अप्राप्य

अरविंद के निश्चेष्ट शरीर को स्तब्ध ताकती दीपा को देख, मीता का मन करूणा से भर आया था। जी चाह रहा था किसी तरह वह अरविंद को झकझोर कर जगा पाती..........उससे पूछ सकती................


अपने हुक्म की गुलाम, इस दीपा को किसके सहारे छोड़े जा रहे हो? क्या करेगी ये लड़की ........हर पल तुम्हारे जा-बेजा हुक्म बजाते रहने की बुरी बादत पाल ली थी। इसने। कैसे झेल सकेगी सन्नाटे की इस आवाज को?

अम्माजी बड़े गर्व से कहा करतीं..

हमारी दीपा ने तो अरविंद की इच्छा अनिच्छा ओढ़ रखी है। ये बहू तो हमारे खानदान की नाक है। बात पूरी करती अम्माजी मीता की ओर व्यंगपूर्ण दृष्टि डाल, पान की पीक पच्च से थूक देती थीं।

माँ की ज़िद के कारण घर के छोटे-बेटे अरविंद को, बड़े भाई आलोक के विवाह से पहले परिणय-सूत्र में बंध जाना पड़ा था। इसीलिए रिश्ते में देवरानी होते हुए भी दीपा ने मीता के स्थान पर पहले ही बड़ी बहू के दायित्व ग्रहण कर लिए थे।

आलोक मीता से विवाह करने की ज़िद पर अड़ गए थे। मीता ने अपने शोध-कार्य को पूरा करने के बाद ही विवाह की स्वीकृति दी थी। बड़े बेटे के लिए अम्माजी ने बड़े चाव से दीपा का चयन किया था। पुत्र पर अपने अधिकार के बल पर ही उन्होंने बात भी पक्की कर डाली थी। बेटे की ना पर माँ पर माँ का मातृत्व आहत होना स्वाभाविक ही था। अपने बड़े बेटे की ज़िद से माँ पूर्णतः परिचित थीं, अन्ततः छोटे बेटे अरविंद पर ही उन्होंने अपने अधिकार का प्रयोग किया था।

दीपा से अपने विवाह की बात सुनते ही अरविंद झुंझला उठा था-

उस लड़की से मैं ब्याह करूँगा? उसमें क्या देखा है तुमने, माँ?

क्यों क्या कमी है लड़की में, ऐसा उजला रंग भला कायस्थों में देखा हैं।

चार दिन की धूप में जलकर खाक हो जाएगा।

ठीक है यही दिन देखने के लिए तो मैं जिन्दा बैठी हूं। भाग्यवान थे तेरे पिता, जो पहले ही चले गए। माँ ने आंचल आँखों से लगा लिया था।

अरविंद परेशान हो उठा-

भला ये भी कोई बात हुई, बड़े भइया शादी नहीं करेंगे तो बलि का बकरा मुझे बनाया जाएगा।

कौन कहता है तू बलि चढे़गा, एक बार दीपा को देख तो ले बिन्दु, ना नहीं कह सकेगा। आंचल आँखों से हटा माँ बेटे के प्रति उत्साहित हो उठी थी।

पर माँ, मैंने अपने लिए एक लड़की देख रखी है...... झिझकते हुए अरविंद अचानक कह गया था।

क्या .............तूने भी लड़की देख ली..............इतना साहस बड़े भाई को देखकर ही हुआ है। ठीक है, दोनों भाइयों ने जब मनमानी की ठान ली है, तो अपने मन की करो, पर मुझे कल ही बदरीनाथ की गाड़ी में चढ़ा दे, बिन्दु। अब इस घर से मेरा दाना-पानी उठ गया है रे। अम्मा जी फिर सिसक उठी थीं।

ये कैसी बात करती हो, अम्मा। तुम्हारा आशीर्वाद लेकर ही वह इस घर में आएगी। लाड़ले पुत्र अरविंद ने माँ की मनुहार की थी।

कौन है वह रूपमती-जरा हम भी तो सुनें। अम्मा के स्वर में व्यंग्य छलक आया था।

वो मास्टर जी की लड़की.............इन्दिरा, अम्मा। अरविंद ने धीमे से बताया था।

क्या वो कलूटी..........अरे बिन्दु तेरा दिमाग तो नहीं चल गया है। घर की महरी की लड़की भी उससे उजली होगी। दीपा के तो पांव की धोवन भी नहीं है वो मास्टर जी की छोकरी। अम्मा के नयन आश्चर्य में कपाल पर चढ गए थे।

