रिश्ते

रात में फ़ोन से बड़ी ताई की मृत्यु की खबर पा, सुमन अपने को रोक नहीं सकी थी। सुबह की फ्लाइट की बुकिंग कराने बाद एक पल को भी नींद नहीं आ सकी। बचपन से बड़़ी होने तक की घटनाएँ तरतीब, बेतरतीबवार याद आती रहीं। सच तो यह था, भारत से जुड़े नाते में ताई ही एक सम्पर्क-सूत्र बच रही थीं, आज ये सूत्र भी टूट गया।


ताऊजी की मृत्यु के बाद मुकुल भइया की हर कोशिश के बावजूद ताई ने अपना घर नहीं छोड़ा। हारकर मुकुल भइया कनाडा बस गए। अम्मा-बाबूजी भी आशीष भइया के साथ नाइजीरिया जा चुके थे। घर के नाम पर तो सबके पास वही घर था, जहाँ ताई अकेली रह गई या छोड़ दी गई थीं। न जाने उनके अंतिम समय में भइया पहुँच पाए या नहीं, मृत्यु की खबर तो किसी पड़ोसी ने दी थी। अब तो पड़ोसी भी सुमन के लिए अजनबी थे। कभी वे सब कितने अपने हुआ करते थे!

घर के दरवाज़े पर स्त्री-पुरूषों के बीच से रास्ता बनाती सुमन ताई के पार्थिव शरीर के पास जा पहॅुंची। आँगन में तुलसी-चैरा के नीचे गोबर से लिपी धरती पर ताई चिरनिद्रा में सो रही थीं। चेहरे पर वही शांति, जिससे सुमन अच्छी तरह परिचित थी। सुमन को देख गोमती चाची आगे बढ़ आई।

”आ गई सुम्मी! आखरी बखत तुझें खूब याद करती रहीं जीजी।“

गोमती चाची के सीने पर सिर धर, सुमन रो पड़ी । गोमती चाची प्यार से उसकी पीठ सहलाती रह गई। जी भर रो चुकने के बाद सुमन ताई के सिरहाने बैठ गई। पंडित जी गीता का पाठ कर रहे थे।

गोमती चाची ने धीमे से बताया था, ”मुकुल बाहर की व्यवस्था में व्यस्त है, बहू और बच्चों का आना नहीं हो सका।“

अम्मा-बाबूजी के लिए ताई के शव को रोकने की सलाह पर मुकुल भइया ने ‘ना’ में सिर हिला दिया-

”गर्मी में इतनी देर बाँडी रखना पाँसिबिल नहीं है, पहले ही बहुत देर हो चुकी है। अगर ऐसा ही था तो माँरचरी में ही बाँडी रखनी थी।“

मुकुल भइया की बात सही होते भी सुमन को ‘बाँडी’ शब्द चुभ गया। कुछ देर पहले की सजीव ताई अब ‘बाँडी’ भर रह गई थीं। बचपन से ताई की गोद में खेलते बच्चे आज बड़े हो चुके हैं। ‘राम नाम सत्य’ के साथ ताई ने इस घर से विदा ले ली।

सुमन से नहाने-धोने का आग्रह कर, गोमती चाची अन्य व्यवस्था में जुट गई थीं। बचपन के परिचितों में बस गोमती चाची और गोबरधन काका ही तो शेष थे। बाकी पड़ोसी, अपने-अपने बच्चों के साथ कहीं और जा बसे थे। सात वर्षो में इतना परिवर्तन अप्रत्याशित होते हुए भी सत्य था।

सिर से नहाकर बाहर आई सुमन को घर का सन्नाटा काटने-सा लगा। मुहल्ले की अधिकांश स्त्रियाँ रस्म निभा वापस नहाने-धोने जा चुकीं थीं। रिश्तेदारों के नाम पर था ही कौन? उतनी-सी देर में गोमती चाची न जाने कब नहा-धो, केतली में चाय लिए आ पहॅुंची थीं। केतकी कमरा-आँगन धो, गोमती चाची के आदेश की प्रतीक्षा में खड़ी थी।

आँचल से आँसू पोंछ चाची ने एक कप में चाय उॅंडेल सुमन की ओर बढ़ाई थी-

”ले बेटी, इत्ती दूर से आई है, गला सूख रहा होगा। तेरी ताई होती तो..........“

सुमन हिलक कर रो पड़ी। हाथ में पकड़ा कप छलक गया। प्यार भरा हाथ पीठ पर धर, गोमती ने सुमन को सहारा-सा दिया। चाय का घूँट गले से नीचे उतारती सुमन ने आँसू पोंछ डाले। चारों ओर पसरे सन्नाटे ने सुमन को सहमा-सा दिया।

इस घर से सुमन का बचपन जुड़ा था। ताऊ-ताई, अम्मा-बाबूजी, मुकुल और आशीष भइया के बीच अकेली सुमन, सबकी दुलारी थी। हर तीज-त्योहार पर घर में कितनी रौनक हुआ करती। पड़ोस के किशन चाचा, गोबरधन काका, शांता मौसी सबके परिवार हवन में इकट्ठा होते। ताऊजी सब परिवारों के बुजुर्ग माने जाते। तब ये घर सारे मुहल्ले का कंेद्र हुआ करता। धनिया आँगन को लीप-पोत चमका देती। बच्चों को वो लम्बा हवन, ख़ासा उबाऊ लगता, पर ताऊजी के डर से सबको बैठना पड़ता। राखी पर सुमन की बन आती। राखी बाँधने के बदले रूपए देते दोनों भाई अड़ जाते-

”नहीं देंगे रूपया, ये तो पैसा ऐंठने का बहाना है............।“

आशीष भइया की उस बात पर ताऊजी नाराज़ हो जाते। वो डाँट पड़ती कि बिना हील-हवाला किए दोनों भाई चुपचाप पैसे थमा देते। बाद में भले ही उन पैसों को हथियाने के लिए सुमन की लाख मिन्नतें-लड़ाई करते। अपने राखी के रूपयों से सुमन को उन्हें पिक्चर तो दिखानी ही पड़ती थी।

