अपनों जैसा

तिवारी जी के साथ गाँव से आये उस छोटे से बालक को देखते ही पतिदेव भुनभुनाने लगे, ”इस आफ़त को लेकर मैं नहीं जाऊॅंगा। वापस भेज दो“


सचमुच उसकी रूपरेखा देख मेरा भी मन बुझ गया। छोटे-छोटे बाल, लम्बी-सी गाँठ बॅंधी शिखा। कीचड़ युक्त आँखें, पता नहीं रोने के कारण या किसी बीमारी से सुर्ख लाल हो रही थीं। चेहरा देख लगा, इससे काम नहीं चलेगा। गत दो माह से पतिदेव का ट्रांसफ़र दूसरे शहर में हो गया था। बच्चों की पढ़ाई के कारण पूरे एक वर्ष मुझे इसी शहर में रहना था। होटल का खाना खाकर वह अस्वस्थ से हो गये थे, अतः गाँव जाते समय तिवारी जी से एक छोटे लड़के को लाने की बार-बार ताकीद कर दी थी। पर इस बच्चे को देख तिवारी जी की बुद्धि पर तरस आ रहा था। भला इतना-सा बच्चा क्या काम कर पायेगा? शक्ल देखो तो बारह बज रहे थे। तिवारी जी तुरन्त गाँव लौटने को प्रस्तुत नहीं थे।

”कम-से-कम एक सप्ताह तो इस बला को झेलना ही है,“ सोच कर उसका नाम पूछ डाला। उत्तर मिला, ”जी मेरा नाम सुशील कुमार है।“

कुछ कौतुक से बच्चे पूछ बैठे, ”किस चिड़ियाघर से आ रहे हो?“

विस्मय से सुशील बच्चों की ओर देख कर बोला,

”हमने पटना में चिड़ियाघर देखा था, खूब मजा आया था।“

बच्चों के ठहाकों पर सुशील विस्मित देखता रह गया था। सुशील के गंदे कपड़े देख बच्चे नाक-भौं चढ़ाने लगे थे। खीज कर विवके की पुरानी शर्ट, नेकर और साबुन की एक टिक्की सुशील के आगे पटक मैंने कहा, ”जा बाहर नल पर नहा ले और ये अपने कपड़े घोकर सुखा दे।“

”जी, माँ जी!“ शान्त संयत उत्तर दे सुशील चला गया। एक बार फिर तिवारी जी की मूर्खता पर मैं कुढ़ गयी कि न जाने कब तक यह बला झेलनी होगी।

लगभग एक घंटे बाद अच्छी तरह नहा-धोकर जब सुशील घर में घुसा तो ढीली, कंधो से लटकती बुश्शर्ट देख बच्चे जोर से ‘जोकर-जोकर’ कह हॅंस पड़े। सुशील भी उनके साथ हॅंस दिया।

”झाडू तो लगा लेगा न?“ के साथ ही मैंने उसके हाथ में झाडू पकड़ाकर बाहर ड्राइंगरूम में अच्छी तरह झाडू लगाने का निर्देश दे डाला। व्यस्तता में यह भी याद न रहा कि सुशील गाँव से बहुत प्रातः चला होगा, पता नहीं कुछ खाकर भी चला था या नहीं। दस मिनट के बाद ही, ”अब क्या करूँ, माँ जी“ के साथ सुशील मेरे सामने खड़ा था।

”क्या झाडू लग गयी?“ मैंने पूछा। इतनी जल्दी यूँ ही बेगार डाल आया होगा, सोच जब ड्राइंगरूम में पहॅुंची तो देखा, सुशील ने पूरे मनोयोग से झाडू लगाई थी। यही नहीं, कुर्सी-मेज पर बैठी धूल की परत भी साफ़ कर करीने से फ़र्नीचर सजा दिया था।

