वर्जिन मीरा




डिनर के बाद प्लेजर ड्राइव पर जाते प्रतीक ने पूछा था,यहाँ कोई बार देखा है, आंटी?बार? भला बार से मेरा क्या नाता? क्या करूँगी मैं वहाँ जाकर?
वाह! यू एस ए घूम रही हैं और बार में नही गईं। चलिए आज वहाँ 'कोक' पीकर आते हैं। मुड़कर पीछे बैठे सुनील से प्रतीक ने पूछा ... एनी आँब्जेक्शन?
मुझे क्यों होने लगा ए पर पर्स नहीं लाया हूँ।
ओके! आज आंटी के लिए मेरा ही पर्स सही। प्रतीक ने कार दूसरी दिशा में मोड़ दी थी।
पर मेरे कपड़े ...........मैं तो घरवाली साड़ी पहने हूँ। वहाँ इतने लोग होंगे, उनके बीच कैसी लगूंगी? उन साधारण कपड़ों में मेरा संकोच स्वाभाविक ही था।
यही तो यहाँ अच्छाई है आंटी! कोई किसी का नोटिस ही नहीं लेता। सब अपने में मस्त रहते हैं। सुनील ने ठीक ही कहा था।
चैराहे के एक कोने पर जगमगाता रेस्तराँ कार में दूर से ही दीख गया था। सामने खुले बरामदे में ढेर सारे युवक-युवतियाँ बैठे थे। तीव्र विद्युत्-प्रकाश में लड़कियों के रंगीन परिधान, आभूषण झिलमिला रहे थे। गर्मियों में दिन के समय उन्हें बस शार्ट्स और बनियान में ही देखती थी। इस समय वे पूर्ण रूप से सजी हुई थीं। बार में प्रवेश करते प्रतीक ने परिहास किया,
आंटी, आप अठारह वर्ष के ऊपर है न-वर्ना यह सामने खड़ा बाउंसर बाहर कर देगा। यहाँ के बार में अठारह वर्ष से कम आयु वाले नहीं आ सकते, इसीलिए हम अपना आइडेंटिटी-कार्ड अपने साथ रखते हैं। देवाशीष तू अपना कार्ड लाया है न?
मेरी फिक्र मत कर! इतना स्मार्टली निकल जाऊॅंगा कि तू देखता रह जाएगा। टेक केयर आँफ आंटी। देवाशीष अपने भुलक्कड़ स्वभाव के लिए मित्रों के मध्य प्रसिद्ध था।
बालों को सॅंवारता देवाशीष सबसे आगे निकल गया था। मेरी 'बार' की कल्पना को झुठलाताएवह बार भारत के किसी रेस्तराँ जैसा लगा था- वही उत्फुल्ल वातावरण, वही रंगीन जलता-बुझता प्रकाश अपनी आभा बिखेर रहा था। काँलेज होस्टल निकट होने के कारण अधिकांश भीड़ युवा विद्यार्थियों की थी। अन्दर किसी उत्सव का-सा दृश्य था। साथ बैठे युवक-युवतियाँ नितांत स्वाभाविक थे। बीच-बीच में एक-दूसरे के प्रति स्नेह-प्रदर्शन हेतु चुम्बन लेना, कन्धे या कमर गुदगुदाना अब बहुत सामान्य-सा लगने लगा था।
हाँल के मध्य हमने जो जगह अपने बैठने को चुनी, वहाँ से पूरे हाँल का दृश्य स्पष्ट दिखाई देता था। प्रतीक और सुनील पेप्सी लेने काउंटर पर चले गए थे। यह शीतल पेय यहाँ कोक की प्रतिस्पद्र्धा में तेजी से उभर आया है। दाहिनी ओर दृष्टि जाते ही निगाह उस अकेली लड़की पर ठहर गई । खिड़की के पासवाली टेबुल पर गिलास और बोतल के साथ सबसे उदासीन एवह शांत बाहर ताक रही थी। प्रतीक के आते ही मेरे मॅुह से निकल गया था,
इतनी भीड़ में यहाँ उसे यों अकेली देख बड़ा ताज्जुब हो रहा है।
दृष्टि मुड़ते ही प्रतीक ने कहा था, ओह, वह तो वर्जीनिया है। कभी न लौटने वाले का इन्तजार कर रही है बेचारी।
क्यों, क्या उसकी मृत्यु हो गई और इसे पता नहीं?