तीज पर अम्मा और ताईजी का उत्साह देखते ही बनता। ताईजी को उस दिन बेटी की कमी खलती, पर सुमन का लाड़ कर वह अपने मन की साध पूरी कर लेतीं। गोटा लगी धानी चुन्नी के साथ सलवार सूट में सुमन की सलोनी काया खिल उठती। झूले की ऊॅंची पेंग पर कित्ता मजा आता। और, बस थोड़ा और ऊपर पहुँंच वह सारे आकाश को मुट्ठी में समेट लेना चाहती। तीज के दिन ही लड़कों को महसूस हो पाता कि लड़की होना कितना अच्छा होता है। गौतम ने तो हद ही कर डाली थी। बहन की साड़ी पहन सुमन को उत्ती ऊॅंची पेंग पर आकाश छुआने चला था। डर कर सुमन की चीख निकल गई। हाथ में पकड़ा झूला न जाने कैसे छूट गया और वह धम्म से नीचे आ गिरी। माथे से निकली खून की धार पूरी चुन्नी भिगो गई। सब दहशत में आ गए थे। हज़ार-हज़ार गालियाँ देती शांता मौसी ने गौतम पर ताबड़तोड़ मुक्कों की बौछार कर दी थी। ताई मुश्किल से रोक पाई थीं-

”क्यों मार रही हो शांता, बच्चे की जान ही ले डालेगी!“

”मर जाए तो जान छूटे! अब ये क्या बच्चा है, पूरे सोलह साल का हो गया............“

”इसीलिए उसे इस तरह धुन रही हो। बहुत हो गया, अब छोड़ो उसे।“

”नहीं मौसी, गलती मेरी है। सुमन इत्ता डर जाएगी, मैने नहीं सोचा था। मुझे माफ़ कर दो माँ।“ गौतम का स्वर गम्भीर था।

”बस .......बस, बहुत हो गया अब भाग यहाँ से।“ अम्मा ने गौतम को मीठी झिड़की दी थी।

सुमन का हाथ अनायास ही माथे के ऊपर की ओर पड़े दाग पर चला गया। अम्मा को हमेशा दुख सालता- ”लड़की के चाँद-से चेहरे पर दाग़ पड़ गया।“

सुबोध ने भी एक बार कहा था, प्लास्टिक सर्जरी से इस दाग़ को हटवा क्यों नहीं देतीं, पर सुमन की इस तरफ कोई रूचि नहीं थी।

घाट गए लोग वापस आ चुके थे। गोमती चाची व्यस्त हो उठी। शीला जीजी के अंतिम काम में कोई कमी-कसर न रह जाए। पंडित जी के हाथ-पाँव धुला, नीम की पत्तियाँ थमा दी गई। सबका मुँह मीठा कराने के लिए गोमती चाची ने न जाने कब मोतीचूर के लड्डू मॅंगा लिए थे। मुकुल भइया के चेहरे पर खीज-सी उभर आई थी।

”मुझे कुछ नहीं चाहिए। मैं नहाने जा रहा हूँं, उसके बाद सोऊॅंगा, मुझे डिस्टर्ब न किया जाए.......“

”पर बेटा, तेरह दिन तक तुम्हंे ही सब नेम-धरम निभाना होगा.........। मैं यहीं इसी जगह कम्बल बिछाए देती हूँं..........“

”मुझसे इस सीलन-भरे कमरे में नहीं सोया जाएगा। मैं ऊपर जा रहा हूँ। हो सके तो एक कप चाय भेज दीजिएगा।“

गोमती चाची की बात अनसुनी कर, सुमन से चाय की फ़र्माइश कर, मुकुल धड़धड़ा के सीढ़ियाँ चढ़ गया था। गोमती चाची विस्मित ताकती रह गई। शीला जीजी की आत्मा जब यहाँ आएगी, बेटे को न पा कितना तड़पेगी!

सुमन को याद आया ताऊजी के निधन के बाद पूरे तेरह दिन ताई धरती की शय्या बना, फलाहार पर रही थीं। दबी जुबान से अम्मा ने खाट पर सोने की बात कही तो ताई ने दृढ़ता से ‘ना’ में सिर हिला दिया था। आज ताई की आत्मा की शांति के लिए कौन विधि-विधान पूरे करेगा? सुमन को तो पहले ही पराया धन कह, हर काम से अलग किया जाता रहा है। अचानक किसी परिचित आवाज ने सुमन को चैंका दिया था-

”क्यों मौसी, पड़ गई न सोच में। मुकुल भइया की जगह मैं तैयार हूँ, बिछाओ कुश-शय्या। हमारे मुकुल भइया सात समंदर पार से दौड़े आए हैं, कितना थक गए होंगे ये तो सोचा होता मौसी!“

अपने आनंदी चेहरे के साथ सामने गौतम खड़ा था। कुरते-पाजामे के ऊपर शाल ओढ़े गौतम के चेहरे पर उम्र शायद अपना असर डालना भूल गई थी।

”ये भली कही, बेटे की जगह पड़ोसी को रस्म निभाने की बात पहली बार सुनी।“ गोमती का स्वर खिन्न था।

”जब ताई ने मुझे बेटे की जगह दी तो ये फ़र्ज भी मुझे ही निभाना है एमौसी। बोलो क्या करना है?“ गौतम अब गम्भीर था।

”पूरे तेरह दिन धरती की शय्या पर सोकर नियम से फलाहार पर रह, पूजा-पाठ करनी होगी। तू मांस-मछली भक्षी कर सकेगा?“

”मैं क्या कर सकॅूगा, उसकी चिन्ता छोड़ दो मौसी, तुम मुकुल भइया को देखो।“

”बड़ा पुण्य पाएगा गौतम। शीला जीजी की आत्मा को शांति मिले भगवान!“ अपने दोनों हाथ जोड़ सिर से लगा गोमती चाची ने अदृश्य को प्रणाम किया था। स्तब्भ सुमन ताकती रह गई।

जिस गौतम का इस घर में वैसा अपमान किया गया, वही आज ताई के पुत्र का कर्तव्य निभाने आगे बढ आया था। शरीर से कुर्ता उतारते गौतम की दृष्टि सुमन पर पड़ी थी, हाथ ठिठक-से गए। सुमन ने दृष्टि झुका ली थी।

