरे प्रशान्त उन कार्यो के लिए स्वीकृत होता गया था।

हिन्दी विभाग के वार्षिकोत्सव में मीरा के जीवन पर एक नृत्य-नाटिका के मंचन का निर्णय लिया गया था। मीरा की भूमिका के लिए गीता को चुना गया था। रिहर्सल के लिए कालिन्दी जी का घर नियत हुआ था। रिहर्सल के लिए कालिन्दी जी के घर पहुँचाने और वापिस लाने का दायित्व भी प्रशान्त पर आ गया था।

”प्रशान्त, हमारी बिटिया रानी अब पिक्चर का शौक छोड़ मीरा के भजन गाएगी। शाम को इसे कालिन्दी गुप्ता के घर छोड़ थोड़ी देर लाइब्रेरी में समय बिता साथ ही वापिस ले आया करना।“

”मैं कोई छोटी बच्ची हूँ क्या पापा, जो ये पहुंचाने और वापिस लाने जाएँगे!“ गीता ने प्रतिवाद किया था।

”मेरे लिए तो तू तब तक छोटी बच्ची ही रहेगी गीता, जब तक तू अपने दो-चार बच्चों की माँ नहीं बन जाती।“ गीता का मुख लज्जा से आरक्त हो उठा था।

रिहर्सल के लिए साथ चलती गीता को प्रशान्त छेड़ रहा था- ”जरा जल्दी कदम बढ़ाइए देवी जी, कालिन्दी जी अपनी मीरा की प्रतीक्षा में व्यग्र होंगी।“

”अभी तो बस पाँच बजे हैं, रिहर्सल तो साढे़ पाँच से शुरू होगा। आपको मुझसे पीछा छुड़ाने की इतनी जल्दी क्यों है जनाब?“ स्वर में तनिक-सी शोखी छलक आई थी।

”डरता हूँ कहीं ज्यादा देर साथ चला तो ऐसा न हो जाए कि साथ छोड़ने को जी ही न चाहे।“ प्रशान्त नहले पे दहला था।

कालिन्दी गुप्ता के द्वार पर ठिठक प्रशान्त ने पूछा था- ”सेवक को फिर कब हाजिर होने की आज्ञा है?“

सहास्य गीता ने कहा था- ”वापिस जाने की क्या जरूरत है! सेवक को स्वामिनी की छाया बन उपस्थित रहने का आदेश दिया जाता है।“

”बहुत पछताओगी गीता। ये लो यहीं बरामदे में धूनी जमाए आपकी प्रतीक्षा करूँगा।“ प्रशान्त बरामदे में बैठने ही लगा था।

”छिः, ये भी कोई मजाक है, उठिये यहाँ से............. “ गीता के स्वर में हल्की-सी झिड़की थी।

”सेवक तो स्वामिनी की आज्ञा का पालन करेगा..............“

”छोड़ो प्रशान्त, हमें ऐसी बातें पसंद नहीं-क्या हमने कभी किसी पर अपना रौब जमाया है.........?“ कुछ रूआँसी-सी गीता की बात पर प्रशान्त हॅंस पड़ा था- ”अच्छा भई, अब नहीं करेंगे कभी ऐसा मजाक जो गीता को रूला जाए।“

घर पहुंचते ही गीता पापा से कह रही थी- ”पापा, रोज मुझे पहुंचाने-लाने में इनका कितना समय वेस्ट होगा, सोचा है आपने ? कल से हम अकेले जाएँगे-अब हम बड़े हो गए हैं पापा!“

”हाँ, वो तो हम देख रहे हैं बिटिया। ऐसा करो, प्रशान्त को भी नाटक में कोई छोटा-मोटा रोल दे दो-समय का सदुपयोग हो जाएगा।“ उनके साथ ही प्रशान्त भी जोर से हॅंस पड़ा था।

कालिंदी गुप्ता के घर को जाती पगडंडी के दोनों ओर शेफाली की झाड़ियाँ थीं। शेफाली की मादक सुगन्ध गीता को बहुत भाती थी। अंजुरि में झोंके उनकी सुगन्ध पूरे वातावरण में घोल देते। पगडंडी पर चलते हुए हवा से झरी शेफाली पर प्रशान्त पाँव रखने ही वाला था कि गीता जैसे चीख उठी थी- ”ठहरो प्रशान्त, शेफाली को मत रौंदना "
 धरती पर बिछी शेफ़ाली को देख प्रशांत हंस पड़ा- जानती हो गीत ,शेफ़ाली  का जीवन? रात-भर जीवन के उल्लास से महकती-गर्वित शेफाली, प्रातः पाँव तले रौंदे जाने के लिए स्वयं सेज बिछा देती है।“

