अस्मिता के नाम


अस्मिता के नाम

हाथ में विकलांगों वाली लकड़ी, चेहरे पर अनगिनत झुर्रियों वाली, उस वृद्धा को नीता ने पहली बार दिल्ली-हाट में देखा था। पेंटिंग वाले स्टॉल पर वह एक-एक चित्र को बारीकी से देख रही थीं। नीता उसके चयन की कायल हो गई।  

‘‘लगता है, आप भी चित्रकला में खासा दख़ल रखती हैं, आंटी।''  

‘‘तुमने कैसे जाना ?’’ हल्की- सी मुस्कान होंठों पर फैलकर, सिमट आई।  

‘‘आपने जितने भी चित्र चुने, सब मेरे फ़ेवरिट चित्र हैं।’’  

‘‘इसका मतलब तुम्हें भी पेंटिंग में रूचि है। चित्र।कारी करती भी हो या बस शौक़ रखती हो ?’’  

‘‘बस शौकिया कभी-कभी ब्रश चला लेती हूँ। ये चित्र मेरी सहेली ने बनाए हैं।’’ हँसती नीता ने बताया।  

‘‘क्या नाम है, तुम्हारा ? कहीं पढ़ती हो ? तुमसे मिलकर अच्छा लगा, बेटी।’’  

‘‘मैं नीता हूँ और मैं पढ़ती नहीं, पढ़ाती हूँ। आंटी, क्या मैं टीचर नहीं दिखती ?’’ नीता मायूस- सी दिखी।  

‘‘टीचर तो सचमुच नहीं दिखती। वैसे उम्र से कम दिखना अच्छी बात है, वर्ना मेरी तरह अपनी उम्र से दस-पंद्रह साल ज़्यादा दिखना अच्छा नहीं होता, न ?’’ उदास- सी मुस्कराहट होंठो पर तिर आई।  

‘‘आप क्या करती हैं, आंटी ?’’  

‘‘मैं ? कभी प्रोफ़ेसर हुआ करती थी, नीता। अब तो अकेली बैठी, पुराने दिन याद किया करती हूँ।’’ चित्रों का पेमेंट करतीं, वह हल्के से हँस दीं।  

छड़ी के सहारे धीमे-धीमें क़दम बढ़ातीं, वह चली गईं। नीता की दृष्टि ने कुछ देर उनका पीछा किया फिर अपने काम में जुट गई।  
   
करीब एक महीने बाद नीता फिर दिल्ली-हाट आई थी। यह एक ऐसी जगह है, वहाँ आकर इंसान मेले का- सा आनंद उठा लेता है। आज रीतेश ने यहीं मिलने की बात कही थी। स्नैक-स्टाल से कॉफ़ी लाकर, नीता एक खाली टेबल पर बैठ गई। काम में लगे रीतेश को वक़्त का ज़रा भी ख्याल नहीं रहता। नीता को उसके इंतज़ार में हमेशा काफ़ी देर तक बैठना पड़ता है।  

अचानक पीछे से किसी ने प्यार से पूछा-  

‘‘तुम्हारे साथ बैठ सकती हूँ नीता ?’’  

निगाह उठाते ही नीता ने देखा, चेहरे पर खिली मुस्कान के साथ वह खड़ी थीं।  

‘‘अरे आप। आइए, आंटी।’’  

‘‘थैंक्स ! किसी का इंतजार कर रही हो ?’’  

‘‘जी, पर आपने कैसे जाना ?’’  

‘‘कभी मैं भी तुम्हारी उम्र से गुज़री हूँ, नीता।’’ अपनी बात कह, वह हल्के से मुस्करा दीं।  

‘‘यानी कि आप भी किसी का इंतज़ार किया करती थीं, ठीक कहा न, आंटी ? कौन थे, वह ?’’ नीता शैतानी से चहक उठी।  

‘‘वो सब तो अब एक दुःस्वप्न बनकर रह गया, नीता। वैसे सपने याद करने से क्या फ़ायदा ?’’ उदास आवाज़ में उन्होंने बात खत्म कर दी।  

‘‘नहीं, आंटी। प्लीज बताइए न , वो कौन थे ?’’  

‘‘तुम जिसका इंतज़ार कर रही हो, वह आने वाला ही होगा। मैं बस एक कप कॉफ़ी के लिए आई हूँ।’’ बात उन्होंने टाल दी। उनके उठने के उपक्रम पर नीता तत्परता से खड़ी हो गई।  

‘‘आप बैठिए, आंटी। मैं आपके लिए कॉफ़ी लाती हूँ।’’  

‘‘ओ0के0 पर पैसे तो लिए जाओ।’’ उनकी बात अनसुनी  कर, नीता एक मग कॉफ़ी ले आई।  

‘‘थैंक्स ! तुम्हें देखकर लगता है, काश् ! मेरी भी तुम्हारी जैसी एक बेटी होती।’’  

‘‘आपके घर में कौन-कौन है, आंटी ?’’  

