Oct 1, 2018

अटूट रिश्ता


फोन की बेल होते ही पंडित राम चरण जी ने फोन उठाया था.मन में धुकधुकी थी इतनी रात में न जाने किसने फोन किया है. राम सब कुशल करें. फोन के दूसरे सिरे से आ रही आवाज़ ने पंडित जी को संज्ञाशून्य कर दिया. हाथ से फोन का चोगा छूट कर गिर गया, धरती पर उनके गिरने की आवाज़ से पत्नी सावित्री देवी सोते से जाग गईं. पति को धरती पर गिरा देख वह घबरा गईं.
“हरी देख तो पंडित जी को क्या हुआ, पानी ला.”घबराई आवाज़ में सावित्री ने सेवक को आवाज़ दी.
पंडित जी के मुंह पर काफी देर पानी के छींटे डालने पर उन्होने आँखें खोलीं.
“सब खत्म होगया सावित्री. हमारा मोहन हमें छोड़ कर चला गया.”पंडित जी हाहाकार कर उठे,
“क्या—कैसे?’ सावित्री स्तब्ध इतना ही कह सकी.आँखों से आंसू बाँध तोड़ कर बह निकले.रात का अंधकार और गहरा गया.दोनों पति-पत्नी धरती पर पड़े बिलखते रहे.
सवेरा होते ही पंडित रामचरण के इकलौते पुत्र मोहन की अमरीका में मृत्यु की खबर मोहल्ले में फैल गई. दुःख बांटने पड़ोसी इकट्ठे होगए थे. सब आपस में धीमे शब्दों में बातें कर रहे थे.
“बेटे ने अपने मन की शादी क्या कर ली कि उसे बनवास दे दिया.”कैलाश जी ने कहा.
“ठीक कह रहे हैं, आज के ज़माने में शादी के लिए जाति और धर्म का बंधन मानना पुराने ख्यालात बन चुके हैं.”श्याम जी ने हामी भरी.
 “बेटे ने चिट्ठियाँ लिख-लिख कर कितना समझाया था, हमारी भारतीय संस्कृति सबकी जाति और धर्म को समान सम्मान देती है, हमने कोई पाप नहीं किया है. राम चरण जी ने अपने खोखले धर्म की आड़ में मोहन की एक नहीं सुनी.”सुधीर जी ने दुखी स्वर में कहा.
“मोहन ने कितनी बार घर आने के लिए विनती की, पर पंडित जी ने इजाज़त नहीं दी.”विनोद बोले.
“ये बातें बस कहने भर में अच्छी लगती हैं, पर जिस पर बीतती है, वही समझ सकता है. राम चरण जी हिन्दू धर्म के इतने बड़े समर्थक और प्रचारक हैं,वह अपने घर में ईसा मसीह की पुजारिन को कैसे स्वीकार कर सकते थे. उनका पवित्र घर तो दूषित हो जाता.”वयोवृद्ध दीनानाथ जी ने अपनी बात कही.
“ठीक कह रहे हैं, ये नए ज़माने के लोग धर्म का महत्त्व क्या समझेंगे.”चन्द्र नाथ जी ने भी हामी भारी.
 “हाय मेरा लाल चला गया. वह कुलच्छनी उसे खा गई.”सावित्री का हृदयविदारक रुदन सबको हिला गया.
“अब रोने से क्या लाभ, बेटा तो वापिस नहीं आएगा. काश पहले ही समझ लेते. उसकी मौत के लिए किसी को दोष देना तो गलत बात है.”श्याम जी ने धीमे से कहा.
पिछले आठ वर्षों से रामचरण जी का पुत्र मोहन अमरीका में पिता की कठोर आज्ञा के कारण बनवास की सज़ा काट रहा था. एक विदेशी अमरीकी युवती से विवाह उसके पिता की दृष्टि में उसका अक्षम्य अपराध बन गया था. पिता को अपनी बात समझाने का मोहन का हर प्रयास व्यर्थ रहा.
एम एस सी फिजिक्स में पूरे विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान मिलने पर मोहन के सपने आकाश छूने लगे. अमरीका के विषय में पढ़ते हुए और अपने अमरीका गए कुछ मित्रो की बातों से मोहन की दृष्टि में अमरीका लक्ष्य- पूर्ति का देश था. अपने पिता के कट्टर धार्मिक विचारों के विपरीत मोहन एक खुले विचारों वाला नवयुवक था. यूनीवर्सिटी तथा कई वैज्ञानिक सेमिनारों में भाग लेने के कारण मोहन की दृष्टि में देशी-विदेशी विभिन्न जाति-धर्म वालों के लिए समान सम्मान की भावना थी. मोहन के परिणाम के आधार पर उसके विभागाध्यक्ष ने भी मोहन को अमरीका में शोध- कार्य करने जाने की सलाह दी थी.
“तुम्हारी मेधा और लगन का सुपरिणाम तुम्हें अमरीका में अवश्य मिल सकेगा. तुम जिस नई खोज का लक्ष्य रखते हो, उसके लिए तुम्हें वहां खुला आकाश मिलेगा.”
मोहन ने जब पिता के समक्ष अमरीका जाने का प्रस्ताव रखा तो वह चौंक गए. मांसाहारी और ईसा मसीह के पुजारियों वाले देश में उनका बेटा क्या अपने धर्म को भुला न देगा? बाईस वर्षों तक उसे दी गई उनकी धार्मिक शिक्षा व्यर्थ ना हो जाए. नहीं, वह ऐसा जोखिम नहीं ले सकते. अपने देश में क्या कुछ नहीं है? मोहन के बार-बार विश्वास दिलाने, विनती करने और कुछ लोगों के समझाने पर दिल पर पत्थर रख कर उन्होंने बेटे से वायदे करवा कर उसे अमरीका जाने की इजाज़त दी थी. काश वह जान पाते अमरीका में उनके बेटे को फूलों की सेज नहीं मिली थी. वह नहीं जानते थे, पढाई के खर्चे की भारी फीस के साथ अमरीका में रहने के लिए बिना आर्थिक सहायता के जीवन आसान नहीं होता.
