क्यों?

शैया के पास बैठे बच्चों पर करूण दृष्टि डाल, निष्प्रभ मुख दिव्या ने आँखें मूँद ली थीं। पिछले पन्द्रह दिनों से दिव्या अस्वस्थ चल रही थी। क्टर गुप्ता परेशान थे, रोगिणी जरा भी को-आपरेट करे तो गम्भीर बीमारी पर भी जय पाई जा सकती है, पर दिव्या में तो जैसे जीने की इच्छा ही शेष नहीं रह गई थी।


दिव्या को मौन शून्य में ताकते देख, अखिल को लगता उसकी दृष्टि किसी को खोज रही है। अखिल जानता है, अंतिम सांस तक दिव्या उसकी प्रतीक्षा भले ही करे, मुंह खोल उसे एक बार देख पाने का अनुरोध नहीं करेगी। कभी अखिल का जी चाहता, बहुत उदार बन, उसे दिव्या के सामने ले जा खड़ा कर कह पाता-

तुम्हारे मन की बात जानता हूं,, दिव्या। जाने के पहले जी भर इससे बातें कर लो- मन हल्का हो जाएगा। भारी मन जाकर मुझे अपराधी न बनाना, दिव्या।

..............पर अनुदार अखिल शंकित होता........... कहीं उसे देखने भर से दिव्या चेत गई तो क्या वह सह सकेगा? अखिल आज भी अपनी पराजय से डरता है, जबकि हार तो वह उसी दिन गया था जब दिव्या ने किसी और में अपने स्वप्न साकार होते देखे थे। आज बारह वर्षों बाद, यह प्रश्न अन्तर में हाहाकार मचाता बार-बार उससे पूछ रहा है........।

ऐसा क्यों हुआ अखिल...........क्यों हुआ?

दिव्या से उसका विवाह मात्र अकस्मात घटना भर तो नहीं था। दिव्या को माँ-पिताजी देख-पसन्द कर आए थे, पर दिव्या के पिता ने पत्र भेजा था-

............मेरी बेटी को अखिल जी स्वयं देखकर स्वीकृति देते तो निश्चिन्तता होती। भविष्य में किसी प्रकार की गलतफ़हमी न हो। दिव्या-मेरी बेटी की भी यही इच्छा है। विश्वास है इसे अन्यथा न लेंगे। माँ-पिताजी को इस प्रस्ताव पर कोई आपत्ति न थी,  पर शिखा ने व्यंग्य किया था-

बाप रे, जरा तेवर तो देखो-मानो कोई अप्सरा है कि उसे देखते ही तुम मुग्ध हो जाओगे। सच कहूं तो ये लड़की तुम्हारे योग्य नहीं है, अखिल स्वयं को दिखाने का इतना दर्प-?

अखिल ने कभी शिखा से विवाह करना चाहा था। युवा अखिल, शिखा के जिस मोहपाश में बंध गया था, उससे शायद आज तक मुक्त नहीं हो सका है। माँ-बाप की इच्छा के आगे सिर झुकाना शिखा की विवशता थी। विवाह के बाद पति के साथ जाती शिखा ने जरा-सा एकान्त पा अखिल से कहा था-

हमेशा तुम्हारी थी, तुम्हारी रहूंगी-वह विवाह मेरी विवशता है, अखिल............।

रूद्ध कंठ से निकले उन शब्दों ने अखिल का शिखा के प्रति प्रेम और बढा दिया था। शायद आज भी वह स्वीकार न कर सके कि विवाह की उस विवश स्वीकृति में उच्च पदस्थ अधिकारी की पत्नी बनने का स्वार्थ भी निहित था। उस समय अखिल एक मामूली अधिकारी भी तो नहीं था।

शिखा के विवाह के बाद जब अखिल ने प्रतियोगिता परीक्षा में सफलता प्राप्त की तब शिखा प्रसन्न होने की अपेक्षा मायूस अधिक थी-

काश, तुमने इस परीक्षा के लिए पहले ही प्रयास किया होता।

तुम सब कुछ छोड़कर मेरे पास नहीं आ सकतीं, शिखा? अखिल उस समय भी आतुर प्रेमी था।

विवाह न होने से क्या हमारे संबंध टूट जाएँगे, अखिल? समाज इसकी स्वीकृति नहीं देगा। मैंने तो तुम्हें कभी अपने से अलग नहीं पाया है, अखिल।

शिखा का कातर स्वर अखिल को पिघला जाता था। सत्य से साक्षात्कार करना उसने कब चाहा था?