‘‘मैं और मेरे घर की दीवारें।’’ उदासी आँखों में तैर आई।  

‘‘क्या आपने शादी नहीं की ? घर में भाई-बहिन, कोई और रिश्तेदार तो होंगे ?’’  

‘‘हाँ, नीता ! जैसे दिल्ली-हाट की भीड़ में इतने लोगों के बीच भी अकेली हूँ, वैसे ही सबके होते हुए भी, अकेली छोड़ दी गई हूँ।’’  

‘‘क्यों आंटी, ऐसा क्यों हुआ ?’’  

‘‘मेरी किस्मत ! किसे दोष दूँ, बेटी ! मेरी ज़िंदगी तो एक अफ़साना भर बनकर रह गई है।’’  

‘‘अपनी कहानी मुझे नहीं सुनाएँगी, आंटी ?’’  

‘‘कभी घर आ जाओ ! जो मैं शब्दों में न कह पाऊँ, घर की दीवारें कह जाएँगी।’’  

‘‘आपका घर कहाँ है, आंटी ?’’ कॉफ़ी का मग टेबल पर रख, पर्स से एक कार्ड निकाल, नीता को थमा दिया।  

‘‘ओ माई ग़ॉड ! आप इतनी दूर से यहाँ आती हैं ? कैसे आंटी ?’’  

‘‘पहले कार से आया करती थी। जब से कार ड्राइव करने की शक्ति छिन गई, तब से ये बस ही मेरा सहारा बन गई है।’’  

‘‘क्या ? आप बस से इतनी लम्बी दूरी तय करती हैं ? आपके घर से तो यहाँ के लिए कोई डाइरेक्ट बस भी नहीं है, आंटी।’’  

‘‘हाँ, शिवाजी स्टेडियम से बस बदलती हूँ। पहले सब कुछ कठिन लगा, पर अभ्यास से सब कुछ सहज हो गया है।’’  

‘‘यू आर ग्रेट, आंटी।’’  

तभी पीछे से आए रीतेश ने ‘हलो’ कह, नीता को चौंका  दिया।  

‘‘अच्छा, जनाब के अब चार बजे है। पता है , एक घंटे से वेट कर रही हूँ। तुम्हारा तो घड़ी पहनना बेकार है, रीतेश।’’ नीता ने गुस्सा दिखाया।  

‘‘साॅरी ! अब लड़ाई करके और ज़्यादा वक़्त मत करो।’’ रीतेश ने हँसकर नीता को मनाना चाहा।  

‘‘हाँ-हाँ,वक़्त की वैल्यू तो तुम्हीं जानते हो। आपने देखा, आंटी....।’’  

अचानक नीता को उनकी याद हो आई। दोनों की नोकझोंक देख, वह मुस्करा रही थीं। अपनी छड़ी उठा, खड़े होने के उनके प्रयास पर नीता को परिचय कराने की सुध आई।  

‘‘रीतेश, यह आंटी है। यूनीवर्सटी में प्रोफ़ेसर थीं। जानते हो, आंटी बहुत अच्छी आर्टिस्ट हैं। आंटी इसे तो आप पहचान ही गई होंगी, यही है लेट-लतीफ़ रीतेश.....।’’  

‘‘नमस्ते, आंटी ! वैसे इसने जितनी तारीफ़ की है, उतना बुरा नहीं हूँ। सच्चाई ये है कि यह खुद टीचर है, इसलिए एक-एक मिनट का हिसाब रखती है।’’  

‘‘पंक्चुएलिटी तो अच्छी बात है, बेटा, वर्ना वक़्त निकल जाता है और इंसान के पास पछतावे के सिवा कुछ नहीं रह जाता।’’  

‘‘बिल्कुल ठीक कहती हैं, आंटी ! बैठिए न !’’ आंटी को खड़ा होता देख, रीतेश ने झूठा निमंत्रण दिया।  

‘‘अब तुम दोनों एनज्वाय करो। दो के बीच तीसरे का क्या काम।’’  

‘‘आंटी, आपकी कहानी सुनने आपके घर ज़रूर आऊँगी। यह मेरा वादा रहा।’’  

‘‘तुम्हारे आने का इंतज़ार रहेगा, नीता ! छड़ी ठकठकाती वह चली गईं’’  

‘‘इस बूढ़ी से तेरी दोस्ती कैसे को गई, यार ?’’  

‘‘बूढ़ी की जगह आंटी नहीं कह सकते ? बड़ों की इज़्ज़त करना सीखो, रीतेश।’’  

‘‘सारी ! वैसे उम्र का फ़र्क भले ही हो, पर नेचर तेरा भी बूढ़ियों वाला है। ठीक कहा न ?’’  