अमरीका पहुंचे मोहन को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. यूनीवर्सिटी में देर से एप्लीकेशन भेजने के कारण मोहन को यूनीवर्सिटी से आर्थिक सहायता तथा हॉस्टेल में कमरा नहीं मिल सका, पर उसके रिज़ल्ट के आधार पर एक सेमेस्टर के बाद आर्थिक सहायता का आश्वासन दिया गया था. अमरीका में अधिक पैसों के साथ बेटा बिगड़ ना जाए इसलिए पंडित रामचरण ने उसे सीमित मात्रा में पैसे देकर उतने पैसों में ही गुज़ारा करने को कहा था. उतने सीमित पैसों में अलग अपार्टमेन्ट ले पाना कठिन था. सौभाग्यवश लीना नाम की एक अनाथ अमरीकी शोधार्थी युवती भी आर्थिक समस्याओं से परेशान थी. लीना भारतीय संस्कृति और हिन्दी भाषा पर शोध-कार्य कर रही थी. लीना के एक मित्र रॉबिन ने मोहन की समस्या जान कर लीना के साथ अपार्टमेंट शेयर करने की जब सलाह दी तो मोहन बौखला सा गया.
“क्या एक लड़की के साथ अपार्टमेंट शेयर करना? इसकी तो कल्पना भी असंभव है. तुम हमारी भारतीय संस्कृति के विषय में नहीं जानते, विवाह के पहले लड़के और लड़की का मिलना तो दूर, बात करना भी निषिद्ध होता है, मेरे परिवार वाले इसे कभी स्वीकार नहीं करेंगे. मेरे पिता बहुत पुराने और कट्टर विचारों वाले व्यक्ति हैं.”मोहन ने अपनी समस्या बताई थी.
 “अब तुम्हें यह समझना ज़रूरी है कि तुम भारत में नहीं अमरीका में हो. यहाँ लड़के और लड़की का अपार्टमेन्ट ही नहीं, रूम शेयर करना भी सामान्य बात है. कॉलेजों में तो दोनों के बाथरूम्स भी कॉमन होते हैं. वैसे दोनों के साथ रहने से तुम्हें जिस गलती का भय है, अपार्टमेंट शेयर करने से वैसा होना ज़रूरी नहीं होता. यह तो तुम दोनों की समझदारी और अपने आत्मविश्वास पर निर्भर है. लीना बहुत ही समझदार और सिंपल लड़की है. उस पर मुझे पूरा विश्वास है.” रॉबिन ने समझाया.
मोहन को मौन देख कर रॉबिन ने कहा-
मेरे ख्याल से तुम एक बार लीना से मिल लो, उसके बाद फैसला लेना. तुम दोनों की समस्या सुलझ सकती है वरना तुम्हें अकेले ही अपना इंतज़ाम करना होगा.”
बहुत सोचने के बाद मोहन लीना से मिलने को राजी होगया था., यूनीवर्सिटी- कैम्पस में दोनों का मिलना निश्चित हुआ था. सादे गुलाबी सलवार सूट में लीना को देख कर उसके भारतीय होने का भ्रम होता. गुलाबी परिधान उसकी गुलाबी रंगत से होड़ लेता लग रहा था. आकर्षक लीना के चेहरे पर मासूमियत और उदासी की हलकी सी छाया थी. मोहन को देख जब उसने हाथ जोड़ कर नमस्ते की तो मोहन चौंक गया. प्रत्युत्तर में वह कुछ भी नहीं कह सका.
“रॉबिन ने बताया है, आप किसी के साथ अपार्टमेन्ट शेयर करना चाहते हैं. मुझे भी रहने के लिए किसी स्थान की आवश्यकता है. देरी से एडमीशन लेने के कारण हॉस्टेल में स्थान नहीं मिल सकता.”
“मेरे साथ भी यही समस्या है, पर आप अमरीकन होते हुए भी इतनी अच्छी हिन्दी कैसे बोल लेती हैं?” लीना की साफ़ हिन्दी ने मोहन को विस्मित किया था.
मेरे पापा अमेरिकन एम्बैसी में काम करते थे. कुछ वर्षों के लिए उनकी पोस्टिंग भारत में .हुई थी. ग्यारह-बारह वर्ष की आयु तक मै भारत में रही थी. वहां के बच्चों के साथ खेलते और बातें करते हुए मै भी अच्छी हिन्दी बोलना सीख गई थी. दुर्भाग्यवश पापा की एक दुर्घटना में इंडिया में मृत्यु होगई, मेरी माँ पहले ही  हमेशा के लिए दुनिया छोड़ कर जा चुकी थीं,” अचानक लीना उदास हो गई, आँखें नम थीं.
“ओह, यह तो दुखद था, फिर क्या आप अमरीका में किसी रिश्तेदार के साथ रहीं?’मोहन द्रवित था.
“अमरीका में मेरे पापा और माँ चर्च के ऑरफ़नेज में पले थे. पापा ने दुनिया से जाने के पहले उसी चर्च के फादर मॉरिस को मेरा दायित्व सौंप दिया था. कॉलेज की पढाई पूरी करने के बाद अब इस विश्वविद्यालय से हिंदी एवं भारतीय संस्कृति में शोध कार्य कर रही हूँ.”
“एक प्रश्न पूछना चाहूंगा. अमरीकी नागरिक होते हुए भी आपने यह विषय क्यों चुना? आप तो अमरीका से संबंधित कोई उपयुक्त विषय ले सकती थीं. भारतीय संस्कृति और हिंदी भाषा तो आपके लिए कठिन विषय होगा.”मोहन अपनी उत्सुकता रोक नहीं सका.
“भारत में रहते हुए मेरे बहुत सुखद अनुभव थे. वहां मेरा कोई रिश्तेदार नहीं था, पर मोहल्ले-पड़ोस में रहने वाली स्त्रियों से  मुझे नानी-दादी, चाची –ताई जैसा जो प्यार मिला, उसे कभी नहीं भूल सकती. अपने मित्रो के साथ मिल कर वहां के त्योहार और जन्म-दिन जैसे अवसर मनाती थी. मेरा जन्म-दिन भी खुशी के साथ मनाया जाता. सच तो यह है कि उनके बीच मै अपनी माँ की कमी भूल गई थी.”लीना यादों में खो सी गई थी.
“आप ठीक कहती हैं, लीना. हमारी भारतीय संस्कृति बहुत उदार है. आपने भारत में जो हिंदी सीखी थी क्या वो हिंदी भाषा आज भी याद है.? साधारणत: विदेशियों को हिंदी भाषा कठिन लगती है.”