”ठीक है, घर में झाडू लगा डाल। हाँ, मिट्टी-धूल कहीं नहीं छूटनी चाहिए,“ कह मैं बच्चों के लिए नाश्ता बनाने किचन में चली गयी। बच्चों को नाश्ता, दूध देकर अचानक याद आया कि सुशील को चाय भी नहीं दी थी। रोटियों पर सब्जी रख उसको देते समय लगा, पता नहीं गाँव का लड़का है, भरपेट खाना भी कभी मिला है या नहीं? शहर में न जाने कितना खायेगा? सुशील ने मात्र तीन रोटी ले बाकी लौटा दीं तो सचमुच अजीब-सा लगा। घर पर दृष्टि डाली तो आश्चर्य हुआ, इतने कम समय में सुशील ने झाडू के बाद पोछा भी लगा डाला था।

”चलो, कम-से-कम झाडू-पोछा तो लगाना जानता हैं,“ सोचकर अपने को तसल्ली दे मैं पूछ बैठी, ”मसाला तो पीस लेगा न?“

बहुत ही उत्साहित हो सुशील बोल पड़ा, ”अभी पीसता हूँ, माँ जी।“ और शायद पाँच मिनट में रोटियाँ खा मसाला पीसने में वह तन्मय हो गया था। बिना पूछे बाथरूम में जाकर बच्चों और इनके कपड़े धोकर फैलाते सुशील को देख आश्चर्य मिश्रित सुख का ही अनुभव हुआ।

सब्जी वाले से सब्जी खरीद उसका हिसाब जोड़ना शुरू करने वाली थी कि पास खड़े सुशील ने फौरन कहा, ”ग्यारह रूपये बासठ पैसे हुए हैं, माँ जी।“

मैं चैंक गयी। लगभग पाँच मिनट जोड़ने के बाद जब सचमुच उतना ही हिसाब आया तो मैं विस्मित रह गयी, ”क्या तू पढ़ा-लिखा है?“

सगर्व सुशील बोला, ”गाँव के स्कूल में तीसरी कक्षा में साठ लड़कों में फ़स्र्ट आया था।“

पैसे देते मेरे हाथ एक क्षण को रूक से गये, मेरी पुत्री सुनीता इस वर्ष दूसरी कक्षा में हिसाब मेंं असफल रही थी।

”फिर आगे क्यों नहीं पढ़ा?“

”कैसे पढ़ता! गरीब घर का लड़का हूँ न!“

लगा शायद उस लड़के को समझने में कहीं भूल हो गयी थी।

एक सप्ताह में ही सुशील ने घर के सब काम इस तरह से करने शुरू कर दिये कि हमें आश्चर्य होता था। हम यह भूल ही गये कि सुशील को मात्र एक सप्ताह बाद वापस गाँव जाने का निर्णय लिया गया था। सब काम करके भी सुशील के पास बच्चों के साथ खेलने का समय न जाने कैसे बच रहता था! घर में रहते उसका चेहरा फूल की तरह खिलने लगा। विश्वास नहीं होता था कि एक दिन गंदे कपड़ों में, कीचड़-भरी आँखों के साथ शायद दस या ग्यारह वर्ष का यही बालक काम करने आया था। आँखें बुद्धि से दीप्त और गोरा रंग दमकने लगा था। बच्चों के पुराने कपड़े पहन जब वह कहीं हमारे साथ चलता तो प्रायः अजनबी उसे हमारा ही बेटा समझते थे। सुनीता और विवेक के स्कूल जाते समय वह उन्हें जबरन गिलास भर कर दूध दिया करता था। सुनीता के क्रोध करने पर बड़ी सहजता से कहता था,

”दीदी, बच्चों को खूब दूध पीना चाहिए। तभी तो ताकत आती है।“

स्वंय दस वर्ष का बच्चा मानो उस समय सुनीता का अभिभावक बन जाता था। शायद उसे यह कभी समझ में ही नहीं आया कि वह भी बालक था या दूध पीना उसके लिए भी आवश्यक हो सकता था। विवेक को भइया कह उस पर सुशील पूरा अधिकार जमाता था। व्यस्त क्षणों में विवके की झिड़की सुशील को कभी छू नहीं पायी। कभी-कभी बच्चों के साथ खेलते समय सुशील जिद कर जाता या अड़ता, पर दूसरे ही क्षण तुरन्त अपनी पराजय स्वीकार कर लेता, मानो गलती उसी की थी। शायद पराजय को उसने अपनी नियति स्वीकार लिया था।