‘‘रीतेश, आई विल किल यू।’’ शैतानी से हँसते रीतेश की ओर नीता ने मुट्ठी तानी।  

‘‘ओह ग़ॉड ! सीन मन क्रिएट कर। चल उधर खाली कोने में चलते हैं।’’ नीता का हाथ पकड़ रीतेश चला गया।  

नव वर्ष पर टीचर्स-पिकनिक सुभाष पार्क में मनाई जाने की घोषणा ने, नीता को आंटी की याद दिला दी। पार्क के पास ही तो आंटी का घर है। उनके घर जाने का नीता ने वादा किया था। इससे अच्छा मौका फिर कब मिलेगा ? पूरे दिन का वक़्त है, कुछ देर को आंटी के पास जाने में किसी को आपत्ति नहीं होगी। छह-सात मटर की कचैड़ियाँ पैककर, पर्स में डाल लीं।  

उनका घर ढूँढ़ने में कोई दिक्कत नहीं हुई। खोमचा लगाने वाले भी ‘‘दादी’ का घर जानते थे। कॉ ल-बेल बजाकर नीता को कुछ देर प्रतीक्षा करनी पड़ी। दरवाज़ा खोलती आंटी के चेहरे पर खुशी खिल आई।  

‘‘अरे, नीता बेटी ! आओ-आओ, अंदर आ जाओ।’’  

आंटी के पीछे कमरे में प्रविष्ट होती नीता की निगाहें, चारों ओर का जायज़ा ले रही थीं। ज़रूरत से ज़्यादा सामान ने ड्राइंग रूम छोटा कर दिया था। देश-विदेश के कीमती डेकोरेशन पीसेज़ पर धूल की परत थी। अनूठे नक्काशीदार सोफ़े का भी वही हाल था। ड्राइंग-रूम से खुलते डाइनिंग रूम में भी क्राकरी की भरमार थी। एक बात ज़रूर थी, दीवारों पर लटकी पेंटिंग्स साफ़ चमक रही थीं। पेंटिग्स के अलावा बाकी घर ख़ासा उपेक्षित था। हर पेंटिंग के नीचे एक छोटा- सा नाम ‘फरीदा’ ज़रूर अंकित था।  

‘‘घर की बदहाली देख रही हो, बेटी ?’’  

‘‘नहीं, आंटी ! इस घर में छिपे कलाकार को खोज़ रही  हूँ। ये पेंटिंग्स आपने ही बनाई हैं, न ?’’  

‘‘हाँ, ये उस वक़्त की पेंटिंग्स हैं, जब यह बूढ़ी, एक जिं़दादिल लड़की फ़रीदा हुआ करती थी।’’ आंटी ने लम्बी साँस ली।  

‘‘आपकी ज़िदंगी में ज़रूर कोई ट्रेजेडी घटी है, आंटी ! कौन थे वो ?’’  

‘‘ठीक कहती हो, बेटी ! मैने उसे अपना सब कुछ समझने की भूल की थी।’’ वह उदास थीं।  

‘‘मुझे बताइए, आंटी ! क्या हुआ ? अपना दर्द बाँटने से तकलीफ़ कम हो जाती है।’’  

‘‘हम दोनों की मुलाकात लाइब्रेरी में हुई थी। एम0एस0सी0 में टॉप करने की वजह से मेरा उत्साह बढ़ गया था। घर में सात भाई-बहिनों की ज़मात में, मैं पाँचवे नम्बर पर थी। अब्बू ने न कभी हमारी पढ़ाई-लिखाई में रूचि ली, न कोई बाधा डाली। रिसर्च-वर्क के बाद लेक्चररशिप ही मेरा सपना था। हेड ऑफ दि डिपार्टमेंट, इंटरनेशनल फ़ेम के इंसान थे। उनके साथ रिसर्च करने के चांस पर मैं बेहद खुश थी, पर उनका ज़्यादा वक़्त विदेश-यात्राओं में ही बीतता। गाइडेंस के बिना मैं काम नहीं कर पा रही थी। जावेद उस वक़्त डी0यस0सी0 कर रहे थे। बदकिस्मती से एम0एस0सी0 में उन्हें सेकेंड डिव़ीजन मिल गई थी। यूनिवर्सिटी-लेक्चररशिप के लिए  फ़र्स्ट डिवीज़न कैंडिडेट्स के सामने उन्हें चाँस नहीं मिल सका।  

मेरी परेशानी में जावेद ने सहारा दिया। किताबों की लिस्ट और काम शुरू करने में पूरी मदद दी। पहला चैप्टर देखकर जावेद ने करेक्शन्स भी कर दिए। एक दिन मज़ाक में कह बैठी-  

‘‘अब तो आप ही हमारे गाइड बन गए हैं। क्यों न अपने मशहूर गाइड की जगह आपका नाम दे दूँ।’’  

‘‘तौबा-तौबा, ऐसी गुस्ताख़ी न कीजिएगा। आप जैसी हसीना, उससे दामन छुड़ा लें। उन्हें कतई बर्दाश्त नहीं होगा। सारा  गुस्सा इस ग़रीब पर ही उतरेगा।’’ नाटकीय अंदाज में जावेद ने कान पकड़ लिए।  

