एक पाखी अकेला

ड्राइंग रूम के सज्जित वक्ष में एक ओर रखे अक्वेरियम में बस एक नन्हीं सी लाल मछली तैर रही थी। व्याकुल कंठ से नन्दिता ने मुड़कर गृहस्वामी सोमेश दत्त से कहा था-
कितनी अकेली छटपटा रही है ये मछली, सोमू दा। कुछ और मछलियाँ डाल दीजिये न इसके साथ।


गम्भीर स्वर में अन्यमनस्क सोमेश दत्त बोले-

हाँ कुछ और मछलियाँ डालनी ही होंगी सचमुच ये अकेलापन महसूस करती होगी। मेरा ध्यान ही नहीं गया था।

नन्दिता के चले जाने के बाद खिड़की के सीखंचे पकड़े सोमेश दत्त सोचने लगे- क्या इस घर में बस ये मछली ही अकेली छटपटाती है? सच तो यह है पत्नी के साथ रहते भी सोमेश दत्त कितने अकेले हैं? वर्षों पहले सोमेश का अकेला जीवन कितना पूर्ण था?

गांव के निकटवर्ती कॉलेज से प्रथम श्रेणी में बी0एस0सी0 परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद जब सोमेश इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम0एस0सी0 करने आने लगे तो माँ ने इलाहाबाद में रह रही अपनी एक सखी का पता दे दिया था। कभी सोमेश की माँ और वह घनिष्ठ सहेलियाँ हुआ करती थीं।

लूकरगंज के बताये उस घर के पते पर पहुंच, सोमेश एक पल असमंजस में खड़ा रह गया। इतनी बड़ी हवेलीनुमा घर में कहाँ-किसे पुकारूँ? किस मुश्किल में माँ ने डाल दिया। तभी एक लड़की जोरों से हॅंसती हुई बाहर आ गई थी। पीछे से कोई स्वर उसे पुकार रहा था। सोमेश को भौचक खड़ा देख वह लड़की एकदम अकड़ कर बोली-

ऐ मिस्टर कहाँ से आ रहे हैं? किससे मिलना है? कहीं चोरी-वोरी का इरादा तो नहीं है? उसे ऊपर से नीचे तक देख, जैसे पूर्ण आश्वस्त हो बोली थी

नहीं चोर तो नहीं लगते, हाँ गंवई गाँव के नमूने जरूर दिखाई देते हो।

लज्जा, अपमान से सोमेश का मुख लाल हो उठा था। हाथ के झोले को पीछे कर, जबरन मुस्कान ला कहा था-

नमूना तो आदमी काहूं,  क्या मिसेस माया मित्रा यहीं रहती हैं?

ओह तो आप मम्मी के पास आये हैं, वंडरफुल। माँ, एतुम्हारे कोई मेहमान आये हैं सम्हालो इन्हें। द्रुत गति से वह लड़की दूसरी दिशा में चली गई।

अन्दर से एक प्रौढ़ा ने बाहर आ सोमेश को देख स्नेह से पूछा-

कौन हो भई! क्हाँ से आ रहे हो? प्रत्युत्तर में हाथ जोड़, नमस्कार कर सोमेश जैसे ही चरण- स्पर्श करने को झुका, स्नेह से उसे उठा आशीष दे प्रौढ़ा एकदम खिल गई

अरे तुम कृष्णा के बेटे सोमेश हो न? सोमेश ने आश्चर्य से जैसे ही स्वीकृति सूचक सिर हिलाया माया मित्रा प्रसन्नता से विभोर पुकारने लगीं.

अरी सपना, ज़रा देख तो सही कौन आया है? कई आवाजों के बाद वही लड़की धृष्ट मुस्कान के साथ आ खड़ी हुई। स्नेह से प्रौढ़ा ने कहा-

देख ये तेरे सोमेश दादा हैं, समझी। चल जल्दी से हाथ-मुंह धुला, नाश्ता लगा। कब चले थे बेटे?