”सुमन बिटिया, चल तू भी घड़ी भर आराम कर ले। तब तक इसके लिए मैं आसन बिछा दॅू, पंडित जी आते होंगे।“

निःशब्द सिर झुकाए सुमन कमरे से बाहर चली गई, पर पीठ पर गड़ी दो आँखें उसे अन्दर तक उद्वेलित कर गई। अम्मा-बाबूजी के कमरे में सब कुछ वैसा ही व्यवस्थित था। जिठानी-देवरानी में अच्छी पटती थी। अम्मा-बाबूजी के नाइजीरिया चले जाने के बाद भी ये कमरा उनके नाम पर सजा-सॅंवरा रहा। उसे किराए पर या किसी और प्रयोजन के लिए इस्तेमाल की बात ताई ने शायद कभी नहीं सोची।

अम्मा के पलंग पर लेटी सुमन को जोरों की रूलाई आ रही थी। अपने इस घर में कभी उसने ऐसा अकेलापन महसूस नहीं किया। दोनों भाई पढ़ाई के लिए बाहर चले गए तब भी अम्मा-ताई और मुहल्ले की चाची-मौसी के बीच वह कभी अकेली नहीं थी। अतीत का एक नाम याद करने में सुमन केा संकोच क्यों हो रहा था, गौतम ने क्या कभी उसे अकेली रहने दिया था? हमेशा छाया बना गौतम, सुमन का खालीपन भरता रहा। कभी तो उसकी मौजूदगी पर सुमन खीज जाती। अनचाहे ही वह उसका अंगरक्षक बन जाता। साथ की लड़कियाँ जब गौतम का नाम ले उसे छेड़ती तो सुमन को सचमुच नाराज़गी होती। सुमन की पसंद लायक गौतम में था ही क्या!

विधवा माँ का इकलौता बेटा, उस पर जमीन-जायदाद के नाम पर सिर पर दो कमरों का छोटा-सा मकान भर, उसकी पूँजी थी। पढ़ाई-लिखाई में सामान्य गौतम से किसी को ज्यादा अपेक्षाएँ नहीं थीं। कभी सुमन को लगता, अगर वह उसका पीछा छोड़ पढ़ाई में मन लगाता तो शायद परिणाम अच्छे रहते। सुमन के मॅंुह से निकली बात पूरी करना गौतम का परम कर्तव्य होता।

आशीष भइया की शादी में सुमन ने अपनी छोटी-छोटी ज़रूरतों के लिए न जाने कितनी बार गौतम को दौड़ाया था। उस दिन तो हद ही हो गई, पूरे काम निबटा गौतम खाने बैठा ही था कि सुमन को याद आया शाम को पार्टी में पहनने वाले सलवार-सूट के साथ की चुन्नी, दर्जी के यहाँ से पीको होकर नहीं आई है। खाना छोड़ गौतम को उठने का उपक्रम करते देख ताई ने सुमन को हल्के से झिड़का था-

”छिः बेटी, उसे खाना तो खा लेने दे। तेरी चुन्नी भागी नहीं जा रही।“

गौतम असमंजस में पड़ गया था। सुमन का मुँह तमतमा आया। लाड़-प्यार में पली सुमन को ताई की उतनी-सी बात भी कितनी बुरी लग गई थी!

”ठीक है, मैं खुद जा रही हूँ, तुम बैठकर पेट भर खाना खा लो।“

अपमान से गौतम का मॅंुह काला पड़ गया था। सामने परोसी खाने की थाली छोड़ बाहर चला गया। तब भी सुमन को अपने किए पर जरा-सा भी दुख नहीं हुआ था। ताई की उतनी-सी बात का गुस्सा सुमन ने कई दिनों तक ताई से बात न कर निकाला था। हाँ, इतना जरूर था कि उस शाम चुन्नी ओढ़ते उसकी आँखों के सामने गौतम का कातर मॅुंह एक बार जरूर कौंधा था।

सच तो यह था उस घर में गौतम को कभी महत्व नहीं दिया गया; वो सबके काम निबटाता रहे, उससे बस उतनी ही अपेक्षा रखी जाती। आशीष-मुकुल भइया की पैंट-शर्ट आइरन करने से लेकर उनकी काँलेज की फ़ीस जमा करने के लिए घंटों लाइन में खड़ा रहता। कुछ भी न देकर गौतम पर सबका अधिकार था। ये अधिकार खुद गौतम ने ही दिया था, लेकिन क्यों?

गौतम के मन में उस घर में रहने वालों के लिए कौन-सा मोह था? मुकुल भइया की नौकरी लगने की पार्टी में भी गौतम का पूरा ध्यान सुमन पर केंद्रित था। सुमन की प्लेट में कोई सब्जी खत्म हुई नहीं कि उस सब्जी के डोंगे के साथ गौतम हाज़िर हो जाता। सुमन झुझॅंला उठती थी-

”मेरी प्लेट में आँख गड़ाए रखने के अलावा और दूसरा काम नहीं है तुमको“

सुमन की सहेलियों की सम्मिलित हॅंसी पर गौतम संकुचित हो उठा। ऐसा पहली बार नहीं हुआ, सुमन मानो उसके जीवन का चरम लक्ष्य थी। उसके लिए कुछ भी कर पाने में गौतम अपने को धन्य मानता। सुमन के काँलेज, फ़ंक्शन के रिहर्सलों में रोज सुमन को रिहर्सल स्थान पर पहुँचाने और वापस लाने का दायित्व, गौतम सहर्ष उठाता। आशीष भइया के पास उन फ़िज़ूल कामों के लिए वक्त कहाँ होता था। सच तो ये था उस घर के लिए गौतम हमेशा एक ज़रूरी ज़रूरत-भर था। शांता मौसी के कामों को नकार, गौतम उस घर में ही अपना ज्यादा से ज्यादा समय बिताना चाहता।

एक दिन शांता मौसी ने ताऊजी से तनुहार की थी-

”इस पगले को अपनी शरण में ले लंे भाई जी, घर में तो इसके पाँव ही नहीं टिकते। आपकी दया से कहीं लग जाए तो चार पैसे का सहारा हो जाए..........“