पर अम्मा मुझे तो उसका वो साँवला रंग ही पसन्द है,  कॉफ़ी- कलर। तुम तो जानती हो मुझे दूध से कॉफ़ी ज्यादा पसन्द है, अम्मा। अरविंद ने निरर्थक परिहास करना चाहा था।

भाड़ में जाए तेरी कॉफ़ी। कान खोल के सुन ले बिन्दु, वो मास्टर की छोरी अगर इस घर में आई तो मैं बदरीनाथ धाम में जा बसूँगी, समझा। माँ ने अपना दो टूक निर्णय सुना दिया था।

ठीक है माँ,  वह नहीं आएगी, पर मैं भी तुम्हारी चुनी लड़की से शादी नहीं करूँगा। अरविंद भी अड़ गया था।

अम्माजी ने उसी दिन से भूख हड़ताल शुरू कर दी थी। बड़ा पुत्र आलोक बाहर नौकरी पर रहता था, अतः अम्मा जी का लाड़-प्यार और जोर-जबरदस्ती छोटे अरविंद को ही झेलनी पड़ती थी। दो दिन बाद ही अरविंद ने हथियार डाल दिये थे-

ठीक है अम्मा, जो तुम्हारी इच्छा हो करो, पर बाद में अच्छे-बुरे के लिए मुझे दोष न देना।

अरे एक बार दीपा को देख लेगा-सबकुछ भूल जाएगा। तो मैं तैयारी करूँ? अम्मा अत्यधिक उत्साहित हो उठी थीं।

पर अम्मा बड़े भइया के पहले मेरा विवाह कैसे होगा? अरविन्द मानो ये विवाह टालना चाहता था।

तेरे बड़े भइया की तो बातें ही निराली हैं, बिंदु, वो तो शादी के पहले ही जोरू का गुलाम बन गया है। उसकी शादी तभी होगी जब उसकी श्रीमती जी का आर्डर होगा। इधर दीपा से छोटी दो बहिनें और हैं,  उनकी भी तो शादी की जल्दी है। जब तक बड़ी वेटी ससुराल नहीं जाती छोटी का ब्याह कैसे होगा, बिंदु?

अम्मा जी की दलीलों ने अरविंद को परास्त कर दिया था। माँ के प्यार का मोल तो चुकाना ही था। आनन-फानन अम्मा जी ने तैयारी कर डाली है। मनचाही बहू लाने के उत्साह में विवाह के समय अरविंद के कुम्हलाए मुख पर उनकी दृष्टि भी नहीं पड़ी। बड़े भाई आलोक का मुख गम्भीर हो उठा था-

तूने मुझे ये सब क्यों नहीं बताया बिंदु,  मैं माँ को समझा लेता। विवाह जीवन भर का प्रश्न है, यूँ जबरन क्या संबंध किए जाते हैं?

मेरी यही नियति थी भइया..............। अरविंद के उस उत्तर पर आलोक व्यथित हो उठे थे। अपने कारण भाई के उस त्याग के प्रति वे अपने को दोषी ठहरा कर भी, विवश थे।

दीपा का मुख देख आलोक ने शांति की साँस ली थी। सचमुच अम्मा का चयन गलत नहीं था। दीपा के उजले चेहरे पर शांन्ति और सौभ्यता का अद्भुत समन्वय था। अम्मा के अतिशय लाड़-दुलार ने अरविंद को जहाँ कुछ ज्यादा ही सिर चढ़ा दिया था,  वहीं घर की बड़ी बेटी होने के नाते दीपा में अपार सहनशक्ति और धैर्य था। विवाह के बाद नौकरी पर वापिस जाते आलोक ने, पाँव छूती दीपा को हृदय से आशीर्वाद दिया था-

सदा सुखी रहो, और देखो अम्मा के इस लाड़ले पर अपना अंकुश बनाए रखना,  वर्ना ये बेहाथ हो जाएगा।

आलोक को अम्मा के पत्रों से घर की सूचना मिलती रहती थीं। दीपा ने घर का सारा काम सम्हाल लिया है। घर की मर्यादा का उसे पूरा ध्यान रहता है। बड़े छोटों के प्रति व्यवहार में वह कहीं चूक नहीं करती। अब आलोक को भी जल्दी विवाह कर लेना चाहिए,  वर्ना छोटी बहू घर की बड़ी बहू न बन जाएगी?