”नहीं प्रशान्त, पाँव तले रौंदे जाने की नियति नहीं है शेफाली की..........सच, कितना अन्याय है! रात-भर जिसका रूप-यौवन मुग्धकारी है, प्रातः तक वह झर जाता है! बस एक रात की जीवन जीती है।“ दो-चार फूल तोड़ उन्हें सहलाती गीता गम्भीर हो उठी थी।

”साहित्य का यही दोष है, वास्तविकता से मुंह मोड़ व्यक्ति कल्पना के संसार में जीने लगता है। भला जिन फूलों को जन्मदाता वृक्ष स्वयं एक दिन साथ नहीं रख पाता, प्रातः होते ही उसे अस्वीकार कर दे, उसकी क्या नियति होगी, गीता? डार से झरे पुष्पों को तो देवता भी स्वीकार नहीं करेंगे-यही सच है गीत- इस सच को स्वीकार करना ही होगा। कोरी भावुकता से काम नहीं चलता जीवन में।“ प्रशान्त के स्वर में दृढ़ निश्चय का भाव था।

”हाँ प्रशान्त, एक वैज्ञानिक के सोचने का यही तरीका है। कितनी आसानी से हर बात का पोस्टमार्टम कर सकते हो! मैं तो आज भी रात के आकाश में बिखरे तारों में माँ, बाबूजी को खोजती रहती हूँ।“ गीता का स्वर भीग उठा था।

”आई डू नॉट मीन दैट -सच तुम्हारी यही भावुकता कभी बहुत अच्छी लगती है, गीत! तुम हमेशा ऐसी ही पंख समेटे चिड़िया-सी रहना गीता.........आई मीन दैट-बिलीव मी........“ अब प्रशान्त भावुक हो उठा था।

हौले से सिर उठा जगमगाती आँखों से प्रशान्त को निहारती गीता हॅंस दी तो मानो कुहासा छॅंट गया।

मीरा के रूप में गीता के हृदयस्पर्शी अभिनय की बहुत प्रशंसा की गई थी। प्रोफेसर नारायण ने कई बार रूमाल से अश्रु पोंछे थे। करतल-ध्वनि से गीता का देर तक अभिनंदन किया गया था। घर पहुंचते ही मुग्ध स्वर में प्रशान्त ने सराहना की थी-
”मैं तो एक पल को भूल ही गया था वो मेरी ही गीता है- मीरा नहीं।“

प्रशान्त अनजाने ही उसे ‘मेरी गीता’ कह गया था-अपनी गलती का उसे तनिक-सा आभास भी नहीं हुआ था। बड़े-बड़े विस्मित नयन उठा एक बार प्रशान्त का मुख ताक गीता ने चेहरा नीचे झुका लिया था, कहीं उसका रक्ताभ मुख प्रशान्त की पकड़ में न आ जाए। सप्रयास गीता ने कहना चाहा था-
”इस सफलता के लिए मेरा पुरस्कार?“

”ठीक है, कल हमारी ओर से क्वालिटी की आइसक्रीम तय रही-आखिर तुम्हारी सफलता का दंड तो भरना ही पडे़गा।“

”सिर्फ आइसक्रीम ? न बाबा, इतनी कंजूसी भली नहीं; मैं तो बाबा की चाट भी खाऊंगी।“ गीता हॅंस रही थी।

”ठीक है प्रशान्त, इसे इतनी आइसक्रीम और चाट खिला देना कि आगे से कभी तुम्हें कंजूस न कह सके।“ हॅंसते हुए प्रोफेसर नारायण ने एक सौ का नोट प्रशान्त की ओर बढ़ाया था।

”नहीं सर, ये पार्टी तो मेरी ओर से रहेगी-आपकी ओर से फिर कभी चलेंगे।“ प्रशान्त ने रूपए स्वीकार नहीं किये थे।

दूसरे दिन संध्या गुलाबी शिफान की साड़ी में गीता जाने को तैयार थी। प्रशान्त की मुग्ध दृष्टि से बचती पापा के पास जा पहुंची थी-
”आप भी चलिए न पापा, कभी हमारे साथ नहीं चलते। आज तो चलना ही होगा।“ बड़े लाड़ से गीता ने जिद की थी।

”नहीं बिटिया, कल कान्फ्रेंस के लिए ये लेख पूरा करना है। तुम दोनों जाओ, संडे को हम अपनी बेटी को कहीं बाहर डिनर के लिए ले जाएँगे-ओ के?“ प्रोफेसर पक्के सौदेबाज थे।