”हाँ-हाँ देखता हूँ, जल्दी ही कोई काम देखॅूगा।“

इन्टरमीडिएट पास गौतम को ताऊजी ने आफिस में क्लर्की दिला, शांता मौसी का दिल जीत लिया। आफ़िस के बाद गौतम का पूरा समय उनके लिए समर्पित रहता। अचानक एक दिन सुमन गौतम पर बहुत सहृदय हो आई थी-

”तुम अपनी पढ़ाई पूरी क्यों नहीं करते गौतम? पढ़ने से तुम्हें आगे भी तरक्की मिल सकती है न?“

गौतम एकटक सुमन का मुँह ताकता रह गया था। उस दिन के बाद से गौतम ने घर में पढ़ाई शुरू कर दी थी। गौतम ने जब बी.ए. परीक्षा द्वितीय श्रेणी में पास की तो सुमन सचमुच खुश हुई थी। बाबूजी ने पीठ ठोंक शाबाशी दी थी। गौतम का उत्साह देखते ही बनता था। पूरे घर को मिठाई खिला अम्मा, ताई, ताऊ सबके पाँव छू, आशीर्वाद लिया था। सुमन को अलग से धन्यवाद देते गौतम का चेहरा लाल हो आया था।

एम.ए. के बाद गौतम ने एक काँलेज में लेक्चररशिप ले ली थी। घर में उसका आना-जाना पूर्ववत् था, पर अब गौतम के चेहरे पर आत्मविश्वास की झलक रहती। उससे ऐसे-वैसे काम कहने के लिए सबको संकोच होने लगा था। उसकी नौकरी का संतोष उसके पूरे घर में था। शांता मौसी तो ताऊजी के गुण गाते न थकतीं।

कुछ दिनों में दुबले-पतले गौतम के शरीर पर मांस चढ़ आया। गोरे चेहरे पर लाली आते ही गौतम, दूसरा ही व्यक्ति लगने लगा था। धीमे-धीमे सोच-समझ कर बातंे करता गौतम, सबको सहज ही आकर्षित करता। मुकुल भइया से गौतम की ज्यादा ही पटती। गौतम में आए परिवर्तन को लक्ष्य कर उन्होंने कहा भी था-

”क्या बात है यार, अब तो पहचान में ही नहीं आते?“

गौतम मुस्करा के चुप रह गया। सुमन की सहेलियाँ भी गौतम से बातें करने को उत्सुक रहतीं, पर वह सबसे मिलकर भी सबसे अलग ही बना रहता। हाँ, सुमन के साथ होते ही उसका चेहरा अजीब चमक से उज्ज्वल हो उठता। ऐसा नहीं कि सुमन गौतम के इस परिवर्तन से अछूती थी, पर गौतम को लेकर प्यार-व्यार की बात उसने कभी नही सोची। शुरू से उसे जिस रूप में देखा, उसमें दासत्व भाव का प्राबल्य होने की वजह से उसके साथ वैसी कोई कल्पना उसके मन में आनी भी असंभव थी।

पहले आशीष भइया, फिर मुकुल भइया की शादी के बाद घर में रौनक बढ़ गई। दो-दो बहुओं के घर में रहने की वजह से अम्मा-ताई को पास-पड़ोस में घूमने-बतियाने का वक्त ज्यादा मिलने लगा। दोनों भाभियों के साथ सुमन का वक्त आराम से कट रहा था।

पिछले कुछ दिनों से घर के सामने वाले घर में एक नया परिवार आ बसा था। धनी माँ-बाप का इकलौता बेटा अरूण, देखने में भी बेहद आकर्षक था। पहले ही दिन सुमन को अरूण भा गया। अरूण ने एम.ए. प्रीवियस में एडमीशन लिया था। सुमन का हिस्ट्री डिपार्टमेंट और अरूण का पाँलिटिकल साइंस डिपार्टमेंट पास-पास ही थे। अक्सर अरूण और सुमन साथ-साथ आने-जाने लगे थे।

साथ ही लड़कियों ने दोनों को लेकर जब छेड़ना शुरू किया तो सुमन का मन मीठी गुदगुदी से भर गया। अरूण को लेकर उसने सपने देखने शुरू कर दिए। अब भाई-भाभियों की जगह उसे एकान्त ज्यादा भाता। न जाने क्यों आशीष भइया को अरूण फूटी आँखों न सुहाता- ”ये लड़का पक्का घाघ है। माँ-बाप के पैसों से गुलछर्रे उड़ा रहा है।“

”वो कैसे?“ मुकुल भइया इन बातों के प्रति अक्सर उदासीन ही रहते।

”अरे यार-दोस्तों के साथ होटल में शराब पीना क्या अच्छे लड़कों का काम है?“

”अरे छोड़ो यार, आजकल सब चलता है। हम दोनों तो अम्मा की कड़ी देखरेख में पले, बुद्धू हैं। आज ज़माना कहाँ पहॅुच गया, हमें होश भी नहीं।“

सचमुच ताई की दृष्टि से कोई नहीं छूटता था। उनके मुकाबले अम्मा का ध्यान सिवाय रसोईघर के और कहीं नहीं जाता था। ताई ने किसी को शायद ही कभी डाँटा-फटकारा, पर उनकी दृष्टि के आगे कुछ भी छिपा पाना संभव नहीं होता। अम्मा की सिधाई का ताई ने कभी फ़ायदा नहीं उठाया, वह उन्हें सच्चे दिल से छोटी बहन का प्यार देती रहीं। अम्मा भी उनका खूब सम्मान करतीं-