आलोक ने अरविंद को भी पत्र लिखे थे। उसके संक्षिप्त उत्तरों में वह दीपा के प्रति उन्हीं प्रशंसा के शब्दों को खोजता था, जो अम्मा के पत्रों की हर पंक्ति में उभरते आते थे। दीपा के प्रति अरविंद का नितान्त मौन आलोक की चिन्ता का विषय था।

अन्ततः मीता का शोध-कार्य पूर्ण हुआ और जल्दी ही आलोक और मीता परिणय-सूत्र में बंध गये थे। दोनों के कुछ गिने-चुने आत्मीय और मित्र भर ही विवाह में आमंत्रित किए गए थे। सादे से विवाह समारोह के बाद मीता ने जब घर में प्रवेश किया तो अम्मा के मुख पर वो उछाह नहीं मिला जो दीपा के बहू बनाकर घर में आते समय परिलक्षित था। आरती की थाली लिए खड़ी महरी को देख आलोक चौंक गया था, पर तभी अम्मा ने स्थिति स्पष्ट की थी-

भइया तुमने नई फैसन का विवाह किया है सो बता दो आरती उतारूँ या नहीं? कहीं तुम्हारी बहू हमें पुराने फैशन की न बता दें।

अम्माजी,  हमें तो आपका आशीर्वाद भर चाहिए। आपकी जो इच्छा हो हमें मान्य होगी। मीठी आवाज में अम्मा को निरूत्तर कर, मीता उनके पाँवों पर झुक गई थी।

दीपा ने अत्यन्त आदर से मीता के पाँव छूने चाहे थे, पर बीच में ही स्नेह से उठा मीता ने उसे अपने वक्ष से सटा लिया था।

तुम्हें मीता दीदी कहूं........ठीक रहेगा न? उत्सुकता से दीपा ने पूछा था।

उहुंक बस मीता चलेगा। हल्की मुस्कान के साथ मीता ने उत्तर दिया था।

पर रिश्ते में तुम मेरी जिठानी हो, फिर भला मैं नाम कैसे। लूंगी? इस घर में पहले तुम आई हो,  इस नाते मुझसे बड़ी हुई न? मीता ने दीपा की समस्या का समाधान खोजना चाहा था।

उम्र, शिक्षा, योग्यता, सब में तुम मुझसे आगे हो फिर मेरी कोई बड़ी बहिन भी नहीं इसलिए अगर तुम्हें दीदी कहूं तो तुम्हें बुरा लगेगा, दीदी?

छिः पगली, तू प्यार से मुझे चाहे कुछ भी पुकारे मुझे स्वीकार है, पर रिश्ता हम दोनों का सच्चे मित्रों का होगा, बोलो है स्वीकार? मीता की फैली हथेली पर विश्वास के साथ दीपा ने अपना हाथ धर दिया था।

दो चार ही दिनों में दीपा की स्थिति देख मीता विस्मित हो उठी थी। हर पल अरविंद का कोई न कोई आदेश दीपा को मिलता रहता था। एक ओर आगतों को चाय-नाश्ता पकड़ाती, दूसरी ओर अरविंद के लिए कपड़े निकाल, कोल्ड ड्रिंक्स तैयार करती। उतनी सी देर में अरविंद का कोई नया हुक्म जारी हो जाता। कभी-कभी तो आदेशों की हद हो जाती। रात के दो तीन बजे तक दीपा जिस तरह घर के हर प्राणी के हुक्म बजाती,  मीता की कल्पना से परे था। सुबह पाँच बजे नल आता था, पानी भरने के दायित्व से लेकर घर के हर छोटे-बडे़ कामों की दीपा की ही जिम्मेदारी थी। ननदों और उनके बच्चों की हर फ़र्माइश पूरी करती दीपा के चेहरे पर जरा-सी शिकन तक नहीं आती थी।