सिविल लाइन्स में ठेले के पास खड़ी गीता ने जी भर चाट खाने की तैयारी कर रखी थी। खूब मिर्चे डलवा सी-सी करती, आँसू बहाती गीता को देख प्रशान्त हॅंस पड़ा था-

”इतनी मिर्चे डलवाने की क्या जरूरत थी कि यूँ आँसू बहाए जाएँ ?“

”जरा खाकर देखो न प्रशान्त, मजा आ जाएगा।“ गीता ने दोना बढ़ाया था।
”न भई, ये चाट तुम लड़कियों को मुबारक। अगर हमने खानी शुरू कर दी तो बहुत घाटे में रहोगी।“

जी भर चाट खा लेने के बाद रूमाल ले हाथ पोंछती गीता क्वालिटी में जा आइसक्रीम खाने को उतनी उत्सुक नहीं थी।

”प्रशान्त, क्वालिटी के अंधेरे में आइसक्रीम का क्या मजा, वहाँ संडे को पापा के साथ डिनर को आएँगे।“

”यानी मुझ बेचारे पर तरस आ गया देवी जी को ? तो चलें घर ?“ प्रशान्त प्रसन्न दिख रहा था।

”जी नहीं, आपका वादा अभी पूरा कहाँ हुआ है ? क्वालिटी आइसक्रीम फिर कभी खाएँगे, आज तो सॉफ्टी कार्नर से सॉफ्टी लेंगे। खुली हवा में खाते चलेंगे, मजा आएगा न ?“

”लेकिन बाद में ये तो नहीं कहोगी कि मैंने कंजूसी की ?“ प्रशान्त आश्वस्त हो लेना चाहता था।

”नहीं कहूँगी- नहीं कहूँगी। चलो अब तो चलें सॉफ्टी कार्नर ?“

हाथ में सॉफ्टी ले, पैदल बतियाते चलना गीता को विशेष प्रिय था। प्रोफेसर ने प्रशान्त से कार ले जाने को कहा था तो गीता ने ही आपत्ति की थी- ”
दस मिनट की तो दूरी है पापा, हम पैदल ही जाएँगे। प्रशान्त के पैसों से खाई चाट हज़म करना आसान तो नहीं है न पापा !“ गीता की शैतानी पर सब हॅंस पड़े। सिविल लाइन्स से पैदल घर पहुंचने में सचमुच अधिक समय नहीं लगता था। उस दिन भी गीता ने प्रशान्त से यही कहा था-”देखना ये सॉफ्टी खत्म होने के पहले ही हम घर पहुंच जाएँगे।“

”जी नहीं, इस स्पीड से चलने पर आपको पहुंचने तक कम-से-कम पाँच सॉफ्टी लेनी होंगी।“ प्रशान्त ने व्यंग्य किया था।

”तुम हमेशा इतनी जल्दी में क्यों रहते हो प्रशान्त ? मैं तो इस गुलमोहरी सड़क पर पूरी रात बिता सकती हूँ। कभी गुलमोहर और अमलताश के इन फूलों के सौंदर्य पर तुमने दृष्टि भी डाली है प्रशान्त ?“

प्रशान्त दृष्टि उठाते ही मुग्ध रह गया था। सड़क के दोनों किनारों पर लगे गुलमोहर और अमलताश के गुच्छे हल्की हवा के झूले पर झूल रहे थे। गर्मियों में इन फूलों का वैभव ही निराला होता है। प्रोफेसर नारायण के घर के आस-पास प्रायः सन्नाटा ही रहता था। जन-कोलाहल से दूर उन्होंने अपना बॅंगला बनवाया था। प्रायः इस जनशून्य सड़क के बल्ब भी शैतान बच्चों के निशाना बन अपने दुर्भाग्य पर रोते थे।

घर के मोड़ पर उस रात्रि भी घना अंधकार था। मोड़ पर पहुंचते ही पीछे से आती एक कार ने दोनों का मार्ग अवरूद्ध कर दिया था। कुछ समझ पाने की स्थिति के पूर्व ही दो सबल हाथों ने गीता को कार के अन्दर खींच लिया था। प्रशान्त ने आगे बढ़ गीता को पकड़ना चाहा था, पर आगे की सीट से उतरे एक बलिष्ट व्यक्ति ने प्रशान्त को ज़ोर से धक्का दे गिरा दिया था। गीता को जबरन कार में ढकेल, कार का दरवाजा बन्द कर, कार तेजी से आगे चली गई थी। ”प्रशान्त.......प्र...........शा..........“ सम्भवतः गीता का मुख बन्द कर दिया गया था।