पता नहीं एक वर्ष का लम्बा समय कैसे पलक झपकते-सा बीत गया। सुशील अब हमें परिवार का सदस्य ही लगने लगा था। मेरी बीमारी में स्वंय खाना बना, बच्चों को टिफ़िन दे सुशील ने चमत्कृत कर दिया।

”तुझे खाना बनाना कैसे आया सुशील?“ पूछने पर बड़ी सहजता से उत्तर दिया, ”आप बनाती थीं तो मैं देखता था। बस आ गया।“

पतिदेव के साथ जब सुशील को भेज दिया तो हमें घर बहुत सूना लगने लगा। जब भी पतिदेव आते, सुशील का भी आने का बहुत आग्रह रहता था, पर साथ आने की जिद उसने कभी नहीं की। जब भी सुशील घर आता था घर में जैसे खुशी आ जाती थी।

”भाई जी, ये अमरूद का पेड़ क्यों सूख गया? गाय केले का पेड़ कैसे खा गयी?“ जैसे प्रश्नों के साथ सुशील खाली समय में माली बना पौधे लगाता, सींचता रहता था। सुशील की इस अतिरिक्त शक्ति पर आश्चर्य होता है। उसी आयु की सुनीता तो अपना काम भी नहीं कर पाती। छुट्टियों में सुशील हमारी प्रतीक्षा इस उत्सुकता से करता कि लगता, अपना बच्चा हमसे अलग पड़ा है।

पैसों के प्रति हम सब बेहद लापरवाह हैं। अल्मारी, कमीज, पैंट की जेबों में या मेज की दराजों में प्रायः पैसे छूटे ही रह जाते थे। सोने की अपनी चेन, अॅंगूठियाँ यहाँ-वहाँ छोड़ने के लिए मैं बेहद बदनाम हूँ। सुशील बुज़ुर्ग की तरह चेन, अॅंगूठियाँ सहेज मुझे लैक्चर दे डालता था,

”आप तो, भाई जी, अपनी चीज भी सॅंभाल कर नहीं रख पातीं।“ हर जगह पड़े पैसे इकट्ठे कर सुशील एक डिब्बे में रखता जाता था। कभी खुले पैसों की खोज के समय सुशील डिब्बे से पैसे दे हमारी मुश्किल आसान कर देता था। यही नहीं, घर आये मेहमान जाते समय जो पैसे सुशील को दे जाते थे, उसने उनका उपयोग अपने लिए कभी नहीं किया। कभी सुनीता की साइकिल का पंचर लगवाना हो या रिक्शे वाले को टूटे पैसे देने हो तो सुशील के पैसे इस सहजता से निकल आते कि ताज्जुब होता। कभी सुशील के उधार पैसे गिनने की चेष्टा की तो वह नाराज़ हो कहने लगता,

”अपने ही ऊपर तो खर्च किये हैं। आप लोग क्या दूसरे हैं!“ उसकी उदारता देख विवेक की कृपणता पर खीज आने लगती- मजाल है, कोई विवके से पैसे ले तो ले!

वर्ष के अन्त में पतिदेव के पास हम सब सदैव के लिए शिफ्ट करने वाले थे। ‘सब एक साथ रहेंगे’ की कल्पना से हमारे साथ ही सुशील भी प्रसन्न था।

”खूब मज़ा आयेगा। अब भइया के साथ खूब खेलेंगे“, वह कह रहा था। सामान की पैकिंग सुशील की तत्परता के कारण ही इतनी शीघ्र सम्भव हो सकीं। घर की रद्दी, डिब्बे आदि सुशील ने इस चतुराई से बेचे कि हॅंसी रोकनी मुश्किल थी। भारी-भारी फर्नीचर, गोदरेज की अल्मारियाँ उठाते समय सुशील की शक्ति देख सब विस्मित थे। नये घर में नौकर के लिए भी एक कमरा था। प्रायः हर घर में सर्वेंट क्वार्टर में कोई नौकर अरैर उसका परिवार रहता था। सुशील ने आते ही कहा,

