एक चिंगारी छोटी-सी



वार्षिक पुरस्कार वितरण की संध्या, विद्यायल का प्रांगण दर्शकों से भर चुका था। समारोह में जिलाधिकारी राजकुकार जी मुख्य अतिथि के रूप में आमन्त्रित थे। पुरस्कार पानेवाले छात्र-छात्राएँ उत्सुकता से उस क्षण की प्रतीक्षा कर रहे थे, जब उनके हाथ में उनका पुरस्कार होगा। अपने एक वर्ष के कार्यकाल में ही अपनी कर्मठता एवं मृदु स्वभाव के कारण राजकुमार जी बहुत लोकप्रिय हो गए थे।
पुरस्कार-वितरण प्रारम्भ हो गया था। फैन्सी ड्रेस प्रतियोगिता के पुरस्कार बाँटे जा रह थे। 'बूट पालिश' बने मास्टर अमित को सर्वसम्मति से विशेष पुरस्कार के लिए चुना गया था। अमित को पुरस्कार देते राजकुमारजी ने उसकी पीठ थपथपा, स्नेहपूर्वक कहा था,

तुम्हें बहुत ऊपर उठना है, बेटे! पुरस्कार-वितरण के बाद राजकुमार जी को अचानक आवश्यक कार्य याद आ गया था। आयोजक और प्राचार्य चाय के लिए अनुरोध करते रह गए, पर क्षमायाचना-सहित वह वापस आ गए थे।

घर पहॅुंच, बिना कपड़े बदले जिलाधिकारी राजकुमार पलॅंग पर आँखें मूंद लेट गए । आज से पन्द्रह वर्ष पूर्व की संध्या उनके नयनों के समक्ष साकार हो उठी थी।

उस दिन नगर के बाहर वाले मैदान में मेला लगा था। कुछ प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने बाल-वर्ष के उपलक्ष्य में यह आयोजन किया था। चाट और गर्म मूंगफली, गुब्बारे, मसालेवाले चने की धूम थी। शहर के कोने-कोने से नन्हें.मुन्ने अपने माता-पिता का हाथ पकड़े कुछ शर्माते और कुछ मुस्काते चले आ रहे थे। बाल-दिवस पर आयोजित यह मेला नगरवासियों के लिए अनोखा आकर्षण था। बच्चों के लिए नगर-सेठ द्वारा एक फेंसी ड्रेस प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था। मैदान के मध्य में बने मंच पर भन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ फेंसी ड्रेस प्रतियोगिता में भाग लेने की बच्चों को पूरी स्वतन्त्रता दी गई थी।

कार्यक्रम शुरू होने की घोषणा कर दी गई थी। माइक पर सूचना दी जा रही थी,

जो बच्चे फेंसी ड्रेस प्रतियोगिता में भाग लेना चाहते है, वे मंच पर पहॅुंच जाएँ।।

सूचना सुनते ही भीड़ मैदान के मध्य भाग की ओर उमड़ पड़ी। नन्हें-मुन्ने बच्चों को विविध वेषभूषा में देखने का सभी को मोह था। विभिन्न परिधानों में सजे बच्चे फेंसी ड्रेस प्रतियोगिता में भाग लेने को दौड़ पड़े। कुछ बच्चे मंच पर जाने के पूर्व लज्जा और भय से माँ के आँचल में मॅुंह छिपाकर रो भी पड़े थे। बच्चों को गोद में उठा-उठा अभिभावक मंच पर पहॅुंचाने लगे। सजे हुए बच्चे मंच पर पंक्ति में बैठाए जा रहे थे, साथ ही निर्देश दिए जा रहे थे,

देखो ये तुम्हारा नम्बर तीन है- जब तीन नम्बर पुकारें, तुम वहाँ जाकर अपनी बात कहना, समझे? और हाँ देखो, तुम नम्बर चार पर आओगे................

मंच के नीचे बूट पालिश वाले लड़के के रूप में सजा एक लड़का तो छूटा ही जा रहा था-

जाओ बेटे, वहाँ ऊपर मंच पर जाओ। दो-चार सदय हाथों ने सहारा दे 'राजू' को मंच पर पहॅुंचा दिया था। आयोजक ने उसे अन्य बच्चों के साथ बिठा उसका भी नम्बर दे दिया ।

प्रतियोगिता आरम्भ हो गई। पहले नम्बर पर फौजी वर्दी पहने मास्टर राकेश थे। मंच के मध्य पहुंचते ही फौजी अदा में सबको सेल्यूट दे सबको मुग्ध कर दिया। तालियों के जवाब में हल्के-से मुस्कराकर वह अपनी जगह वापस आ बैठा।