“यह् भ्रामक धारणा है, मेरे विचार में तो हिंदी सरल और प्रेम की भाषा है. जब मै अमरीका आरही थी तब मेरे मित्रो ने मुझे हिंदी कहानियों की कुछ पुस्तकें दी थीं. अमरीका में उन पुस्तकों को पढती और अपने मित्रो को याद करती. मै हिंदी कभी नहीं भूली. आपको जान कर खुशी होगी कॉलेज में मैने हिंदी को मुख्य विषय के रूप में लिया और उसमें सर्वोच्च अंक मिले.”लीना के सुन्दर मुख पर खुशी थी.
“आपकी बातें सुन कर प्रसन्नता है, पर आपको बताना चाहूंगा, मेरा शाकाहारी परिवार सनातन धर्म में विश्वास रखता है. हमारे यहाँ हिंदू देवी-देवताओं की श्रद्धा पूर्वक पूजा की जाती है. आपका धर्म और आचार-विचार अलग होंगे. मेरे लिए मांस –मदिरा जैसी वस्तुएं सर्वथा निषिद्ध हैं. यदि हमारा एक ही किचेन होगा तो शायद मुझे कुछ कठिनाई हो सकती है.”मोहन ने सच्चाई से अपनी समस्या बताई थी.
“जी हाँ, इंडिया में मेरे कई मित्रो के परिवार आपके परिवार जैसे ही थे. मुझे उनके साथ कभी कोई समस्या नहीं आई. अब आपको सच बताऊं, अपने घर की अपेक्षा मुझे सुरमा नानी का शाकाहारी भोजन और उनकी पूजा का प्रसाद अच्छा लगता था. कभी-कभी उनके साथ मन्दिर भी जाती थी. यहाँ आकर शाकाहारी भोजन ही लेती हूँ, उसकी कुकिंग भी आसान है और स्वास्थ्य के लिए भी अच्छा है. विश्वास है, मेरी कुकिंग से आपको समस्या नहीं होगी.”लीना के चेहरे पर मुस्कान थी.
“आपकी बातों से मै प्रभावित हुआ हूँ. आप एक सुलझी और समझदार लड़की हैं. मुझे विश्वास है, हम दोनों एक अपार्टमेंट शेयर कर सकते हैं.”
“धन्यवाद. आपकी स्पष्टवादिता ने मुझे भी प्रभावित किया है. आशा है, हम दोनों अच्छे मित्र सिद्ध होंगे.
अपार्टमेन्ट की समस्या का हल हो जाने से मोहन के मन का भार उतर गया, पर क्या उसके पिता इस समझौते को स्वीकार कर सकेंगे? हिंदू धर्म के प्रगांड पंडित, धार्मिक विधि-विधानों का बेहद कडाई के साथ पालन करने वाले, क्या उसकी समस्या समझ सकेंगे? सबसे पहले एक अविवाहित युवती के साथ एक ही घर में रहना, उस पर अलग जाति और धर्म वाली विधर्मी के साथ एक ही रसोई में भोजन पकाना, उनकी दृष्टि में तो बेटा धर्म भ्रष्ट हो जाएगा. इसी सोच-विचार में मोहन पूरी रात सो नहीं सका. उसे लीना में किसी आपत्तिजनक बात का अनुभव नहीं हुआ था. फ़ैशनेबल मेकअप पोते तितली जैसी लड़कियों से बिलकुल अलग वह अभावों में पली सीधी-सादी लड़की है. अपनी समस्या रॉबिन को बताने पर रॉबिन ने उसे सलाह दी-
“अभी जल्दी ही तो तुम्हारे पिता अमरीका नहीं आने वाले है, उम्मीद है अगले सेशन में तुम्हें आर्थिक सहायता मिल जाएगी तब तुम अपना अलग रहने का इंतज़ाम कर लेना. अभी इस विषय में उन्हें बताने की आवश्यकता नहीं है.”
मोहन जानता था उसके पिता अभी क्या अमरीका में कभी पैर भी नहीं रक्खेंगे, उनकी दृष्टि में तो यह अपवित्र देश है. अंतत: उसने लीना के साथ रहने का निर्णय ले ही लिया. रॉबिन ठीक कहता है, उसे अपने पर पूरा विश्वास है, किसी तरह की भूल होने का प्रश्न ही नहीं उठता. पिता से सच छिपाना उसे अच्छा नहीं लग रहा था, पर परिस्थिति से समझौता करने में ही समझदारी थी.
निश्चित दिन दोनों अपने सामान के साथ अपार्टमेन्ट में रहने आगए. लीना के साथ एक सूटकेस और स्लीपिंग बैग था. मोहन के पास दो भारी सूटकेसों में भारत से आने वाले मध्यम वर्ग के विद्यार्थियों की  तरह कपड़ों के अलावा खाने-पीने का कुछ सामान और ओढने-बिछाने की चादर आदि थीं. अपने अभ्यस्त हाथो से लीना ने शीघ्र ही अपने कपडे अलमारी में रख लिए, पर मोहन अपना सूटकेस खोल कर परेशान था. मुश्किल से एक मोटी दरी जैसा बिछौना और राजस्थानी रजाई निकाल सका. कपडे निकालने के क्रम में सब सब उलट-पुलट हो गया. माँ के लाड़ले बेटे ने ये सब काम किए ही कब थे? डिनर का समय हो जाने के कारण भूख भी ज़ोरों से लग रही थी. अचानक याद आया माँ ने आते समय मठरी-लड्डू जैसे उसकी पसंद की व्यंजन और थोड़ा आटा-दाल चावल तक सूटकेस में रख दिया था. सौभाग्यवश उसे कस्टम में पकड़ा नहीं जा सका. अपना काम समाप्त कर लीना एक पुस्तक पढ़ रही थी.
“आपका डिनर होगया?”मोहन ने अपनी जन्मजात भारतीय संस्कृति के नाते पूछा.
“जी, मेरे पास कुकीज और ब्रेड है. इस समय इसी से काम चल जाएगा. ”शान्ति से लीना ने कहा.
“अगर आपको आपत्ति ना हो तो मेरे साथ माँ ने अपने हाथो से कुछ मिठाई आदि बनाकर भेजी है. हम शेयर कर सकते हैं.”कुछ संकोच से मोहन ने कहा, क्या पता यह अमरीकी लड़की वो चीजें खा भी सकेगी.
“माँ के हाथ की बनी मिठाई तो सौभाग्य से ही मिलती है.”लीना के चेहरे पर खुशी थी.