”माई जी, हर घर में फुल टाइम सर्वेंट हैं। आप भी एक सर्वेंट क्यों नहीं रखतीं?“

”फिर तू कहाँ रहेगा?“

”क्यों, हम और भइया एक कमरे में रहेंगे!“

बात हॅंसी में टल गयी, पर जब सचमुच सोते समय सुशील विवेक के ही कमरे में नीचे चटाई बिछा सोने लगा तो उसे यह समझाना मुझे भी कठिन लगा कि वह सर्वेंटस क्वार्टर में जाकर सोये। सुशील को शिकायत थी कि सब कमरों में पंखे हैं, फिर सर्वेंटस क्वार्टर में पंखा क्यों नहीं लगाया गया था?

मुहल्ले के लोग उसे हॅंसी में सुशील बाबू कहकर बुलाते थे। जमादार के आते ही वह दौड़कर बाथरूम धुलवाता, ज्यादा विम खर्च करने की शिकायत करता। ग्वाले पर दूध में पानी मिलाने का आरोप लगाता। सब्जी लेते समय पैसे कम करने की ज़िद करता। रोज ही उसकी लड़ाई की शिकायतें आतीं। यद्यपि मैं जानती थी कि वह हमारे लिए ही लड़ता था, फिर भी कभी अगर सुशील को ही डाँटा तो उसने बुरा नहीं माना। क्लब जाते समय सबसे आगे सुशील ही रहता था। सुशील पर घर छोड़ मैं इतनी निश्चित हो गयी थी कि कहीं ताले लगाने की अपेक्षा सुशील पर घर खुला छोड़ देना अधिक सहज लगता था। मन के किसी कोने में एक अहॅं भी था कि नौकर को हम अपने बच्चों की तरह प्यार करते हैं, उसे अपने परिवार के सदस्य की तरह रखते हैं।



प्रातः पतिदेव ने एक हजार रूपये दिये थे। हमेशा की तरह खुली अल्मारी में रूपये रख पास के घर चली गयी। सुशील खाना बनाने में व्यस्त था। सुनीता और विवेक का स्कूल पास ही था। दोनों खाना खाने आते थे। सुशील बहुत ही उत्साह से दोनों को खाना खिलाता था। इनके आने में दो-ढाई बज जाते थे, अतः मैं निश्चित हो घूम आती थी। खाना खाकर जाते समय जब इन्होंने रूपये माँगे तो ‘अल्मारी में हैं’, कह मैं किचन में चली गयी। रूपये गिनते ही यह बोले, ”क्या दो सौ रूपये खर्च कर डाले?“

”मैंने तो एक पैसा भी नहीं लिया। जैसे के तैसे धरे हैं।“ मैने कहा।

पुनः रूपये गिनकर भी जब दो सौ रूपये कम मिले तो हम दोनों परेशान हो उठे। सुशील को बुलाकर पूछने पर उसने अपनी अनभिज्ञता प्रकट की। तभी याद आया, परसों सुशील विवेक से पूछ रहा था, ”भइया, आपकी एयरगन कितने में आती है? कहाँ मिलती है?“

क्या कहीं उसी एयरगन के लिए तो सुशील ने यह रूपये नहीं ले लिए? विवेक सुशील की बहुत खुशामद पर भी कभी उसे अपनी एयरगन चलाने नहीं देता था। सुशील का एयरगन के प्रति अपार मोह था, मुग्ध दृष्टि से वह विवके को एयरगन चलाते देखा करता था। इनसे जैसे ही अपनी शंका व्यक्त की, बात विश्वास में बदल गयी। सुशील से बार-बार पूछने पर भी वह दृढ़ शब्दों में कहता गया,

”हमें पता नहीं, हमने रूपये देखे भी नहीं।“

क्रोध में जोर से चार-पाँच थप्पड़ भी मारे, पर सुशील अविचलित भाव से अपनी अनभिज्ञता ही प्रकट करता रहा। अन्त में हार कर मैंने कहा,