दिव्या को देखते अखिल के मन में बस एक बात आई थी- वह सबसे अलग, एकदम सामान्य लड़की भर नहीं है। शायद यही बात उसे अच्छी लगी थी और वह ‘हाँ’ कह आया था। उसकी ‘हाँ’ ने शिखा को निराश किया, पर उसे वह अनदेखा कर गया था।

सादगी से विवाह सम्पन्न किए जाने की शर्त अखिल ने रखी थी, बैंड-बाजे का शौक तो शिखा के विवाह ने ही समाप्त कर दिया था। दिव्या ससुराल आ गई थी। परिवार के किसी समारोह के अवसर पर दिव्या ने कहा था-

बिना महिला-संगीत के समारोह में रौनक कैसे होगी........ बिना बैंड-बाजे की बारात भी भला बारात है?

तुम्हें बाजे-गाजे का बहुत शौक है, दिव्या। छोटी दीदी ने मुस्कराते हुए पूछा था।

हाँ दीदी, पर मेरी बारात तो सूनी ही आई।

चलो अपना यह शौक अपने बेटे की शादी में पूरा कर लेना। छोटी दीदी ने सांत्वना सी दी थी।

अपने विवाह में शिखा का सम्मिलित होना अखिल के लिए महत्वपूर्ण घटना थी। विवाह में आ पाने के लिए शिखा को कितने कष्ट उठाने पड़े - स्वयं शिखा ने सुनाया था-

माँजी ने एकदम साफ़ मना कर दिया था, दो दिन भूख-हड़ताल की तब आ पाई हूं। तुम्हीं कहो, अगर मैं न आ पाती तो क्या जीवन भर तुमसे क्षमा मिल पाती? उसकी स्नेहसिक्त दृष्टि ने अखिल को निहाल कर दिया था।

तुम न आ पातीं तो क्या मैं विवाह करता शिखा? अखिल गदगद था।

हाँ ये तो बताओ दिव्या के लिए कया उपहार लिया है? कोई खास उपहार होगा, अन्ततः वही तो अब सब कुछ तुम्हारी होगी न?

मेरे हृदय में तुम्हारे लिए जो स्थान है, उस पर किसी अन्य का अधिकार संभव नहीं है, शिखा। तुम्हारे बिना मैं कोई उपहार खरीद सकता था?

एक हल्के फालसेई रंग की साड़ी अखिल को अच्छी लगी थी-

ये साड़ी ले लें ,शिखा दिव्या की   दीदी बता रही थीं दिव्या को फालसेई रंग बहुत पसन्द है।

अरे वाह! अभी से उसकी पसन्द-नापसंद जान गए। जब अपने ही मन की साड़ी लेनी थी, तो मुझ पर उपहार खरीदवाने का एहसान क्यों? बाई दि वे कभी जानने की कोशिश की मुझे क्या पसंद है? शिखा व्यंग्य किया था।

मैंने तो बस सजेस्ट किया था, अंतिम निर्णय तुम्हारा ही रहेगा। तुम्हीं पसन्द करो।.......। अखिल अनुनय कर रहा था।

मेरे ख्याल से यह आसमानी साड़ी ठीक रहेगी। गेहुंए रंग पर यही चलेगी। फालसेई रंग तो गोरे रंग पर खिलता है। शिखा दर्पपूर्ण हॅंसी हॅंस दी थी।

वही आसमानी साड़ी प्रथम-उपहार रूप में देते उत्साहित अखिल ने दिव्या से कहा था-

ये साड़ी शिखा ने खास तुम्हारे लिए सेलेक्ट की है। शिखा की पसंद लाजवाब है, अच्छी है न?

आज अचानक अखिल को ध्यान आ रहा था- वो आसमानी साड़ी दिव्या ने कभी नहीं पहनी। दो दिन पहले महरी को बुला, वही साड़ी थमाती दिव्या ने कहा था-

अपनी बिटिया की शादी में मेरी ओर से दे देना पता नहीं मेरे बाद किसी को ध्यान रहे, न रहे।

छिः, कैसे कुबोल बोलती हो, दुलहिन! मरें तुम्हारे दुश्मन। क्या ये तुम्हारे मरने की उमर है, भगवान करे हमारी उमर भी तुम्हें लग जाए, दुलहिन। भाव विह्वल महरी बुदबुदाई थी।