फ़रीदा हँस पड़ी ! बेहद मामूली से रूप-रंग वाली फ़रीदा किसी भी हालत में हसीन नहीं कही जा सकतीं। अपने लिए ‘हसीना’ का खि़ताब उसे अच्छा लगा। उस दिन के बाद से फ़रीदा अपने पर नज़र रखने लगी। कपड़ों के प्रति बेहद लापरवाह फ़रीदा, अब अपने कपड़ों के प्रति सतर्क हो र्गइं। यू0जी0सी0 की स्कॉलरशिप मिलने पर फ़रीदा के चेहरे पर आत्मविश्वास झलकने लगा। पहली राशि मिलते ही फ़रीदा ने जावेद के लिए कीमती शर्ट और टाई खरीद डाली।  

‘‘ये क्या, भेंट तो मुझे देनी चाहिए। उल्टे तुम मेरे लिए पैसे खर्च कर्र आईं।’’ जावेद क्षुब्ध दीख रहा था।  

‘‘उसमें क्या फ़र्क पड़ता है, जब तुम्हें जॉब मिल जाए, मेरे लिए भेंट खरीद लेना ! मैं खुशी से ले लूँगी।’’ फ़रीदा ने मज़ाक किया।  

‘‘पता नहीं वो दिन कब आएगा। काश् ! हम तुम्हारी तरह टॉपर होते।’’ मायूस जावेद ने कहा।  

‘‘परेशान क्यों होते हैं, डॉक्टर ऑफ़ साइंस  की डिग्री मिलने के बाद ज़रूर अच्छा जॉब मिल जाएगा। लेक्चररशिप के अलावा कोई दूसरा काम भी तो ढूंढ सकते हो।’’  

‘‘नहीं, फ़रीदा ! टीचिंग प्रोफे़शन के लिए ही मैने पी0एच0डी0 और डी0एस0सी0 की है। मैं इसके अलावा दूसरा कोई जॉब नहीं ले सकता।’’  

‘‘हम एक तरीका बताएँ, तुम शादी कर लो। कहते हैं, मर्द की किस्मत उसकी बीबी की किस्मत से खुलती है।’’ हँसते हुए फ़रीदा ने कहा।  

‘‘बात सिर्फ़ शादी करने की ही तो नहीं हैं शादी के बाद बीवी के नाज़-नख़रे कहाँ से उठाऊँगा। डिपार्टमेंट से जो फ़ेलोशिप मिलती है, उससे दो लोगो का पेट भले ही भर जाए, बीवी के  अरमान तो पूरे नहीं कर सकता।’’ मायूसी से जावेद ने कहा।  

‘‘क्यों, डिपार्टमेंट की सारी लड़कियों के नाज़-नख़रे उठाने का तो तुम्हें अच्छा एक्सपीरिएंस है।’’ फ़रीदा हँस रही थी।  

‘‘क्या बात करती हो, फ़रीदा ! मेरी तो आदत सबकी हेल्प करने की है। सच कहूँ, तुम्हारे सिवा मैं किसी को अपना नहीं मानता।’’ संजीदग़ी से जावेद ने कहा।  

‘‘मैं तो मज़ाक कर रही थी। हो सकता है, कोई ऐसी लड़की हो, जो बस तुम्हारा साथ चाहे। उसके कोई नख़रे या फ़र्माइशें न हो।’’  

‘‘क्या, तुम किसी ऐसी लड़की को जानती हो, फ़रीदा ?’’ ताज़्जुब से जावेद ने पूछा।  

‘‘हाँ, पर क्या तुम उसे सचमुच नहीं जानते, जावेद ?’’ फ़रीदा शरारत से मुस्करा रही थी।  

‘‘माफ़ करना, कहीं तुम्हारा इशारा अपनी ओर तो नहीं’’ डरते-डरते जावेद ने कहा।  

‘‘ठीक समझे, जनाब ! क्या ख़्याल है, आपका, मैं शायद नख़रीली लड़की तो नहीं हूँ, न ?’’ फ़रीदा की आँखें चमक रही थीं।  

‘‘ओह फ़रीदा ! मैं तो आँखें रहते, अंधा ही रहा। मुझसे शादी करोगी, मेरा मतलब, अगर मुझे अपने लायक समझती हो तो क्या मुझसे शादी करके, मेरी इज़्ज़त बढ़ाओगी।’’  

‘‘हाँ, जावेद ! मैं तुम्हें बहुत चाहती हूँ। कब से इसी इंतज़ार में थी।’’ खुशी से फ़रीदा का चेहरा चमक उठा।  

अपनी कहानी सुनाती फ़रीदा आंटी अचानक चुप हो र्गइं।’ नीता को व्यवधान सहन नहीं हुआ। इतनी अच्छी रोमांटिक कहानी का अंत क्या हुआ।  

‘‘फिर क्या हुआ, आंटी ?’’  

‘‘फिर हम दोनों की शादी हो गई।’’  

‘‘आपके घरवालों ने विरोध नहीं किया ?’’  