ओह माँ, तो यही हैं कृष्णा मौसी के अति कुशाग्र बुद्धि सुपुत्र। वैसे इनसे मिल चुकी हूं, आइए। सोमेश को घर के भीतर आने को आमन्त्रित करती सपना एकदम साम्राज्ञी की तरह सिर उठाए अन्दर चल दी। सोमेश माया मौसी के साथ उसका अनुकरण करने को बाध्य था।

लाख कोशिशों के बाद भी सोमेश को मौसी ने होस्टेल नहीं जाने दिया था। इतना बड़ा घर भूत के डेरे सा लगता है। सपना के पापा का तो इस घर से नाम का नाता है। व्यापार के सिलसिले में बाहर ही रहना होता है। कुछ रूक कर मौसी बोली थीं।
इस सपना को भी अक्ल सिखा दे, सोमू, बस घोड़ी की तरह इधर-उधर छलांग भरती रहती है। कितना भी समझाती हूं, अक्ल ही नहीं आती।

ओह माँ में घोड़ी हुँ तभी तो बी0ए0 पार्ट वन में सर्वप्रथम आई हूं। तुम्हारे इन मौनी बाबा से क्या मैं अक्ल सीखूंगी? तुम्हारा तो जवाब नहीं, माँ।

अपमान से सोमेश का चेहरा तमतमा आया। माँ ने झिड़की दे सपना को डांटा ज़रूर, पर उस उदंड लड़की पर कोई भी प्रभाव परिलक्षित, सोमेश नहीं देख पाया। लज्जित स्वर में माया मौसी कहती गई। तुम इसकी बात का बुरा मत मानना, बेटे। इतने बच्चों में बस यही बची है, इसके बाबा ने सिर चढ़ा रखा है वैसे दिल की सपना हीरा है।

सोमेश को नीचे का कमरा दे दिया गया था। भोजन कराते समय माया मौसी अपनी और सोमेश की माँ की मित्रता की न जाने कितनी कहानियाँ सुनाती जाती थीं। सोमेश के विषय में कृष्णा दत्त एक-एक बात विस्तार से अपनी सहेली को सदैव लिखती रही है, जान कर सोमेश आश्चर्य कर उठता था। माँ ने अपने बेटे के गुणों की इतनी विशद् विवरणी भेजी थी कि कभी-कभी सोमेश लज्जित हो उठता था।

एक संध्या अपनी वीणा ले सोमेश तन्मय हो, बहुत रात तक बजाता रह गया था। प्रातः मौसी ने विस्मय से पूछा था-इतनी अच्छी वीणा कहाँ से बजाना सीख गया, सोमू?

बस यूँ ही मन बहलाने को बजा लेता हूं, कह कुछ अभिमान से सोमेश ने जैसे ही सपना की ओर देखा, वह पूछ बैठी-

ऐ सोमू दा ,हमें भी वीणा सिखाओगे?

न! इसमें एकाग्रता चाहिए-तुम मन कभी भी एकाग्र नहीं कर सकतीं, सपना।

क्या? एकदम क्रोध में सपना खड़ी हो गई।

मैं नहीं सीख सकती? तुम्हें अपने ऊपर इतना अभिमान क्यों है, सोमू दा? तुमसे अच्छी वीणा बजा कर दिखा दूंगी। कहती आवेश से रूद्ध गले के साथ सपना वहाँ से चली गई। स्तब्ध सोमेश उसके जाने की राह देखता रह गया।

मौसी ने हॅंस कर कहा था

ठीक तो है सोमू, कभी खाली वक्त में सिखा दिया कर। कम से कम लड़की का घर से बाहर निकलना तो बन्द हो जाएगा।

बहुत मान-मनुहार के बाद सपना सोमेश से वीणा सीखने को तैयार हुई थी। एक सप्ताह में सोमेश समझ गया सपना ने झूठ नहीं कहा था अगर वह चाहेगी तो बहुत जल्दी अच्छी वीणा बजा सकेगी। सपना की संध्याएं मानो वीणा-वादन के लिए समर्पित हो गई थीं। जिस एकाग्रता से वह वीणा-बजाना सीखती सोमेश विस्मित रह जाता। माया मौसी सोमेश का विस्मय देख बोली थीं-
 इस लड़की का स्वभाव ही ऐसा है, सोमू। कभी एकदम अल्हड़ बच्ची बन जाती है, तो कभी छोटी सी बात इस गम्भीरता से लेती है कि इसके पापा तक डर जाते हैं। सच कहूं सोमू, इसके जिद्दी स्वभाव से मैं न जाने क्यों बहुत डरती हूं।