.....न.......न......ऐसा आशीर्वाद मत दो, बहुत जीली और जीने की चाह नहीं। आँसू छिपाने के लिए दिव्या ने मुंह फेर लिया था।

यह क्या इतनी कीमती साड़ी महरी को दे डाली? जानती हो दस दुकानें खोजकर शिखा ने पसन्द की थी। अखिल क्रुद्ध हो उठा था।

इसीलिए तो डरती थी, मरने के बाद उसी में न लिपटना पड़े। उसी में विदा करते न? दिव्या की आँखों में न जाने क्या जल उठा था।

उस साड़ी से उतनी घृणा का कारण शायद आज अखिल समझ सका था। कभी दिव्या ने कहना चाहा था।

जानते हो, विवाह की प्रथम-रात्रि पत्नी सिर्फ़ अपने लिए पति से कुछ सुनने को आतुर रहती है, पर मेरी प्रथम-रात्रि तो शिखामय थी............

तुम्हारी व्यर्थ की कल्पना मुझे पसंद नहीं........। उसकी बातों को अखिल ने शायद ही कभी महत्व दिया था। हाँ.....विवाहोपरान्त भी उसने दिव्या की एक भी बात नहीं रखी थी।

अखिल के विवाह में सम्मिलित होने के लिए शिखा ने शर्त रखी थी, वापिसी में उसे अखिल पहुंचाने उसके साथ जाएगा। दिव्या उनके जाने के दो दिन बाद जाने वाली थी। कुछ पलों के एकान्त में दिव्या ने अनुनय की थी-

दो दिन ओर नहीं रूक सकते? मैं यहाँ अकली रहूंगी?

क्यों घर में लोगों की क्या कमी है, सब तो हैं? दिव्या की उस मौन दृष्टि की भाषा पढ़कर भी वह अनजान बन गया था।

शिखा और अखिल के संबधों का सिलसिला चलता रहा था। अपने निजी सुख-दुख शिखा के साथ बांटने में अखिल को प्रसन्नता मिलती, पर वही बात दिव्या को किस सीमा तक आहत कर जाती, अखिल ने कभी नहीं जाना। जब अखिल शिखा के लेखों की प्रशंसा करता तो कॉलेज, विश्वविद्यालय से मिले पुरस्कार दिव्या के नयनों में कौंध उठते। न जाने कितनी कहानियों, लेखों पर वह पुरस्कृत की गई थी। उसके गीतों की फ़र्माइश हर समारोह में की जाती, पर अखिल उसकी इस प्रतिभा से अर्वथा अनभिज्ञ ही रहा।

शिखा की दूसरी बेटी ओर दिव्या के प्रथम पुत्र का जन्म लगभग एक साथ ही हुआ था। पुत्र-जन्म पर अखिल के खिले चेहरे को देख, दिव्या गर्व से भर उठी थी। सम्भवतः उसका दिया यह उपहार पा, अखिल अपने अतीत का बन्धन तोड़ सके। दो ही दिन बाद अखिल ने घोषणा कर दी थी-

शिखा के ससुराल वालों ने उसकी दूसरी बेटी के जन्म पर तानों-उलाहनों से उसे छेद डाला है। ऐसे निकम्मे पति पर लानत है......जैसे यह शिखा का ही अपराध हो। मुझे उसके पास जाना होगा, मैं समझ सकता हूं, वह कितनी अपसेट होगी। पुअर शिखा........।

दिव्या का उत्साह कपूर-सा उड़ गया था। अखिल के पास रहते भी दिव्या ने हमेशा अपने को उससे बहुत दूर पाया था। कभी अन्तरंग क्षणों में दिव्या ने उसे पाने की असफल चेष्टा भी की थी-

सुनो विवाह के पूर्व तुम्हारे और शिखा के जो भी संबंध रहे हों, अब मैं तुम्हारी पत्नी हुँ। शिखा के साथ अब संबंध बनाए रखना पाप है, अखिल................।

दिव्या की बात को, वह हमेशा उसका व्यर्थ का भ्रम कहकर टालता रहा। आज भी अखिल ने शिखा के साथ के अपने संबंधों को पाप नहीं स्वीकारा है फिर .......फिर अमर और दिव्या के संबंधों को भी उसी दृष्टि से वह क्यों नहीं स्वीकार कर सका? अपने जीवन में दोहरे मानदंड रखने के लिए क्या वह दिव्या का अपराधी नहीं?