“अगर ऐसा है तो आइए.”मोहन ने पेपर प्लेट में साथ लाई मिठाई-नमकीन सामने रख दिया.नि:संकोच लीना भी अपनी कुकीज का पैकेट ले आई.
“आप बहुत लकी हैं, आपकी माँ आपको इतना प्यार करती हैं. उनकी बनाई मिठाई में उनका प्यार है, इसीलिए इतनी टेस्टी है.”लीना की आवाज़ में सच्चाई थी.
किसी तरह से मोहन ने अपने सोने के लिए साथ लाया लाया बिस्तर किचेन के सामने वाली खाली जगह में बिछा लिया. अपार्टमेन्ट में एक बेड रूम था. मोहन ने सोचा लीना एक लड़की थी, उसकी आवश्यकताएं अधिक हैं. इस कारण मोहन ने अपने सोने के लिए वह जगह चुन कर बेड रूम लीना को दे दिया था. उसकी इस उदारता के लिए लीना बहुत आभारी थी.
“आपकी यह उदारता भारतीय संस्कृति की परिचायक है. अमरीका में लड़के और लड़की में बराबरी का संबंध होता है, कोई किसी के लिए ना ऐसा त्याग करेगा ना दूसरा इसकी उम्मीद करेगा.”
सवेरे लीना की आवाज़ से मोहन की नीद खुली थी-
“अगर आपको मेरे हाथ की बनी चाय पीने में ऐतराज़ ना हो तो चाय हाज़िर है.” हाथ में गरम चाय के कप के साथ लीना खड़ी थी.
“ओह, थैंक्स. ये सच है या सपना, इसकी सख्त ज़रुरत थी. अपने साथ चाय के पैकेट्स तो लाया हूँ, पर सच्चाई यह है कि मुझे चाय बनानी भी नहीं आती.”लीना के हाथ से कप लेता मोहन उठ कर बैठ गया.
“कोई बात नहीं, जल्दी ही एडजेस्ट कर लेंगे. भारत से आने पर शुरू में सबको इस समस्या का सामना करना पड़ता है. अब जल्दी से रेडी हो जाइए वरना देर हो जाएगी.”
जल्दी ही दोनों अपने-अपने विभाग की ओर चल दिए. राबिन ने ठीक ही कहा था, अपार्टमेन्ट यूनीवर्सिटी के पास होने के कारण बस में आने-जाने के पैसे बचेंगे.
शाम को मोहन के वापिस पहुँचने के पहले लीना पहुँच गई थी. चाय के साथ सैंडविच देख कर मोहन खुश हो गया.
“थैंक्स लीना, पर आप मेरे लिए कष्ट नहीं कीजिए. मै कोशिश करूंगा जल्दी ही काम सीख जाऊं. माँ ने साथ में कुछ ग्रोसरी दाल-चावल भी भेजा है. अगर आप मदद कर सकें तो कुछ बनाना शुरू करूंगा.
“वाह ये तो बड़ी अच्छी बात है, पर क्या आप मेरे हाथ का बना खाना खा सकेंगे? इंडिया में रहते हुए कुछ कुकिंग भी सीख ली थी. अब तो खाने लायक खिचडी, दाल-चावल और सब्जी बना लेती हूँ. हाँ आपकी माँ जैसा अच्छा खाना नहीं बना सकती. अक्सर जल्दी में ब्रेड से ही काम चला लेती हूँ.”
“आप ऐसा क्यों सोचती हैं कि मुझे आपके हाथ का बना खाना खाने में ऐतराज़ होगा? आपके हाथ का बना खाना तो मेरी किस्मत खोल देगा. इस अनजान देश में घर का बना भोजन मिल पाना तो सौभाग्य होगा.”मोहन का चेहरा खुशी से खिल उठा.
“तो चलिए, आज ही से शुरूआत करते हैं. आप सामान निकालिए. मै बरतन निकालती हूँ.”
मोहन ने उत्साह से माँ द्वारा पोटलियों में बांधा गया सामान निकलना शुरू कर दिया. एक स्टील के बर्तन में माँ घी रखना भी नहीं भूली थी. माँ की याद ने मोहन की आँखों में आंसू ला दिए, लीना के आते ही आँखें पोंछ डालीं. काश माँ को बता पाता अमरीका के छोटे घरों में भी सारी आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध होती हैं.अचानक मोहन की दृष्टि घड़ी पर पड़ी, अभी खाना बनाने में काफी देर हो जाएगी.
“रुकिए लीना, हम कल से खाना पकाना शुरू कर सकते हैं, आज बहुत देर हो जाएगी. आज आते समय मै पाव रोटी, सॉरी ब्रेड ले आया हूँ, आपके पास शायद जैम या टोमैटो सॉस होगा , आपसे क्या ये चीजें उधार ले सकता हूँ?”
“अमरीका में कुछ दिन रहने के बाद आप जान जाएंगे, यहाँ के लोग बहुत प्रैक्टिकल होते हैं. दो लोगों के बीच जो भी खर्च होता है बराबर-बराबर बाँट लिया जाता है, तकल्लुफ नहीं होता. आज आपकी ब्रेड और मेरा जैम, हिसाब बराबर. चाय मै बनाती हूँ.”
“ठीक है, इंडिया की चाय के पैकेट देता हूँ, दूध और चीनी आपकी, हिसाब बराबर.”
“वाह तुम तो यहाँ का गणित बहुत जल्दी समझ गए.” दोनों हंस पड़े.
मोहन का मन हँसी से हल्का हो गया. लीना के साथ के कारण पिछले सात दिनों का अवसाद जैसे कम हो गया. मजबूरी में शुरू के सात दिन एक सस्ती जगह में अजीब से लोगों के बीच रहते हुए उसे लगा था, वह तुरंत वापिस भारत लौट जाए. एक-दो दिनों में ही लीना जैसे अजनबी नहीं लग रही थी. शायद इसका कारण उसके साथ हिंदी में अपने भारत के बारे में की गई बातें थीं. ठंडे मौसम में गरम चाय के साथ जैम लगी ब्रेड भी अच्छी लग रही थी.”
“मोहन आज का दिन कैसा बीता? मै जानती हूँ शुरू में घर से इतनी दूर अनजान देश में अपने देश-परिवार की याद बहुत सताती है, पर कुछ दिनों बाद यहाँ का जीवन रास आने लगता है.”