अरे नहीं आंटी, आप उस ऋषि-पत्नी शापग्रस्त अहल्या की कहानी जानती हैं? हमारे एक भारतीय भाई ने इसे अहल्या बना छोड़ दिया है। मिलना चाहेंगी?
उसके बारे में कुछ बताओगे तभी तो
अपने में बन्द प्रस्तर-प्रतिमा समझ लीजिए। लाख कोशिशों के बावजूद कोई उसे पिघला नहीं सका है। आइए न
प्रतीक के साथ जबरन खिंची-सी चली गई थी। टेबुल के पास पहॅंुच प्रतीक ने कहा था, हाय वर्जीनिया! मीट माय आंटी फ्राँम इंडिया।
'इंडिया' शब्द ने मानो उसे सचेत कर दिया था। बड़ी-बड़ी उदास पलकें मुझ पर निबद्ध कर झुका ली थीं। बैठने का निमन्त्रण मिले बिना ही सामने की कुर्सी बाहर खींच, प्रतीक ने मुझे बैठने का संकेत किया था। वर्जीनिया के मौन को प्रतीक की बातें मुखरित कर रही थीं।
जानती हो, लिखना आंटी की हाँबी है। अभी थोड़ी देर पहले दस स्टूडेंट्स का इंटरव्यू खत्म किया है। आंटी, आप वर्जीनिया का इंटरव्यू ले लीजिए। तुम अपना इंटरव्यू कब दोगी, वर्जीनिया?
नाइस मीटिंग यू, मुझे जाना है। अपना आधे से अधिक पेय और हमें छोड़ पर्स उठा वर्जीनिया चली गई थी।
प्रतीक मेरे समक्ष बहुत लज्जित हो उठा था,
आंटी, यही तो उसकी ट्रेजिडी है। बहुत सेंटीमेंटल है वर्जीनिया। जब से रवि गया है, अपने को एकदम अकेली कर लिया है। कभी हर डांस-पार्टी की जान हुआ करती थी वर्जीनिया। शायद कोई भारतीय लड़की भी अपना अफेयर इतनी सीरियसली नहीं लेगी!
घर लौटते समय भी प्रतीक वर्जीनिया की ओर से सफाई दिये जा रहा था। देवाशीष झॅंूझला उठा था,
अरे बस भी कर यार! तूने तो हद ही कर दी। बिना बात आंटी को बोर कर रहा है। हाँ, आंटी, आपने डिफरेंस देखा- यहाँ बार में लोग एंजाँय करने आते हैं, डंªक होने नहीं। कितना संयत वातावरण था न! हमारे यहाँ की मधुशालाओं-सा हो-हल्ला कहीं नहीं मिलता।
हूँ। कहकर मैं मौन रह गई थी। कल्पना में वर्जीनिया का उदास मुख उभर रहा था।
अपार्टमेंट में पहॅुंच प्रतीक से प्रश्न किया था,
कौन था रवि? कहाँ चला गया है?
आप अब भी उसी बारे में सोच रही हैं न, आंटी?
हाँ, कुछ उत्सुकता तो हो ही गई, तूने उसे 'अहल्या' जो कहा था!