जीवन में पहली बार अखिल को पराजय-बोध अमर के कारण हुआ था। अखिल ने दिव्या की भले ही उपेक्षा की थी, पर उसका मित्र-समाज दिव्या की प्रशंसा करते नहीं थकता था। दिव्या की विलक्षण बुद्धि, हाजिर जवाबी, व्यंग्य, परिहास पर अखिल के मित्र मुग्ध थे। कभी अखिल ईर्ष्यालु हो उठता था-

तुम निशान्त को जरूरत से ज्यादा लिफ्ट देती हो। तुम ऐसे पुरूषों को नहीं जानतीं, जहाँ किसी स्त्री से जरा-सी लिफ्ट मिली नहीं कि ये हाथ धो, उसके पीछे पड़ जाते हैं।

सच?  दिव्या के अधर व्यंग्य से फैल जाते।

मेरी बात हॅंसी मे उड़ा देना ठीक नहीं। सुनील से उस दिन किस विषय पर चर्चा हो रही थी, बहुत हॅंस रहे थे तुम दोनों।

दिव्या के मर्यादित आचरण ने कभी इन बातों की सत्यता सिद्ध नहीं होने दी थी, पर अमर का दिव्या के प्रति मुग्ध-भाव, अखिल सहजता से स्वीकार नहीं कर सका था।

दिव्या के मुख से निकली बात पूरी करना ही मानो अमर के जीवन का लक्ष्य था। दिव्या को हॅंसते देख अमर खिल उठता था। दिव्या अखिल की पत्नी न हुई,  अमर की आराध्या थी। जब तक अमर दिव्या का मौन साधक रहा,  अखिल टालता गया, पर जिस दिन उसने अनुभव किया दिव्या के मन का कोई खाली कोना, अमर ने भर दिया है,  तो वह तिलमिला उठा था। अमर के घर आने पर दिव्या का खिला मुख, अखिल की पराजय था। अमर का बार-बार घर आना अखिल को असंभव होता जा रहा था-

आज तो आपके हाथ की मटर की कचैड़ियाँ खाने का मन कर रहा है। साथ में मेरे हिस्से का गाजर का हलवा भी मिलेगा न? अनुरोध के साथ अमर अपनी दृष्टि दिव्या पर निबद्ध कर देता था।

अभी हाजिर करती हूं, जनाब, पर बदले में मुझे क्या मिलेगा?

अपना अमरत्व आपकी भेंट है,  मेरी भी उम्र लेकर जिएं। अमर परिहास करता था।

छिः, इत्ती लम्बी उम्र का क्या करना है? दिव्या उदास हो उठती।

अरे अगर आप मुझसे पहले चली गई तो मैं कैसे जी पाऊंगा? आपकी आदत पड़ गई है न।

फिर व्यर्थ की बातें कर रहे हो, जानते हो ऐसे मज़ाक मुझे पसंद नहीं।

ये मज़ाक तो नहीं है, सच ही तो कहा था.......अब देखिए न, दो दिन यहाँ नही आता तो अजीब लगता है।

सच मात्र इतना ही तो नहीं था, अखिल ने स्पष्ट अनुभव किया था- दिव्या को भी अमर की प्रतीक्षा रहती थी। प्रतिदिन उसके लिए नए व्यंजन तैयार करना, उसे अच्छा लगता था। शायद वर्षों की उपेक्षा के बाद इतना मान-सम्मान उसे भी विमुग्ध कर गया था।

दीपावली की रात, दिव्या के साथ अमर भी दीप जला रहा था। पहला दीप दिव्या के मुख के समीप ला, मुग्ध अमर ने कहा था- ।

हमारा यह दीप सदैव जलता रहे...........।

उत्तर में हॅंसती दिव्या ने आशीर्वाद दे डाला था-

तथास्तु .......प्रति वर्ष दीप जलाने आना पड़ेगा। आओगे न?