”ठीक है, इसे पुलिस में दे दो। ये लोग प्यार के काबिल नहीं होते। पुलिस के थप्पड़ ही कबुलवाएँगे।“

सुशील की आँखें लाल हो गयी थीं। उसका पूरा चेहरा पथराया हुआ सा नजर आ रहा था।

”कितना बेशर्म है! इतनी मार खाई पर एक बॅंूद आँसू भी नहीं गिरा।“

आँफ़िस जाते समय वह निर्देश दे गये, ”इसे सर्वेंट्स क्वार्टर में बन्द रखना। तिवारी जी को बुलाएँगे या पुलिस साथ लाएँगे।“

मेरे कहने के पूर्व ही सुशील बिना खाना खाये सर्वेंट्स क्वार्टर में चला गया। क्रोध में भुनती मैं बड़बड़ाये जा रही थी। मुहल्ले की स्त्रियों को सुशील की चोरी की कहानी बताते मन का आक्रोश फूट पड़ा, ”इसे हम अपने बच्चे जैसा मानते थे, इसने यह बदला दिया! सुनीता की साइकिल चलाकर तोड़ डाली, पर हमने कुछ नहीं कहा।“

किसी ने टिप्पणी की, ”अरे यह नौकर की जात ही नमकहराम होती है। आपने तो बेकार इसे सिर चढ़ा रखा था।“

विवेक के स्कूल से लौटते ही मैंने सुशील की कारस्तानी की सूचना दी। विवेक एकदम बोला, ”पर मम्मी वह रूपये तो मैंने अपनी और सुनीता की फ़ीस देने के लिए आपकी अल्मारी से लिए थे। आप भूल गयीं, कल वार्निग दी गयी थी। फ़ीस जमा करने का आज आखिरी दिन था। मेरी परीक्षा की फ़ीस भी जमा होनी थी।“

मैं विवेक का मॅंुह देखती रह गयी। इतनी बड़ी गलती मैं कैसे कर बैठी? अभी उसी दिन हॅंसकर मैंने सुशील से कहा था, ”भइया की पुरानी साइकिल खरीदोगे?“

”गरीब का बच्चा साइकिल कैसे चढ़ेगा, माई जी?“ सुशील का उत्तर मेरे सीने पर हथौड़े मारने लगा।

अपराध बोध से ग्रस्त हो जैसे ही मैंने सर्वेंट्स क्वार्टर का दरवाजा खोला, सुशील एकदम उठकर बैठ गया। कोमल मुख पर लाल उॅंगलियों के चिन्ह उभर आये थे। आँसुओं से पूरा मुख भीग गया था। एक पल को जी चाहा, उस पराये खून को अपने से चिपटाकर सांत्वना दे दुँ, पर अभिजात्य संस्कार बाधा बन गये। धीमे से कहा, ”सुशील ग़लती हो गयी। चल खाना खा ले। रूपये तेरे भइया ले गये थे, हमने बेकार तुम पर शक किया।“

आनन्द से उसका नन्हा-सा मुख खिल गया, आँखें चमक उठीं।

”कोई बात नहीं, माईजी, इसमें ग़लती की क्या बात है! अगर रूपये खो गये तो आप हम पर नहीं तो क्या भइया पर शक करेंगी! क्हते हुए गर्व से पीछे खड़े विवेक की ओर देख वह हॅंस पड़ा। उसकी वाणी में कहीं लगा। मेरा पराये को अपना जैसा समझने का दर्प चूर-चूर हो गया। क्या सचमुच अपने खून पर मैं ऐसी शंका कर सकती थी?“

सुशील आज चैथी कक्षा में पढ़ रहा है। वह मुझे अपनों जैसा प्यारा है, मगर कहते अब भी हिचकिचाहट होती है।

2 टिप्‍पणियां:

  1. awesome... iliterely cried...heart touching....nice story...thanks for this one...:)

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  2. nice story..really heart touching..i literely cried after reading this...thanks for this one....:)

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