दुःख तो यही है उसे 'अहल्या' का रूप देनेवाला रवि कोई महर्षि या महात्मा नहीं, एक बुजदिल, कायर बल्कि मेरी दृष्टि में निहायत गिरा हुआ इन्सान था। एक मामूली देसी ब्रांड दंत दृमंजन के साथ रामायण और गीता की प्रतियों के साथ यहाँ आया था। पिता भारत में किसी मन्दिर के पुरोहित थे। उन्हीं के एक यजमान की कृपा से यहाँ आने का खर्चा तो जुट गया था, पर यहाँ की पढ़ाई की भारी फीस और अन्य खर्चों के लिए उसके साधन अपर्याप्त थे। होस्टेल के कुछ लड़कों के साथ रवि ने कारें धोने का काम शुरू कर दिया था। काँलेज से लौटने के बाद सड़क के किनारे टैªफिक के पास खड़े होकर लड़के बारी-बारी से 'कार-वाँश' की आवाजें लगाते थे। सिर्फ तीन डाँलर में वे लड़के कार धोकर चमका देते थे।।
उस दिन ट्रैफ़िक- लाइट के पास वर्जीनिया की गाड़ी जैसे ही रूकी, रवि ने पास जाकर निहायत सादगी से कहा था,
कार वाँश करायेंगी, मिस? बस तीन डाँलर में हमारा भला हो जाएगा। उसके कुरते-पाजामें के परिधान ने वर्जीनिया को प्रभावित किया था। धूप की गर्मी से रवि का गौरवर्ण ताम्रवर्णी हो गया था।
कहाँ ले जानी होगी गाड़ी? कुछ कौतुक से पूछा था वर्जीनिया ने।
बस, उस सामनेवाली बिल्डिंग के पीछे! अपनी उपलब्धि पर रवि खिल उठा था।
जंप इन! फिक लाइट हरी होते ही रवि कार में बैठ चुका था।
वर्जीनिया को मेपल की शीतल छाया में बिठा लड़के उसकी कार धोने में जुट गए थे। होस्टेल के पीछे वाँलीबाल ग्राउंड के निकट उन्होंने कार-वाँश के लिए स्थान बना लिया था। वर्जीनिया उन परिश्रमी लड़कों को साश्चर्य देख रही थी। रवि उन सबसे अलग उसे मुग्ध कर रहा था। वर्जीनिया ने तीन की जगह पाँच डाँलर्स देने चाहे तो उन्होंने दृढता से अस्वीकार कर दिया था,
हमारा पारिश्रमिक बस तीन डाँलर्स है। थैंक्स मिस।
चलते-चलते वर्जीनिया ने रवि से पूछा था,या करते हो यहाँ?
फिलाँसफी में पी एच डी के लिए आया हूँ।
ओह, तो तुम फिलाँसफर हो! भारतीय धर्म और दर्शन को नजदीक से जानना चाहती हूँ। मदद कर सकोगे?
आप......... क्या सचमुच भारतीय धर्म-दर्शन जानना चाहती हैं? रवि विश्वास नहीं कर पा रहा था।
क्यों, इसमें आश्चर्य की क्या बात है? इंग्लिश लिटरेचर में पोस्ट ग्रेजुएशन कर रही हूँ। टैगोर और अरविन्द मेरे फेवरिट हैं।
पर आपके लिए मेरे पास समय कब होगा? देख रही हैं न, क्लासेज के बाद यहाँ कार-वाँश करके अपना खर्चा चलाता हूँ। रवि मानो लज्जित-सा हो उठा था।
अगर मैं तुमसे पढ़ूँगी तो तुम्हारा पारिश्रमिक भी तो मुझे देना होगा न! कार-वाँश के समय में मुझे पढाना होगा। तुम्हारे खर्चे पूरे करना मेरी जिम्मेदारी, ठीक है न? वर्जीनिया कुछ शैतानी से मुस्कराई थी।
अपने धर्म-दर्शन का ज्ञान देने के लिए आपसे पारिश्रमिक लूं?