पलक झपकते वो हादसा हो गया था। प्रशान्त जब तक उठा, कार तीव्र गति से मोड़ के आगे जा चुकी थी। अंधेरे में कार की बैक लाइट भी ऑफ़ थी-नम्बर देख पाना असम्भव था। बदहवास प्रशान्त भाग कर जब घर पहुंचा, प्रोफेसर खाने की मेज़ पर बैठे ही थे। पुलिस थाने का नबर मिला प्रशान्त ने घटना की जानकारी दी थी। शहर का पुलिस अधीक्षक कुमार प्रोफ़ेसर का छात्र रह चुका था, खबर पाते ही जीप में उनके पास आ पहुंचा  पूरी बात सुन शान्ति से उसने प्रोफेसर को सलाह दी थी-

”सर, अच्छा हो इस विषय में किसी बाहर वाले को खबर न हो। मैं विश्वास दिलाता हूँ, सुबह के पहले गीता को खोज लूंगा। तब तक व्यर्थ बदनामी न होने देने के लिए हिम्मत तो रखनी ही होगी, सर !“

पितृतुल्य प्रोफेसर को बच्चों-सा दिलासा दे कुमार गीता की खोज में चला गया। सचमुच रात के तीन बजे तक गीता का अर्द्धचैतन्य शरीर कुमार ने खोज निकाला था। हॉस्पिटल में गीता को एडमिट करा कुमार ने प्रोफेसर को फोन किया था। सूचना पाते ही प्रशान्त के साथ प्रोफेसर हाँस्पिटल पहुंच गए थे।

सफेद चादर में गीता का मुख छिप-सा गया था। डॉक्टर ने सोने का इंजेक्शन दे रखा था। गीता के निष्प्रभ सफेद मुख को देख प्रोफेसर संयम खो रो पड़े थे और अपनी विवशता और आक्रोश पर प्रशान्त तिलमिला उठा था-जी चाहता था, अपना सिर कहीं फोड़ डाले। डॉक्टर ने प्रोफेसर के कंधे पर अपना सहानुभूतिपूर्ण हाथ रख कर कहा था-
”हैव करेज प्रोफेसर ! बच्ची बहुत बड़े हादसे से गुजरी है, आपको ही सम्हालना होगा।“

पुलिस अधीक्षक कुमार ने दृढ़ स्वर में प्रतिज्ञा करते हुए कहा था- ”उन दरिन्दों को सज़ा दिलाए बिना नहीं छोडूँगा, मेरा विश्वास कीजिए, सर, जब तक उन्हें पकड़ नहीं लूंगा, चैन से नहीं बैठूंगा।“ प्रोफेसर शून्य में हाथ उठा न जाने क्या बुदबुदाए थे।

पूरे बारह घंटे निस्पन्द पड़ी गीता का शरीर हल्की कराह के साथ हिल उठता था। गीता की वो कराह प्रोफेसर और प्रशान्त का हृदय चीर जाती थी। बारह घंटों बाद जब गीता ने आँखें खोलीं तो बड़े दुलार से उसके सिर पर हाथ फेर प्रोफेसर ने कहा था- ”अच्छी तो है मेरी बिटिया रानी?“

उत्तर में सिर तक चादर खींच गीता हिचकियाँ ले रो पड़ी थी। कितनी हृदयद्रावक था वो रूदन-मानो तीरविद्ध शावक अपने पंख कट जाने की दारूण वेदना से कराह रहा हो। प्रोफेसर के नयन अश्रुपूर्ण थे, प्रशान्त ने चेहरा दीवार की ओर फेर लिया।

”मैं मर जाऊंगी पापा, मैं जिंदा नहीं रह सकती। मुझे ज़हर दे दो पापा...........“ स्वर सिसकियों में डूब गए थे।

”ना बेटी, यूँ हिम्मत नहीं हारते। तू तो अपने पापा की बहादुर बिटिया है न ? तेरे बिना तेरे पापा को कौन सम्हालेगा बेटी? देख कल से ये प्रशान्त भी भूखा-प्यासा खड़ा है, आओ प्रशान्त।“

तनिक आगे बढ़ प्रशान्त ने जैसे ही पुकारा था ”गीत“............उसने अपना सिर तकिए में गड़ा अपने को पूर्णतः समेटना चाहा था। अस्फुट कन्दन के मध्य ”नहीं.......नहीं....“ ही प्रशान्त सुन सका था। अपराधी-सा प्रशान्त गीता के तकिए में गड़े सिर को निहारता रह गया था।