सोमेश की वीणा सुनती तन्मय सपना मानों कहीं दूर खो जाती थी। वीणा-वादन रूकते ही जैसे तंद्रा से अचानक जगाई गई सपना, चौंक उठती थी। एक जोड़ी आँखें मुग्ध विस्मय से परिपूर्ण सोमेश पर निबद्ध रह जाती थीं।

माया मौसी को किसी विवाह में बनारस जाना था। सोमेश के भोजन की व्यवस्था का भार सपना को सौंपते मौसी आश्वस्त नहीं हो रही थीं। घर की पुरानी महराजिन को बार-बार निर्देश दे मौसी जा सकी थीं। भोजन के समय उसके पास बैठ सपना जैसे उसकी अभिभाविका बन गई।

ऐ सोमू दा, ये सब्जी खाकर देखो हमने बनाई है।

सोमेश ने मुंह बनाया. ओह तभी तो इतना तेज नमक है।

क्या? एकदम सोमेश की कटोरी से सब्जी निकाल सपना ने मुंह में डाल ली।

छिः सोमू दा, इत्ते झूठे हो तुम? इतनी अच्छी सब्जी बनाई ओर तुम्हें नमक ज्यादा लग रहा है। कल से होटल में खाना तब पता लगेगा, समझे।

पर सपना तुमने मेरी जूठी सब्जी खाकर अपना धर्म तो भ्रष्ट कर डाला। पर .पुरूष की जूठन खाई है प्रायश्चित करना होगा।

ऐ सोमू दा तुम क्या कोई फ़िल्मी कहानी बना रहे हो? अपने को हीरो मत समझ बैठना। वैसी कहानियाँ बस शरतचंद्र की परिणीता ही जैसी होंगी मत समझ लेना समझे।

अभिमान से सिर उठाए सपना जैसे ही उठ कर अन्दर गई सोमेश का मुख काला पड़ गया। आधा भोजन छोड़ ज्यों ही सोमेश उठने लगा, आंधी की तरह सपना आ खड़ी हुई।

अच्छा अब माँ से यही कहोगे न हमने तुम्हें भूखा रखा था। अगर पूरा खाना नहीं खाया तो दो दिन तक अन्न ग्रहण नहीं करेंगे। हमारी ज़िद के आगे माँ भी हार जाती है, समझे।

विवश सोमेश फिर खाने बैठ गया, पर जैसे भोजन का स्वाद एकदम कडुवा हो उठा था। पूरी रात सोमेश सो नहीं सका था न जाने क्यों मन बहुत व्याकुल था। क्या वह सचमुच कोई कहानी रचने लगा था? नहीं-नहीं मन को बार-बार झटका दे, उस जाडे़ की रात में बिना ऊनी कपड़ों के, निरर्थक बाग़ में देर तक घूमता रह गया था।

सुबह सोमेश को तेज बुखार में पा सपना किसी व्यग्र हो उठी थी। घर के डाक्टर ने आ जब न्यूमोनिया की शंका व्यक्त की तो सपना का चेहरा सफ़ेद पड़ गया था। अनुनयपूर्ण स्वर में सपना मानों डाक्टर के समक्ष गिड़गिड़ा उठी थी

कोई भय तो नहीं है न डाक्टर अंकल? आप यहीं रह जाइये न। हॅंस कर डाक्टर ने स्नेह से कहा था नहीं पगली कोई भय नहीं कहो तो में एक नर्स भेज दूं।

नहीं-नहीं अंकल, हम सब देख लेंगे बस आप आते रहियेगा। कल तो माँ भी आ रही है।

जिस तन्मयता से सपना सोमेश की परिचर्या में जुट गई कि देखकर आश्चर्य होता था। वह मस्त सपना मानों कहीं खो गई थी। बुखार नार्मल होने के बाद माँ  ने सहास्य कहा था-
ले सपना, तेरी तपस्या पूर्ण हो गई तेरा सोमू दा अब एकदम ठीक है।

मन्दिर में भगवान के चरणों में शीश धर सपना ने, न जाने क्या मौन प्रार्थना की थी। घर आकर पूरे घर में स्वंय प्रसाद बाँटा था। सोमेश हल्के से मुस्करा भर दिया था। पर सपना का वह पागलपन उसे कितना अच्छा लगा था।