रवि का असमंजस देख वर्जीनिया हॅंस पड़ी थी, देखो रवि, हम अमेरिकन डीलिंग्स में बहुत फ़्रैंक होते हैं। तुम मेरे लिए अपना समय दोगे, उसका मूल्य चुकाना मेरा फर्ज है। प्लीज, से यस रवि! वर्जीनिया का अनुरोध ऐसा था कि रवि को 'हाँ' करनी ही पड़ी थी।
नगर के प्रसिद्ध उद्योगपति की दुलारी बेटी थी वर्जीनिया। सौन्दर्य और बुद्धि का अद्भुत संगम था उसमें। अपने हॅंसमुख स्वभाव के कारण वह हर महफिल की जान हुआ करती थी। न जाने कितने भ्रमर. सदृश युवा उसके आसपास घूमते थे, पर उसे तो शायद रवि की ही प्रतीक्षा थी। रवि ने मानो अपना पैतृक व्यवसाय आधुनिक परिवेश में ढाल लिया था। मन्दिर ले जाकर वर्जीनिया से कहा था,
जानता हूँ ये पत्थर की मूर्तियाँ तुम्हें निर्जीव लगेंगी, पर अगर सच्चे मन, पूरे विश्वास से इनकी ओर देखो तो ये तुमसे बोलेंगी। देखो, वहाँ भगवान राम हम दोनों को देख मुस्करा रहे हैं। सीता माँ तुम्हें आशीष दे रही हैं। रवि ने श्रद्धापूर्वक हाथ जोड़कर नयन बन्द कर लिये थे।
सच रवि? वर्जीनिया रवि की विश्वासपूर्ण वाणी से मानो बॅंधकर रह गई थी।
रवि रामायण की चैपाइयों को अपने मधुर स्वर में गाकर उनका अर्थ बताता था और मन्त्रमुग्ध वर्जीनिया की कल्पना में चित्र साकार हो उठते थे। वह चकित-सी रवि का मुख ताकती रह जाती थी।
राम ने सीता को प्रथम दृष्टि में अपनी पत्नी स्वीकार कर लिया था और उनके अतिरिक्त कभी किसी और स्त्री के विषय में नहीं सोचा। रवि ने बताया था।
अमरीका में जन्मी-पली वर्जीनिया को रवि की कहानी बहुत मनोमुग्धकारी लगती थी।
क्या भारत के सब पुरूष ऐसे ही होते हैं? तुम भी रवि ? वर्जीनिया का कौतूहल बढ़ता जा रहा था।
मैं भी तो विशुद्ध भारतीय हूँ। उनसे अलग कैसे हो सकता हूँ? पर पुरूष क्या, वहाँ की स्त्रियाँ तो अपने पुरूष के लिए हॅंसते-हॅंसते प्राण भी त्याग देती हैं। सीता ने पति के साथ जंगल में चौदह वर्ष स्वेच्छा से रहना स्वीकार किया था। राजस्थान में पति की मृत्यु पर स्त्रियाँ जौहर किया करती थीं। रवि ने वर्जीनिया को न जाने कितनी पतिव्रता, सती नारियों की कहानियाँ सुना डाली थीं।
वर्जीनिया ने रवि के साथ नियमित रूप से मन्दिर जाना शुरू कर दिया था। भारतीय धर्म और दर्शन पर न जाने कितनी पुस्तकें पढ़ डाली थीं। वर्जीनिया ने जब शाकाहारी भोजन शुरू किया तो रवि भी विस्मित हो उठा था।
भला तुम यह भोजन साध सकोगी?
क्यों, क्या कन्दमूल खाकर सीता चौदह वर्ष वन में नहीं रही थीं? उसके उत्तर ने रवि को मौन कर दिया था। अब वर्जीनिया ने हिन्दी भी पढ़नी शुरू कर दी थी। मन्दिर में तन्मय भजन गाती वर्जीनिया से रवि ने कहा था,
विश्वास तो नहीं, पर न जाने क्यों लगता है तुममें मीरा की आत्मा है।
क्या यह हो सकता है, रवि? अपने मीरा के रूप की कल्पना ने वर्जीनिया को उत्साहित कर दिया था।
क्यों नहीं, हम भारतीय तो पुनर्जन्म में पूर्ण विश्वास रखते हैं। तुम्हीं सोचो, भारत से हजारों मील दूर भला तुम्हारे मन में भारतीय धर्म-दर्शन जानने की चाह क्यों उठी? रवि ने वर्जीनिया को उलझन में डाल दिया था।
तब तुम मेरे कृष्ण हो, रवि! नहीं तो हम यहाँ क्यों मिलते?
पर मीरा को तो कृष्ण सहज प्राप्य नहीं थे इतनी चाह है मुझे पाने की?
तुम नहीं जानते?
ऐसा क्या देखा मुझमें तुमने?
अपना भगवान, अपनी साधना, अपनी मंजिल।
अगर मुझे कुछ हो जाए तो?