तू रात में कभी दो घंटे भी चैन से सो पाती है, दीपा? मीता का प्रश्न स्वाभाविक था।

अब तो आदत हो गई है, दीदी। क्लांत भाव से उसने उत्तर दिया था।

क्या बात है दीपा,  अभी तेरे विवाह को दो वर्ष ही हुए हैं, पर तू इस तरह मुर्झा सी गई है। बेबी को भी तू ठीक से पर्वाह नहीं करती। मीता देखती कि दीपा अपनी पाँच माह की बच्ची के रोने पर भी अधिक ध्यान नहीं दे पाती थी। घर का ही कोई प्राणी उसे उठाकर जब दीपा को थमा दे तो ठीक, वर्ना वह तो काम में व्यस्त चकरघिन्नी-सी पूरे घर में चक्कर काटती थी।

अम्मा जी तो उसे देख ही लेती हैं, मुझे सबको देखना होता है न, दीदी।

ऐसी भी क्या बात है,, तू सबको बिगाड़ रही है। जरा अपना भी ध्यान रख दीपा, ,देख कैसा मुंह निकल आया है।

मीता के स्नेहपूर्ण शब्दों पर उसके नयन छलछला आए थे।

आलोक और मीता के जाते समय दीपा के नयन भर आए थे।

कुछ दिन और रह जातीं, दीदी। उदास मुख से दीपा ने कहा था।.........

ताकि तेरी परेशानियाँ और बढ़ जातीं। मीता ने परिहास किया था।

तुम्हारे रहने से मुझे जो आत्मिक बल मिलता है, तुम समझ नहीं सकोगी, दीदी।

अरे अब तेरा बल अरविंद है, ,हम नहीं। मीता की इस बात पर दीपा मौन रह गई थी।

अचानक अरविंद की गम्भीर बीमारी की सूचना पा,, मीता और आलोक घर आए थे। अजीब बीमारी थी, ,अरविंद का पूरा शरीर सूज गया था। आलोक घबरा उठे थे।

किस डाक्टर को दिखाया है, अम्मा

डॉ दास देख गए हैं पर उनका कहना है बड़े अस्पताल में पूरी जाँच कराना ठीक है। अम्मा ने उदास स्वर में जवाब दिया था।

फिर देरी किस बात की है, आज ही अस्पताल में भर्ती करा देते हैं। आलोक की व्यग्रता स्पष्ट थी।

मैं अस्पताल में भर्ती नहीं होऊंगा भइया। प्रयासपूर्वक आँखें खोल अरविंद ने कहा था।

हर बात में ज़िद करना ठीक नहीं हैं, बिन्दु,  डाक्टर की राय सभी मानते हैं। मुझे पहले खबर क्यों नहीं दी, अम्मा। आलोक ने शिकायत की थी।

मैं क्या खबर देती, उस दिन आफ़िस में चक्कर खाकर गिर गया। लाख मना किया घर में आराम कर,  पर दूसरे दिन भी आफ़िस चला गया। नतीजा सामने है। अम्मा का रोष स्वाभाविक था।

अरविंद की गम्भीर बीमारी में भी दीपा को सहज भाव से काम निपटाते देख मीता चकित हो उठी थी। मीता और आलोक के सामने चाय और बिस्किट रख, दीपा जैसे ही मुड़ी अरविंद का तेज स्वर दीपा को चैंका गया था।

‘कब से सैंडविच माँग रहा हूं,  कब दोगी, जब मैं खत्म हो जाऊंगा?’

दीपा ने पलट कर एक पल अरविंद को देखा भर था,  पर शान्त भाव से बाहर चली गई थी। उसके बाहर जाते ही आलोक ने मीठे स्वर में अरविंद को झिड़का था-

छिः, भला इस तरह नाराज़ होते हैं, बेचारी दिन रात पिसती रहती है। उसको भी तो इस समय शांति और सांत्वना चाहिए।

मुझे किसी की शांति से मतलब नहीं है, भइया। आफ़िस में जब बेहोशी टूटी तो लगा अम्मा को देख लूं। वे लोग जबरन हॉस्पिटल ले जाना चाह रहे थे,  पर मैं घर आ गया। अम्मा को देखे बिना मैं प्राण भी तो नहीं त्याग सकता। अरविंद का वाक्य समाप्त होने के साथ ही दीपा ने सैंडविच की प्लेट सामने रख दी थी। निश्चय ही अरविंद की बात दीपा ने स्पष्ट सुनी थी। मीता उसके चेहरे की ओर दृष्टि उठाने का साहस भी न कर सकी थी।

रात के एकान्त में अकेली दीपा को छत पर जाते देख मीता उसके पास जा खड़ी हुई थी।

कैसी हैं, दीपा?