”भगवान ने मुझे बड़ी बहन नहीं दी उसकी कमी जीजी ने पूरी की है।“

त्योहारों पर पूरे घर के लिए कपड़े बनवाने की जिम्मेवारी ताई पर रहती। घर के दास-दासी भी उनकी दया से अछूते नहीं रहते। देवरानी के बच्चों केा उन्होंने कभी पराया नहीं माना, उनको तो ले-देकर बस एक मुकुल भइया ही थे। बच्चों ने भी कभी अपना-पराया नहीं जाना। घर की एकता बनाए रखने में ताई का बहुत बड़ा योगदान था। अक्सर देवर के लिए वह ताऊजी से भी नाराज हो जातीं। बहुत कम बोलकर भी ताई अपनी बात सबसे कह जातीं। ताई ने अनजाने ही घर के पुरूषों को घरेलू बातों में दखलअंदाजी करने की जगह, अपने पर निर्भर बना लिया था। उनके संरक्षण में किसी को शायद ही कोई शिकायत रही हो।

पिछले कुछ दिनों से सुमन काँलेज से अक्सर देर में आने लगी थी। भोली-भाली अम्मा ने उसके देर से आने का भले ही नोटिस न लिया हो, पर ताई ने अचानक पूछ लिया था-

”क्या बात है सुम्मी, तेरी क्लासें क्या देर तक लगने लगी है?“

सुमन सकपका गई थी। हड़बड़ाहट में ठीक बहाना भी नहीं बना सकीं थी।

”वो........नहीं..........ताई......मैं रीना के साथ चली गई थी न!“

”अच्छा तो रीना के यहाँ देर हो जाती है। ऐसा कर, उसका टेलीफ़ोन नम्बर दे दे, कभी जरूरत पर तुझे बुलाना पड़ सकता है न?“

”नहीं ताई, रीना के यहाँ फ़ोन नहीं है।“

”देख सुम्मी, हमेशा याद रख, लड़की का चरित्र काँच की तरह होता है, अगर जरा-सी खरोंच भी पड़ जाए तो लाख जतन पर भी नहीं जाता। मेरी बात समझ रही है सुम्मी?“

”जी ताई!“ पाँव के नख से जमीन कुरेदती सुमन सहम गई थी।

ताई के निर्देश पर अब काँलेज से उसे घर ले जाने कभी कुकुल भइया आते तो कभी आशीष भइया। जिस दिन गौतम उसे काँलेज से घर ले जाने पहुँचा वह तमतमा आई थी-

”अच्छा तो तुम ताई के जासूस हो! घर का भेदी लंका ढाए, कहावत तुम जैसों के लिए ही बनी है।“

”सच मानो सुमन, मैंने किसी से कुछ नहीं कहा..............“

”नहीं कहा तो क्या ताई को सपना आया था? मैं तुम्हारी सारी चालाकी समझती हूँ।“

”काश तुम मेरे मन की बात समझ पातीं................“

”मुझे क्या पड़ी है तुम्हारे मन में झाँकने की? एक बात और सुन लो, अपनी औकात में रहो। मुझसे ऐसी बात कहने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई?“

निःशब्द गौतम उसके साथ चलता रहा। घर पहंुँचते ही सुमन फट पड़ी थी-

”अगर फिर कभी उस गौतम के बच्चे को मुझे लाने भेजा तो मैं घर नहीं आऊॅंगी। मुझसे गन्दी-गन्दी बातें करता है। मैं बच्ची नहीं हूँ, जो रोज मुझे कोई लाने-पहुँचाने जाए।“

”क्या हुआ? मुझे बता क्या कहा उस बदमाश ने? उसकी इतनी हिम्मत? टाँगे न तोड़ दीं तो मेरा नाम आशीष नहीं........“ भइया आवेश में आ गए थे।

”आशीष, तुम बाहर जाओ। एक बात सुन लो, गौतम की टाँगे तोड़ने की बात आज कही सो कह ली, आगे कभी ऐसी बात तुम्हारे मॅंुह से न निकले।“

ताई के उस दृढ़ स्वर का भइया प्रतिवाद न कर सके थे। पर सुमन नाराज हो उठी थी-

”आप बिना जाने उसका पक्ष ले रही हैं.............“

”अच्छा तो अब सुम्मी बिटिया हमंे सिखाएगी, हम किसके साथ कैसा बर्ताव करें!“ ताई की उस मुस्कान से सुमन खिसिया गई थी।

मीठी मार शायद उसी स्वर को कहते होंगे।

उस दिन के बाद से सुम्मी को काँलेज से लाने के लिए कोई नहीं गया, पर सुमन खुद ठीक समय पर वापस आने लगी थी।

मुकुल भइया को कनाडा में एक अच्छे जाँब का आँफर मिला था। घर में उल्लास और अवसाद का मिश्रित वातावरण था। पहली बार ताई का मुँह उदास दिखा। जाने के उत्साह में मुकुल भइया ने ताई की वो उदासी अनदेखी कर दी। उनका कहना था वहाँ जमते ही ताऊ-ताई को कनाडा बुला लंेगे।

मुकुल भइया-भाभी जाने की तैयारियों में जुट गए थे। मौन रहकर ताई उनकी जरूरतें पूरी करती रहीं। जाने के दिन मुकुल भइया जब ताई के पाँव छूने झुके तो ताई ने उन्हें आशीर्वाद दे, आँचल से आँखें पोंछ डाली थीं।

”घबराना नहीं अम्मा, मैं जल्दी तुम्हें ले जाऊॅंगा।“

”ना रे मुकुल, मैं अपना घर छोड़ कहीं नहीं जाने वाली। मैं इस घर में ही भली।“

”वाह अम्मा जी, जहाँ बच्चे रहें वहीं घर होता है।“ मुकुल की पत्नी नेहा ने मीठे स्वर में कहा

था।

”जहाँ रहो खुश रहो बहू। यहाँ ये बच्चे भी तो मेरे ही हैं। हो सके तो मुकुल को वापस ले आना।“ अपनी बात कह, ताई तेजी से मुड़ घर के अन्दर चली गई थीं। शायद अपने आँसू दिखाना उन्हें ठीक नहीं लगा था।

घरवालों के बीच सबसे समन्वय बनाए रखने वाली ताई न जाने क्यों नेहा भाभी से कभी ज्यादा नहीं जुड़ सकीं। अपने माता-पिता की इकलौती बेटी नेहा भाभी इस घर को कभी भी अपना घर नहीं समझ पाई। मुकुल भइया के कनाडा जाने के पीछे नेहा भाभी का बहुत बड़ा हाथ था, शायद इसीलिए ताई ने उन्हें मन से कभी माफ़ नहीं किया।