शहर के नामी उद्योगपति की लाड़ली बिटिया रश्मि अपनी टोकरी में असम की चाय लाई थी। छोटी-सी रश्मि चाय की पत्ती तोड़नेवाली असमी लड़की के रूप में बहुत प्यारी लग रही थी, पर मंच पर खड़े होते ही डर कर वह रो पड़ी। आयोजकों ने टाँफी देकर चुप कराना चाहा, पर उसका रोना न रूका।


तीसरे नम्बर पर मास्टर जी बने अनूपकुमार आँख पर ऐनक, कन्धे पर दुशाला ओढे़ जैसे ही मंच पर आए, जोरदार आवाज में भाषण शुरू किया था-

बच्चों, शान्त रहो! आज बाल-दिवस पर तुम्हें एक देशप्रेम का गीत सिखाता हूँ- हम बच्चे भारत माता के............. करतल-ध्वनि के साथ मास्टरजी को उनके स्थान पर बैठा दिया गया था।

अब बारी थी उस भोले-भाले प्यारे-से बूट पालिश वाले बच्चे की। उसका नम्बर पुकारे जाने पर जब कुछ न समझ पाने की मुद्रा में वह अपने स्थान पर बैठा रह गया तो आयोजक महोदय ने स्वयं उसे मंच के मध्य में पहॅुंचाया था। हाथ में बूट पालिश का सामान और आँखों में आश्चर्य लिये राजू जैसे ही मंच पर खड़ा हुआ, तालियाँ बज उठी थीं-

वाह! क्या मेकअप है! लगता है कोयले से मॅुंह पर आँसू की लकीरें तक बनाई गई हैं। कमीज फाड़कर बूट पालिश जगह-जगह लगाकर स्वाभाविकता लाई गई है।। लोग उसके स्वाभाविक रूप एवं अभिनय पर वाह-वाह कर उठे थे।

हॅंसते हुए एक सम्मानित अतिथि ने पूछा था

बेटा! जूतों पर पालिश भी करना जानते हो या बस सामान उठा लाए हो?

अकड़कर नन्हे राजू ने जवाब दिया था,

करवा के देखिए, पूरे पचास पैसे लगेंगे। आपका जूता एकदम शीशे के जैसा चमकेगा। राजू के निर्भीक उत्तर पर जोर से तालियाँ बजाई गई थीं-

इसे कहते हैं हाजिरजवाबी! क्या मॅुंहतोड़ उत्तर दिया है! भई बड़ा जहीन बच्चा मालूम होता है। कहीं भय या संकोच का तो नामो-निशाँ नहीं था।

अन्त में सर्कस के जोकर की बारी थी। मंच पर जो कलाबाजियाँ खाईं कि डर लगा अन्तिम कलाबाजी के साथ कहीं वह मंच के नीचे ही न चला जाए।

प्रतियोगिता के बाद पुरस्कार-वितरण का कार्यक्रम था। सभी उत्सुकता से परिणाम की प्रतीक्षा कर रहे थे। सर्वसम्मति से बूट पालिश करनेवाले का रूप धरे मास्टर राजू को प्रथम पुरस्कार के लिए चुना गया था। मास्टर राकेश को द्वितीय तथा मास्टर बने अनूपकुमार को तृतीय पुरस्कार के लिए चुना गया था। प्रतियोगिता में भाग लेनेवाले शेष सभी बच्चों को सांत्वना-पुरस्कार देने की घोषणा की गई।

पुरस्कार-वितरण का कार्यक्रम प्रारम्भ किया जा चुका था। प्रथम पुरस्कार के लिए मास्टर राजू का नाम पुकारा जा चुका था। पर वह अपने स्थान पर बैठा मेले का तमाशा देख रहा था। एक कार्यकर्ता उसके पास आ पुचकारते हुए बोला था

आओ बेटा! देखो, जब सेठजी तुम्हें पुरस्कार दें तो तुम उन्हें प्रणाम करना, समझे?

नगर के प्रसिद्ध उद्योगपति एवं समाज-सुधारक सेठ रामलाल ने पुरस्कार थमाते राजू से पूछा था- ये बूट पालिश का सामान कहाँ से लिया, बेटे?

वो तो मम्मी ने पैसे खर्च किए हैं।

कहाँ हैं आपकी माँ? सेठजी अतिशय उदार हो उठे थे।

माँ क्या कभी फालतू रहती है? अपने काम पर गई है। राजू का स्वर गंभीर था।

सेठजी को लगा यह होनहार बच्चा जरूर किसी समाज-सेविका का 'लाल' है। आयोजक महोदय भी प्रभावित हो उठे थे; अचानक उसकी माँ में उनकी भी रूचि जागृत हो उठी थी- अच्छा तो ये बूटपालिश वाले लड़के का मेकअप तुम्हारी माँ ने किया था? उन्होंने ही यहाँ सजाकर भेजा था न तुम्हें?