स्नेह विगलित स्वर में मीता ने प्रश्न किया था। उत्तर में दीपा टूटकर मीता के वक्ष से जा लगी थी। सिसकियों का बाँध टूटने में ही नहीं आ रहा था।

क्यों व्यर्थ ही परेशान हो रही है, दीपा,  अरविंद जल्दी ही ठीक हो जाएँगे। आलोक के सामने उसकी ज़िद नहीं चलेगी। स्नेह से दीपा के केश सहलाती मीता का मन भर आया था।

दीदी, अभी जो वह कह रहे थे, तुमने ठीक सुना था न?

कौन-सी बात दीपा..........? मीता ने जानकर भी अनजान बनना चाहा था।

तुम्हीं बताओ न दीदी,  मैं इस घर में क्या स्थान रखती हूं,  किस पर अधिकार है मेरा? दीपा के स्वर की विकलता मीता को छू गई थी।

‘इस घर की सबसे प्यारी बहू है तू।  सच कहूं, तो तू बड़ी बहू हैं। तेरे सामने तो मैं अपने को बहुत छोटा पाती हूं, दीपा।’

सिर्फ घर की बहू न दीदी,  पर जिसके नाते ये संबोधन मिला है उसकी दृष्टि में मैं क्या हूं,  दीदी? दीपा के नयनों में न जाने कौन-सी आग जल उठी थी।

तू अरविन्द की पत्नी नहीं, उसकी प्रेरणा है, दीपा।

तभी तो उस दिन आफ़िस में बेहोशी टूटने पर उन्होंने सिर्फ़ अम्मा जी को देख पाने की कामना की थी न, दीदी

अरे वह तो उसका बचपना है दीपा,  अम्मा जी का अपने इस छोटे पुत्र पर जरा ज्यादा लाड़ हैं न, सो वह उनके इस स्नेह के प्रति अपना आभार जताना चाहता है। मीता ने बात सम्हालनी चाही थी। वह जानती थी दीपा के हृदय में अरविन्द की उस बात ने कितना आघात पहुंचाया था।

प्रेम प्रतिदान नहीं चाहता,  पर जिसके लिए सब कुछ अर्पित कर दिया उसके दो मीठे शब्दों पर भी अधिकार नहीं?

तू बेकार की बातें सोचती है दीपा,  अरविन्द तुझे बहुत ज्यादा प्यार .................

नहीं दीदी,  इसके आगे और कुछ मत कहना। अम्मा जी की गलती का दंड मुझे भरना पड़ेगा, ये तो अन्याय हुआ न?

अम्मा जी की गलती?

उन्होंने किसी और से विवाह करना चाहा था, अगर उनकी वो इच्छा पूरी नहीं हो सकी तो क्या इसके लिए अकेली मैं जिम्मेवार हूं, दीदी?

अरे वो बात तो अरविन्द कब का भूल चुका होगा दीपा। तुझ जैसी पत्नी पाकर कोई भी धन्य होगा। अम्मा जी तो तेरे गुण गाते नहीं थकतीं।

सिर्फ अम्मा जी की बहू बनकर क्या जिया जा सकता है, दीदी? दीपा ने अपनी प्रश्नवाचक दृष्टि मीता के मुख पर निबद्ध कर दी थी।

याद आया मीता को पिछली बार ननदों के सामने अम्माजी अरविंद के गुणगान करतीं किस कदर गदगद थीं।

अरी बेला इस अरविन्द को देख इतनी साड़ियाँ पड़ी हैं मेरे पास, पर जब भी कहीं जाता है, दो- चार उठा लाता है। मैंने हजार बार कहा तू अब मेरा ध्यान छोड़,  दीपा के लिए साड़ी-वाड़ी लाया कर। मेरी बात सुनते ही बोला -

मैं तुम्हें लाता हूं , उसे जो देना है तुम लाकर दो।

अम्माजी के मुख पर ढेर सा वात्सल्य का गर्व छलक आया था।

बड़ी ननद रजनी ने अम्मा की हाँ में हाँ मिलाई थी-

सच, हमने तो कभी नहीं सोचा था ये अरविन्द इतना बदल जाएगा। कितना शैतान हुआ करता था बचपन में, पर अब तो सारे घर की जिम्मेवारी सम्हाल ली है इसने।