‘‘पापा को दो हार्ट अटैक पड़ चुके थे। उन्हें बेटियों की शादी निबटाने की ज़ल्दी थी। वैसे भी जावेद में कोई बुराई भी तो नहीं नज़र आई। जानती है, नीता हमारी शादी के दो महीने बाद अब्बू चल बसे। सबको यही संतोष था, उनकी नज़रों के सामने लड़कियाँ अपने-अपने घर की हो चुकी थीं।’’  

‘‘मेरा कहा, सच हुआ। जावेद को कनाडा में जॉब मिल गया। मेरी खुशी का ठिकाना न रहा। जी चाहता था, सब छोड़छाड़, जावेद के साथ कनाडा उड़ जाऊँ। जावेद ने समझाया, अपनी थीसिस पूरी कर लूँ तब तक जावेद भी कनाडा में सेटल हो जाएँगे। भारी मन से जावेद को बिदा कर, काम में जुट गई।  

सात-आठ महीने, दिन-रात मेहनत की। थीसिस जमा करने के बाद, कनाडा की राह ली थी। मुझे लेने जावेद एयरपोर्ट आए थे, पर जिस गर्मजोशी की उम्मीद थी, वह नदारद थी। चेहरे पर परेशानी और थकान देख, मज़ाक कर बैठी-  

‘‘लगता है, हमारे आने से खुशी नहीं हुई। कहीं हमारी जगह, किसी और ने तो नहीं भर दी ?’’  

‘‘बेकार की बातें मत करो। यहाँ काम का इतना प्रेशर रहता है कि साँस लेना भी मुश्किल लगता है।’’ जावेद की झुंझलाहट अज़ीब- सी थी।  

सुव्यवस्थित घर ने फ़रीदा को फिर चौंका दिया।  

‘‘वाह, लगता है, यहाँ की ट्रेनिंग पक्की है। इंडिया में तो हर जगह तुम्हारा सामान बिखरा रहता था।’’  

‘‘हूँ ! देखो फ्रिज़ में खाना है। कुछ और चाहिए तो पैंट्री से ले लेना। उधर बाथरूम और वो सामने बेडरूम है.....।’’  

‘‘अरे, तुम तो इतनी जल्दी में हो, जैसे किसी तरह पीछा छूटे। भई बीवी हूँ तुम्हारी। आठ महीने बाद आई हूँ।’’ हँसकर फ़रीदा ने कहा।  

‘‘हाँ-हाँ, जानता हूँ पर अभी मेरा लेक्चर है, मुझे तो जाना ही होगा। ओ0के0 बाय। टेक केयर।’’  

फ़रीदा को कुछ कहने का मौक़ा दिए बिना, जावेद चले गए। फ़रीदा का मन बुझ गया। क्या इसी स्वागत की उम्मीद में वह दौड़ी आई थी ? कनाडा अचानक पहुँच, जावेद को चैंका देने की नीयत से उसने जावेद को ख़बर भी नहीं दी थी। दो दिन पहले जावेद ने हेड आफ़ दि डिपार्टमेंट के पास किसी ज़रूरी काम से फ़ोन किया था, उन्होंने फ़रीदा के कनाडा पहुँचने की इत्तला दे, सारा ससपेंस ही खत्म कर दिया। कहीं इसी वज़ह से तो जावेद नाराज़ नहीं ? कुछ देर बाद अपने को सहेज़ फ़रीदा, बाथरूम में शावर लेने गई। कोने में तौलिया पड़ी देख, फ़रीदा के ओंठों पर मुस्कान आगई। जावेद की आदत थी, नहाने के बाद तौलिया से बदन पोंछ, तौलिया एक कोने में डाल देता। उसका कहना था-  

‘‘एक बार जिससे बदन पोंछ लिया बिना धोए, उसका इस्तेमाल करना ग़लत बात है।’’  

बरसात में तौलिए सुखाना कठिन होता, पर जावेद आदत से बाज़ नहीं आता। तौलिया धोना यहाँ तो आसान है। वाशिंग मशीन में डाल दो, काम हो गया। अपने उतारे कपड़ों के साथ जावेद की तौलिया उठाती फ़रीदा जड़ बन गई। तौलिए के नीचे स्त्रियों के आंतरिक वस्त्र, उतरे पड़े थे। सच्चाई समझते देर नहीं लगी थी। बेड-रूम में परफ़्यूम की सुगंध ड्रेसर की दराज़ में हेयर-पिन्स,ड्रेसिंग टेबल पर लेड़ीज़ ब्रश और कंघी में सुनहरे बालों का गुच्छा, एक ही कहानी बता रहा था कि सुव्यवस्था में जावेद का नहीं, किसी स्त्री के हाथों का स्पर्श था। निश्चय ही जावेद अकेला नहीं, किसी के साथ रह रहा था।  

बिना कुछ खाए-पिए फ़रीदा, पत्थर की मूर्ति- सी निश्चल बैठी रही। शाम को आया जावेद, अपेक्षाकृत अच्छे मूड में था।
‘‘कहो, अपना घर कैसा लगा ? सॉरी तुम्हारे आने पर ठीक से तुम्हारा स्वागत नहीं कर सका। कोई बात नहीं, रात में अच्छी तरह कम्पेनसेट कर दूँगा।’’ शरारत से जावेद मुस्कराया।  
 ‘‘वह कौन है, जावेद ?’’ गम्भीर फ़रीदा ने इतना ही पूछा।  