एक सप्ताह बाद गीता घर आ गई थी, पर मानो ये कोई और ही गीता थी। पहले वाली शोख-चंचल गीता न जाने कहाँ खो गई थी। कुमार के निर्देशानुसार इस दुर्घटना को गुप्त ही रखा गया था। बाहर वाले परिचित यही जान सके-अचानक गीता की तबियत खराब हो गई थी और डाक्टरों ने उसे कुछ दिन आराम की सलाह दी थी। अगर किसी के मन में कोई शंका उठी भी होगी तो वो घर के प्राणियों तक नहीं पहुंच सकी थी।

अपने कमरे में कैद गीता शायद छत की कड़ियाँ गिनते ही दिन काट देती थी। अपने पापा और प्रशान्त की बार-बार मनुहार पर भी गीता संध्या-चाय के लिए लॉन में नहीं जाती थी। साहस करके एक दिन प्रशान्त ने गीता को समझाना चाहा था-
”यूँ, सबसे कट कर अपने को दंडित कर रही हो गीत? तुम्हारा अपराधी मैं हूँ, मुझे दंडित करो। अक्षम्य अपराधी हूँ मैं-तुम्हारा............ अपनी गीता की रक्षा तक न कर सका!“ प्रशान्त का स्वर रूँध गया था।

”नहीं प्रशान्त, तुम अपने को व्यर्थ अपराधी ठहरा रहे हो......कार से सिविल लाइंस  न जाने की ज़िद तो मैंने की थी न? शायद मेरा दुर्भाग्य था...........“

”गीत, क्या वो दुर्घटना तुम भुला नहीं सकतीं?“ प्रशान्त की स्थिर दृष्टि गीता के मुख पर निबद्ध थी।

”तुम वो सब कुछ भुला सकते हो, प्रशान्त?“ गीता ने सीधे-सपाट स्वर में उल्टा प्रश्न किया था।

”मैं.........मैं तुमसे विवाह करना चाहता हूँ, गीत!“

”क्यों -क्या अपनी भूल का प्रायश्चित करना चाहते हो या अपने अपराध के लिए स्वयं दंड निर्धारित किया है, प्रशान्त?“

”छिः, कैसी बातें करती हो गीत! क्या तुम नहीं जानती मैंने हमेशा तुम्हारी कामना की है, आज भी मैं तुम्हें पाना चाहता हूँ। मेरे प्यार पर अविश्वास क्यों, गीत?“

”तुम पर तो अपने से भी ज्यादा विश्वास है प्रशान्त, पर तुम व्यर्थ अपने को अपराधी ठहरा प्रायश्चित्त या दंडस्वरूप मुझे अपनाना चाहो, ये मुझे स्वीकार नहीं है। मैं तुम्हारी अपराधिनी नहीं बनना चाहती प्रशान्त!“ नयनों में उमड़े आ रहे आँसुओं को गीता जबरन रोक रही थी।

”मुझसे विवाह कर तुम अपराधिनी बनोगी, गीत !“ प्रशान्त का विस्मय स्वाभाविक था।

”हाँ प्रशान्त, इस कडुए सत्य को आत्मसात् कर पाना सचमुच कठिन था, पर मैं ज़हर का घूंट पी चुकी हूँ। मेरी अन्तर्वेदना के एकमात्र साक्ष्य तुम हो। जब भी हम एक-दूसरे को देखेंगे वो वेदना, मेरा वो घाव सदैव हरा रहेगा-हम दोनों इस हादसे को कभी नहीं भुला सकेंगे, प्रशान्त ............ कभी नहीं...........“

”समय हर घाव को भर देता है गीत, आज ये घाव हरा है, कल इसका नामो-निशाँ नहीं बचेगा।“

”बशर्ते इसे जीवित रखने को हम साथ न रहें!“

”क्या कहना चाहती हो गीता ?“ प्रशान्त फिर विस्मित था।

”मेरे लिए इस समय कुछ भी करने को तत्पर हो न प्रशान्त ?“ गीता के नयन प्रशान्त के सौम्य चेहरे पर गड़े थे।

”कह के तो देखो गीत ! सिर्फ इसी समय क्यों - जब भी पुकारोगी प्रशान्त को पाओगी।“ पास के स्टूल पर बैठ गीता के माथे पर झूल आई लट सॅंवारता प्रशान्त आशान्वित हो उठा।