तो सती हो जाऊॅंगी। वर्जीनिया गम्भीर हो उठी थी।
छिः! क्या पागलपन है रवि हॅंस दिया था।
नहीं-नहीं, सच कहो रवि, मुझे भारत ले चलोगे न
वहाँ रह सकोगी, वर्जीनिया? अभावपूर्ण देश है हमारा। रवि ने सीधा प्रश्न किया था।
जिस धरती पर राम, कृष्ण, गौतम, मीरा, अरविन्द अवतरित हुए, उसे अभावपूर्ण बताते हो, रवि? काश, मैं उस धरती पर जन्म लेती! अरमान-भरी उसाँस छोड़ी थी वर्जीनिया ने।
तो ठीक है, हम जल्दी ही भारत चलेंगे, वर्जीनिया! वहाँ गंगा-किनारे हमारा छोटा-सा घर देख मुग्ध रह जाओगी।
भारतीय धर्म-संस्कृति के विषय में बात करते रवि से वर्जीनिया ने पूछा था,
भारतीय धर्म-जाति को इतनी मान्यता देते हैं। भला तुम्हारे पिता मुझे स्वीकार कर सकेंगे, रवि?
क्यों नहीं, पिताजी विशुद्ध गंगाजल छिड़ककर तुम्हें पवित्र कर लेंगे।
क्या गंगाजल छिड़कने से ही मैं पवित्र हो सकूंगी? तुम मुझे पवित्र नहीं मानते, रवि? पानी भला क्या जादू कर सकता है? वर्जीनिया कुछ क्षुब्ध हो उठी थी।
यही तो तुम नहीं जानतीं। गंगाजल भारतीयों के लिए अमृत है। अन्तिम समय में इसकी एक बूंद मोक्ष प्रदान करती है।
रवि ने विस्तार से भगीरथ द्वारा सगर-पुत्रों के तारण की कथा सुनाई थी। वर्जीनिया मानो दिन-प्रतिदिन भारतीय धर्म के चमत्कारिक रूप द्वारा विमोहित होती जा रही थी। पता नहीं रवि के विश्वासपूर्ण कथन में सम्मोहन अधिक होता था या धर्म का अद्भुत आकर्षण था जो वर्जीनिया को अपने मोहपाश में बाँधता जा रहा था।


रवि की पी एच डी स्वीकृत हो गई थी। वर्जीनिया ने अपने घर विभाग के प्राध्यापकों और साथियों को आमन्त्रित किया था। साड़ी-ब्लाउज के भारतीय परिधान में सजी वर्जीनिया ने विशुद्ध शाकाहारी भोजन परोसा था। पिछले कई दिनों से वर्जीनिया एक भारतीय महिला के साथ भोजन बनाना सीख रही थी। उस दिन रवि को अचानक अपना पाक-कौशल दिखा चमत्कृत कर दिया था वर्जीनिया ने।
अब तो भारतीय बहू बनने का अन्तिम प्रमाणपत्र भी तुमने जुटा लिया, वर्जीनिया! रवि आनंदित था।
हॅंसी-खुशी की वह संध्या पलक झपकते बीत गई थी। अतिथियों को विदा देने के बाद रात्रि के मादक क्षणों में रवि अपना संयम, विवेक भूल वर्जीनिया को पाने को व्याकुल हो उठा था। वर्जीनिया को बाहुपाश में जकड़ उसके अधरों पर अपने अधर धर रवि सीमा से आगे बढने लगा था। तभी वर्जीनिया ने उसके उन्मत्त उबाल पर ठंडे पानी के छींटे मार दिए थे,
छिः ऐसा व्यवहार तुम्हें शोभा नहीं देता, रवि! तुमने ही तो बताया है कि शरीर का मिलन विवाह के बाद ही सम्भव है।
उसमें अब देर ही कितनी है? कुछ ही दिनों में तो हम विवाह-बन्धन में बॅंधने वाले हैं न? लेट्स फारगेट एवरीथिंग, कम आँन डार्लिंग! रवि उन्मत्त था।
नहीं-नहीं, यह असम्भव है। तुम अपने को भूल रहे हो। मैं तुम्हें पाप नहीं करने दूंगी। दढ़ता से वर्जीनिया ने रवि को परे कर दिया था।
शारीरिक मिलन हमारे पवित्र प्यार को दृढ करेगा। इस मिलन के बिना प्रेम अपूर्ण है। रवि जिद कर रहा था।
तो वह प्यार नहीं है, रवि! मीरा ने क्या अपने कृष्ण से शारीरिक सम्बन्ध स्थापित किए थे? नहीं रवि, यह असम्भव है।
उन्मत्त रवि को वहीं छोड़ वर्जीनिया बाहर चली गई थी। पता नहीं रवि ने स्वयं को अपमानित अनुभव किया था या लज्जित।