‘‘किसकी बात कर रही हो, डार्लिंग।’’  

‘‘वहीं जो यहाँ, मेरी जगह, तुम्हारे साथ रहती थी।’’  

‘‘क्या बात कर रही हो, यहाँ कौन रहता है ?’’ जावेद की हँसी खोखली थी।  

‘‘देखो जावेद, झूठ बोलने से कोई फ़ायदा नहीं। मैं सच्चाई जान चुकी हूँ। कुछ देर पहले तुम दोनों के नाम यह निमंत्राण-पत्र आया है’’  

‘‘मुझे माफ़ करना फ़रीदा ! तुम्हारे बिना यहाँ अपने को इतना अकेला महसूस किया कि किसी सहारे के बिना जी पाना, मुश्किल लगा।’’  

‘‘इसलिए जो जगह सिर्फ़ मेरी थी, तुमने उसे दे डाली ?’’ बेहद आहत स्वर में फ़रीदा ने सवाल किया।  

‘‘देखो, फ़रीदा, यहाँ जिंद़गी का तरीका बिल्कुल अलग है। किसी के साथ रहना एक मामूली बात है।’’  

‘‘तुम तो कनेडियन नहीं हो, जावेद ? तुम यह भी भूल गए, इंडिया में तुम्हारी बीवी, तुमसे मिलने के लिए एक-एक दिन, किस बेचैनी से काट रही है ?’’  

‘ज़रा- सी बात पर क्यों इतना शोर मचा रही हो। आगई हो तो, अपनी जगह रहो। उसने घर छोड़ तो दिया है, न ?’’  

‘‘वाह, क्या बात है क्या तुम वही जावेद हो, जो मेरे आगे-पीछे घूमते थे। ठीक है, उसने घर छोड़ दिया, पर क्या तुम उसे छोड़ सकोगे, जावेद ?’’  

‘‘देखो, फ़रीदा ! तुम एक हिन्दुस्तानी बीवी हो। शौहर के सौ खून भी माफ़ होते हैं। अकेलापन बाँटने के लिए किसी के साथ रह लिया तो कौन- सा तूफ़ान आ गया। आते दिन ही, मूड ख़राब कर दिया।  

‘‘हाँ, जावेद ! तुम्हारे नाज़ायज़ रिश्ते पर मुझे ऐतराज है। मुझे तलाक देकर, तुम उसके साथ शादी कर लो। अपने नाज़ायज़  रिश्ते को एक नाम दे दो।’’  

‘‘दिमाग़ तो ठीक है ? अपने पैरों पर क्या कोई कुल्हाड़ी मारता है ? अच्छी तरह जानती हो, हमारे मज़हब में चार शादियाँ तक जायज़ हैं।’’ जावेद तैश में आ गया।  

‘‘तुम ग़लत समझ रहे हो, जावेद ! यह तुम्हारा मुल्क नहीं है। मैं जानती हूँ, नारी-उत्पीड़न के खिलाफ़ यहाँ के कानून सख़्त हैं। किसी भी हालत में मैं तुम्हारा अन्याय नहीं सहूँगी।’’ शांति से फ़रीदा ने कहा।  

‘‘किस अन्याय की बात कर रही हो ? कभी शीशे में अपनी शक्ल देखी है ? तुम्हारे साथ शादी करके तुम पर एहशान किया है।’’ जावेद आपा खो बैठा।  

‘‘तो तलाक दे दो, मैं तुम्हारी दया पर नहीं जीना चाहती, जावेद।’’  

‘‘अगर तलाक नहीं देता तो क्या कर लोगी ? निकाह के वक़्त क्यों नहीं खुला का प्राविजन रखा था ?’’ व्यंग्य से जावेद का मुँह विकृत- सा हो गया।  

‘‘तब मैं तुम्हारे प्यार में दीवानी थी, जावेद ! तुम्हारे इस रूप से अनज़ान जो थी। मैं यहाँ कानून का सहारा लूँगी, तुम्हारे साथ रहना अब पॉसिबिल नहीं है। अपने किए पर शर्मिदगी की जगह तुम मुझे ज़लील कर रहे हो। यह हिमाक़त है।’’ फ़रीदा का मुँह लाल हो गया।  

 ‘‘अभी मेरी हिमाक़त देखी कहाँ है ? यहाँ तुम पूरी तरह मुझ पर डिपेंडेंट हो। जैसा कहूँ, वैसा करना होगा, समझीं।’’  

‘‘इस भुलावे में मत रहना, जावेद ! मैं अनपढ़, असहाय नहीं, पढ़ी-लिखी औरत हूँ। तुम्हें वो सबक सिखाऊँगी कि आठ-आठ आँसू रोओगे। जान लो, अपना हक, मैं लेकर रहूँगी।’’  