”तुम हमेशा के लिए यहाँ से चले जाओ, प्रशान्त ! मैं जानती हूँ पापा तुम्हारे बिना टूट जाएँगे, पर तुम मेधावी और प्रतिभाशाली हो- अमेरिका छात्रवृत्ति लेकर चले जाओ, प्रशान्त ! पापा भी तो उस दिन यही सजेस्ट कर रहे थे न? मैं भीख माँगती हूँ प्रशान्त, यहाँ से चले जाओ !“ आगे की बात आँसुओं में भीग गई थी।

”मेरे बिना रह सकोगी, गीत? थोड़ा शान्त और सुस्थिर होकर निर्णय लेना-सच पा जाओगी।“ बहुत दुलार से प्रशान्त  ने चुनौती दी थी।

”तुम्हारे बिना ही जी सकूँगी, प्रशान्त! तुम्हारे साथ हर पल ये एहसास जीता है- मैं अपवित्र हूँ, अस्पर्श्य हूँ। शेफाली-सी नियति पाई है मैंने प्रशान्त.......... झरी, रौंदी शेफाली अपने देवता के मस्तक नहीं चढ़ सकती न प्रशान्त? मुझे क्षमा कर दो मेरे देव!“ कंठ से रूलाई छलकी पड़ रही थी। बिना कुछ कहे प्रशान्त बाहर चला गय।

प्रशान्त को अमेरिकी छात्रवृत्ति मिल गई थी। जाने के पूर्व प्रशान्त को आलिंगन में बाँध मौन प्रोफेसर नारायण ने न जाने कितना अनकहा कह डाला था। कभी भावों की अभिव्यक्ति के लिए शब्द आवश्यक नहीं होते। तैयारी के लिए प्रशान्त को पहले अपने घर जौनपुर जाना था। जाने के पहले गीता ने प्रशान्त से आग्रह किया था-
 ”आपके पिताजी अस्वस्थ रहते हैं, कई बार आपके विवाह के लिए पापा को लिखते रहे हैं। आप विवाह करके ही अमेरिका जाएँ तो उन्हें शान्ति मिलेगी।“

”और तुम्हें? बहुत भारी पड़ गया था न गीत तुम पर? जो दंड कहो सह लूंगा......“ प्रशान्त चला गया था।

घर में भर गए सूनेपन को झेलते प्रोफेसर और गीता लॉन में बैठे, निःशब्द हवा का सरसराना भर सुनते रहते थे। प्रशान्त के पिता का कृतज्ञतापूर्ण पत्र और साथ में एक निमंत्रण आया था-
”आपके आदेशानुसार प्रशान्त विवाह के लिए राजी हो गया है। विवाह शहर के उद्योगपति की एकमात्र कन्या से तय हुआ है। प्रशान्त की हार्दिक इच्छा है नवदम्पति को आशीर्वाद देने प्रोफेसर साहिब बेटी गीता के साथ अवश्य आएँ।“ सब कुछ एक सप्ताह में ही किया जाना था ताकि विवाह के बाद प्रशान्त सपत्नी अमेरिका जा सके।

पत्र पढ़ एक लम्बी उसाँस छोड़ प्रोफेसर शून्य में निहारते रह गए थे। उनके मन की बात क्या गीता से छिपी थी ! प्रशान्त को घर में रख, गीता का पूरा दायित्व उसे सौंपने में उनकी इच्छा गीता पर स्पष्ट हो चुकी थी। प्रोफेसर से बिना पूछे गीता उनकी जौनपुर-यात्रा की तैयारी में जुट गई थी। बाजार से साड़ी और सच्चे मोती के टॉप्स खरीदकर भी वह सन्तुष्ट न थी........ ”पापा, प्रशान्त को सोने से अधिक सच्चे मोती पसन्द हैं -इसलिए ये टॉप्स लाई हूँ। दाम कुछ ज्यादा थे, पर ये टॉप्स बहुत सुन्दर है न पापा ?“ प्रोफेसर निरूत्तर गीता को देखते रह गए थे-यूँ अपने घर में स्वयं आग लगा हाथ सेंकना क्या किसी अन्य को सम्भव होगा !