“पता नहीं, पर आज भी अपने घर-परिवार की बहुत याद आरही है.”मोहन ने सच्चाई से कहा.
“अपने गाइड से मिल कर कैसा अनुभव रहा?”
“प्रोफ़ेसर जेम्स से मिल कर बहुत खुशी हुई. वह अपने विषय के विशेषज्ञ हैं. मेरे शोध का विषय उन्हें बहुत पसंद आया है. उनके विचार में इस विषय में बहुत संभावनाएं हैं, मुझे प्रतीक्षा करने को कहा है, वह मेरे लिए टीचिंग असिस्टेंन्टशिप दिलाने का प्रयास करेंगे.आपके गाइड क्या भारतीय हैं?” मोहन ने पूछा.
“वाह यह तो बहुत अच्छी खबर है, मेरी शुभ कामनाएं. मेरे गाइड एक अमेरिकन हैं. वह भाषा-विज्ञान और साहित्य के विशेषज्ञ हैं. मेरा तो अनुभव है, उन्हें हिंदी अनुरागी कहना ही उनका असली परिचय होगा.”लीना के मुख पर खुशी थी.
अगले दिन लीना आलू-टमाटर वेजीटेबल ऑयल तथा कुछ सब्जी ले आई थी.
“लीना तुमने क्यों तकलीफ की, मै ले आता.”मोहन संकुचित था.
“अभी आपको यहाँ की जानकारी लेनी है. अमरीका में लिंग भेद नहीं है. ऐसा कोई काम नहीं है जो दोनों में भेद करे. वैसे एक दिन इन्डियन स्टोर चलेंगे, आप अपनी पसंद और ज़रुरत का सामान ले सकेंगे. वहां भारत से डिब्बों में बंद रेडीमेड यानी बना बनाया खाना भी मिलता है.”
“वाह, यह तो मुझ जैसे अनाडी के लिए अच्छी खबर है. क्या आज हम कुछ कुकिंग कर सकते हैं?’
“आज खिचड़ी के साथ आलू-टमाटर की सब्जी चलेगी. रोटी बनाने के लिए रोलर ( बेलन) लाना होगा. वैसे काम लायक बर्तन तो मेरे पास हैं. मोहन आलू तो छील लोगे?”
“ज़रूर, कोशिश करूंगा, पर गलती हो सकती है.”
“’जानती हूँ, हिन्दुस्तान में अधिकाँश परिवारों में लड़के घरेलू काम नहीं करते, पर यहाँ आकर सबको काम करना सीखना पड़ता है.”अनाडीपन से आलू छीलते मोहन को देखती लीना हंस कर बोली.
“इसका मतलब, जब यहाँ से वापिस जाऊंगा मेरा कायाकल्प देख कर माँ मुझे पहिचान नहीं पाएगी.” आलू छीलते मोहन ने कहा.
दिन बीतने लगे. दोनों अपने-अपने शोध- कार्य में व्यस्त थे. शाम को दोनों साथ चाय पीते दिन भर की बातें करते. रात में मिल कर डिनर के लिए कुछ बना लेते.अब दोनों आपस में काफी सहज हो चले थे. औपचारिकता के स्थान पर मित्र बन गए थे. काम की व्यस्तता में भी मोहन को अपने माता-पिता की बहुत याद आती, फोन से बात करने से मन नहीं भरता.
जिस दिन मोहन को टीचिंग असिस्टेंन्टशिप मिली मोहन लीना को बाहर रेस्तरा में डिनर के लिए ले गया.लीना ने बधाई देते हुए कहा-
“अब तो तुम अलग अपार्टमेन्ट ले सकोगे, मुझे कोई और जगह ढूंढनी होगी.”
“क्यों क्या मेरे साथ रहने से तुम्हे कोई असुविधा है?”मोहन ने जानना चाहा.
“नहीं, यह क्या कह रहे हैं, पर तुम मेरे साथ क्यों असुविधा में रहना चाहोगे? अभी तो मेरा साथ तुम्हारी मजबूरी थी.” शायद लीना की आवाज़ उदास थी.
“तुम्हें मेरे किस व्यवहार से लगा कि तुम्हारे साथ मै असुविधा में रह रहा हूँ?अगर तुम ना होतीं तो ब्रेड और सैंडविच खाकर शायद अब तक इंडिया वापिस जाने की बात सोच रहा होता. तुमने देख लिया लाख कोशिशों के बावजूद मै खाना पकाने की ए बी सी डी भी नहीं सीख सका हूँ. अब नए अपार्टमेन्ट में हम दोनों जल्दी ही शिफ्ट कर लेंगे.” मोहन ने खुशी और विश्वास से कहा.
“धन्यवाद, पर जब तक मुझे आर्थिक सहायता नहीं मिलती दो बेड रूम वाले अपार्टमेन्ट का आधा किराया कैसे शेयर कर सकूंगी?”लीना ने चिता जताई.
“यह तो तय है, तुम्हारी कुकिंग में मै अधिक मदद नहीं कर सकता. अगर तुम्हारी कुकिंग की वजह से मुझे रोज़ होटल में खाने का बिल ना चुकाना पड़े तो तुम्हारा आधे हिस्से का किराया तो अपने आप ही वसूल हो जाएगा.” मोहन ने परिहास किया.
“वैसे मुझे मुझे भी विश्वास है,जल्दी ही मुझे भी फ़ाइनेनशियल एड मिलने वाली है, तब अपने हिस्से का किराया शेयर कर लूंगी.”आत्मविश्वास से लीना ने कहा.
“इतने दिनों से हम साथ रह रहे हैं, पर बराबरी की हिस्सेदारी तुम नहीं भूली हो. मै भारतीय हूँ, किसी के साथ स्नेह हो तो उसमें हिस्सेदारी का स्थान नहीं होता. मित्रता के समक्ष पैसों का कोई मोल नहीं होता.”
अचानक अनहोनी हो गई. भारत से अमरीका पढने आए उसके पिता के मित्र के बेटे राकेश ने मोहन और लीना को साथ रहते देख जो अनुमान लगाया वो नमक-मिर्च लगाकर राम शरण जी को लिख भेजा.