मुकुल भइया और नेहा भाभी के कनाडा चले जाने के बाद ताई ने अपने को कमरे में कैद कर लिया था। अपने अकुशल हाथों में घर की बागडोर पा, अम्मा डर गई थीं। ताई के हाथ जोड़ वह उन्हें जबरन कैद से बाहर लाई थीं-

”जीजी, तुम्हारे बिना ये घर-संसार हमसे नहीं चलने वाला है। अगर तुमने घर-परिवार नहीं सम्हाला तो हम अन्न-जल त्याग देंगे।“

हारकर ताई घर के कामकाज में फिर जुट गई थीं। इन कुछेक दिनों में सुमन बहुत आगे बढ़ गई थी। उस रात कमरे की खुली खिड़की से अरूण जब उसके कमरे में पहुँचा तो पाँव की ठोकर से कमरे में रखा पीतल का लैम्प जोरदार आवाज के साथ नीचे आ गिरा था। अरूण खिड़की से कूद बाहर भाग गया था। शोर की आवाज सुन, आशीष भइया, अम्मा, ताई सब उसके कमरे में आ पहुँचे थे। भागते अरूण की पीठ अॅंधेरे में भी स्पष्ट थी। आशीष भइया दहाड़े थे-

”कौन आया था इस कमरे में...........?“

सुमन थर-थर काँप रही थी।

”जल्दी बता वर्ना तेरी जान ले डालूँगा।“ आशीष भइया के उठे हाथ देख, सुमन की जान निकल गई थी। डरते-डरते अस्फुट शब्द मॅंुह से निकला था..... ”गौ......त.........म..........।“

”क्या उस साले की ये मजाल! जिस थाली में खाता है उसी में छेद करने चला है!“ आवेश में आशीष भइया सोते गौतम को उसके कमरे से खींच बाहर ले आए थे। ताबड़तोड़ थप्पड़-घूँसों की बौछार के बावजूद गौतम मौन बना रहा। शांता मौसी हाथ जोड़, विनती करती जा रही थीं-

”छोड़ दो बेटा! अभागा जनमते ही मर क्यों न गया। मैं तो समझी कमरे में सो रहा है।“

आखिर अम्मा के बीच-बचाव से आशीष भइया ने उसे छोड़ा था, पर वह फुफकार रहे थे-

”ख़बरदार जो इस घर में फिर कभी पाँव भी रखा। टाँगे तोड़ दूँगा।“

उस बीच ताई न जाने कहाँ चली गई थीं। अच्छा हुआ ताऊजी के साथ बाबूजी लखनऊ गए थे। पिछले कुछ दिनों से ताऊजी को सीढ़ियाँ चढ़ने में बहुत कष्ट होने लगा था। डाँक्टर ने लखनऊ मेडिकल काँलेज में जाँच कराने की सलाह दी थी। अगर वे लोग घर में होते तो शायद गौतम का जिंदा रहना मुश्किल होता।

दो दिन तक घर में मौत-सा सन्नाटा छाया रहा। बाबूजी और ताऊजी के आने से वातावरण और भी बोझिल हो उठा। ताऊजी को फेफड़े का कैंसर था। सब बातें छोड़ ताई पति की परिचर्या में जुट गई। अपनी व्यस्तता के बावजूद उन्होंने बाबूजी से जल्दी-से-जल्दी सुमन की शादी निबटाने की बात दृढ़ स्वर में कही थी।

सुमन के लिए लड़का खोजने में बाबूजी को ज्यादा प्रयास नहीं करना पड़ा था। वर्षाे पहले इंग्लैंड में जा बसे उनके मित्र को भारतीय पुत्रवधू चाहिए थी। सुबोध को पहली नजर में ही सुमन पसंद आ गई।

विदा के समय ताई ने गम्भीर स्वर में कहा था, ”मेरी एक बात गाँठ से बाँध ले सुम्मी, अपनी ग़लती छिपाने के लिए कभी किसी दूसरे को अपराधी मत बनाना। ऐसा करने से मन की शांति चली जाती है एबिटिया!“

स्तब्ध सुमन ताई की आँखों में निहारती, उनके सीने पर सिर धर, जोर से रो पड़ी थी। उसका सिर सहलाती ताई ने तसल्ली दी थी, ”जो ग़लती हो गई, उसे भूल जा सुम्मी! तेरी जगह मैं प्रायश्चित्त कर लूँगी। मुझ पर विश्वास है न?“

”हाँ ताई, अपने से ज्यादा मुझे तुम पर विश्वास है। मुझे माफ़ कर दो ताई!“

”तब ठीक है, शांत मन अपने घर जा। मन पर किसी तरह का बोझ मत ले जाना बिटिया! प्रभु तेरा कल्याण करें।“

लंदन में पति-गृह में सुमन को पूरा प्यार और सम्मान मिला। सुबोध खुले दिल का युवक था, उसे पा सुमन का जीवन खुशियों से भर गया। सब कुछ होते हुए भी सुमन के अन्तर में एक ऐसी गाँठ थी जिसे सुबोध के साथ शेयर कर पाना असंभव था। कभी रातों में सोई सुमन अचानक जागकर पसीने-पसीने हो जाती। लगता उस पर कोई वार कर रहा है, सब उसे चोर कहकर पुकार रहे हैं। सुबोध परेशान हो उठता, पर सुमन बेचैन हो जाती। निरपराध-निर्दोष गौतम का वह अपमान क्या क्षम्य था? काश आने के पहले वह उसके पाँवों में पड़ क्षमा माँग लेती तो उदार गौतम क्या उसे माफ़ न करता? अपनी छअपटाहट, बेचैनी जीती सुमन, एक बेटे की माँ बन गई। बेटे का नाम उसने सिद्धार्थ रखा था। सुबोध को वो नाम ज्यादा नहीं जॅंचा था-