पर जौनपुर जाने के दिन अचानक प्रोफेसर नारायण को जाड़ा देकर तीव्र ज्वर आ गया था। प्रशान्त को विवाह के लिए आशीर्वाद टेलीग्राम द्वारा भेजना पड़ा था। आश्चर्य था कि अमेरिका जाकर प्रशान्त ने धन्यवाद पत्र भी नहीं भेजा था।

प्रथम श्रेणी में एम0ए0 कर गीता ने भी शोध-कार्य प्रारम्भ किया था। जीवन बिना किसी हलचल के शान्त सरोवर-सा चल रहा था। नए सत्र में गीता का अस्थायी प्राध्यापिका रूप में चयन हो जाने से व्यस्तता बढ़ गई थी। प्रोफेसर नारायण कभी अपनी उस तपस्विनी बनी बिटियाँ को देख व्यथित हो उठते थे-
”तू विवाह कर ले बेटी, तो मैं स्वामी जी के पास जा निश्चिन्त हरि-भजन करूँ ,गीता !“

”यहाँ हरि-भजन की सुविधा नहीं है क्या पापा? सच कहना बहुत तंग करती हूँ आपको क्या?“

”वो बात नहीं है बेटी, कन्यादान किए बिना भला हरि-भजन में चित्त एकाग्र कर पाऊंगा?“ प्रोफेसर का स्वर उदास हो उठता था।

”मेरा दान तो आप कर नहीं सकते पापा, मेरी स्वर्ण-प्रतिमा दान कर दें-किसी ब्राह्मण का भला हो जाएगा !“ गीता खिलखिला उठती।

”स्वर्ण-दान भी हो जाएगा बेटी.........पर............“

”चलो पापा आज कहीं घूम आएँ, आप उदास लग रहे हैं।“ गीता जबरन कार में पापा को ले उनके किसी मित्र के घर चली जाती थी।

प्रशान्त की स्वदेश वापिसी और प्रोफेसर नारायण के विभाग में उसकी नियुक्ति की सूचना ने शान्त सरोवर के जल को पूर्णतः उद्वेलित कर दिया था। शान्त-निर्विकार गीता अचानक प्रोफेसर नारायण से बच्चों-सी जिद कर बैठी थी..............

”पापा, हम गुरूजी के पास हरिद्वार चलेंगे। आपने कहा था, स्वामी जी के पास दुखों से मुक्ति मिलती है, मन को शांति मिलती है।
" हां बिटिया,पर तेरे मन को वहां  भी शांति मिल सकेगी, इसमें मुझे सन्देह है।“

”नहीं पापा, यूँ टालने से नहीं चलेगा, हमें हरिद्वार जाना ही है। स्वामी जी के विद्यालय में मैं पढ़ाऊंगी। उन अनाथ बच्चों के बीच ही शान्ति पा सकूँगी। चलो न पापा !“

”पर तेरी लेक्चररशिप का क्या होगा बिटिया? दो महीने बाद परमानेंट पोस्ट मिल जाएगी-इन्टरव्यू देना है न?“

”नहीं-नहीं, वो सब कुछ नहीं चाहिए पापा, बस यहाँ से चलना है।“ गीता का स्वर करूण आर्तनाद-सा कर उठा था।

”ठीक है बेटी यही सही-स्वामी जी झूंसी आए हुए हैं, उन्हें बुलाकर बात कर लेते हैं।“ प्रोफेसर उदास हो उठे थे।

अचानक हरिद्वार जाने का निर्णय लेने मे गीता की उतावली का रहस्य प्रोफेसर नारायण समझ रहे थे, काश जो उन्होंने जो सोचा था वैसा हो पाता, और आज यज्ञ का ये आयोजन सबसे विदा लेने का क्या बहाना भर था? प्रशान्त को देख मन न जाने क्यों उद्वेलित हो गया था। कल प्रातः कार से हरिद्वार जाना निश्चित हो चुका था।

लॉन के कोने में कुर्सी पर बैठे डॉ प्रशान्त सामने लगी शेफाली की नन्हीं सी झाड़ी को निहार रहे थे। कालिन्दी गुप्ता के घर से इसे गीता कितने प्यार से लाई थी। आज वही नन्हा पौधा पुष्पित-पल्लवित हो हवा में अपनी सुगंध फेला रहा था। क्या गीता की शेफाली-सी नियति थी? गीता की इस नियति को उत्तरदायी प्रशान्त स्तब्ध बैठे थे। क्या प्रशान्त गीता को अपने साथ विवाह के लिए राजी नहीं कर सकता था? गीता का यह पलायन प्रशान्त के प्रति अटूट प्यार का ही तो परिणाम है। गीता ने उसे हृदय से चाहा और वो कायर पहला अवसर पाते ही देश छोड़ भाग निकला- ”कायर.......चीट.......“

”क्या बात है प्रशान्त ? यूँ अकेले बैठे हो, तबियत तो ठीक है न?“ प्रोफेसर का स्वर स्नेहपूर्ण था।