दूसरे ही दिन रवि को पिता की गम्भीर बीमारी का तार मिला था। एकमात्र पुत्र की उपस्थिति नितांत आवश्यक थी। तुरन्त लौट आने के निर्देश स्पष्ट थे। रवि के विवर्ण मुख को देख वर्जीनिया ने धीरज बॅंधाया था,
भगवान में विश्वास रखो, रवि! मैं तुम्हारे साथ चलूंगी। मैं जानती हूँ मेरी प्रार्थना पिताजी का अनिष्ट नहीं होने देगी।
नहीं वर्जीनिया, अभी तुम्हारा मेरे साथ जाना ठीक नहीं है। पिताजी को तो मैं समझा लूंगा, पर वहाँ परिवार के न जाने कितने लोग इकट्ठे होंगे। तुम्हारी उपस्थिति शायद उन्हें सह्य न हो। किसी भी स्थिति में तुम्हारा अपमान मैं नहीं सह सकता।
मेरा मान-अपमान सिर्फ मेरा ही तो नहीं है, रवि! मान लो पिताजी को कुछ हो गया....... तो मैं उनका आशीर्वाद भी न पा सकूंगी।
नहीं, इस समय तुम्हारे जाने से बहुत-सी प्राँब्लम्स आ सकती हैं। मैं पहॅंचते ही तुम्हें काँन्टेक्ट करूँगा। हैव फ़ेथ इन मी, डार्लिंग!।
वर्जीनिया ने ही रवि का टिकट खरीद, शुभकामनाओं के साथ उसे विदा किया था। समाचार शीघ्र देने का अनुरोध करती वर्जीनिया के कन्धे स्नेह से थपथपा रवि चला गया था।


एक माह तक रवि की कोई सूचना न पा वर्जीनिया व्यग्र हो उठी थी। रवि मेरे ही होस्टेल में रहता था। रवि के साथ वर्जीनिया से कई बार मिला था। वर्जीनिया को मैंने ही समझाया था,
हमारी भारतीय परम्परा में मृत्यु के बाद बहुत-से रीति-रिवाज होते हैं। रवि अकेला बेटा है। शायद उन दायित्वों को पूरा करते उसे पत्र लिखने का समय ही नहीं मिला हो, या फिर उसके पिता अभी गम्भीर हालत में हों।
कुछ पलों को वर्जीनिया आश्वस्त दिखी थी। फिर उसने कहा था,
मैंने भारत जाने का निश्चय कर लिया है, प्रतीक! कठिनाई के समय रवि का साथ देना मेरा कर्तव्य है।
शायद वर्जीनिया ने जाने की तैयारी शुरू भी कर दी थी, तभी रवि का पत्र मुझे मिला था। बहुत सफाई देने के बाद रवि ने सत्य मुझे लिखा था- पिता की गम्भीर हालत का तार झूठा था। पिता के किसी शुभचिन्तक मित्र ने रवि और वर्जीनिया की प्रगाढ मैत्री का सविस्तार वर्णन उन्हें लिख भेजा था। एकमात्र पुत्र विधर्मी, विदेशी लड़की से विवाह कर कुल कलंकित करे- इससे तो मृत्यु भली! यही नहीं, जिन यजमान की कृपा से रवि को अमरीका जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था, उनकी कन्या अमरीका से पी एच डी प्राप्त रवि के आने की प्रतीक्षा में ही अब तक अविवाहित थी। उच्च ब्राह्मण-कुल में जन्मे, ऊॅंची अमरीकन डिग्री प्राप्त रवि को अपना दामाद बनाने में यजमान ने विलम्ब नहीं किया था। लाखों की जायदाद का उत्तराधिकारी उन्हें रवि जैसा जामाता ही चाहिए था। उनकी दूरदर्शिता ने रवि को पहले ही जाँच-परखकर अमरीका भेजा था।
रवि ने लिखा था कि उसने पिता के समक्ष अपनी स्थिति स्पष्ट करने की बहुत चेष्टा की, पर पिता अपने हठ पर दृढ रहे। उन्होंने रवि से स्पष्ट कह दिया था कि वह विधर्मी, विदेशी लड़की उनकी मृत्यु के बाद ही उनके घर आ सकती है। साथ में रवि के विवाह न करने की बात पर भूख- हड़ताल कर अपने प्राण त्यागने का अडिग निर्णय भी उन्होंने सुना दिया था। माता के अभाव में जिस पिता ने उसे सीने से लगाकर पाला, उसकी आज्ञा की अवहेलना कर पाना रवि के लिए कैसे सम्भव हो पाता?