”ये क्या दकियानूसी नाम रख रही हो? कोई नया नाम क्यों नहीं खोजतीं?“

”यह गौतम-सा निष्पाप, त्यागी, उदार बने इसीलिए ये पुराना नाम ही चलेगा।“

”तुम्हारी मर्जी।“ उसकी इच्छा देख सुबोध ने बहस नहीं की थी।

ताऊ की मृत्यु पर पहॅुंची सुमन की आँखें गौतम को खोजती रहीं। उस समय ताई से कुछ पूछ पाना, बहुत कठिन था।

आशीष भइया अपने साथ, अम्मा-बाबूजी को नाइजीरिया ले जा चुके थे। ताऊजी की मृत्यु पर अम्मा अकेली ही पहॅुंची थीं। शांता मौसी अम्मा के गले लग रो पड़ी थीं।

रोते-रोते उन्हीं ने बताया था किसी छात्रवृत्ति पर गौतम अमेरिका गया हुआ था। जिन्होंने उसे इस लायक बनाया, उनके अंतिम दर्शन भी वह नहीं कर सका। सुमन को शांता मौसी ने प्यार से सीने से चिपका पूछा था, ”सुख से तो है सुम्मी? तेरा बेटा तो एकदम राजकुमार-सा लगता है।“

शांता मौसी की बातों में कहीं कोई शिकवा या शिकायत नहीं थी। सुमन का मन धरती में गड़ जाने को हुआ था। उसकी वजह से देवी तुल्य शांता मौसी और गौतम को व्यर्थ ही कितना अपमान झेलना पड़ा था! किसी को इतनी आसानी से क्षमा कर देना क्या उतना आसान होता है! अनजाने ही झुककर सुमन ने शांता मौसी के पाँव छू लिए थे। शांता जैसे घबराकर पीछे हट गई थीं-

”अरे....रे......रे.......ये क्या कर रही है, कहीं बेटियाँ पाँव छूती हैं! काहे पाप चढ़ा रही है बिटिया!“ शांता मौसी संकुचित थीं।

”देवी-देवता के पाँव छूने से पाप नहीं चढ़ता मौसी!“ रूलाई रोकती सुमन कमरे से बाहर चली गई थी।

गोमती चाची ने आकर बत्ती जलाई थी।

”आ सुमन, जरा-सा मॅुंह जुठार ले। भूखे पेट सोएगी तो ताई की आत्मा को तकलीफ़ होगी। मुकुल तो सुनने वाला नहीं.............“

नीचे सीढ़ियाँ उतरती सुमन की दृृष्टि गौतम पर पड़ी थी। ध्यानस्थ तपस्वी सदृश धरती पर बिछे कम्बल पर ताई के कमरे में अकेला बैठा गौतम कोई पुस्तक पढ़ रहा था। सुमन का बहुत जी चाहा, गौतम के पास जा अपने अक्षम्य अपराध की क्षमा माँग ले, पर गौतम के पास जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाई।

”चाची, क्या गौतम ताई के पास आता रहता था?“

”अरे तुझे नहीं पता, गौतम तो जीजी का ख़ास बेटा था। उनका अपना बेटा तो सात समंदर पार जा, उन्हें भुला ही बैठा था।“

”शांता मौसी कहाँ हैं?“

”मुहल्ले की कुछ औरतें तीरथ-यात्रा पर गई हैं, वह भी उनके साथ गई है। जाना तो मुझे और जीजी को भी था, पर जीजी की तबियत पहले ही खराब हो गई। उनके बिना में कैसे जाती? सोचा था अगले बरस हम दोनों जाएँगे, पर भगवान को कुछ और ही मंजूर था।“

गोमती चाची ने गीली आँखें आँचल से पोंछ, सुमन के आगे पड़ोस के घर से आया भोजन परोस दिया था।

”मुझे भूख नहीं है चाची...........“

”अरे बिटिया, ऐसे में किसे भूख लगे है, पर रीति-रिवाज तो निभानी ही पड़े है, फिर ये पापी पेट क्या मानेगा?“

”चाची, गौतम ने कुछ खाया?“

”उसे तो तेरह दिन फलाहार पर रहना है। शांता बीबीजी ने बड़े पुण्य किए थे ऐसे बेटे को जन्म दिया। लाख कहने पर भी आज तक शादी नहीं की है, माँ के साथ पूरे मुहल्ले की सेवा करता है। भगवान उसे लम्बी उमर दें।“

गोबरधन काका की आवाज पर गोमती बाहर चली गई थीं। सुमन सोच में पड़ गई थी। गौतम, ताई का इतना अभिन्न बन चुका है, इसकी खबर कभी ताई ने नहीं दी। सुमन के नाम उनके ख़त पहुँचते थे, पर गौतम का उनमें कभी कहीं ज़िक्र तक नहीं रहता। ये सच है, सुमन का वो झूठा आरोप ताई से छिपा नहीं था, शायद इसीलिए जानकर उन्होंने गौतम के बारे में उसे कभी नहीं लिखा। कौन विश्वास करेगा, ताई का अपना कोख जाया बेटा ऊपर कमरे में आराम से सो रहा है और ये गौतम, ताई की आत्मा की शांति के लिए पूरे विधि-विधान अपने सिर ले, उन्हीं के सीलन-भरे कमरे में अकेला बैठा, साधना कर रहा है। क्या रिश्ता था गौतम का ताई से?

दूसरे दिन मुकुल भइया की तबियत खराब हो गई थी। पूरी-भाजी हजम कर पाना उन्हें संभव नहीं हो सका था। अपने घर से खिचड़ी बना, गोमती चाची ने मुकुल भइया को खिलाई थी बहुत रोकने पर भी वह पूछ बैठी थीं, ”एक बात बता सुम्मी, जीजी की आत्मा जब अपने कमरे में आएगी, वहाँ बेटे को न पा, क्या उनकी आत्मा शांति पा सकेगी?“

”आप चिन्ता न करें चाची! शरीर त्यागने के बाद आत्मा सुख-दुख से परे हो जाती है।“ सुमन ने भोली चाची को तसल्ली दी थी।

पाँचवें दिन मुकुल भइया चले गए थे, कनाडा से भाभी का फ़ोन आया था, छोटे बेटे की तबियत खराब थी, वह हाँस्पिटेलाइज्ड था। वैसे भी मुकुल ने कहा था, ”अम्मा का काम आर्यसमाजी विधि से करने में क्या हर्ज है?“