सपना के कॉलेज में वार्षिकोत्सव था। सपना की सब सहेलियों का अनुरोध था सोमेश दत्त का वीणा-वादन उस दिन अवश्य हो। सोमेश से बिना पूछे सपना ने स्वीकृति भी दे डाली थी। सोमेश के संकोच पर सपना बच्चों की तरह फुसलाती गई।

अरे सोमू दा, हम तो रहेंगे वहाँ। मज़ाल है कोई लड़की छेड़ तो दे तुम्हें। फिर तुरन्त मनुहार करती कहती गई।

ऐ सोमू दा, देखो हमारी इज्ज़त का सवाल है। नहीं बजाओगे तो प्रिन्सिपल क्या कहेंगी हमारी? सपना अपने कॉलेज के लिए इतना भी नहीं कर पाई?

नियत दिन सोमेश को वीणा-वादन के लिए जाना ही पड़ा था। वीणा-वादन के पूर्व ही छात्राओं की जोरदार तालियों की गूंज से सोमेश का हृदय धड़क उठा था। वीणा-वादन अत्यन्त सफल रहा। वीणा के हाथ में ले सोमेश मंच से नीचे उतर रहा था, एक शोख आवाज उभरी थी-

 ऐ सपना ले सम्हाल अपने वीणा-वादक को कहीं किसी की नज़र न लग जाए।

दूसरी आवाज उभरी-हाय काश हमें भी कोई इतना चाहता। लगता है वीणा बजाते भी सपना को याद कर रहे थे। क्या दर्द उभरा है स्वरों में।

कितनी लकी हे सपना जो धुन कही बजा दी। सपना का ही तो अनुरोध था इस धुन के लिए क्यों ठीक कह रही हुँ न ,सपना के मजनूँ जनाब।

एक ढ़ीठ लड़की राह रोक खड़ी हो गई थी कभी हम पर भी नजर डालिए हुजूर।

लज्जा से सोमेश मुंह भी ऊपर न कर सका। कॉलेज से बाहर आते ही मन का सारा आक्रोश ज्वालामुखी की तरह बह निकला। बिना रूके पूरे रास्ते अनाप-शनाप न जाने क्या-क्या सपना को सुनाता गया था। अभी भी उसे याद है, वह बरस पड़ा था-

शर्म नहीं आती इतनी बकवास सुन कर भी हॅंसती रहीं? तुम तो किसी कहानी की नायिका नहीं हो फिर ये क्या था? अगर चीप पब्लिसिटी का इतना ही शौक है तो किसी और को खोज लो समझीं। अब और अधिक अपमान असंभव है। कल ही होस्टेल चला जाऊंगा। मैं ऐसी छिछोरी लड़कियों से घृणा करता हुँ।

पूरे समय सपना शान्त-निर्वाक रह मानों आरोप सहती गई। उसका मौन सोमेश का साहस बढ़ाता गया था। उत्तेजना में कहे वाक्य सोमेश दत्त आज चाह कर भी याद नहीं कर पाते हैं। निःशब्द सपना घर पहुंच, माँ से भोजन न करने को कह, जल्दी सोने चली गई थी। उत्तेजना शान्त होने के बाद सोमेश को लगा शायद उसने सपना से बहुत अधिक कह डाला था। खैर सुबह सपना से क्षमा माँग लेगाए सोचता सोमेश सो गया था।

दूसरे दिन प्रातः अचानक जोर से किसी ने जगाया था

भइया, गजब हो गया, सपना दीदी को क्या हो गया देखो न।

क्या? एकदम रज़ाई फेंक सोमेश भागता हुआ जैसे ही सपना के कमरे में पहुंचा, माँ विलाप कर रही थीं। डाक्टर अंकल स्तब्ध खड़े थे? उसे देखते ही मौसी आर्तनाद कर उठी-