‘‘तेरी इतनी ज़ुर्रत, अपने शौहर को सबक सिखाएगी। आठ-आठ आँसू रूलाएगी ?’’ जावेद ने अंधाधुंध मुक्कों के प्रहार से फ़रीदा को हत्प्रभ कर दिया।  

फटाक से अपार्टमेंट का दरवाज़ा बंद कर, जावेद घर से बाहर चला गया। फ़रीदा का सिर चकरा गया। अपमान से आँखें जल उठीं। इस देश में उसका अपना कौन था ? माना उसके मज़हब में मर्द को एक से ज़्यादा शादी करने की छूट है, पर किसी के साथ चोरी से नाज़ायज़ रिश्ता बनाए रखना तो सीधा गुनाह है। वैसे भी फ़रीदा ने हमेशा यही सोचा, उसका शौहर, बस उसका होकर रहेगा। उसे इतना प्यार देगी कि उसे कोई कमी महसूस न हो। फ़रीदा को ढेर सारी बातें याद आने लगीं-  

जावेद ने फ़रीदा के साथ उस वक़्त शादी की, जब उसके पास कोई नौकरी नहीं थी। फ़रीदा की स्कॉ लरशिप ने जावेद की बहुत- सी ज़रूरतें ही नहीं, शौक़ भी पूरे किए। शौक़ीन मिज़ाज़ जावेद कितने तरीके से फ़रीदा के सामने पसंदीदा चीज़ों का जिक्र कर, उन्हें न खरीद पाने की मायूसी ज़ाहिर करता। फ़रीदा उसकी मनपसंद चीज़े, ख़रीद कितनी खुश होती। डिपार्टमेंट की लड़कियों से घिरा जावेद फ़रीदा से उनकी शिकायत करता-  

‘‘मेरी हेल्पिंग नेचर की वजह से ये लड़कियाँ मुझसे फ़ायदा उठाती हैं। समझ में नहीं आता, इनसे कैसे पीछा छुड़ाऊँ।’’  

‘‘सुषमा तो कहती है, तुम डिपार्टमेंट के कैसानोवा हो। मैं बेकार ही तुम्हारे चक्कर में पड़ी हूँ।’’ फ़रीदा छेड़ती।  

‘‘इसका मतलब, वो सुषमा तुमसे जलती है, फ़रीदा ! सच कहता हूँ, तुम्हारे सिवा मैंने किसी की ओर नज़र उठाकर भी नहीं देखा है।  

काश् ! फ़रीदा, जावेद के झूठे प्यार में अंधी न बन गई होती। शाहिदा तो जावेद की दीवानी थी। फ़रीदा ने कभी क्यों नहीं सोचा, आखिर शाहिदा जैसी खूबसूरत लड़की को छोड़ जावेद ने फ़रीदा को क्यों चुना ? शायद इसकी वज़ह यही थी, फ़रीदा पैसा कमा सकने वाली लड़की थी और शाहिदा की तमन्ना शौहर के कमाए पैसों पर ऐश करने की थी। हाँ, जिस दिन, जावेद को कनाडा से जॉब का ऑफ़र मिला, उस दिन से उसके तेवर  बदल गए। फ़रीदा को आर्डर देते, उसे ज़रा भी हिचक न होती। फ़रीदा के कामों में ग़लतियाँ निकाल, झुँझलाता। जावेद का यह व्यवहार फ़रीदा को अज़नबी लगता, पर सोचती शायद नई जगह अकेले जाने का टेंशन हो।  

आज असलियत सामने आ गई। वह अकेला नहीं था। अपने लिए उसने इंतज़ाम कर लिया। नहीं, ऐसे इंसान का फ़रीदा अपना शौहर, अपना सरताज़ मानकर नही जी सकती। फ़ोन उठा, हेल्प के लिए नम्बर घुमा दिया। हिन्दुस्तान से इतनी जानकारी तो वह लेकर आई थी, मुसीबत के वक़्त यहाँ की पुलिस और वीमेन एसोसिएशन्स दोनों ही साथ देते हैं।  

फ़रीदा द्वारा तलाक़ लेने के कारण को जान, कनेडियन औरतों को आश्चर्य ज़रूर हुआ, पर साथ ही उसके निर्णय को उन्होंने सम्मान दिया। जावेद ने फ़रीदा से माँफ़ी माँग, उसे समझाना चाहा, पर फ़रीदा अपने फ़ैसले पर अटल रही उसके वक़ील ने जावेद से मुआवज़ा दिलाना चाहा, पर फ़रीदा ने साफ़ इंकार कर दिया-  

‘‘जिस इंसान के पास चरित्रि नहीं वह तो दुनिया का सबसे ग़रीब इंसान है। ऐसे ओछे व्यक्ति की भीख स्वीकार नहीं।’’  

कनाडा में फ़रीदा को जॉब के ऑफर थे, पर फ़रीदा का मन उचाट हो गया। जिस देश में उसके सपने टूट गए, वहाँ क्या रहना।  

इंडिया वापस लौटी फ़रीदा को परेशानियों का सामना करना पड़ा। शौहर को खुद तलाक़ देने वाली औरत को इज़्ज़त कौन देता ? घर में भाभियों और उनके तानों के बीच रह पाना, आसान नहीं था। उनके ख़्याल में सारी ग़लती फ़रीदा की थी। खुशकिस्मती से दिल्ली यूनीवर्सिटी में उसे अपनी योग्यता के बल पर नौकरी मिल गई। बस तब से ठीक-ठाक जिंदगी चल रही है। उन्होंने एक उसाँस ली।  

‘‘फिर शादी करने का ख़्याल नहीं आया, आंटी ?’’  