उस समय गोमती चाची ने उन्हें बताया था, ”जीजी नेम-धरम वाली स्त्री थीं, उनकी आत्मा की शांति के लिए तेरह दिन तो नियम से रहना ही होगा।“

मुकुल भइया की समस्या का समाधान गौतम ने आगे बढ़ कर दिया था। जन्म से न सही, कर्म से तो वह ताई का बेटा जरूर था।

अम्मा-बाबूजी के आ जाने के बाद घर में जीवन के लक्षण दिखने लगे थें। सुमन भी उनसे पूरे एक वर्ष बाद मिली थी। ताज्जुब यही था कि गौतम के प्रति अम्मा-बाबूजी भी बेहद सहृदय थे। अम्मा ने अब गौतम के साथ घर को भी सम्हाल लिया था। गोमती चाची उनकी सहायता को थीं ही।

दिन-भर काम के बाद अम्मा थोड़ा सो गई थीं। बाबूजी बाहर वाले कमरे में आराम कर रहे थे। ष्धीमे से अम्मा को सोता छोड़, सुमन ताई के कमरे में पहॅुंची थी। उसके पाँवों की आहट पर गौतम ने दृष्टि उठाई थी। उसकी आँखें जैसे चमक-सी उठी थीं.......................

”तुम ...........आप?“

”उस दिन तुमने सबको सच क्यों नहीं बताया थाए गौतम? इसलिए इतना अपमान सहा था न कि मैं पूरी जिंदगी तुम्हारी अपराधिनी बनी रहूँ?“ सुमन का चेहरा लाल हो उठा था।

एक पल उसकी ओर ताक, विस्मित गौतम हल्के से हॅंसा था, ”इतने दुख के समय, ऐसी बातें करना ठीक हैए सुमन?“

”मैं कुछ नहीं जानती, तुम्हें सच स्वीकार करना पड़ेगा। जानते हो तुम्हारी उस महानता के नाटक की वजह से मैं पश्चात्ताप की आग में जलती रही हूँ। अगर उस दिन सच कह दिया होता तो अम्मा की मार खाकर सब खत्म हो जाता। कोई अपराध-बोध तो न सालता।“

”तुम ऐसा ही सोचती हो सुमन?“

”हाँ, मैं ऐसा ही सोचती हॅू। उस दिन चुपचाप अपमान सहने के बाद, तुमने ताई को मेरे विरूद्ध सब कुछ बताकर उनकी सहानुभूति और प्यार पाया है। क्या सच ये नहीं?“

”ताई को तो तुम बचपन से जानती हो, सच-झूठ के बारे क्या कभी उन्हें बताना पड़ा था एसुमन?“ सवाल पूछती गौतम की आँखों ने सुमन को तिलमिला दिया था।

”फिर उस दिन सच क्यों नहीं कह दिया.................?“

”क्योंकि वही तो सच था।“

”क्या सच था?“

”यही कि मैं रोज तुम्हारे पास पहॅुंचता था...........“

”झूठ, एकदम झूठ.......... मेरे कमरे में तुम कभी नहीं आए, कभी नहीं..............“

”क्या किसी के पास पहॅुंचने के लिए यह ज़रूरी होता है कि वह उसके पास सशरीर उपस्थित हो ...“

”मतलब?“

”हाँ सुमन, आज ये बात स्वीकार करने में मुझे जरा-सी भी हिचक नहीं, तब मेरा मन हर पल, हर वक्त सिर्फ़ तुम्हारे पास रहता था। उस रात भी मैं स्वप्न में तुम्हारे साथ ही था, इसलिए उस सत्य को स्वीकार कर, मैंने तुम पर कोई एकहसान नहीं किया सुमन, सच वही था।“

”और अब ......... अब तुम्हारा मन कहाँ रहता है गौतम?“

”अब मैं उन सब बातों से ऊपर हूँ। ताई से इतना प्यार मिला कि किसी से कोई शिकायत शेष नहीं रही।“

”तुमने अपना सच तो बता दिया, पर मेरा सच नहीं जानते। ये सच नहीं कि सिर्फ़ डर के कारण ही मैं असलियत नहीं बता सकी, उस वक्त तुम्हें व्यर्थ दंडित होते देखने में मुझे जरा भी तकलीफ़ नहीं पहॅुंची थी बल्कि लगा था तुम उसी के लायक हो। अपना दोष भी अपराध नहीं लगा था, पर तुमसे दूर जाकर मेरा मन बार-बार धिक्कारता रहा। तुम्हें कलंकित कर अपना कलंक धोना मेरा अक्षम्य अपराध है, फिर भी क्या मुझ जैसी स्वार्थी लड़की को माफ़ कर सकोगे गौतम?“

”माफ़ी तो दोषी को माँगनी चाहिए। तुमने मुझे चाहा ही कब था। तुम्हें लेकर सपने बुनना तो मेरी ग़लती थी।“

”ओह गौतम, तुम इंसान नहीं देवता हो।“

”अब तुम जरूर ग़लती कर रही हो सुम्मी! एक कमजोर इंसान को देवत्व देकर, देवता का अपमान मत करो।“

”ताई क्या इसीलिए तुम्हें इतना प्यार करती थींए गौतम?“

”पता नहीं। पर तुम्हारे जाने के बाद उन्होंने बुलाकर मुझे कहा कुछ नहीं, बस सिर पर आशीर्वाद का हाथ धर, मौन रह गई थीं।“

”तुम उनकी बात समझ गए थे गौतम?“

”हाँ। इसीलिए मैंने उन्हें अपने मन की पूरी कहानी सुना दी थी सुमन।“

”ताई की गोद में खेलकर भी हम उन्हें उतना नहीं जान सके जितना तुम।“

”क्या रिश्ते सिर्फ खून के ही होते हैं सुमन?“

”नहीं गौतम, आज इस सत्य को मुझसे ज्यादा कौन समझेगा।“

गौतम के सामने दोनों हाथ जोड़, अपनी नम पलकों के साथ, सुमन कमरे से बाहर चली गई।

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