मोहन के घर में तूफ़ान आगया. पंडित राम शरण पर वज्रपात होगया. सिर धुनते उस दिन को कोस रहे थे जब बेटे की बात मान उसे सात समंदर पार भेजा था. उनके तो जीवन भर का पुन्य कुल कलंकी बेटे ने मिट्टी में मिला दिया. अब मोहन उनका बेटा नही रहा बल्कि उस अपवित्र और पापी से उनका कोई संबंध नहीं रह सकता. फोन उठा कर मोहन को जी भर के कोसा था. साथ ही चेतावनी दी थी-
“आज से तू हमारे लिए मर गया. मेरी वर्षों की साधना-तपस्या भंग कर दी. खबरदार जो कभी भूल कर भी इस घर में कदम रक्खा. तुझ जैसे बेटे से निपूता रह जाना भला है. मेरी कसम है, जो कभी स्वयं या उस कुलच्छनी के साथ यहाँ आने की कोशिश भी की तो समझ ले, फांसी लगा कर जान दे दूंगा.”
पिता के विष भरे कुवचन सुन मोहन स्तब्ध रह गया. कुछ समझाने का हर प्रयास व्यर्थ गया. पिता के शब्दों की सच्चाई से वह परिचित था. अगर वह जबरन गया तो वह अपनी जान दे देंगे. उसके पिता उसकी बात सुनने को तैयार ही नहीं थे. मोहन का दुःख उसके चेहरे पर लिखा हुआ था. अब मोहन के पास घर में फोन करने का भी साधन नहीं रह गया था. फोन करने पर उसका फोन काट दिया जाता. अब केवल कुछेक मित्रो और संबंधियों के द्वारा ही माता-पिता की कुशलता जान पाता. सब जान कर लीना अपने को अपराधी मान रही थी. उसके अपार्टमेंट छोड़ कर जाने की बात ने मोहन  को चैतन्य किया था. नहीं इसमें लीना की कोई गलती नहीं थी, यह तो उस समय दोनों की विवशता थी.
“नहीं, तुम्हें अपने को अपराधी मानने की कोई आवश्यकता नहीं है. यह मेरा निर्णय था. हमने कोई पाप नहीं किया है. हम जल्दी ही नए अपार्टमेन्ट में जा रहे हैं.
अंतिम प्रयास के रूप में मोहन ने पिता के नाम अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए क्षमा मांगी थी. पिता को विश्वास दिलाया था, उसने कोई पाप नहीं किया है, यह उसकी विवशता थी. लीना एक अच्छी और भारतीय संस्कृति तथा हिंदी भाषा की शोधार्थी है. क्षमा माँगते हुए उसने पिता से घर वापिसी की प्रार्थना की थी. उत्तर में उसके पत्र की फटी हुई चिन्दियाँ मिली थीं. उसके बाद भी मोहन की क्षमा की विनती पर राम शरण पर कोई प्रभाव नहीं पडा. माँ से बात करने का प्रयास भी सफल नही हो सका.
अंतत: मोहन ने अपना शोध-कार्य पूरा करने का निर्णय लिया था. इस निर्णय में लीना ने उसे साहस दे कर सहायता की थी. समय बीतने लगा. अचानक एक दिन लीना सीढियों से गिर गई. उसके माथे से रक्त की धार बह निकली. मोहन घबरा गया, अगर लीना को कुछ हो गया तो वह अकेला कैसे रह सकेगा. उस दिन पहली बार मोहन समझ सका लीना अब उसकी मित्र से कुछ अधिक अपनी हो गई थी. क्या लीना के मन में भी उसके लिए ऐसी ही भावनाएं हैं ,यह जानना आवश्यक था. उस पर वह किसी तरह का दबाव नहीं डालेगा, पर मोहन अपने मन का सत्य पहिचान चुका था.उसे लीना से प्यार हो गया था. हॉस्पिटल से घर वापिस आई लीना और अपने विषय में मोहन निर्णय ले चुका था. लीना से स्पष्ट शब्दों में कहा था-
“लीना, तुम मेरे जीवन की अभिन्न अंग बन चुकी हो. यदि तुम मुझे स्वीकार करने योग्य समझो तो मै तुम्हें अपनी जीवन संगिनी बनाना चाहता हूँ, पर यह केवल तुम्हारी स्वीकृति पर ही निर्भर है. तुम्हारी अस्वीकृति से हमारे संबंधों में कोई अंतर नहीं आएगा. हम पूर्ववत मित्र ही रहेंगे.”
“तुम किसी भी लड़की का स्वप्न पुरुष हो सकते हो, मोहन. तुम्हें पाना मेरा सौभाग्य होगा. मेरा स्वप्न सत्य हो गया.” कुछ देर मौन के बाद लीना ने उत्तर दिया था. मुख पर लाज की लालिमा थी.
मोहन ने झुक कर लीना के माथे पर चुम्बन अंकित कर अपने प्यार की मोहर लगा दी.
एक सप्ताह के बाद मन्दिर में कुछ साथियों की उपस्थिति में मोहन और लीना विवाह-बंधन में बंध गए.मोहन ने फिर कोशिश की थी. लीना के साथ अपने विवाह की फोटो अपने माता-पिता को  भेज कर लिखा था, उन्होंने मन्दिर में पूर्ण भारतीय वैदिक विधि से विवाह किया है, अब भावी जीवन के लिए माता-पिता के आशीर्वाद की प्रार्थना है. क्या वे उनका आशीर्वाद लेने भारत के अपने घर आ सकते हैं?        
नव विवाहित दंपत्ति के चेहरों पर कालिख लगी फोटो के साथ उनका जो उत्तर आया था. समझने को कुछ भी शेष नहीं था. उनसे क्षमा की प्रार्थाना व्यर्थ कल्पना थी. अब उस प्रसंग को भुलाना ही था .
 नए जीवन में खुशियों के फूल खिल गए थे. दोनों ने एक साथ शोधोपाधि (पीएच डी) प्राप्त की थी. उनके शोध-कार्य को बहुत प्रशंसा मिली थी. कुछ ही दिनों में दोनों को अपने-अपने विभाग में नियुक्ति की सूचना ने उनकी खुशियां दुगनी कर दीं. अब उनके जीवन में कोई अभाव नहीं था. दो कारें, टीवी ही नहीं हर संभावित सुख के साधन उपलब्ध थे. मोहन कभी –कभी यह सोच कर उदास हो जाता, काश उसके माता-पिता उनके साथ इस सुख का उपभोग कर पाते. लीना मोहन की मन:स्थिति समझती थी,उसके अभिभावक नहीं थे, काश उसे मोहन में माता-पिता का स्नेह मिल पाता. अक्सर दोनों अपने पुराने दिनों की याद करते उन्होंने ये कब सोचा था कि अपार्टमेन्ट शेयर करने से उनको जीवन भर का साथ मिलेगा.