‘‘सच कहूँ तो मर्द-ज़ात से यकीन ही उठ गया। जो भी पास आने की कोशिश करता, लगता, मेरे पैसे उसे खींच रहे हैं। गैरों की तो छोड़ो, मेरे अपने रिश्तेदार भी सिर्फ़ इसीलिए पूछते हैं कि अपना यह घर और पैसे उनके नाम कर दूँ। ये दुनिया बड़ी बेरहम है, बेटी।’’  

‘‘आपके पैर को क्या हुआ आंटी ?’’  

‘‘कहते हैं, वक्त की लाठी अकेले ही नहीं पड़ती। सड़क पार करते हुए एक ऑटो ने टक्कर मार दी और पीछे से आता स्कूटर पैर कुचल गया। सात महीने पलंग पर पड़ी रही। डॉक्टर हिम्मत हार जाते, उन्हें लगता मैं अब चल नहीं सकूँगी, पर मैं दीवार का सहारा ले, चलती रही। आज अपना काम खुद करने लायक हो गई हूँ।’’  

‘‘सच आंटी, आप बड़े जीवट वाली हैं। आपकी जगह कोई और होता तो शायद हिम्मत हार जाता।’’  

‘‘एक बात तू और नहीं जानती, पिछले एक साल से मुझे लंग-कैंसर हैं’’ हँसती हुई फ़रीदा आंटी का चेहरा उम्र से दस साल कम लग रहा था।  

‘‘क्या--आ--? और आप हँस रही हैं, आंटी ?’’  

‘‘हाँ नीता। डॉक्टर कहते हैं, तुरन्त ऑपरेशन करा लूँ, पर मैं तैयार नहीं हूँ।’’  

‘‘क्यों, आंटी ! डॉक्टर की एडवाइज़ मानने में ही तो समझदारी है।  

‘‘ठीक कहती है, पर ऑपरेशन के बाद तीन-चार महीने कम्प्लीट बेडरेस्ट चाहिए। मेरा बोझ कौन उठाएगा। इसलिए सोच लिया जब मौत आती है, आजाए। वैसे भी जिस कैंसर ने शरीर में शरण पाली, उसे वहीं पलने देने में क्या हर्ज़ है। शरणागत को बेघर क्यों करूँ। क्यों ठीक कहा न ?’’ वह ठठाकर हँस दीं।  

‘‘नहीं, आई कांट बिलीव दिस।’’ स्तब्ध नीता इतना ही कह सकी।  

‘‘अरे बातों में इतना वक़्त बीत गया, शाही सिंवई बनाई है। अभी लाती हूँ।  

‘‘नहीं, आंटी, इस वक़्त कुछ नहीं खा सकूँगी। एक बात बताइए, जावेद का क्या हुआ ?’’  

‘‘ओह, बेचारा सख्त बीमार है। लम्बा-चैड़ा माफ़ीनामा भेजा है।  

‘‘उसका तो यही हश्र होना था। आप उसे बेचारा क्यों कह रही हैं ?’’  

‘‘अब मरे को क्या मारना, नीता। दो-दो बेटियाँ शादी के लिए बैठी हैं। जावेद नौकरी करने की हालत में नहीं हैं। मैंने पैसे भेजे हैं।  

‘‘आप भी कमाल करती हैं, आंटी। जिसने आपकी जिंदगी नर्क बना दी, उसके साथ हमदर्दी क्यों ?’’  

‘‘अलग होकर उसने भी तो सुख भोगा। चार बच्चों को छोड़, उसकी कनेडियन बीवी, किसी और के साथ चली गई। वैसे भी मेरी कमाई भोगने वाला तो यहाँ कोई है,नहीं। सोचा, पैसे किसी ज़रूरतमंद के काम तो आ जाएँगे। सच कहूँ, जिंदग़ी से मुझे कोई शिकायत नहीं है, नीता।’’  

‘‘आप तो अपने आप में एक मिसाल हैं, आंटी।’’  

‘‘नहीं, पगली ! तेरी आंटी बस एक मामूली औरत हैं। ले, सिंवई खाकर बता, कैसी बनी है ?’’  

अवाक् नीता को सिं वई की प्लेट थमाती, फ़रीदा मीठी हँसी हँस दी।  


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

यह ब्लॉग खोजें

Previews