अम्मा को तो पलंग से पाँव नीचे नहीं धरने देते हैं, अरविन्द भइया। असली राज तो अम्मा छोटे बेटे के कारण कर रही है। छोटी ननद बेला ने अप्रत्यक्ष रूप से बड़े भाई की अकर्मण्यता पर छींटा डाला था।

उन सब तारीफ़ों में दीपा कहाँ थीं? क्या खास किया है उसने? सबकी खातिरदारी में गर्मियों में रसोईघर में तपती दीपा, घर के हर व्यक्ति के आदेश पर बस दौड़ती ही तो रहती थी। अरविन्द तो जैसे सबको ये दिखा कर निहायत संतोष पाता कि देखो परिवारजनों के लिए उसने अपनी पत्नी समर्पित कर दी है। हर छुट्टी में घर के सारे सदस्य इकट्ठे होते, गप्पें मारी जातीं, पर दीपा उनमें कब सम्मिलित होती थी। मीता ने कितनी बार अरविन्द और दीपा को अपने घर आमंत्रित किया था,  पर अरविन्द हमेशा कोई न कोई बहाना करके टाल जाया करता था। मीता को कभी अपराध-बोध भी होता कि वह तो स्वतन्त्र अकेला जीवन जी रही है,  पर दीपा की तो उम्रकैद जैसी हो गई है।

बोलो दीदी, तुम चुप क्यों हो गई?

दीपा के प्रश्न ने मानो मीता को चैतन्य कर दिया था। उत्तर देने की दुविधा से आलोक ने उबार लिया था...............

अरे तुम लोग यहाँ खड़ी हो,  वहाँ अम्मा अरविन्द के लिए साबूदाना माँग रही है। आलोक की बात समाप्त होते न होते दीपा सीढ़ियां भागते हुए उतर गई थी।

क्या बात है मीता, बहुत गम्भीर दिख रही हो। क्या अम्मा ने कुछ कहा है? आलोक मीता का कितना ध्यान रखते है और एक वो अरविन्द है कि.......

सुनो इस बार जब अरविन्द ठीक हो जाए उन्हें जबरदस्ती दीपा के साथ अपने पास बुलाना है।

ठीक है...........क्या कोई खास बात? आलोक चिन्तित हो उठे थे।

यूं घर के कामों में पिसती दीपा को भी तो खुली हवा में साँस लेने का अधिकार है न?

ये बात तो ठीक कह रही हो। कभी लगता है, अम्मा की अरविन्द के प्रति ज्यादती का दंड दीपा भर रही है। आलोक गम्भीर हो उठे थे।

अरविन्द के सभी आवश्यक परीक्षण हॉस्पिटल में करा चुकने के बाद जब रिपोर्ट आई तो आलोक गम्भीर हो उठे थे। एकान्त में अम्मा जी को बुला कर कहा था-

क्या अरविन्द बहुत पीने लगा है, अम्मा?

नहीं...........वैसा कुछ तो नहीं बस दोस्तों में कभी-कदा हो ही जाती है। क्या दीपा ने शिकायत की है तुझसे? अम्मा सतर्क हो उठी थी।

दीपा का नाम क्यों लिया, अम्मा?

असल में वह अरविन्द से शराब को लेकर झगड़ती रहती है, इसीलिए.......................।

दीपा मना करती है,  फिर भी अरविन्द पीता है, अम्मा। तुमने नहीं रोका उसे।

अरे अब मैं कहां तक इनके झंझटों में पड़ूं,  आपस की बात है, ये दोनों जानें।

और किसी बात में तो तुमने इन दोनों को अकेला नहीं छोड़ा,  बस इसी बात के लिए उन्हें छोड़ दिया? आलोक का स्वर तिक्त हो उठा था।

आखिर बात क्या है, तू बताता क्यों नहीं?

अरविन्द का लिवर बहुत बढ चुका है, ब्लड. प्रेशर, हाई रहता ही है। शराब तो उसके लिए ज़हर है, अम्मा।

हे भगवान, अब क्या होगा? अम्मा चिन्तित हो उठी थी।

अरविन्द को परहेज करना होगा। शराब छुए तक नहीं यही देखना है।

तू उसे समझा, शायद तेरी बात मान जाए।

कोशिश करूंगा। आलोक बस इतना भर कह बाहर चले गए थे।

एक सप्ताह बाद आलोक और मीता को वापिस जाना पड़ा था। पांव छूती दीपा के सिर पर हाथ धरते आलोक का मुख गहन-गम्भीर हो उठा था। घर पहुँचने के दस दिन बाद दीपा का पत्र आया था........