जिस दिन नन्हें राहुल का उनके जीवन में आगमन हुआ उनकी खुशियों में चार चाँद लग गए. दोनों उसके प्यार में दीवाने थे. दिन पंख लगा कर उड़ रहे थे. मोहन के मन में एक कसक थी काश उसके माता-पिता अपने प्यारे पोते को गोद में खिला पाते. लीना मोहन के मन को समझती थी.
“मोहन, हम राहुल की फ़ोटो माँ-पिताजी को क्यों ना भेज दें. कहते हैं मूल से सूद अधिक प्यारा होता है.शायद राहुल की फ़ोटो देख कर हमें उनकी क्षमा मिल जाए.”
 मोहन को लीना की बात से आशा बंधी थी. बड़े उत्साह से राहुल की एक प्यारी सी तस्वीर के साथ बाबा-दादी को राहुल का प्रणाम लिख कर पत्र भेजा था. अब उत्तर की प्रतीक्षा थी, शायद उनकी आशा सत्य हो जाए, पोते का प्यार उन्हें क्षमा -दान दिला दे. उनकी आशा निष्फल ही रही.
दिन महीने और वर्ष बीत रहे थे. अब राहुल छह वर्ष का समझदार और मेधावी बालक बन चुका था. लीना और मोहन ने निर्णय लिया था कि वे उसे भारतीय संस्कृति और भाषा से पूर्णत: परिचित कराएंगे. शायद इसी तरह से मोहन अपने पिता के प्रति अपने कर्तव्य का पालन करना चाहता था. नन्हा राहुल जब अपनी मीठी बोली में गायत्री मन्त्र का पाठ करता तो लोग मुग्ध रह जाते. घर में वे राहुल के साथ हिंदी में ही बात करते, अपने स्कूल और बाहर राहुल अंग्रेज़ी में बात करता. मोहन राहुल को उसके बाबा-दादी के विषय में बताता. वह राहुल  के साथ पूजा करता, लीना भी उनका साथ देती.
पिछले कुछ दिनों से मोहन कुछ उदास और गंभीर रहने लगा था. कभी- कभी उसे देर रात तक कुछ लिखते देख लीना के पूछने पर वह कहता कि वह एक पेपर तैयार कर रहा है. अचानक एक रात सीने के भयंकर दर्द के साथ मोहन को अस्पताल ले जाया गया था. मोहन को गंभीर हार्ट अटैक पड़ा था. अंत: उसका दिल और नहीं झेल सका. अस्पताल जाने के पहले मोहन ने अपने पिता के नाम एक बंद लिफाफा लीना को दे कर कहा था,
“अगर मुझे कुछ हो जाए तो इस पत्र और राहुल के साथ मेरे पिताजी के पास जाना. मै जानता हूँ, तुम मेरी खुशी के लिए कोई भी त्याग कर सकती हो, अगर मेरे माता-पिता राहुल को अपने पास रखना चाहें तो मेरी खुशी के लिए राहुल को उनके पास छोड़ देना. मेरे कारण उन्होंने जीवन में अकेलेपन का जो अभाव झेला है, राहुल उस की क्षति- पूर्ति कर देगा. बोलो ऐसा कर सकोगी?”
“तुम्हारी खुशी के लिए कुछ भी करूंगी. पर ऐसा क्यों कह रहे हो? तुम ठीक हो जाओगे,”लीना की आवाज़ भीग गई, आँखों में अश्रु- कण झलक आए थे.
“एक बात और अगर पिताजी मेरे अंतिम अवशेषों का स्पर्श ना करें तो तुम मेरी अस्थियाँ गंगा में प्रवाहित कर देना. वादा करो तुम ऐसा करोगी.”
 “अभी तुम आराम करो, ऎसी निराशाजनक बातें क्यों कर रहे हो?”लीना ने साहस से कहा.
“यह लिफाफा पिताजी को दे देना.” कठिनाई से अपनी बात कहते मोहन ने हमेशा के लिए आँखें मूँद लीं.
मोहन के हाथ से बंद लिफाफा लेती लीना समझ गई मोहन किसी पेपर की तैयारी नहीं कर रहा था, बल्कि यह पत्र लिख रहा था. ऐसा क्या था कि मोहन को अपनी मृत्यु का आभास हो गया था, पर उसने लीना पर कभी कुछ प्रकट नहीं किया.
राम शरण जी को मोहन की मृत्यु की सूचना मोहन के मित्रो द्वारा फोन पर दे दी गई थी. राम शरण जी के एक मित्र को मोहन का लिखा पत्र भी फैक्स भी करा दिया गया था. इस संसार से जाने के पहले मोहन वो सारी व्यवस्था कर गया था जिससे लीना को कोई असुविधा ना हो.अपने पत्र में मोहन ने अपना दिल खोल कर रख दिया था. पिछले आठ वर्षों का माता-पता से अलगाव की पीड़ा, अपना कर्तव्य पालन ना कर पाने का असहनीय दुःख, बचपन की मीठी यादें और माता-पिता का अतुलनीय प्यार सब शब्दों में साकार कर दिया था. क्षमा मांगते हुए राहुल को अपनाने की विनती की थी. उसे यह विश्वास नहीं था कि वे लीना को अपनाएंगे, पर लीना उसकी पत्नी है, यदि उसे एक बार अपनी पुत्र वधू पुकार सकें तो उसे प्रसन्नता होगी. लीना उसकी सच्चे अर्थों में सहधर्मिणी है. उसे विश्वास है, अपने दिवंगत पुत्र की अंतिम इच्छा अवश्य पूरी करेंगे.
दो सप्ताह बाद राहुल का हाथ पकडे लीना मोहन के घर के द्वार पर खड़ी थी. राहुल कौतुक से चारों तरफ देख रहा था. दरवाज़ा खोलते राम शरण को देख लीना ने राहुल से कहा-
“ये तुम्हारे बाबा हैं, राहुल और उनके पीछे दादी हैं.” माँ की बात सुनते ही राहुल ने झुक कर राम शरण जी और सावित्री जी के पाँव छू लिए.