एक अन्य व्यक्ति ने भी उत्सुकता दिखाई, यह बूट पालिश वाला बनने का विचार किसका था बेटे?

नन्हें राजू के मुख पर मानो बदली छा गई-

क्या करता! जब छोटा-सा था तभी कोयले की खदान में दबकर बापू भगवानजी के पास चले गए तो माँ उसी जगह मजदूरी करती है। माँ चाहती है मैं खूब पढ़ूँ, इसीलिए दिन में पढता हूँ, शाम को और छुट्टी वाले दिन बूटपालिश का काम करता हूँ। पढाई के लिए खूब सारे पैसे चाहिए न?


क्या...........? आयोजक महोदय दहाड़ उठे थे।

तू यहाँ कैसे आया? जानता नहीं यहाँ फेंसी-ड्रेस प्रतियोगिता हो रही है? आक्रोश बढ़ता जा रहा था।

यहाँ खूब सारी भीड़ देखकर सोचा शायद यहाँ कहीं बूटपालिश का काम मिल जाए। राजू ने सचाई से उत्तर दिया था।

उत्तर पूरा होने के पूर्व ही राजू के हाथ से पुरस्कार का पैकेट छीन आयोजक ने धक्का देकर राजू को मंच के नीचे उतार दिया था। राजू को उतारते हुए उनका बड़बड़ाना जारी था, धोखेबाज बेईमानी से पुरस्कार लिये जा रहा था। अच्छा हुआ ठीक वक्त पर पता चल गया। ऐसे छोकरों को तो सीधे पुलिस में देना चाहिए।

राजू रोता जा रहा था। वह अपने-आप मंच पर कहाँ गया था! उसे तो लोगों ने उठाकर वहाँ बिठा दिया था। उन्हीं लोगों ने तों उसे नम्बर दिया था।

सेठजी के मुख पर क्षोभ अंकित था, संसार कितना बदल गया है! अरे आज के बच्चे कल के नागरिक हैं। अगर ऐसी ही धोखाधड़ी करेंगे तो भारत का भविष्य क्या होगा? कलयुग आ गया है भाई! एक साँस छोड़ वह दुःखी मुद्रा में खड़े रह गए थे।

अपमानित राजू माँ से लिपटकर सिसक-सिसककर रो पड़ा था। क्या गलती थी उसकी? क्यों सबने उसे धिक्कारा था? सिर पर हाथ फेरती माँ ने दृढ़ शब्दों में कहा था-

आज का तेरा यह अपमान ही तुझे ऊपर उठाएगा, मेरे बच्चे! इस अपमान को हमेशा याद रखना होगा राजू! रोने से तेरा अपमान नहीं धुलेगा, बेटे! तुझे कुछ बनकर दिखाना होगा, मेरे लाल! तू मेरा राजकुमार है न बेटा? माँ अपने राजकुमार को प्यार से राजू ही तो पुकारती थी।

उस दिन के बाद से हर परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त कर, ट्यूशन लेकर अपनी पढ़ाई करने वाले राजकुमार की अलग पहचान बनती गई थी। परीक्षा-परिणामों के आधार पर पुरस्कार, स्वर्ण और रजत पुरस्कार प्राप्त करते समय भी न जाने क्यों राजकुमार के अन्तर् में कैद एक नन्हा, अपमानित 'राजू' हमेशा छअपटाता रहा, सहमा रहा। कितना चाहकर भी उस यातनापूर्ण कैद से वह उस नन्हें 'राजू' को मुक्ति नहीं दिला सके हैं। आज विद्यालय के बालक को बूटपालिश वाले लड़के के रूप में देखकर उनके अन्तर् का वह कैद राजू आज मानो फिर जी उठा था।

काश, आज माँ अपने 'राजू' को इस पद पर आसीन देख पातीं! पर माँ उन्हें जीवन का मंत्र देकर कब की अकेला छोड़ जा चुकी हैं। उनके राजू ने उनका सपना पूरा किया है, पर वह सपने को साकार होता कहाँ देख पाई!

चपरासी ने आकर कमरे की बत्ती जला दी। अपने प्रिय साहब को असमय सोया देख वह चकित था। इतने दिनों में चाहकर भी वह उनका कोई व्यक्तिगत काम करने की अनुमति नहीं पा सका है। यह साहब तो कोई 'देवता' हैं। अपना सारा काम खुद करते हैं। किसी को अनजाने में भी तो कष्ट नहीं पहॅुंचाते।

कमरे में प्रकाश होते ही पलॅंग से उठकर राजकुमार जी बाहर बालकनी में आ तारों-भरे आकाश में माँ का स्नेहिल मुख खोजने की व्यर्थ चेष्टा करने लगे।




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