सोमू ये क्या हो गया बेटे? सपना ने क्या कर डाला, कुछ तो बोल, सोमू।

जड़ सोमेश आँखें सपना पर निबद्ध खड़ा था। डाक्टर ने असहाय सिर हिला दिया, कुछ भी शेष नहीं रह गया था। माँ की नींद की गोलियाँ खा सपना सो गई थी। क्यों सोमेश के अलावा भला और कौन जान सकता था? कोई चिट नहीं छोड़ी थी, किसी ने कुछ नहीं कहा था, फिर क्यों? मौसी-माँ का करूण स्वर बार-बार सोमेश के सीने पर हथौड़े मार रहा था, पर मौसी से बहुत चाह कर भी सोमेश सत्य न बता सका था। पाषाण प्रतिमा सदृश्य सोमेश मौन रह गया था। अन्तर का अपराध. बोध उसे जीवित शव बना रहा था। सपना का आहत स्वाभिमान सोमेश को इतनी बड़ी-सजा दे गया था।

दूसरे ही दिन सपना के पापा आ गये थे। जीवन में हमेशा दबंग व्यक्तित्व वाले मिस्टर मित्रा पुत्री के शव पर पछाड़ खा गिर पड़े थे। सब कुछ समाप्त हो चुका था। सोमेश को अकेले जीने की सजा देकर चली गई थी।

एकाकी सोमेश सपना का अभाव क्या किसी पल भी भूल सका है। आज भी सपना की याद के क्षणों में सोमेश दत्त अपने को पूर्ण पाते हैं। उदार डाक्टर ने हार्ट-फेल का प्रमाण-पत्र दे किसी प्रकार की अफ़वाहों को पनपने नहीं दिया था। हाँ सोमेश की ओर जब डाक्टर अंकल ने गहरी दृष्टि डाली थी, सोमेश का अन्तर तक सिहर उठा था।

सब कुछ लुटा प्रौढ़ दम्पत्ति घर बेच, वह शहर छोड़ सोमेश को अकेला छोड़ गये थे। वैसे भी उस घर में सोमेश को एक पल सांस लेना भी कठिन था-जहाँ के कण-कण में सपना महकती थी। सोमेश के अकेलेपन की सज़ा सपना की मृत्यु के दिन से प्रारम्भ हुई थी। उसी शहर में रह कर बहुत चाह कर भी सोमेश उस पुराने घर को देखने जाने का साहस कभी नहीं जुटा सका।

प्रतियोगिता परीक्षा में उच्च अंक प्राप्त कर सोमेश पुलिस अधिकारी बन गया था। माँ के आग्रह को बार-बार ठुकरा, अन्ततः सोमेश को विवाह करना पड़ा था। पत्नी एक धनी परिवार की एकमात्र कन्या है, शायद यही आकर्षण माँ के मन में प्रबल था। कभी सपना को ले माँ ने कुछ सोचा था पर आज तो वह बात याद भी नहीं होगी।

धनी परिवार की सिर चढ़ी बेटी ने आते ही सबको अनुशासन संबंधी निर्देश दे डाले थे। सोमेश दत्त को साधारण शिष्टाचार तक पर भाषण दे डाला था। क्लब, पार्टीज के अलावा उसे अन्य किसी वस्तु से कोई लगाव नहीं था। पति की वीणा उसे अपनी सौत लगती थी। माँ जब कभी अकेला पा सोमेश से, बहू के अपने प्रति अन्याय की बात करतीं, तो विद्रूप से सोमेश दत्त के होंठ सिकुड़ जाते थे। कभी देर रात गये तक जब पत्नी क्लब में रह जाती, सोमेश दत्त वीणा ले बैठ जाते। उस समय वह सचमुच अकेले नहीं रह जाते । सामने बैठी सपना की विस्मय-विमुग्ध आँखें उन पर निबद्ध रहतीं। तन्मय विभोर हो जाते, बस उन्हीं क्षणों में तो वह पूर्ण जीवन जी पाते। अपने मन का दर्द वह अहंकारी पत्नी से कब बांट पाए हैं। यही दर्द तो उनका अपना है। उनके इस एकाकी जीवन की दौड़ और इस मछली की छटपटाहट में कितना साभ्य है? क्या पुलिस अधिकारी सोमेश दत्त अपने लिये आजीवन एकाकी कारावास की सजा से कठिन, कोई और सजा चुन सकते थे? यह एकाकीपन हर पल उनके द्वारा किये अपराध की याद दिलाता रहता है।

पत्नी भोजन के लिए शायद एक से अधिक बार बुला चुकी थी, क्योंकि इस बार उसके स्वर में तेजी आ चुकी थी। खिड़की के सीखंचे छोड़ सोमेश दत्त भोजन के कमरे की ओर चल दिये।

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