”मैं गीता से विवाह करना चाहता हूँ, सर ! आपकी आज्ञा और आशीर्वाद चाहिए..........“

”क्या ..........? पर तुम तो विवाहित हो, प्रशान्त?“

”नहीं सर, शायद वह मेरा सौभाग्य ही था-ठीक विवाह के दो दिन पहले दीपा का लिखा पत्र मिला था मुझे-वह किसी और को चाहती थी। पिता की जिद के कारण मुझसे विवाह को दीपा विवश की गई थी...........“

”फिर.........?“ प्रोफेसर के स्वर में विस्मय था।

”दीपा की मदद के लिए मैंने ही दृढ़ता से कह दिया था मैं किसी और के प्रति वचनबद्ध हूँ, ये विवाह नहीं होगा।“

”तुम्हारे परिवार वाले मान गए, प्रशान्त ?“

”परिवार वाले बहुत क्रोधित हुए-पर उसके अलावा कोई और विकल्प भी तो नहीं था। आज लगता है उस दिन भी मैंने झूठ नहीं कहा था, सर ! अगर विवाह हो जाता तो जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप होता।“

”पर पिछले तीन वर्षों में इस विषय में तुमने मुझे कुछ भी नहीं लिखा, प्रशान्त ?“

”गीता के भ्रम को न तोड़ना ही तब ठीक समझा था। सोचता था शायद गीता कहीं अन्यत्र विवाह कर ले तो मैं बंधन-मुक्त हो जाऊं।“

”बंधन-मुक्त? तुम्हें तो किसी ने बंधन में नहीं बाँधा, प्रशान्त?“ प्रोफेसर नारायण ने प्रशान्त को सीधी दृष्टि से देखा था।

”आज सब स्वीकार करते मुझे लज्जा नहीं है, सर ! गीता को प्यार करने के बावजूद उस हादसे के कारण अपने को तैयार नहीं कर पाता था-बहुत दिन अपने से संघर्ष करता रहा, पर मैं कायर सिद्ध हुआ था-पर आज मैंने अपने मन का सत्य पा लिया.....गीता के बिना मेरा जीवन निरर्थक है। मुझे आज्ञा दीजिए, सर!“ प्रशान्त का कंठ भर आया था।

तभी उनकी ओर आती गीता का मधुर स्वर सुनाई दिया था- ”यहाँ हैं पापा, वहाँ सब आपको खोज रहे हैं। आप..........“ प्रशान्त से मिलते ही गीता रूक गई थी।

”अच्छा बेटी, मैं उधर चलता हूँ......“ व्यग्र भाव से प्रोफेसर आगे गए थे।

चलने को उद्यत गीता का हाथ पकड़  प्रशान्त ने उसे रोक लिया।

”छिः, ये क्या कर रहे हैं.........छोड़िये मेरा हाथ...........“

”अपने इस भटके राही का मार्ग-दर्शन नहीं करोगी, गीत? कब तक तुम्हारी प्रतीक्षा करनी होगी?“

”कैसी बातें कर रहे हैं आप? आपका मार्ग-दर्शन करने को आपकी पत्नी है। मुझे मेरी नियति पर छोड़ दीजिए। ऐसी बातें आपको शोभा नहीं देती डॉ प्रशान्त ! छोड़िए मेरा हाथ...“

”अपनी नियति तुम्हें बदलनी होगी, गीत। तुम शेफाली नहीं गीता हो...... इसीलिए तो पत्नी-रूप में तुमसे मार्ग-दर्शन का अधिकार माँग रहा हूँ गीता। बहुत देर से पहुंचा हूँ तुम्हारे पास, मुझे क्षमा मिलेगी न?“ बहुत मनुहार से प्रशान्त ने अनुनय की थी।

”पर.......ये सब क्या है, प्रशान्त ? स्वामी जी, आप इन्हें समझाइए..... विवाह मेरी नियति में नहीं है। पापा, आप ही इन्हें बताएँ.........“ प्रोफेसर के साथ आए स्वामी जी की मंद स्मिति पर गीता विस्मित थी।

”अगर विवाह गीता की नियति नहीं तो वही नियति मैं अपने लिए भी स्वीकार करता हूँ, गुरूजी! मैं आपके समक्ष सच्चे हृदय से अपनी भूल स्वीकार कर, प्रायश्चित को तत्पर हूँ।“ डॉप्रशान्त स्वामी जी के चरणों में जैसे ही झुके, उन्होंने उसे प्यार से उठा हृदय से लगा लिया।

अवाक् गीता का हाथ प्रशान्त के हाथ में वे स्वामी जी ने आशीर्वाद दिया था- ”पति-पत्नी रूप में इस जीवन-पथ पर सदैव कर्मरत रहो- यही मेरा आशीर्वाद है।“

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