मेरी दीदी,


आलोक भाई साहिब ने जब इनकी गम्भीर हालत के विषय में बताया, मैं बहुत चिन्तित हो गई थी। पिछले दो वर्षों में मेरे स्थान पर शायद इन्होंने शराब को ही अपना लिया था। हर बार मेरी मिन्नतें निरर्थक ही गई। इस बार भी वही अंजाम निकला,  इसीलिए मैंने इंदिरा जी का सहारा लिया। अम्मा जी जब रजनी दीदी के घर गई थीं,  मैंने इंदिरा जी को वस्तुस्थिति बता, अनुरोध किया था कि वे इन्हें शराब न पीने दें।

जानती हो दीदी,  इंदिरा जी को मेरे साथ देख अरविन्द का चेहरा फीका पड़ गया। जब इंदिरा ने शराब न पीने की बात कही तब भी ये एकदम चुप रहे। उनसे बात करना तो दूर, हाँ-ना भी नहीं की। अपने मन का चोर बता दूं, मैं कमरे के बाहर खड़ी थी। रोम-रोम कान बन गया था। इंदिरा ने पूछा था

.खुश तो हो अरविन्द? तो जानती हो क्या कहा इन्होंने ..........बूझ नहीं सकोगी, दीदी। अरविन्द ने कहा था-

दीपा के सिवा मुझे झेल सकने वाली दूसरी लड़की बनी ही नहीं है, इंदिरा। बहुत सुखी हूं मैं उसे पाकर।

सच दीदी मुझे लगा मेरा तप सार्थक हो गया। रोम-रोम उल्लसित हो गया। इन्दिरा के जाने के बाद जब मैं कमरे में गई तो मीठे स्वर में उन्होंने कहा था-

मेरे जीवन पर तुम्हारे सिवा और किसी का अधिकार नहीं है, दीपा। ऐसी गलती फिर कभी मत करना। कोशिश करूँगा तुम्हारे योग्य बन सकूं।

दीदी, ये खुशी मुझसे झेली नहीं जा रही है, मेरा अप्राप्य मिल गया है। तुम्हारा आशीर्वाद मुझे फल गया। भाई साहब को चरण-स्पर्श।

तुम्हारी

दीपा

पत्र समाप्त करते मीता के नयन भर आए थे। मन ही मन भगवान को धन्यवाद दे, वह यह शुभ-सूचना आलोक को सुनाने लॉन में चली गई थी।

बस पन्द्रह दिनों बाद ही तो वज्रपात हुआ था। टेलीफोन से अरविन्द के अचानक एक्सीडेंट की सूचना पा जब तक वे पहुंचे, अरविन्द सबसे नाता तोड़ चला गया था। दीपा के स्तब्ध चेहरे को देख सब सहानुभूति जता रहे थे।

बेचारी की उम्र ही क्या है? कैसे कटेगी सारी जिन्दगी?

कल दीपा का जन्मदिन था, उसके लिए साड़ी खरीदने ही तो गया था.............।

न जाने कब, कौन स्कूटर को टक्कर मार गया। बेहोश पड़ा मिला था, बेचारा।

अरे दीपा को रूला रजनी बेटी, दुख उसके सीने में जम गया है।

पत्थर हो गई है...........साथ में नन्हीं सी जान..............कैसे निबटेगी।

अम्मा जी का रो-रो के बुरा हाल था। आलोक के पहुंचते ही वे उसके कन्धे पर सिर रख हाहाकार कर उठी थीं.................

हाय मेरा लाल चला गया, आलोक। भीगी आँखें पोंछ, आलोक के सुदृढ़ हाथों ने अम्मा को सहारा देते समेट लिया था।

अम्माजी को सहारा देने को आलोक का कन्धा तो है, पर दीपा- वह किसके कन्धे पर सिर रख कर रोएगी। अपनी जगह से उठ मीता ने स्तब्ध ताकती दीपा का सिर हौले से जैसे ही अपने कन्धे पर रखा, दीपा का बाँध टूट, मीता की साड़ी भिगो गया।

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