अखिल और नहीं सह सका था। दिव्या के हाथ में पकड़ी दीप-भरी थाली छीनकर फेंक दी थी। क्रोधावेश में न जाने क्या-क्या कह डाला था। अमर उसी समय चला गया था। अखिल को समझा पाने की उसकी हर चेष्टा व्यर्थ गई थी-

निकल जाओ, खबरदार जो फिर कभी यहाँ पाँव रक्खा........।

अमर उस शहर को छोड़, चला गया था। अमर के चले जाने के बाद भी अखिल दिव्या पर संदेह करता रहा है। दोनों के बीच अमर सदैव जीवित रहा है। दिव्या ने प्रतिवाद में एक शब्द भी नहीं कहा था, बस बड़ी-बड़ी विस्फारित आँखों से उसे निहारती भर रह गई थी।

क्या अमर की दिव्या के प्रति आसक्ति पाप थी? अखिल निर्णय नहीं ले पा रहा था-अमर ने दिव्या के मन के बंजर कोने में प्यार का एक नन्हा बिरवा रोपा .......पर उस कोने को बंजर किसने छोड़ दिया था.... वह कोना इतना खाली ही क्यों छूटा कि कोई और उस पर अधिकार जमा सके? अखिल की उपेक्षा से जड़ पडे़ मन में, अगर उमंगों की नई कोंपल फूट पड़ी तो गलती किसकी थी?

दिव्या को अपनी पहिचान अमर से ही तो मिली थी। दिव्या की लेखन-शैली, साहित्यिक अभिरूचि, संगीत-प्रेम को अखिल ने कब जाना था? एक समारोह मे अमर ने जब दिव्या से एक गीत की फ़र्माइश की थी तो अखिल चौंक गया था- क्या दिव्या गा भी सकती है? दिव्या की ।ग़ज़ल ने सबको बांध लिया था। दिव्या के पत्रों की पंक्तियाँ अमर मनचाहे गीतों की तरह दोहराता था।

अखिल यार, दिव्या भाभी के पत्र छपवा डाल। प्रेम-पत्र हिट हो जाएँगे।

मेरे पत्र तुमने कब देखे अमर? अखिल का स्वर बेहद रूक्ष हो उठा था।

देख पाता तो चोरी न कर ले जाता? अरे भई कभी घर बुलाने के लिए दो पंक्तियाँ भी भेजती है, उनमें भी इनकी शैली झलकती है,  इसीलिए तो सोचता हूं , इनके तेरे नाम लिखे प्रेम-पत्र कैसे होंगे।

कह दो तुम्हें भी प्रेम-पत्र लिख दें। अखिल के उस रिमार्क पर अमर ठठा कर हॅंस पड़ा था, पर दिव्या का मुख अनार हो गया था।

दिव्या के प्रति अखिल का रोष अकारण तो नहीं........बच्चे समझदार हो गए, उस समय दिव्या ने ऐसा क्यों किया? दिव्या ने अगर अमर को चाहा, तो क्या आज भी वह अपने को शिखा के मोहपाश से अलग कर सका है? सच तो यही हे पता नहीं कैसे, दिव्या ने इतनी लम्बी सूनी और एकाकी ज़िन्दगी काटी है। जन-शून्य पथ पर अगर कोई जीवन्त हमराही मिल जाए तो उसके साथ चलना क्या पाप है?

नहीं अखिल गलती तुमने की है, परिष्कार भी तुम्हें ही करना होगा। धीमे से अपने स्थान से उठकर अखिल दिव्या के निकट जा बैठा था।

अमर कल आ रहा है दिव्या,  अब तुम ठीक हो जाओगी। प्यार से दिव्या के माथे पर आई लट को हटाते अखिल का स्वर रूद्ध हो आया था।

अखिल की बात सुनती दिव्या का शान्त, निर्वकार मुख मानो पीड़ा से काला पड़ गया था। बहुत कष्ट के साथ दिव्या अपनी बात कह सकी थी-

तुम मुझे कभी नहीं समझ सके, अखिल। जीवन भर अकेली रही, अब इस जाती बेला तो अकेला न छोड़ो। इस समय झूठ नहीं कहूंगी................ अमर ने मेरे खालीपन को मेरे साथ बांटना जरूर चाहा........मैं पूर्ण कभी न हो सकी। मेरी पूर्णता तुम्हारे साथ थी, अखिल। तुम्हीं मेरे सब कुछ...........।

कष्ट और उत्तेजना के कारण दिव्या हांफ़ उठी थी।

फिर मैं तुम्हें नहीं जाने दूंगा, दिव्या...........बोलो दिव्या- मैं तुम्हारे साथ पूर्ण जीवन जीना चाहता हूं।  मुझे माफ़ कर दो, दिव्या..............।

दिव्या का मुख आनन्द से चमक उठा। हल्के से अपना दायां हाथ, उठा अखिल के हाथ पर धर दिया।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

यह ब्लॉग खोजें

Previews