जिस दिन वह सेहरा बाँध भारत में विवाह को चला था, उसी दिन उसके अस्वस्थ पिता की मंगल कामना हेतु वर्जीनिया ने पूरे दिन का व्रत रखा था। रवि ने उसे व्रत का माहात्म्य अच्छी तरह समझा रखा था। ठीक विवाह के मुहूर्त पर ही वर्जीनिया ने अपना व्रत तोड़ा था। शायद शहनाई और वर्जीनिया के पूजन की शंखध्वनि एकाकार हो गई होंगी। रवि ने स्पष्ट लिखा था, अपने विवाह की सूचना वर्जीनिया को देने का उसमें साहस नहीं -यह दायित्व मुझे ही पूर्ण करना था।


कावर्ड चीट! प्रतीक बात करते-करते दाँत भींच बुदबुदा उठा था,
आप ही सोचिए आंटी, अगर उसमें इतना भी साहस नहीं था तो बेचारी वर्जीनिया के सामने इतनी ऊॅंची-ऊॅंची महानता की बातें करने का उसे क्या अधिकार था? उसके सामने तो एक दृढ़-प्रतिज्ञ पुरूष का चित्र साकार किया और आवश्यकता के समय जरा-सी धूप में मोम-सा पिघल गया।

एक बार तो जी चाहा था वर्जीनिया से कह दूं कि रवि की मृत्यु हो गई। यह सच भी था न, आंटी! वह रवि तो मर ही गया था जिसने वर्जीनिया को प्यार किया था। यह तो एक कायर नया रवि था, भारत के गण्यमान्य धनी व्यक्ति का दामाद। पर मेरी बात सुन क्या उसकी दीवानी वर्जीनिया अपने को रोक पाती? उसकी आत्मा की शांति के लिए गंगा-तट पर न पहॅुंच जाती!
अन्ततः परिस्थिति उसे बता ही दी थी। मेरी बात शांति से सुन एक पल जड़ दृष्टि से मुझे ताक वह कार में बैठ चल दी थी। उसे पुकारता पीछे भागा था मैं, पर उसने शायद पूरा एक्सलरेटर दबा दिया था। इसी बार में आकर पूरी बोतल गले के नीचे उतार ली थी। रवि के साथ उसने मदिरा पूरी तरह त्याग दी थी। किसी ने रोकना चाहा तो ऐसी दृष्टि से वर्जना की कि वह सहम गया। तब से रोज शाम वह यहाँ आती है। ऐसे ही अकेली बैठ वापस चली जाती है। कई युवाओं ने मित्रता का हाथ बढ़ाया, पर वह तो बस चलती-फिरती अहल्या बनकर रह गई। काश, कोई राम उसका उद्धार कर पाता! प्रतीक की आवाज भारी हो गई थी।
पुअर वर्जीनिया...........नहीं, वर्जिन मीरा! अनजाने ही मैं बुदबुदा उठी थी।



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