बाबा और दादी दोनों की आँखों से आंसुओं की धार बह निकली. राम शरण ने पोतेको गोद में उठा सीने से चिपका लिया. सावित्री प्यार से उसके बाल सहला रही थी.
“देखो सावित्री आज यह नन्हा राहुल हमारे मोहन के रूप में वापिस आ गया. लीना बहू, चलो घर के अन्दर आओ.”लीना को बाहर खडी देख राम शरण जी ने कहा.
“क्षमा कीजिए पिताजी, इस घर में प्रवेश के लिए मेरे पति जीवन भर तड़पते रहे, पर उन्हें क्षमा नहीं मिल सकी. जिस घर में मेरे पति का आना निषिद्ध था, उस घर में प्रवेश के लिए मेरे कदम नहीं बढ़ सकते.”दृढ़ता से अपनी बात कह कहती लीना की आँखें भर आईं.
“जो बीत गई, उसे भुला देने में ही समझदारी है. मोहन बेटे ने पूरी सच्चाई पत्र में लिख कर भेजी है. हमें बहुत दुःख है, हमसे भारी भूल हो गई. अब पंडित जी को बुला कर हम सबको मिल कर मोहन की आत्मा की शांति के लिए पूजा करनी है.”राम शरण जी ने अश्रु पूर्ण आँखों के साथ दुखी स्वर में कहा.
“अभी मुझे मोहन की इच्छानुसार उनके अवशेष संगम में विसर्जित करने जाना है. यदि अवशेष-विसर्जन में आपके वरद हस्त का स्पर्श रहेगा तो मोहन की आत्मा को शान्ति मिलेगी. यदि आप और माँ भी साथ चलेंगे तो हम वहीं पूजा भी संपन्न करा लेंगे.”शांति से लीना ने कहा.
मोहन की अस्थियाँ संगम में विसर्जित करते हुए मोहन और सावित्री रो पड़े,  राम शरण जी की गोद में बैठा राहुल उन्हें विस्मय से देख रहा था. पंडित जी के मन्त्रों के साथ लीना को भी मन्त्र बोलते देख मोहन के माता-पिता विस्मित थे. मोहन सत्य कहता था, लीना तो सच में भारतीय संस्कृति की पोषिका थी. काश, यह सत्य वे पहले ही मान लेते. पूजा समाप्त होने के बाद लीना संगम के पानी में उतर कर स्नान कर के भीगे वस्त्रों में ही नाव में आ गई. वह जानती थी उस अंतिम कार्य के बाद शुद्धता के लिए गंगा- जल में स्नान आवश्यक था.
“भीगे वस्त्रों में तुम अस्वस्थ हो जाओगी, बहू. घर चल कर स्नान कर लेतीं.”सावित्री ने स्नेह से कहा.
“संध्या चार बजे मेरी अमरीका के लिए फ्लाइट है. मुझे एयरपोर्ट जाना है.”
“यह क्या कह रही हो, क्या तुम हमारे साथ यहाँ नहीं रहोगी?”सावित्री चौंक गई.
“क्या तुम राहुल को भी ले जाओगी? हमे इतना कठोर दंड मत दो. बहू.”राम शरण जी ने राहुल को अपने से चिपटा कर अश्रु विगलित स्वर में कहा.
“राहुल आपकी अमानत है, मोहन की अंतिम इच्छा थी कि राहुल आप दोनों के संरक्षण में बड़ा हो. उसके पिताजी उसे अपने संस्कार दें. हम दोनों ने यह प्रयास किया था, पर अब राहुल आपका दायित्व है. शायद मै अकेली राहुल को आपकी तरह से संस्कारित ना कर सकूं.”स्वर में कुछ उदासी झलक आई थी.
“राहुल के बिना तुम अकेली कैसे रह सकोगी, बहू? तुम नहीं जानतीं अपने बेटे के बिना जीवन मृत्यु से भी बदतर होता है. हमें माफ़ कर दो और यहीं हमारे साथ रहो.”सावित्री ने रुंधे कंठ से कहा.
“वैसे ही रहूंगी जैसे गत आठ वर्षों से मोहन के बिना आप दोनों ने समय बिताया है. वैसे भी मै अकेली क्यों रहूंगी, मोहन तो सदैव मेरे साथ रहेंगे. आप तो ज्ञानी हैं, पिताजी. आत्मा तो अमर है. मोहन कहीं नहीं गए हैं. मुझे विश्वास है, मोहन मेरे इस निर्णय से प्रसन्न होंगे.
नैनं छिदंति शस्त्राणी, नैनं दहति पावक,
न चैनं क्लेदयां तापो, नैनं शोशयाति” 
एयर पोर्ट के लिए घर के बाहर खड़ी टैक्सी में बैठने के पहले राहुल को प्यार से चूम  लीना ने कहा था-
“तुम्हारे पापा चाहते थे तुम अपने बाबा की तरह से ज्ञानी बनो. बाबा-दादी की बात मानना. “
राहुल को विस्मित छोड कर राम शरण जी से विनीत स्वर में कहा-
“पिताजी आपसे एक विनती है, राहुल को अंध विश्वास और रूढ़िवादिता से दूर रखिएगा.  भारतीय संस्कृति सभी जाति और धर्मों को समान सम्मान देने को कहती है. मनुष्यों के बीच इस आधार पर भेदभाव करना उचित नहीं होता. राहुल को एक अच्छा और सब धर्मों का सम्मान करने वाला इंसान बनाइएगा, यही मेरी विनती है.”लीना का कंठ भर आया था.
“तुम्हारी बात समझ गया हूँ, अब मेरी आँखें खुल गई हैं. तुम जैसी पुत्र वधू की अवज्ञा मेरा अक्षम्य अपराध था. काश मोहन की बातें मान लेता. मै तुम्हारा और मोहन का अपराधी हूँ. मेरी भगवान् से यही प्रार्थना रहेगी कि तुम हमें क्षमा कर दो और हम साथ रह सकें.”राम शरण की आँखें अश्रुपूर्ण थीं.
“बड़े लोग क्षमा नहीं माँगते बल्कि अपना आशीर्वाद देते हैं.”
झुक कर राम शरण जी और सावित्री के चरण स्पर्श कर राहुल की पुकार को अनसुना कर, लीना तेज़ी से जाकर टैक्सी में बैठ गई. राहुल के साथ उसके बाबा-दादी दूर जाती टैक्सी को स्तब्ध देखते रह गए.


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